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बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

७१० वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
मूलरोगी च पिशुनः सदा दानपरो शुचिः ।
सेवाकरः सुभाषी च धनवाँल्लोभसंयुतः ।।२२।।
प्रख्यातो विद्यया भीरूर्बुद्धि श्रीमान्सुशीलकः ।
परदाररतः श्रीमान्सुशीलो बलवान्गुणी ।।२३।।
अध्वन्योनिगमव्यग्रः पातकीच तपोयुतः ।
परदाररतो वेश्यासक्तोऽसत्फलवासनः ।।२४।।
सिंहासनस्थो रिक्तश्च जटिलः कुलपांशनः ।
योगी बुद्धश्च सन्यासी सेनानीर्बुद्धिमान्सुखी ।।२५।।
कुष्ठी भूतकरः श्रीमानेकपुत्र समन्वितः ।
शास्त्रज्ञो दासकृत्यश्च चंडरोष समन्वितः ।।२६।।
स्त्रीसक्तः परदारोक्तो भृत्यः पटुररोगवान् ।
कुरूपश्चापि कुशलो जितारिः पुत्रवर्जितः ।।२७।।
शूरोवीरश्च चंडश्च कुशलः कुक्षिरोगवान् ।
ग्रामणीविटपो° धूर्तः सतीपतिररिंदमः ।।२८।।
वंध्यापतिः सुरापी च रिक्तसाध्यपतिः सुखी ।
विजयी युद्धभीरुश्च चोरोऽमर्षी जनार्जकः ।।२९।।
धनार्जनाय सततमकृत्य शतकारकः ।
वृषलीपतिरिन्द्रश्च सेनानीः सत्यवाक्छुचिः ।।३०।।
शिरोरोगी च कुष्ठी च मेही च पिशुनः सुखी ।
जलवद्रोगसंयुक्तः कृतज्ञो निर्गुणो घृणी ।।३१।।
विवादशीलः सुमुखः क्रोधनः कामुकः पटुः ।
चलचित्तो धनी वाग्मी विद्यार्जनपरः सुखी ।।३२।।
अपुत्रः कृषिकृद्धीरः परदाररतः शुचिः ।
विद्याहीनश्च मूर्खश्च बुद्धिमान शास्त्रपारगः ।।३३।।
सदाभीरुर्शठो वाग्मी कृत्येषु कुशलः सुखी ।
नीतिज्ञो लेखको नीचजातिकृत्यंरतः पटुः ।।३४।।

अथ चतुर्दशोऽध्यायः । ७११
प्रेष्यो गोमयविक्रेता वदान्योधनवंचकः ।
सेनानीः क्षेत्रवान् वीरो लेखवृत्या च जीवति ।।३५।।
मूर्खों जितेन्द्रियो वाग्मी सदाकृत्यपरः सुखी ।
अन्नदाताच मिष्ठाशी शिवभक्तो जितेन्द्रियः ।।३६।।
कुब्जो वक्रशरीरश्च जात्यंधो वधिरः शठः ।
अमर्षी नर्तकः क्रुद्धो दुर्जनो वेदपारगः ।।३७।।
वक्ता च गायकः श्रीमान् सर्वदा चजनार्जकः ।
तालज्ञो विद्यया युक्तः पंच पंचासदुत्तरम् ।।३८।।
शतं गुणाश्च श्रीयोगा एकयोगावसानक्रमम् ।
पूर्वपूर्वयुता ओजे युग्मे राशौ तु वामतः ।।३९।।
चरे क्रमः स्थिरे वाममुभयोर्धपदादितः ।
आदौ त्रिंशद्गुणा ह्यतै वामतस्त्रिंशदेवहि ।।४०।।
षष्ठ्यंशेतु गुणः प्रोक्ताः प्राग्वदोजचरादिकाः ।
दशवर्ग से फलादेश कहते हैं जो कि स्पष्ट हैं। विशेष यह है कि विषम नवांश
हो तो श्रीमान् योग से समराशि का नवांश हो तो विद्वान् योग से आरम्भ कर श्रीमान्
योग तक और चर राशि में क्रम से स्थिर राशि में विलोम से द्विस्वभाव राशि में
अर्धभाग से क्रम लेना चाहिये।।३९-४०।।
राहोः गतिः-
मेषादुत्क्रमतो राहुः केतुर्यादि वृषात्क्रमात् ।।४१।।
राहु मेष राशि से विपरीत क्रम से और केतु वृष राशि से क्रम से जाता
है।।४१।।
अस्य प्रयोजनम् -
ऋक्ष संध्यन्तरे जातः प्रष्टासौ म्रियते भृशम् ।
केतुराहुस्थिते राशौ भसंधौ मरणं भवेत् ।।४२।।
राहु केतु नक्षत्र प्रवेशान्तर के समय जन्म हो तो निश्चय ही प्रश्नकर्त्ता की मृत्यु
होती है।।४२।।
इतरेषां त्रयाणां च प्रकाशे व्याधिपीडितः ।
दुर्बलो बुद्धिहीनश्च जायते न मृतो यदि ।।४३।।

७१२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
ग्रह केतु से युक्त राशि के संधि में प्रश्न हो वा जन्म हो तो भी मृत्यु होती
हैं, इसी प्रकार अन्य धूम, कार्मुक परिवेश के उदय राशि में प्रश्नकर्त्ता व्याधि से
पीड़ित होता है।।४३।।
अथ पित्र्याद्यरिष्ट विचारः-
कलांशराशितोऽरिष्टे नक्षत्रारिष्टसंभवे ।
पित्रादीनां सुतस्यापि तद्दशाञ्चिन्तयेत्सुधीः ।।४४।।
यदि षोडशांश से और नक्षत्र से अरिष्ट योग आता हो और भाव को पापग्रह
देखता हो या उसमें पापग्रह युत हो तो पित्रादि को और पुत्र को भी अशुभ होता
है।।४४।।
पावशत्रुग्रहाकांता भावास्तद्दृष्टिसंयुताः ।
सौम्यपापादयश्चैवं शुभाशुभफलप्रदाः ।।४५।।
पाप शत्रु ग्रह से भाव युक्त हो वा उसके दृष्टि से युक्त हो, तो शुभग्रह का
दृष्टि योग हो तो शुभद होता हैं और पापग्रह का दृष्टियोग हो तो अशुभ होता
है।।४५।।
एकद्वित्रिचतुः पंचषट्सप्ताष्टदिग्धराः ।
सूर्येन्दुन्नृपमूर्च्छेन्द्रनृपभार्क नृपाजिताः ।।४६।।
पंचाष्टवसुभूतेषु सुरदंताजिनाद्रयः ।
नखास्त्रिंशत्खवेदाः षट्सप्ततिः षष्टिरिद्रियुक् ।।४७।।
नवतिश्च शतं मूर्च्छा जिना दंता जिना दिशः ।
एवं नवशतं प्रोक्ताः क्रमादैवं तु तत्रतु ।।४८।।
पूर्वं पूर्वं युता संख्या लक्ष्मीयोगफलप्रदा ।
नक्षत्रे राशिचक्रे तु दिवसे वामतः स्मृताः ।।४९।।
शेष योगों का विचार पूर्वा पर संबंध से देखना चाहिये।।४६-४९।।
सुगतिदुर्गतिअंश-
शुभमित्रग्रहाक्रांता भावास्तद्दृष्टिसंयुताः ।
द्वित्रिपंच च षट् सप्त वसुनंददिशोऽद्रयः ।।५०।।
यदि भाव शुभग्रह या मित्र ग्रह से आक्रांत हो वा देखा जाता हो तो
२।३।५।६।७।८।९।१०।७ ।।५०।।

