बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ५४५
शनि के अंतर में अनेक सुख, इष्टबंधु से युक्त 'सम्मान' अनेक लोगों से
सम्मान, कन्या का जन्म ।।५२।।
पुण्यतीर्थफलावाप्तिर्दानधर्मादिपुण्यकृत् ।
स्वप्रभोश्च विशेषः स्यात्वैपरीत्येक्लेशभाग्भवेत् ।।५३।।
पुण्य तीर्थ के फल की प्राप्ति, दान धर्म आदि पुण्य, अपने स्वामी से विशेष
सम्मान होता है। इसके विपरीत याने नीच राशि में हो तो कष्ट होता है।।५३।।
देहालस्यमवाप्नोति आयाद्वाअधिकव्ययम् ।
षष्ठाष्टमव्यये मन्दे दायेशाद्वातथैव च ।।५४।।
शरीर में आलस्य, आमदनी से अधिक खर्च होता है। लग्न से वा दशेश
से ६।८।१२ भाव में शनि हो तो ।।५४।।
भुक्त्यादौ च महत्पीडा पितृमातृजनावपि ।
दारपुत्रादिपीडा च संसारे देहविभ्रमम् ।।५५।।
अंतर के आदि महा पीड़ा, पिता-माता को भी कष्ट, स्त्री-पुत्र को कष्ट, संसार
में भ्रम ।।५५।।
व्यवसायात्फलं नष्टं गोमहिष्यादिहानिकृत् ।
द्वितीयसप्तमाधीशे देहबाधा भविष्यति ।
तद्दोषपरिहारार्थं तिलहोमं च कारयेत् ।।५६।।
व्यवसाय से हानि, गौ-भैंस की हानि होती है। २ वा ७ भाव के स्वामी हो
तो शरीर में बाधा होती है। इसकी शान्ति के लिये तिल से हवन करना
चाहिये ।।५६।।
अथशुक्रदशायांबुधान्तर्दशाफलम् -
शुक्रस्यान्तर्गते सौम्ये केन्द्रे लाभत्रिकोणगे ।
स्वोच्चे वा स्वक्षेत्रगेवापि राजप्रीतिकरंशुभम् ।।५७।।
शुक्र की दशा में केन्द्र वा लाभ वा त्रिकोण में वा अपने उच्च वा अपनी
राशि में गये हुये बुध के अन्तर में राजा से प्रीति ।।५७।।
सौभाग्यं पुत्रलाभं च सन्मार्गे धनलाभकृत्।
पुराणधर्मश्रवणं श्रृंगारिजनसंगमम् ।।५८।।
सौभाग्य पुत्र का लाभ अच्छे मार्ग से धन का लाभ, पुराण और धर्मवार्ता
का श्रवण, श्रृंगार करने वालों का समागम ।।५८ ।।
५८६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
इष्टबंधुजनाकीर्णं विप्रप्रभुसमागमम् ।
स्वप्रभोश्च महत्सौख्यं नित्यं मिष्टान्नभोजनम् ।।५९।।
इष्ट बंधुओं का समागम तथा ब्राह्मण और स्वामी का समागम, महा सुख
और नित्य मिष्टान्न का भोजन होता है।।५९।।
दायेशात्षष्ठरन्ध्रे वा व्यये वा बलवर्जिते ।
पापदृष्टौ तथा युक्ते चतुष्पाज्जीवहानिकृत् ।।६०।।
दशेश से ६।८।१२ भाव में निर्बल हो और पाप दृष्ट वायुत हो तो
चतुष्पद की हानि।।६०।।
अन्यालयनिवासश्च मनोवैकल्यसम्भवः ।
व्यापारेषु तथा प्राज्ञं हानिरेव न संशयः ।।६१।।
दूसरे के मकान में वास मन में विकलता, व्यापार में हानि होती है।।६१।।
भुक्त्यादौ शोभनं प्रोक्तं मध्ये सौख्यं विनिर्दिशेत्।
अंते क्लेशकरं चैव शीतवातज्वरादिकम् ।।६२।।
अन्तर के आदि में शुभफल मध्य में सुख और अन्त में कष्ट, शीत वात
ज्वर होता है।।६२।।
सप्तमाधीशदोषेण देहपीडा भविष्यति ।
तद्दोषपरिहारार्थं विष्णुसाहस्रकंजपेत् ।।६३।।
सप्तमेश होने के दोष से शरीर में पीड़ा होती है। इसके शान्त्यर्थ विष्णु सहस्र
