बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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पिता से सुखी, विद्वान्, स्वजातिगुण से युक्त, दूसरे अंश में पूर्व का ही फल,
तीसरे अंश में स्वतंत्र।।२६।।
क्षेत्रदारसुहृत्पुत्रकलत्रैर्बहुभिर्वृतः ।
पंचमेव्याधितः षष्ठे बहुव्ययपरायणः ।।२७।।
छठें अंश में अधिक व्यय करने वाला होता है।।२७।।
पंचविंशे तु षष्ठांशे फलहीनस्तु जीवति ।
षड्विंशे प्रथमांशे तु दरिद्रः स्यात्सुतोऽपिसन् ।।२८।।
पच्चीसवीं रश्मि के छठें अंश में निष्फल जीवन वाला, छब्बीसवीं रश्मि के
प्रथम अंश में दरिद्र।।२८।।
पितुःकार्ये तु वृद्धिःस्याद्द्वितीये पितृवेश्मतः ।
अन्यत्रगत्वा तत्रैव स्वयोगेन च कर्मणा ।।२९।।
दूसरे अंश में अपने गृह से अन्यत्र दूसरे स्थान में शरीर पोषण करने
वाला।।२९।।
स्वदेहपोषकोऽन्येंऽशेधनी च कृत्यवित्स्थितः ।
चतुर्थे पंचमे चैव पट्टबंधादिसंयुतः ।।३०।।
तीसरे अंश में धनी कार्य को जानने वाला, चौथे पांचवें अंश में पट्टबंधादि
से युक्त।।३०।।
अतीवधनवान्सस्यात्षष्ठेत्वंशे स्वदेहभाक् ।
क्षेत्रदारादिवृध्या तु व्यथा व्याधिसमन्वितः ।।३१।।
छठें अंश में धनी, सातवें अंश में देह पोषण करने वाला, आठवें अंश
में खेत और स्त्रियों की वृद्धि से जीवन चलाने वाला।।३१।।
नवमे धनहानिःस्यात्पुत्रदारविवर्जितः ।
यावद्दश नवांशाश्च षड्विंशवदथ द्वये ।।३२।।
नवें अंश में मानसिक रोग से युक्त, दशम अंश में धनहीन, स्त्रीपुत्रहीन
हो, सत्ताइस और अट्ठाइस रश्मि के फल पूर्वोक्तवत्।।३२।।
राजप्रियस्तत्रंशंडः शुद्धः स्यादंशकेततः ।
एकोनत्रिंशे रश्मौ तु सुखी स्याच्च द्वितीयेके ।।३३।।
उनतीसवीं रश्मि के प्रथम अंश में जन्म हो तो सुखी होवें, दूसरे अंश में
राजसेवी तीसरे अंश में सत्कर्म करने वाला।।३३।।