अथ चतुर्दशोऽध्यायः । ७१३
त्रिंशद्दिशो नखाः षष्ठिसूर्यमूर्च्छाजिनाजिनाः ।
आकृतिर्भानिभाकार्ग्निनखाश्छंदः शतं नखाः ॥५१॥
३०।१०।२०।६०।१२।३१।२४।२१।२७।२२।३।२०।२६।१००।२०।२
॥५१॥
त्रिंशत्खवेदा दिग्विश्त्रे शतं षष्ठिः शतंजिनः ।
वेदाः खवेदाः पूर्वार्धे परार्धे प्राग्वदत्रतु ॥५२॥
एते योगवलाच्चैव केवलं दुर्मतिप्रदाः ।
३०।४०।१०।१३।१००।६०।१००।२४।४।४० के पूर्वार्ध में और
राशि के उत्तरार्ध में विलोम क्रम से दुर्गति हैं॥५२॥
कुब्जादियोगाः-
दिनर्क्ष चक्रसंख्याः स्युरादिमध्यावसानिकाः ॥५३॥
दिन, नक्षत्र और राशि इनकी संख्या आदि मध्य और अंत्यभाग का
योग॥५३॥
सप्तविंशतिसप्तत्यां शते षष्ठ्यां शतद्वये ।
षट्पंचांशतिविंशे च षण्णवत्यामशीतिके ॥५४॥
यदि २७।७०।१००।६०।२००।६।५०।२०।९६।८० ।५४।
षष्ठिभागे च विंशत्यां शतषष्ठ्यां शतद्वये ।
कुब्जः कलांशेमूकस्तु शतद्वयशतत्रये ॥५५॥
१०।६०।२०० हो तो कुब्ज होता है। यदि २००, ३०० ।।५५।।
सहस्रे द्विशते जातः पंचमे पापसंयुते ।
द्वित्रिपंचाष्टदिग्विश्नृपातिधृतिभूमयः ॥५६॥
१०००, २०० हो और पाँचवें भाव में पापग्रह हो तो मूक होगा।
२।३।५।८।१०।१३।१६।१८।१ ।।५६।।
नवदिग्भसुरैस्तानैस्तिथिविश्वाष्टकैः क्रमात् ।
गुणेन वामतः प्रोक्तो लक्ष्यंशे श्रीसमन्वितः ॥५७॥
९।१०।२७।३३।४९।१५।१३।८. इनको वांयें भाग से गुंणने प्राप्त अंश
लक्ष्यंश में श्रीमान् होता है॥५७॥

७१४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
योगान्तरम् -
रविचन्द्रतमपातकालेष्वरिभवेषु च ।
पंचाशीतिशते वेदे मनौद्वित्रिशते पुनः ।।५८।।
यदि सूर्य चन्द्र राहु पातकाल में ६।११ तथा ८५।२००।४।१४।२।३।२००
।।५८।।
खाब्धिपंचंसु दिग्भागे सहस्रे चाक्षिचन्द्रगे ।
खखाग्निरूपं विश्वाष्ट त्रिचन्द्रखखभूमिपैः ।।५९।।
४०।५।१०।१३००।१३।८।३।१।१६०० इन योगों में चन्द्रमा युक्त हो
तो बधिर होता है।।५९।।
मृत्युकालज्ञानम् -
शताधिके च जातोऽस्मिन्वधिरः षष्ठि संयुतो ।
कर्किवृश्चिकमीनांशे तद्राशीशांशके तथा ।।६०।।
कर्क, वृश्चिक और मीन के अंश में इनके स्वामियों के (चंद्र, भौम, गुरु)
इनके नवांश में।।६०।।
पातकेत्वोश्च शत्र्वृक्षगतयो रंशकेपुनः ।
एकादित्रिंशतैर्वित्क्रमात्तास्तु सुभाजिताः ।।६१।।
पात में अथवा उच्च, शत्रु राशि में स्थित ग्रह के अंश में जो संख्या हो उससे
१ से लेकर ३०० तक।।६१।।
आकाशपूर्णधृतयो निःशेषं लब्धसंख्यके ।
सदोषेऽतराशेतु जातस्यैतेऽपमृत्यवः ।।६२।।
१८०० में भाग देना जिससे निःशेष हो जो लब्धि प्राप्त वह यदि सदोष
(पापग्रह से युक्त हो) तो जातक का लब्धि तुल्य वर्ष में अपमृत्यु कहना।।६२।।
अल्पंमध्यदीर्घायुर्ज्ञानम् -
पंचाशतः षडावृत्या स्वल्पमध्यचिरायुषः ।
क्रमेणोत्क्रमशस्ते तु त्रैराशिकविधानतः ।।६३।।
पीछे कहे हुये ५० कुब्ज आवृत्ति के वर्ष से त्रैराशिक रीति से गणना करके
प्रथम आवृत्ति में अल्पायु दूसरे आवृत्ति में मध्यमायु और तीसरे आवृत्ति में चिरायु
चौथे आवृत्ति में उत्क्रम से दीर्घायु पाँचवीं आवृत्ति में मध्यमायु और छठी आवृत्ति
में अल्पायु समझना चाहिये।।६३।।✿
✿ वर्षण्याहं— शराः दिशास्तिथयः नखाः तिथयः दश एवं षडिति।