नाम का जप करना चाहिये।।६३।।
अथ शुक्रदशायांकेत्वन्तर्दशाफलम् -
शुक्रस्यान्तर्गते केतौ स्वोच्चे वा स्वर्क्षगेऽपिवा ।
योगकारकसम्बन्धे स्थानवीर्य समन्विते ।।६४।।
शुक्र की दशा में अपने उच्च वा अपनी राशि वा योगकारक के संबंध युक्त
वा स्थान बल से युक्त।।६४।।
भुक्त्यादौ शुभमाधिक्यान्नित्यं मिष्टान्नभोजनम् ।
व्यवसायात्फलाधिक्यं गोमहिष्यादिवृद्धिकृत् ।।६५।।
केतु के अन्तर में शुभफल की अधिकता से नित्य मिष्टान्न का भोजन, व्यवसाय
से अधिक लाभ, गौ भैंस की वृद्धि।।६५।।
अथ प्रत्यन्तर्दशाऽध्यायः । ५४७
धनधान्यसमृद्धिश्च संग्रामे विजयोभवेत् ।
भुक्त्यंते हि सुखं चैव भुक्त्यादौ मध्यमंफलम् ॥६६॥
धन धान्य समृद्धि का लाभ और संग्राम में विजय होती है। अंतर के अन्त
में सुख और आदि में मध्यम फल।।६६।।
मध्ये मध्ये महत्कष्टं पश्चादारोग्यमादिशेत् ।
दायेशाद्रिपुरंध्रस्थे व्यये वा पापसंयुते ॥६७॥
और मध्य में बीच बीच में महाकष्ट पीछे आरोग्यता होती है। दशेश से
६।८।१२ भाव में पापग्रह से युक्त हो तो।।६७।।
चौराहिब्रणपीडा च बुद्धिनाशो महद्भयम् ।
शिरोरूजं मनस्तापमकस्मात्कलहं तथा ॥६८॥
चोर-सर्प, व्रण की पीड़ा, बुद्धि का नाश, महाभय, शिर में रोग, मन में
संताप अकस्मात् कलह।।६८।।
प्रमेहरोगसम्प्राप्तिर्नानामार्गे धनव्ययः ।
भार्यापुत्रविरोधश्च गमनं कार्यनाशनम् ॥६९॥
प्रमेह रोग की उत्पत्ति, अनेक मार्ग में धन व्यय, स्त्री, पुत्र के विरोध, यात्रा
और कार्य की हानि होती है।।६९।।
द्वितीयद्यूननाथे तु देहबाधा भविष्यति ।
तद्दोषपरिहारार्थ मृत्युंजय जपं चरेत् ।
छागदानं प्रकुर्वीत सर्वसम्पत्प्रदायकम् ॥७०॥
२।७ भाव के स्वामी हों तो शरीर में कष्ट होता है। इस दोष के शान्त्यर्थ
मृत्युंजय का जप करना चाहिये और सभी सम्पत्ति को देनेवाला छाग का दान करना
चाहिये।।७०।।
इति पारशर होरायां पूर्वार्धे विंशोत्तरीमन्तर्दशा प्रकरणं समाप्तम्।
अथ प्रत्यन्तर्दशाऽध्यायः ।
अथ प्रत्यन्तर्दशासाधनप्रकारः-
स्वान्तर्दशाब्दवृन्दं च हन्यात्स्वाब्दैर्ग्रहस्य च ।
विंशोत्तरशतेनाप्तं दस्राः शेषं घट्यादिकम् ॥१॥
ग्रह के अन्तर्दशामान को ग्रह के दशा वर्ष संख्या से गुणाकर गुणनफल में
५४८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
१२० का भाग देने से लब्धि दिनादि उस ग्रह के प्रत्यन्तर होता है ।।१।।
उदाहरण-जैसे सूर्य की दशा में सूर्य का अन्तर ० वर्ष ३ मास और १८
दिन होता है, इसे सूर्य के दशा वर्ष ६ से गुणा करने से १ वर्ष ९ मास १८ दिन
हुये इसमें १२० का भाग देने से ० वर्ष ० मास ५ दिन और २४ घटी यह सूर्य
की दशा में सूर्य के अन्तर में सूर्य का प्रत्यन्तर्दशा हुआ।
०।३।१८ को ६ से
गुणा किया तो १।९।१८ इसमें १२० का
भाग दिया १२०)१।९।१८( ० व
१२
१२+९
इसी प्रकार सूर्य की दशा में चन्द्रमा के २१ ( ० मा.