अथ चतुर्दशोऽध्यायः । ७१५
चतुर्दशग्रहाणांषष्ठ्यंशादिः-
खाक्ष्यद्रयस्तुषष्ठ्यंशास्त्रिंशांशाः खरसान्ग्नयः ।।६४।।
बारह राशियों में ७२० षष्ट्यंश।।६४।।
अष्टषट्भूमयः कालहोराः सप्तदिनेषु च ।
वेदेन्द्रा द्वादशांशा, स्युर्नवांशा गजखेंदवः ।।६५।।
३६० त्रिंशांश, १६८ कालहोरांश, १४४ द्वादशांश, १०८ नवांश।।६५।।
सप्तांशा वेदनागास्तु द्रेक्काणास्तु षडग्नयः ।
अर्धहोराजिनाः प्रोक्ता नक्षत्राणि चराशयः ।।६६।।
८४ सप्तमांश, ३६ द्रेष्काणांश और २४ अर्धहोरांश ये क्रम से नक्षत्र राशि
के होते हैं।।६६।।
भुंजते च ग्रहाश्चैव मनुसंख्यैश्च भुंजते ।
राशयश्च ग्रहाश्चैव नक्षत्राणि च भुंजते ।।६७।।
इनको १ सूर्य, २ चन्द्र, ३ भौम, ४ बुध, ५ गुरु, ६ शुक्र, ७ शनि, ८
राहु, ९ केतु।।६७।।
ख्यादिशिखिपर्यन्ता नवभूमेन्द्रकार्मुकौ ।
पातश्च परिवेशश्च कालश्चेति चतुर्दश ।।६८।।
१० भूमा, ११ इन्द्रचाप, १२ पात, १३ परिवेश, १४ काल ये भोगते
हैं। कौन किस अंश में है इसे देखकर फल का विचार करना चाहिये।।६८।।
अथ नक्षत्रगणनाक्रमः-
तेषां प्रादुर्भावे चैव भंगदास्तु नवग्रहः ।
दस्रात्पंच भगात्षट्क पंचार्द्राद्दारूणादपि ।।६९।।
अश्विनी से ५, पूर्वाफाल्गुनी से ६, आर्द्रा से ५, शतभिष से ४।।६९।।
मित्रान्नवक्रमात्प्रोक्तास्तत्तद्देशेषु सर्वदा ।
अक्षिणी पंचदश च नखास्तत्त्वं तथामराः ।।७०।।
और अनुराधा से ७ ये नक्षत्र पूर्वोक्त अंशों में रहते हैं क्रम से
२।१५।२०।२५।३३ ।।७०।।
सत्र्यंशाश्चषडंशोनाश्चत्वारिंशत्क्रमादथ ।
शतं खेष्विंदवः प्रोक्ता विनाडीतनयोऽपिच ।।७१।।
३३।३३।४०।१००।१५० ये नाडियाँ अर्धहोरा आदि के योगकाल हैं।।७१।।

७१६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
काल्यंशवद्यर्धहोरांशभोगकालः प्रकीर्त्तितः ।
प्रमाणराशयश्चैते भागहारा कलात्मकाः ।।७२।।
तत्तद्देशकला इच्छाराशयो गुणराशयः ।
कटुको मधुरतिक्तः कषायो लवणाम्लकौ ।।७३।।
कलांश में उत्पन्न हुये का कटुक, मीठा, तीता, कषैला, नमक, अम्ल।।७२-
७३।।
कालांशेक्रमतो गण्याः षष्ठ्यंशेव्युत्क्रमात्स्मृताः ।
त्रिंशांशेतु कषायादिःकालहोरांशके पुनः ।।७४।।
क्रम से गणना करने से जो रस आवे वह उस वर्ष में उसे प्रिय होता है।
षष्ठ्यंश में उसे अम्ल से कटु पर्यन्त इस क्रम से, त्रिंशांश में कषाय से तिक्त
पर्यन्त।।७४।।
तिक्तादि द्वादशांशेषु मधुरादि नवांशके ।
अम्लादिमुनिर्भागे तु द्रेष्काणे मधुरादितः ।।७५।।
द्वादशांश में मधुरादि क्रम, नवांश में अम्लादि क्रम, सप्तांश, अर्ध होरा और
द्रेष्काण में मधुरादि क्रम से गिनना चाहिये।।७५।।
षष्ठ्यंशोत्पत्तौफलम् -
अर्धहोरांशके तद्वज्जातस्यैवं प्रजायते ।
वेदाष्टदशभैरमैः प्रषष्ठ्यंशे च भास्करे ।।७६।।
यदि कन्या के जन्म समय में सूर्य ४।८।१०।२७।३ संख्यक षष्ठ्यंश में
हो तो वह कन्या बंध्या होती हैं।।७६।।
त्रिषट्न्वत्रिर्वाकार्ध्विजिनदंतसुराः क्रमात् ।
नवदिग्भैर्जिनाकैश्र्च सूर्यैस्तांस्त्रिपंचभिः ।।७७।।
तथा ३।६।९।३।०।१२।४।२४।३२।३३ इन अंकों को क्रम से
९।१०।२७।२४।१२।१२।४९।३।५।५० से गुण ने जो प्राप्त हो उतने संख्या
के षष्ठ्यंश में सूर्य हो तो कन्या पूज्या (पूजनीया) होती हैं।।७७।।
मृतपुत्र-कन्यायोग-
पंचाशद्भिःक्रमाद्गुण्या वंध्यावंध्या प्रकीर्त्तिताः ।
त्रिवेदाद्यंकविश्वेंद्र नखच्छदोजिनायमाः ।।७८।।