अन्तर्दशा वर्षादि ०।६।० को २१x३०
सूर्य के दशावर्ष ६ से गुणाकर ६३०+१८
१२० का भाग दिया ६४८ ( ५ दि.
०।६।०x६ ६००
१२० ) ०।३६।० ( ० व. ४८x६०
१२ २८८०( २४ घ.
०+३६ २४०
३६ ( ० मा. ४८०
x ३० ४८०
१०८० ( ९ दि. X
१०८०
X
यह सूर्य की दशा में सूर्य के अन्तर में चन्द्रमा का प्रत्यन्तर हुआ। इसी प्रकार
भौमादि के अन्तर्दशा वर्षादि को सूर्य के दशावर्ष से गुणकर १२० से भाग देने
से सूर्यान्तर में भौमादि के प्रत्यन्तर्दशा दिनादि आ जाती है। अर्थात् जिस ग्रह के
अन्तर्दशा में जिस ग्रह की प्रत्यन्तर्दशा लानी हो उसके अन्तर्दशा वर्षादि को
अन्तर्दशेश के दशा वर्ष से गुणकर १२० का भाग देने से उसके प्रत्यन्तर्दशा का
दिनादि मान आ जाता है।
अथ सूर्यान्तरेसूर्यादीनांप्रत्यन्तर्दशाफलम्-
उद्वेगश्च महच्चित्तदारात्तिः शिरसिव्यथा ।
ब्राह्मणेन विवादश्चसूर्यः स्वविदशांगतः ॥२॥ (सू.सू.)
अथ प्रत्यन्तर्दशाऽध्यायः । ५४९
सूर्य के अन्तर में सूर्य के प्रत्यन्तर में उद्वेग, धनका तथा स्त्री को बड़ा कष्ट
और ब्राह्मण के साथ विवाद होता है ।।२।।
उद्वेगं कलहं चित्तपीडां स्वहतिमद्भुताम् ।
मणिमुक्तादिनाशश्च विदिशासु रवेः शशी ।।३।। (सू.चं.)
सूर्य के अन्तर में चन्द्रमा के प्रत्यन्तर में उद्वेग, कलह, मनको व्यथा, धन
का अपहरण और मणि-मुक्ता आदि का नाश होता है।।३।।
राजभीति शस्त्रभीतीं बंधनं बहुसंकटम् ।
शत्रुभंगस्तथा घातो विदशासु रवेःकुजः ।।४।। (सू.मं.)
सूर्य के अन्तर में भौम के प्रत्यन्तर में राजभय, शस्त्रभय, बंधन, अनेक संकट,
शत्रु और अग्नि से पीड़ा होती है।।४।।
श्लेष्मव्याधिं शस्त्रभीतिं धनहानिं महद्भयम् ।
राजभंगस्तथा घातो विदशासु रवेस्तमः ।।५।। (सू.रा.)