अथ चतुर्दशोऽध्यायः । ७१७
पंचाशच्च शतं पूर्वयुताः मृतसुता स्मृता ।
पुत्राणां तु कलांशे तु शेषे जाता मृता द्विज ॥७९॥
३।४।७।९।१३।१४।२०।२६।२४।२।५०।१०० इनमें पूर्व अंकों को
जोड़ने से जो संख्या हो तत्तुल्य अंश में सूर्य हों मृतसुता उत्पन्न होती है। उक्तांश
से शेष अंशों में सूर्य हों तो उत्पन्न पुत्रों में मृत पुत्र भी होंगे॥७८-७९॥
अथ संन्यासयोगः-
द्वादशे च चतुर्विंशे चतुस्त्रिंशे सुरांशके ।
द्विसप्तांशे नवांशे षष्ठयुत्तरशतांशके ॥८०॥
यदि १२।२४।३३।७२।९।१६० ॥८०॥
षट्शते च सहस्रे च खखाहीन्द्वंशके पुनः ।
खांशातिथ्यंशके जातो भवेत्प्रव्रजितो नरः ॥८१॥
६००।१०००।१८०।१५।१० संख्यक अंश में जन्म हो तो सन्यासी होता
है॥८१॥
परमहंसादियोगाः-
गुरुशुक्रोदये राशौ तयोः परमहंसकः ।
शत्रुराशिगतौ तौ चेदप्रकाशयुतौ तु वा ॥८२॥
गुरु शुक्र के उदय की राशि में जन्म हो तो परमहंस होता है। यदि वे शत्रुराशि
में हों अथवा धूमादि अप्रकाश ग्रह से युक्त हों तो॥८२॥
भ्रष्टः स्यात्तु तथा ज्ञेतु त्रिदंडी वा वहूदकः।
रवौ जटाधरः शैवः कुजे नग्नोऽटनः स्मृतः॥८३॥
भ्रष्ट परमहंस होता है। ऐसे ही बुध हो तो त्रिदंडी सन्यासी होता है वा वहूदक-
होता है। सूर्य हो तो शिवभक्त, भौम हो तो नग्न घूमने वाला॥८३॥
मंदे बौद्धोऽथ वाग्मी स्याद्राहौ केतौ तथैव च ।
धूमे कापालिकाश्चापे काले तु परिवेषके ॥८४॥
गूढ़पापो यथा लिंगी कुलमार्गतस्तथा ।
शनि हो तो बौद्ध धर्मावलम्बी, राहु वा केतु जन्मराशि में हों तो बौद्ध सन्यासी,
धूमग्रह हो तो कापालिक, चाप, काल, परिवेष हो तो गुप्तपापी, पाखंडी,
कुलमार्गानुकूल चलने वाला होता है॥८४॥

७१८ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
प्रव्रज्यायांनिष्टायोगः-
षष्ठ्यंशे ऋक्षसन्ध्यंशे सार्पे पौष्णेन्द्रभांशके ।।८५।।
षष्ठ्यंश में, नक्षत्र संध्यंश में, आश्लेषा, रेवती, ज्येष्ठा के अंश में।।८५।।
त्रिंशांशे कालहोरांशे तत्तदंशांशेऽपि च ।
नवमूर्च्छासुरांशे तु यथा षष्ठितमे युतः ।।८६।।
त्रिंशांश में, कालहोरांश में, नवांश में, मूर्ना ४९ अंश में ३३वें अंश, ६०वें
अंश ।।८६।।
शतांशेखाब्धितिथ्यंशे द्वादशांशे नवांशके ।
राश्यंतांशे तु सप्तांशे ऋक्षसंधिमृगांतिके ।।८७।।
१०० वें अंश में, १५४० वें अंश में, द्वादशांश में, राशि के अतिमांश
में, सप्तांश में नक्षत्र संधि में।।८७।।
मृगकर्कालिसिंहादिर्मीनतौल्यंशकादिमे ।
अंत्यांशेऽपि च जातस्य षष्ठ्यर्थाक्षिजिनैरदे ।।८८।।
मकर, कर्क, वृश्चिक, सिंह, मेष, मीन, तुला के आदि या अंतिम अंश में
उत्पन्न होने वाले, ६, ५, २, २४, ३२ अंशों में।।८८।।
द्रेष्काणेचार्द्धहोरायां त्रिसप्ते च नखेषु तु ।
जातः प्रव्रजितश्चैषु सर्वत्रैकयुतेष्वपि ।।८९।।
द्रेष्काण में अर्द्धहोरा में ७३, २० वें अंश में वा पूर्वोक्त अंकों में एक जोड़ने
से जो अंक हो उन अंशों में उन अंकों में उत्पन्न होनेवाले सन्यास धर्म में श्रद्धा
रखनेवाले होते हैं।।८९।।
अथ अंशविशेषजातायांस्त्रीलक्षणम् -
पापाप्रकाशसंयोगे कलत्रेत्वशुभं भवेत् ।
रवौवंध्या तु शीतांशौ क्षीणे तु व्यभिचारिणी ।।९०।।
सातवें भाव में पापग्रह हो अथवा अप्रकाशग्रह हो तों स्त्रीदुष्टा हो, सूर्य हो
तो बंध्या, क्षीणचन्द्र हो तो व्यभिचारिणी।।९०।।
कुजे तु प्रियते मन्दे दुर्भगा राहुसंयुते ।
परदाररतिः स्वीयनिषेकाभावतोऽसुताः ।।९१।।

अथ चतुर्दशोऽध्यायः । ७१९
भौम हो तो स्त्री का नाश, शनि हो तो दुर्भागिनी और राहु हो तो परस्त्रीगामी
होता है।।९१।।
धूमे विवाहहीनः सन्म्रियते कार्मुकेसति ।
परिवेशेतु दुःशीला केतौवंध्याऽसतीभवेत् ।।९२।।
धूम हो तो बिना विवाह के ही मर जावे, कार्मुक हो तो भी वही फल हो,
परिवेश हो तो स्त्री दुःशीला हो, केतु हो तो वंध्या और कुलटा हो।।९२।।
कालेऽभावस्य पापे तु गर्भश्रावेण संयुता ।
सुशीला स्त्रीप्रसूता च पूर्यमाणे तु शीतगौ ।।९३।।
काल हो तो स्त्री का अभाव, पापग्रह हो तो गर्भस्राव हो, पूर्ण चन्द्रमा हो
तो सुशीला, कन्या प्रजावती हो।।९३।।
बुधे त्वपुत्रा जीवेतु गुणयुक्ता सुपुत्रिणी ।
शुक्रे सौभाग्य संयुक्ता श्रीमतीपुत्रिणीभवेत् ।।९४।।
बुध हो तो पुत्र हीन हो, गुरु हो तो गुणी और पुत्रवती हो। शुक्र हो तो
सौभाग्यवती, लक्ष्मी से युक्त और पुत्रवती हो।।९४।।
अथ दशमभावानुसारफलम् -
एष्वेवं दशमे पापपुण्यकर्मरतो भवेत् ।
पंचाशद्भिः सुरैस्तत्त्वैनृपैश्च मुनिभिग्रहैः ।।९५।।
जिस प्रकार से सप्तम भाव से स्त्री के फल का विचार किया है उसी प्रकार
से दशम भाव से व्यापार आदि शुभाशुभ कर्मफल का विचार करना चाहिये। दशम
भाव शुभयुक्त वा दृष्ट हो तो शुभ कर्मफल जानना, पापग्रह से दृष्ट युक्त हो अशुभ
कर्मफल जानना चाहिये। मिश्रित ग्रह हों तो मिश्रफल इसमें भी शुभ पाप की संख्या
के समान ही शुभ पापफलों को न्यूनाधिक कहना।।९५।।
अष्टभिः षड्भिरेवाथ सप्तादिभिरनुक्रमात् ।
पंचादिभिश्च होराः स्युरेकोपचयैरथ ।।९६।।
इसमें भी ५० । ३३ । २५ । १६ । ७ । ९ । ८ । ६ । ७ तथा पाँच से एक पर्यन्त तथा
पूर्वोक्त अंकों में एक जोड़ने से।।९६।।
पापपुण्यक्रियाकर्त्ता क्रमाल्लब्ध्वांतरांशजः ।
आवृत्तितरुतरा प्रोक्ता पापपुण्यक्रियारतिः ।।९७।।