सूर्य के अन्तर में राहु के प्रत्यन्तर में कफव्याधि, शस्त्र से भय, धनकी हानि,
बड़ा भय, राजका भंग और चोट आदि से कष्ट होता है।।५।।
शत्रुनाशं जयं वृद्धिं वस्त्रहेमादिभूषणम् ।
वस्त्रयानादि लब्धिं च गोधनं च रवेर्गुरुः ।।६।। (सू.गु.)
सूर्य के अन्तर में गुरु के प्रत्यन्तर में शत्रु का नाश, विजय, उन्नति, वस्त्र,
सुवर्ण के आभूषण, सवारी और गौ का लाभ होता है।।६।।
धनहानिः पशोःपीडा महोद्वेगो महारूजः ।
अशुभं सर्वमाप्नोति विदशासु रवेः शनि ।।७।। (सू.श.)
सूर्य के अन्तर में शनि के प्रत्यन्तर में धन की हानि, पशु को पीड़ा, उद्वेग,
महारोग और अनेक अशुभ होते हैं।।७।।
विद्यालाभो बंधुसंगो भोज्यप्राप्तिर्धनागमः ।
धर्मलाभो नृपात्पूजा विदशासु रवेर्बुधः ।।८।। (सू.बु.)
सूर्य के अन्तर में बुध के प्रत्यन्तर में विद्या का लाभ, बंधु का समागम, भोज्य
की प्राप्ति, धन का आगम, धर्म का लाभ और राजा से आदर होता है।।८।।
प्राणभीतिर्महाहानी राजभीतिश्च विग्रहः ।
शत्रुजा च महावादो विदशासुखेः शिखी ।।९।। (सू.के.)
५५० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
सूर्य की दशा में केतु के प्रत्यन्तर में प्राण का भय, बड़ी हानि, राजभय,
शत्रुता, शत्रु से बड़ा वादविवाद होता है॥९॥
दिनानि समरूपाणि लाभोऽप्यल्पो भवेदिह ।
स्वल्पा च सुखसम्पत्तिर्विदशासु रवेर्भृगुः ॥१०॥(सू.शु.)
सूर्य के अंतर में शुक्र के प्रत्यन्तर में समान रूप से दिन बीतते हैं, लाभ
थोड़ा होता है और थोड़ी ही सुख सम्पत्ति होती है॥१०॥
इति सूर्यान्तरे प्रत्यंतर फलम्।
अथ चन्द्रान्तरे चन्द्रादीनां प्रत्यन्तरफलम् -
भूभोज्यधश्रसम्प्राप्ती राजपूजामहत्सुखम् ।
महालाभः दारसौख्यं विदशासु स्वयं शशी ॥११॥(चं.चं.)
चन्द्रमा के अन्तर में चन्द्रमा के ही प्रत्यन्तर में भूमि, भोजन पदार्थ, धन
की प्राप्ति, राजा से पूजा, बड़ा सुख, अत्यन्त लाभ और स्त्री का सुख होता
है॥११॥
मतिर्वृद्धिर्महापूज्यः सुखं बंधुजनैः सह ।
धनागमं शत्रुभयं चन्द्रस्यान्तर्गतः कुजः ॥१२॥(चं.मं.)
चन्द्रमा के अन्तर में भौम के प्रत्यन्तर में बुद्धि में वृद्धि, अत्यंत आदर, बंधुओं
से सुख, धन का आगम और शत्रु का भय होता है॥१२॥
भवेत्कल्याणसम्पत्ती राजवित्तसमागमः ।
अशुभैरल्पमृत्युश्च चन्द्रेचन्द्रान्तरे तमः ॥१३॥(चं.श.)
चन्द्रमा के अन्तर में राहु के प्रत्यन्तर में कल्याण, सम्पत्ति, राजा से धन का
समागम, अशुभ और अल्पमृत्यु का भय होता है॥१३॥
वस्त्रलाभो महातेजो ब्रह्मज्ञानं च सद्गुरोः ।
राज्यालङ्करणावाप्तिश्चन्द्रचन्द्रान्तरे गुरुः ॥१४॥(चं.वृ.)
चन्द्रमा के अन्तर में गुरु के प्रत्यंतर में वस्त्र का लाभ, तेज में वृद्धि, अच्छे
गुरु से ब्रह्मज्ञान की राज्यचिह्नों की प्राप्ति होती है॥१४॥
दुर्दिने लभते पीडा वातपित्ताद्विशेषतः ।
धनधान्ययशोहानिश्चन्द्रचन्द्रान्तरे शनिः ॥१५॥(चं.श.)
चन्द्रमा के अन्तर में शनि के प्रत्यन्तर में दुर्दिन में विशेषकर वायु पित्त विकार
से कष्ट धन धान्य और यश की हानि होती है॥१५॥
अथ प्रत्यन्तर्दशाऽध्यायः । ५५१
पुत्रजन्महयप्राप्तिर्विद्यालाभो महोन्नतिः ।
शुक्लवस्त्रान्नलाभश्च चन्द्रचन्द्रान्तरे बुधः ।।१६।। (चं.बु.)
चन्द्रमा के अन्तर में बुध के प्रत्यन्तर में पुत्र का जन्म, घोड़े की प्राप्ति, विद्या
का लाभ, अत्यन्त उन्नति और सफेद वस्त्र एवं अन्न का लाभ होता है।।१६।।
ब्राह्मणेन समं युद्धमपमृत्युः सुखक्षयः ।
सर्वत्र जायते क्लेशश्चन्द्रचन्द्रान्तरे शिखी ।।१७।। (चं.के.)
चन्द्रमा के अन्तर में केतु के प्रत्यंतर में ब्राह्मण के साथ युद्ध, अपमृत्यु,
सुख की हानि और सर्वत्र कष्ट प्राप्त होता है।।१७।।
धनलाभो महत्सौख्यं कन्याजन्मं सुभोजनम् ।
प्रीतिश्च सर्वलोकेभ्यश्चन्द्रचन्द्रान्तरे भृगुः ।।१८।। (चं.शु.)
चन्द्रमा के अन्तर में शुक्र के प्रत्यन्तर में धन का लाभ, महासुख, कन्या
का जन्म, सुन्दर भोजन और सभी प्राणियों से प्रेम होता है।।१८।।
अन्नागमो वस्त्रलाभः शत्रुहानिः सुखागमः ।
सर्वत्र विजयप्राप्तिश्चन्द्रचन्द्रान्तरे रविः ।।१९।। (चं.सू.)
चन्द्रमा के अन्तर में सूर्य के प्रत्यन्तर में अन्न का आगम, वस्त्र का लाभ,
शत्रु का नाश और सर्वत्र विजय होती है।।१९।।
इति चन्द्रान्तरे प्रत्यन्तर फलम् -
अथ भौमान्तरेभौमादीनांप्रत्यन्तरफलम् -
शत्रुभीतिं कलिं घोरमकस्माज्जायते भयम् ।
रक्तस्रावोऽपमृत्युश्च विदिशासुस्वयं कुजः ।।२०।। (मं.मं.)
भौम के अन्तर में भौम ही के प्रत्यन्तर में शत्रु का भय, अकस्मात् घोररूप
से झगड़ा, भय, रक्तस्राव और अपमृत्यु होती है।।२०।।
बंधनं राजभङ्गं च - धनहानिः कुभोजनम् ।
कलहं शत्रुभिर्नित्यं भौमभौमान्तरे तमः ।।२१।। (मं.रा.)
भौम की दशा में राहु के अन्तर में बंधन, राज्य का नाश, धन की हानि,
खराब भोजन, नित्य शत्रु से कलह होता है।।२१।।
मतिनाशं तथा दुःखं संतापः कलहो भवेत् ।
विफलं चिंतितं सर्वं भौमभौमान्तरे गुरुः ।।२२।। (मं.वृ.)