७२० • बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
जो हो उन अंशों में जन्म होने से पाप शुभ ।।९७।।
मिश्रे तु मिश्रं त्वाधिकवशादेव निर्णयः ।
मिश्रक्रिया ग्रहानुसार होती हैं।
वर्णाश्रमाचारविहीबुद्धिः स्त्रियांचपापी परदारसक्तः ।
क्षेत्रापहारी च परस्वसर्वं निहत्य योगं सकलं करोति ।।९८।।
वर्ण और आश्रम के आचार में हीन बुद्धिवाला, स्त्रियों के प्रति पाप बुद्धि
वाला, परस्त्रीगामी, दूसरे की भूमि को अपहरण करने वाला, दूसरे के सर्वस्व को
अपहरण करने वाला।।९८।।
परस्यचोत्कर्षविघातकारी विषाग्निदः घातककर्मकृच्च ।
ग्रामस्य देशस्य च विप्रवर्यः धनापहारी व्यसनेकृतार्थः ।।९९।।
दूसरे के उत्कर्ष को नाश करने वाला, विष और अग्नि को देने वाला, ग्राम
को जलाने वाला, ब्राह्मण और देवता के धन को हरण करने वाला पातक कर्म
करने वाला होता है ।।९९।।
मृतिप्रदं कर्मकरोति सूर्यात्प्राप्यप्रकाशः सितशीतगोश्च ।
दयारतो दानरतः सुतेजाः स्वाचारपाला विजितेन्द्रियश्च ।।१००।।
सूर्य हो तो मारण कर्म करने वाला, चंद्रमा और शुक्र हो तो प्रसिद्ध होता
है। भौम से दयारत, दानरत, सुन्दर तेजवान्, आचारयुक्त, इन्द्रियों को जीतने
वाला।।१००।।
इष्टं च पूर्तं च करोति जीवे शुक्रेवदान्यः कृतदारशीलः ।।१०१।।
गुरु हो तो इष्टापूर्त कर्म करने वाला, शुक्र हो तो दाता, शनि हो तो स्त्रीशील
हो।।१०१।।
अथ मेषादि राशीनां फलानि।
मेषे त्वगम्यागमनप्रियश्च त्वभक्ष्यक्ष्योवृषभेसुशीलः ।
देवेशदेवालयधर्मकारी युग्मेविरक्तोऽत्यधनैर्विहीनः ।।१०२।।
मेष राशि में जन्म हो तो अगम्यागमन, अभक्ष्य को भक्षण करने वाला वृष
राशि में अच्छा स्वभाव, शिव, विष्णु का उपासक, मिथुन राशि में वैराग्य
युक्त।।१०२।।
चान्द्रे च तीव्रं च करोतिपापं परस्वहर्तापि च पूर्वकारी ।
सिंहे तु देवस्य विघातकारी पाथोनके धर्मरतिः सुकृत्यः ।।१०३।।

अथ चतुर्दशोऽध्यायः । ७२१
कर्क राशि में अत्यन्त पाप करने वाला, दूसरे के धन को हरण करने वाला,
पूर्त कार्य (कूंआं आदि) करने वाला, सिंह राशि में देवस्थान का नाश करने वाला,
कन्याराशि में धर्म में प्रेम और सत्कर्म करने वाला।।१०३।।
जूके परेषां धनदश्च पूर्तं करोति चापेऽपि च वृश्चिकेतु ।
परस्वहर्ता परदारसक्तो मृगेऽपि चैवं घटभे कृतज्ञः ।।१०४।।
तुला में दूसरों को धन से पूर्ण करने वाला, धन में भी पूर्वोक्त फल, वृश्चिक
राशि में दूसरे के द्रव्य को हरण करने वाला दूसरे की स्त्री में आसक्त, मकर में
भी पूर्वोक्त फल, कुम्भ राशि में कृतज्ञ।।१०४।।
यज्ञस्य कर्त्ता झषभे तथैव पूर्तादिकारी वहुयोजकःस्यात्।
और यज्ञकर्त्ता और मीन राशि में पूर्त आदि काम को करने वाला और अनेक
योजना करने वाला होता है।
अथ सूर्यादीनां कालांश फलम् -
नर्तको गायको वंदी शिल्पी याञ्चापरस्ततः ।।१०५।।
सूर्यादि के कालांश में उत्पन्न होने से क्रम से नाच को जानने वाला गाने
वाला, राजा की स्तुति करने वाला, कारीगरी को जानने वाला, याचक।।१०५।।
गायको नर्तको भारवाही प्राणतियोजकः ।
प्रेष्यश्च भारकोवंदी याचको धातुवादकः ।।१०६।।
गायक, नर्तक, बोझा ढोने वाला, नम्र रहने वाला दास वृत्ति करने वाला,
वंदी, याचक, धातु के कामको करने वाला।।१०६।।
वेदाध्यायी स्मृतिज्ञस्तु शैवाश्रमकृतश्रमः ।
शिल्पलेखनकर्त्ता च मीमांशान्यायतर्कवित् ।।१०७।।
वेद पढ़ने वाला, स्मृति शास्त्र को जानने वाला, शिवदीक्षा में प्रवीण, शिल्प
को लिखने वाला, मीमांशा न्याय तर्क का जानकार।।१०७।।
पंचरात्रार्थशास्त्रज्ञः इतिहासपुराणवित् ।
आयुधश्रमहेतुश्च आयुर्वेदकृतश्रमः ।।१०८।।
अर्कात्क्लांशतश्चैव क्रमादेवं प्रकीर्त्तितः ।
आगम (तंत्र) को जानने वाला, अर्थ शास्त्र को जानने वाला, आयुध (शस्त्र)
को बनाने वाला, आयुर्वेद (दवा) का ज्ञाता होता है।।१०८।।