५५२. बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
भौम के अन्तर में गुरु के प्रत्यन्तर में बुद्धि का नाश, दुःख, संतापं कलह
और सभी चिंतित कार्य विफल हो जाते हैं।।२२।।
स्वामिनाशस्तथा पीडा धनहानिर्महाभयम् ।
वैकल्यं कलहंस्त्रासो भौमभौमान्तरे शनिः ।।२३।। (मं.श.)
भौम के अन्तर में शनि के प्रत्यन्तर में स्वामी का नाश, पीडा, धन की हानि,
महाभय, विकलता, कलह और त्रास होता है।।२३।।
सर्वथा बुद्धिनाशश्च धनहानिज्वरस्तनौ ।
वस्त्रान्नसुहृदां नाशो भौमभौमान्तरे बुधः ।।२४।। (मं.बु.)
भौम के अन्तरदशा में बुध के प्रत्यन्तर में बुद्धि का नाश, धनहानि, शरीर
में ज्वर, वस्त्र अन्न और मित्रों का नाश होता है।।२४।।
आलस्यं च शिरः पीडा पापरोगअपमृत्युकृत् ।
राजभीतिः शस्त्रघातो भौमभौमान्तरे शिखी ।।२५।। (मं.के.)
भौम के अन्तर में केतु के प्रत्यन्तर में आलस्य, शिर में पीडा, पाप, रोग,
अपमृत्यु राजभय और शस्त्र से चोट लगने का भय होता है।।२५।।
चांडालात्संकटस्त्रासो राजशस्त्रभयं भवेत् ।
अतिसारो च वमनं भौमभौमान्तरे भृगुः ।।२६।। (मं.शु.)
भौम के अन्तर में शुक्र के प्रत्यन्तर में चांडाल से संकट और त्रास राजा
और शस्त्र से भय, अतिसार और वमन होता है।।२६।।
भूमिलाभोऽर्थसम्पत्तिः संतोषोमित्रसंमतिः ।
सर्वत्र सुख माप्नोति भौमभौमान्तरे रविः ।।२७।। (मं.सू.)
भौम के अंतर में सूर्य के प्रत्यन्तर में भूमि का लाभ, धन सम्पत्ति का लाभ,
संतोष, मित्रों का लाभ और सर्वत्र सुख होता है।।२७।।
याम्यां दिशि भवेल्लाभः सितवस्त्रविभूषणम् ।
संसिद्धिः सर्वकार्याणां भौमभौमान्तरे शशी ।।२८।। (मं.चं.)
भौम की दशा में चन्द्रमा के प्रत्यन्तर में दक्षिणदिशा से लाभ, सफेद वस्त्र
आभूषण का लाभ और सभी कार्यों की सिद्धि होती है।।२८।।
इति भौमप्रत्यन्तर फलम् -
अथराह्वन्तरेराह्यादीनां प्रत्यन्तरफलम् -
बंधनं बहुधारोगो बाहुघातं सुहृद्भयम् ।
अकस्मात्प्राप्यते व्याधिः राहुप्रत्यन्तरे राहुः ।।२९।। (रा.रा.)
अथ प्रत्यन्तर्दशाऽध्यायः । ५५३
राहु की दशा में राहु के अन्तर में बंधन, अनेक रोग, बाहु में आघात, मित्र
से भय, अकस्मात् व्याधि होती है।।२९।।
सर्वत्रलभते लाभं गजाश्वं च धनागमम् ।
राजसन्मानदं राज्यं भवेद्राह्वन्तरे गुरुः ।।३०।। (रा.वृ.)
राहु के अन्तर में गुरु के प्रत्यन्तर में सर्वत्र लाभ, हाथी, घोड़ा, धन का लाभ,
राज सन्मान से युक्त राज्य की प्राप्ति होती है।।३०।।
बंधनं जायते घोरं सुखहानिर्महद्भयम् ।
प्रत्यहं वातपीडा च राहौ राह्वन्तरे शनिः ।।३१।। (रा.श.)
राहु के अन्तर में शनि के प्रत्यन्तर में घोर वंधन होता है। सुख की हानि
और बड़ा भय और प्रतिदिन वायु से पीड़ा होती है।।३१।।
सर्वत्र बहुधा लाभः स्त्री समश्र विशेषतः ।
परदेशगतिः सिद्धिं राहो राह्वन्तरे बुधः ।।३२।। (रा.बु.)
राहु की दशा में बुध के प्रत्यन्तर में सर्वत्र अनेक लाभ स्त्री संसर्ग से विशेष
लाभ और परदेश से विशेष सिद्धि होती है।।३२।।
बुद्धिनाशो भयं विघ्नं धनहानिर्महद्भयम् ।
सर्वत्र कलहोद्वेगो राहो राह्वन्तरे शिखी ।।३३।। (रा.के.)
राहु के अन्तर में केतु के प्रत्यन्तर में, बुद्धि का नाश, भय, विघ्न, धन की
हानि, बड़ा भय और सर्वत्र कलह और द्वेष होता है।।३३।।
योगिनीभ्योभयं भूयादश्वहानिः कुभोजनम् ।
स्त्रीनाशः कुलजं शोकं राहो राह्वंतरेसितः ।।३४।। (रा.शु.)
राहु के अन्तर में शुक्र के प्रत्यंतर में योगिनी (पिशाचिनी आदि) से भय,
घोड़े का नाश, खराब भोजन, स्त्री का नाश और कुलजनित शोक होता है।।३४।।
ज्वररोगो महाभीतिः पुत्रपौत्रादिपीडनम् ।
अल्पमृत्युः प्रभादश्च राहो राह्वन्तरे रविः ।।३५।। (रा.सू.)
राहु के अन्तर में सूर्य के प्रत्यन्तर में ज्वररोग, महाभय, पुत्र-पौत्र को पीड़ा,
अपमृत्यु और प्रमाद होता है।।३५।।
उद्वेगकलहो चिन्ता मानहानिर्भहद्भयम् ।
पितुर्विकलता देहे राहो राह्वन्तरे शशी ।।३६।। (रा.चं.)
५५४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
राहु की दशा में चन्द्रमा के प्रत्यन्तर में उद्वेग, कलह, चिन्ता, मानहानि,
महाभय, पिता आदि के शरीर में विकलता होती है।।३६।।
भगंदरकृता पीडा रक्तपित्तप्रपीडनम् ।
अर्थहानिर्महोद्वेगो राहो राह्वन्तरे कुजः ।।३७।। (रा.मं.)
राहु के अन्तर में भौम के प्रत्यंतर में भगंदर रोग से पीड़ा, रक्त पित्त से पीड़ा,
धन हानि और महा उद्वेग होता है।।३७।।
इति राहु प्रत्यन्तर फलम् ।
अथ गुर्वन्तरे गुर्वादीनांप्रत्यंतर फलम्-
हेमलाभो धान्यवृद्धिः कल्याणं च फलोदयः ।
बहुभाग्यं गृहे वृद्धिं जीवजीवान्तरे गुरुः ।।३८।। (वृ.शू.)
गुरु के अन्तर में गुरु के प्रत्यन्तर में सुवर्ण का लाभ, धान्य वृद्धि, कल्याण,
फलोदय अनेक प्रकार से भाग्योदय और घर में वृद्धि होती है।।३८।।
गोभूमिहयलाभः स्यात्सर्वत्र सुखसाधनम् ।
संग्रहो ह्यन्नपानादि गुरुर्गुर्वन्तराशनिः ।।३९।। (वृ.श.)
गुरु के अन्तर में शनि के प्रत्यन्तर में गौ, भूमि, सुवर्ण का लाभ, सर्वत्र
सुख का साधन, अन्न, पान आदि का संग्रह होता है।।३९।।
विद्यालाभो वस्त्रलाभो ज्ञानलाभः समौक्षिकः ।
सुहृदां संगमः स्नेहो जीवजीवान्तराबुधः ।।४०।। (वृ.बु.)