७२२, बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
अथ षष्ट्यंश फलम् -
अध्यापकस्तु वेदानां सेवकः शास्त्रपाठकः ।।१९०९।।
यदि विषम लग्न हो तो क्रम से वेद का अध्यापक १, सेवक २, शास्त्र पढ़ाने
वाला ३।।१९०९।।
अश्वसादीभसादी च लिपिलेखनतत्परः ।
मदुरावंधको नट्यौ देशिको याज्ञिको गुरुः ।।१९१०।।
घोड़सवारी में कुशल ४, हाथी के कार्य में कुशल ५, पुस्तकादि लिखने
में कुशल ६, घोड़े के शाला का अधिकारी ७, वाचक ८, पाठशाला में पढ़ाने
वाला ९, यज्ञ करने वाला १०, गुरु ११।।१९१०।।
दानशीलस्तु तृणको ग्रामणीर्व्यसनाधिपः ।
आरामकरणोद्युक्तः पुष्पविक्रयतत्परः ।।१९११।।
दानशील तृण बेचने वाला १३, ग्राम प्रधान १४, व्यसन का अधिकारी १५,
बाग लगाने में कुशल १६, फूल माला बेचने वाला।।१९११।।
राजकार्यरतः सेनालतापुष्पफलक्रयी ।
नृत्यगीते च कुशलस्ताम्बूलफलविक्रयी ।।१९१२।।
राजकर्मचारी १८, फल-फूल खरीदने वाला १९, नाचगाने में प्रवीण २०,
पान बेचने वाला २१।।१९१२।।
निषिद्धविक्रयकरो ग्रामाणामधिकारकृत् ।
वंदी च देशिकः प्राज्ञो धूपकश्चौषधिक्रियः ।।१९१३।।
निंदित पदार्थ बेचने वाला, २२ ग्राम का अधिकारी २३, राज कर्मचारी २४,
देशिक २५, बुद्धिमान् २६, धूप बेचने वाला २७, दवा बेचने वाला
२८।।१९१३।।
कायस्य करणोद्यक्तो भारको भांडविक्रयी ।
कृषिकृच्च वणिग्धातुचर्मकारी च कर्षकः ।।१९१४।।
बहुरूप धारण करने वाला २९, भार ढोने वाला ३०, बर्तन बेचने वाला
३१, खेती करने वाला ३२, वैश्य वृत्ति करने वाला ३३, धातुचर्म का व्यापारी
३४, कृषक ३५।।१९१४।।

अथ चतुर्दशोऽध्यायः । ७२३
शास्त्राधिकारी विज्ञानी पुस्तकोरंजकोवणिक् ।
वेदवेदांगवेत्ता च शास्त्रज्ञोवंदिपाठकः ।।११५।।
शास्त्राधिकारी ३६, विज्ञान को जानने वाला ३७, पुस्तक का संग्राही ३८,
रंगने वाला ३९, वैश्य वृत्ति करने वाला ४०, वेदवेदांग को जानने वाला ४१,
शास्त्र को जानने वाला ४२।।११५।।
ग्रामणीरधिकारी च गणको दंडकारकः ।
भारकश्चेंधनाहारी फलमूलादिविक्रयी ।।११६।।
ग्राम प्रधान ४३, अधिकारी ४५, गणक ४६, दंड देने वाला ४७, भारक
४८ ईंधन का व्यापारी ४९, फल फूल बेचने वाला ५०।।११६।।
शांतकृत्स्वर्णकारी च कृषिकृत्पलविक्रयी ।
याजकोऽध्यापकोऽध्यक्षःप्रतिग्रहपरः फली ।।११७।।
शांतिस्थापन करने वाला ५१, सुनार का काम करने वाला ५२, खेती करने
वाला ५३, मांस बेचने वाला ५४, यज्ञ करने वाला ५५, अध्यापक ५६, अध्यक्ष
५७, दान लेने वाला ५८, फल बेचने वाला ५९।।११७।।
क्रमाद्व्युत्क्रमतश्चैव षष्ठिः स्यादंशकेषु च ।
कुछ भी काम न करने वाला ६० होता है, और समराशि में जन्म हो तो
विलोम से फल जानना चाहिये।
षष्ठ्यंश के विशेषः-
रवीशहरिविष्णीशदुर्गागणपतिष्वथ ।।११८।।
षष्ठ्यंश के दो दो अंशों को एक साथ करने से ३० होते हैं इस क्रम से
जिस अंश में जन्म नक्षत्र हो उसका फल क्रम से रवि १, ईश २, हरि ३, विष्णु
४, हिरण्यगर्भ ५, दुर्गा ६, गजपति ७।।११८।।
चंडिकायां च चंडेश चंद्रविष्णावीशपावके ।
त्रिपुराचेंदिराविष्णुहरिशंकरशंभुषु ।।११९।।
चंडिका ८, चंड ९, महादेव १०, चंद्र ११, विष्णु १२, ईश १३, अग्नि १४,
त्रिपुरा १५, इंदिरा १६, विष्णु १७, हरि १८, शंकर १९, शम्भु २०।।११९।।
क्षेत्रेशे गुरुडेस्कंदे शास्तरिब्रह्माणीश्वरे ।
विषापहरणोद्युक्ते जिने बुद्धे क्रमात्तथा ।।१२०।।

७२४. बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
क्षेत्रेश २१, गरुड़ २२, स्कंद २३, शान्ता २४, ब्रह्मा २५, ईश्वर २६,
गरुड़ २७, जिन २८, बौद्ध २९, सभी में समान भक्ति होती है।।१२०।।
अथ मरण निमित्तानि-
ज्वरश्लेष्मातिसारासृग्जठरव्याधिमूलरुक् ।
मेहग्रहणिपिटिका पावकावनिशस्त्रतः ॥१२१॥
सूर्यादि १४ ग्रहों में से जन्म राशि में जो हो वा जिसका अंश हो उसके निमित्त
से मृत्यु कहना चाहिये। जैसे ज्वर १, कफ २, अतिसार ३, रक्तविकार ४, जठर
(पेट) व्याधि ५, मूलव्याधि ६, प्रमेह ७, संग्रहणी ८, पिटकरोग ९, अग्नि १०,
भू ११, शस्त्र १२॥१२१॥
दाहज्वरविषाभ्यां तु सूर्यात्कालांतिमेमृतिः ।
राशौ ग्रहांशके पित्तवातश्लेष्मनरोगतः ।।१२२।।
पित्तवातकफश्लेष्मपित्तवातैः क्रमात्स्मृतः ।
दाह १३, ज्वर विष निमित्त से मृत्यु कहना। प्रकारांतर से सूर्य से पित्त, चन्द्र
से वायु, भौम से कफ, बुध से पित्त, गुरु से वायु, शुक्र से कफ, शनि से कफ,
राहु से पित्त, केतु से वायु से मृत्यु होती है।।१२२।।
नवांश द्वारा मरण निमित्तानि-
ज्वरसन्निपातजठरामयांत्ररुग्रामप्रमेहजलाज्जलाग्नितः ।
ज्वरसन्निपाततोत्रभवेन्मृतिः क्रिय पूर्व कस्तुनिधनांशकेष्वितु ।।१२३।।
मेषादि राशियों में मरण कालीन नवांशों के निमित्त क्रम से ज्वर १ सन्निपातज्वर
२, जठर (पेट) के रोग ३, अंत्ररोग ४, प्रमेह ५, जल से ६, अग्नि से ७, ज्वर
से ९ मृत्यु कहना। यह जन्म लग्न के नवांश से देखना चाहिये।।१२३।।
राशिनिमित्ततो मृत्युविचारः-
गुल्मोदरज्वरविषाग्निजलादिपातगुदकलभगंदरोत्था ।
रक्तातिसारजठरज्वरमेहगुल्मकुष्ठातिसारपिटकादि-
भिरश्मरीयैः ।।१२४।।
मेषादि राशियों में क्रम से गुल्म १, उदरज्वर २, विष, अग्नि से ३, शस्त्रादि
से ४, भगंदर से ५, रक्तातिसार, जठर रोग से प्रमेह-गुल्म से ७, कुष्ठ अतिसार
से ८, पिटक रोग से ९।।१२४।।

अथ चतुर्दशोऽध्यायः । ७२५
शूलाशनिक्षतजपित्तसमावृतानि
शीतज्वरप्रभृतिराशिवशात्क्रमेण ।।१२५।।
शूल वज्रपातादि से १०, पित्तरोग से ११, शीतज्वरादि से १२ मृत्यु होती
हैं।।१२५।।
अथ कालादि सूर्य्यान्त चतुर्दशग्रहाणामंशेन मृत्युज्ञानम् –
कालादिरव्यंतखगोक्तजाता चेद्दुर्गपातपतनज्वरसन्निपातात्।
गोपातसत्वजनिता च मृतिः क्रमेण वामेन चापि पुनरेवमथांशकेषु।।
काल आदि १४ ग्रहों के क्रम से दुर्गपात से १, पतन से २,.ज्वर ३, सन्निपात
से ४, बैल से ५, पतन से ६, प्राणि निमित्त से ७।८, पतन से १३, दुर्गपात
से १४ मृत्यु होती है।।१२६।।
अथ रश्मिद्वारा वर्षानयने हरांशज्ञानम् –
आचतुर्थात्खभूतानि त्रयोद्वादश हारकौ ।
अथस्यादष्टमात्षष्ठिः पंचाष्टौ दशमात्ततः ।।१२७।।
पञ्चपञ्चाशदकाःस्युस्त्रयोरत्नानि हारकाः ।
एकादशेऽष्टषष्ठिःस्यात्सप्तकाष्ठाश्च हारकाः ।।१२८।।
त्रयोदशे च तानाः स्युर्द्विसप्ततिरथो मनौ ।
रश्मयः पंचदश चेत्पंचसप्ततिरेव च ।।१२९।।
वेदपंचरसा हारो दशरुद्राश्च रश्मयः ।
आत्रिंशतः क्रमादंका अशीतिरथ सप्ततिः ।।१३०।।
खेषवः खाब्धयः खाद्रिवेदसप्ततिः ।
षष्ठीरुद्रादिरिष्टेषु पंचसप्ततिरिद्रियुक् ।।१३१।।
रश्मि द्वारा वर्ष लाने के लिये हारक्यांक कहते हैं शेष चक्र से स्पष्ट है।।१२७-
१३१।।
एकाशीतिश्चतुर्युक्ता चत्वारिंशत्स्मृताःसमाः ।
सप्तांकरसतर्केषु नवाद्रिरसषट्कराः ।।१३२।।

७२६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
रश्मिवर्षहारज्ञानायचक्रम् –

र.१२३४५६७८९१०१११२१३१४१५१६१७१८१९२०
व.०००५०५०५०५०६००५५६८०४९७५७५८०७०५०४०७
हा.०००३३३३५०३७०७३५४१०७९६६५
हा.०००१२१२१२१२८०९१०००६११०००००
रं.२१२२२३२४२५२६२७२८२९३०
व.७४७४६०७८५८७५७७८१८५४०
हा.९७६६२१११०९६१२
अथ अंशायुहारः-
रुद्रा दिङ्नवतर्काकी अंकहाराः क्रमादमी ।
रुद्रार्कमनुविश्वेऽष्टिः सप्तांकेष्वर्कदिक्छराः ।।१३३।।
११।२३।१४।१३।१६।७।५९।१२।१०।५।५४।९०। ये ये अंशायुर्दाय
के हार हैं।।१३३।।
राशीनामशायुर्दाये हारः-
वेदेषुवेदकांशाःस्युरंशहारा प्रकीर्तिताः ।
पंचानां च चतुर्णां च तत्तत्षण्णवतिःशतम् ।।१३४।।
५।४।६।९०।१०० ।।१३४।।
दशरुद्रानखामूर्छा हाराःस्युःक्रमशःस्मृताः ।
शते रसार्कुरुद्राश्च दशविंशोत्तरं शतम् ।।१३५।।
१०।११।२०।२१ ये क्रम से नवांशायुर्दाय के हार हैं शतायुर्दाय के क्रम
से ६।१२।११।१०।१२० हार होते हैं।।१३५।।
एते हाराःक्रमात्प्रोक्ताःकेषांचित्परमायुषः ।
केषांचिदनयोर्योगदलमाब्दाः षिशेषतः ।।१३६।।
किसी के मत से हार शतायु के योग का करना वही वर्ष होता है।।१३६।।
अथ पूर्वोक्तानां फल विचारः-
दशमं यावदायातःस्वकुटुम्बं विभर्त्ति च ।
कृच्छ्रेण दशमे पुत्रबाहुल्यानेकसंयुतः ।।१३७।।

अथ चतुर्दशोऽध्यायः । ७२७
यदि दश पर्यन्त रश्मि योग हो तो कष्ट से कुटुम्ब का भरण पोषण करे,
यदि दश रश्मि योग हो तो अधिक पुत्र हों।।१३७।।
एकादशे तु विद्वांसी निर्धनो जगती सदा ।
अरंति द्वादशे नित्यं निर्धनाःकुलपांशवाः ।।१३८।।
ग्यारह रश्मि हो तो पुत्र विद्वान् निर्धनता के कारण पृथ्वी पर घूमता रहे,
१२ रश्मि हो तो निर्धन, कुलाधम और नीच हो।।१३८।।
स्वदेहार्थधना दासा अतो यावत्तु विंशतिः ।
अतः परं मृतिं याता वाल्ये एव यथागताः ।।१३९।।
तेरह रश्मि हो तो शरीर के रक्षार्थ धन पैदा करने वाला, नौकरी करने वाला
और कितनों की वाल्यकाल में ही मृत्यु हो जाती है।।१३९।।
अथ योगज्ञानम् -
एवं प्राग्वत्सराः प्रोक्ताः प्रथमेचोत्तरेस्मृताः ।।१४०।।
केन्द्रत्रिकोणेष््वशुभाः ग्रहास्तु त्रिलाभषष्ठा

: ७२८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
ग्रह हों तो मध्य अवस्था में और तीन ग्रह हों तो अंतिम अवस्था में दरिद्र होता
है।।१४४।।
योगान्तरम् -
नवयोगा इमे प्रोक्तास्त्रिषुस्थानेषु रेकदाः ।
कर्कटाद्वृश्चिकान्मीनाच्चतुर्ष्वेव क्रमात्स्थिताः ।।१४५।।
ये नवयोग तीन २ स्थानों के कहे गये हैं जो कि कर्क, वृश्चिक मीन राशि
से आरंभ होते हैं।।१४५।।
शत्रुगेहे स्थिताः पापा मध्येऽन्त्ये प्रथमे क्रमात् ।
सुखान्मृत्योर्व्ययात्पुत्राद्धर्माल्लग्नात्तथैव च ।।१४६।।
कर्क राशि से ४ राशि के अन्दर पापग्रह हों और शत्रु राशि में हों तो मध्य
अवस्था में योगफल होता है, वृश्चिकादि चार राशियों में हों तो अंत्य अवस्था में
और मीनादि चार राशियों में हों तो प्रथम अवस्था में योग का फल होता है। इसी
प्रकार ४।८।१२।५।९।१ भावों से भी योगों का विचार करना चाहिये।।१४६।।
एवमक्षा यदि न्यूनाश्चाष्टवर्गसमुद्भवाः ।
केन्द्रेषु च त्रिकोणेषु शुभा उपचये परे ।।१४७।।
केन्द्र (१।४।७।१०) त्रिकोण (९।५) स्थानों में शुभ ग्रह हों और ३।६।११
स्थानों में पापग्रह हों।।१४७।।
धनदेषु शुभांश्चान्ये परेषु च यदि स्थिताः ।
इष्टरश्मिफलाधिक्यैकश्च द्वौ च त्रयोपि वा ।।१४८।।
धन स्थान में शुभग्रह हों इष्टरश्मि फल अधिक हो और उच्च मूल त्रिकोण
राशि के एक, दो, तीन ग्रह हों।।१४८।।
उच्चादि पंचकस्थाने नवांशेष्वेव वा यदि ।
लक्ष्मीयोगा इमे प्रोक्तास्सुहृद्दृष्टास्तथापरे ।।१४९।।
अथवा उच्चादि के नवांश हों तो लक्ष्मी योग होता है।।१४९।।
योगान्तरम् -
रेके प्रोक्ताधिकालांशाः शुभारिःफाष्टषड्विना ।
उच्चौ द्वौ वा त्रयःकोणे चत्वारोऽतिसुहृत्स्थिताः ।।१५०।।

अथ चतुर्दशोऽध्यायः । ७२९
रेखा आदि दरिद्रयोग में जो अधिक कालांश कहे हैं वे और १२।८।६ इन
स्थानों को छोड़कर शेष स्थानों में उच्च त्रिकोण में हो के एक दो तीन वा चार
ग्रह हों अथवा अनिमित्र स्थान के होकर पांच, छः यां सात ग्रह हों तो श्रीलक्ष्मीयोग
होता है।।१५०।।
योगांतरम् -
मित्रेण पंच षट् सप्तखेटाश्चेच्छ्रीप्रदाःस्मृताः ।
द्विर्द्वादशे शुभो चन्द्रात्सप्तमे वा तयोस्तथा ।।१५१।।
चन्द्रमा से २।१२ स्थान में शुभग्रह हो अथवा लग्न से ७ स्थान में शुभ
ग्रह हों और लग्न में गुरु हों।।१५१।।
गुरौ लग्ने द्वितीये ज्ञे व्यये शुक्रेऽथवा भवेत् ।
भावदृग्बलकष्टेष्टफलभावस्वभावतः ।।१५२।।
दूसरे स्थान में बुध हो अथवा १२ वें स्थान में शुक्र हों तो लक्ष्मीयोग होता
हैं किन्तु भाव बल दग्वाल इष्टकष्ट फल के तारतम्य से फल होता है।।१५२।।
योगान्तरम् -
दायानां च फलैरेव भाववर्गेशसंयुतैः ।
रश्म्यंशसंभवादेव वर्षचर्यां च दैववित् ।।१५३।।
आयुर्दाय के फल के साथ भावेश और वर्गेश के फलों का समन्वय करके
रंश्म्यंश के तारतम्य से वर्षचर्या का फल कहना चाहिये।।१५३।।
एषामंशाश्च संभूताःकारकादिग्रहेरपि ।
मासचर्या दिनोत्थां नाप्यष्टवर्गसमुद्भवात् ।।१५४।।
तथा कारकादि ग्रहों के अनुसार मासचर्या और अष्टकवर्ग के अनुसार दिनचर्या
को कहना चाहिये।।१५४।।
अन्य विशेषः-
भावदृष्ट्योःप्रधानत्वात्कारको वोधको वले ।
इष्टकष्टफले त्वन्ये पाचको रश्मिसंभवे ।।१५५।।
इति वृहत्पाराशरहोरायामुत्तरार्धेऽब्दचर्यावर्णनं नामश्रतुर्दशोऽध्यायः
भाव और दृष्टि के विचार में कारक ही प्रधान होता है उसी को लेना चाहिये।
वलावल के विचार में बोधक ग्रह की प्रधानता होती है अतः उसी को लेना चाहिये।
इष्टकष्ट और रश्मि के विचार में पाचक ग्रह की प्रधानता होने के कारण पाचक को
ही लेना चाहिये।।१५५।।