गुरु के अन्तर में बुध के प्रत्यन्तर में विद्या का लाभ, वस्त्र का लाभ, मौक्षिक
ज्ञान का लाभ, मित्रों से समागम और स्नेह होता है।।४०।।
जलभीतिस्तथा चौर्यं बंधनं कलहो भवेत् ।
अल्पमृत्युर्भयं घोरं जीव जीवांतरे ध्वजः ।।४१।। (वृ.के.)
गुरु के अन्तर में केतु के प्रत्यंतर में जल से भय, चोरी का भय, बंधन,
कलह, घोर अपमृत्यु का भय होता है।।४१।।
नानाविद्यार्थसम्प्राप्तिर्हेमवस्त्रविभूषणम् ।
लभतेक्षेमसंतोषं जीवजीवांतरे कविः ।।४२।। (वृ.शु.)
गुरु के अन्तर में शुक्र के प्रत्यंतर में अनेक प्रकार से धन का लाभ, सुवर्ण,
वस्त्र, आभूषण का लाभ और कुशल, संतोष का लाभ होता है।।४२।।
अथ प्रत्यन्तर्दशाऽध्यायः । ५५५
नृपाल्लाभस्तथा मित्रान्पितृतो मातृतोऽपि वा ।
सर्वत्र लभते पूजां जीवजीवान्तरा रविः ।।४३।। (वृ.सू.)
गुरु के अंतर में सूर्य के प्रत्यंतर में राजा से लाभ, मित्र, पिता, माता से
लाभ और सर्वत्र पूजनीय होता है।।४३।।
सर्वदुःखविमोक्षश्च मुक्तालाभो हयस्य च ।
सिध्यंति सर्व कार्याणि जीवजीवांतरे शशी ।।४४।। (वृ.चं.)
गुरु के अन्तर में चन्द्रमा के प्रत्यन्तर में सभी दुःखों का नाश, मुक्ता और
अश्व का लाभ और सभी कार्य सिद्ध होते हैं।।४४।।
शस्त्रभीतिर्गुदे पीडावह्निमान्द्यमजीर्णता ।
पीडाशत्रुकृता भूरि जीवजीवान्तरे कुजः ।।४५।। (वृ.मं.)
गुरु के अन्तर में भौम के प्रत्यंतर में शस्त्र का भय, गुदा में पीड़ा, अग्निमांद्य,
अजीर्ण और शत्रु से अधिक पीड़ा होती है।।४५।।
चांडालेन विरोधः स्याद्भयं तेभ्यो रतिग्रहः ।
कष्टं स्याद्व्याधिशत्रुभ्यो जीवजीवान्तरे तमः ।।४६।। (वृ.रा.)
गुरु के अन्तर में राहु के प्रत्यंतर में चांडाल से विरोध और उनसे भय, व्याधि
और शत्रु से कष्ट होता है।।४६।।
इति गुरुप्रत्यंतरफलम्।
अथ शन्यन्तरेशान्यादीनांप्रत्यन्तरफलम्-
देहपीडा कलेर्भीतिर्भयमन्त्यलोकतः ।
विदेशगमनं दुःखं शनेः शन्यन्तरे शनिः ।।४७।। (श.श.)
शनि के अन्तर में शनि के प्रत्यंतर में शरीर में पीड़ा, झगड़े का भय, नीचों
से भय, विदेश की यात्रा और दुःख होता है।।४७।।
बुद्धिनाशो कलेर्भीतिमन्नपानादिहानिकृत् ।
धनहानिर्भयं शत्रोः शनेः शन्यन्तरे बुधः ।।४८।। (श.बु.)
शनि के अन्तर में बुध के प्रत्यंतर में बुद्धि का नाश, कलह का भय, अन्नादि
की हानि, धन की हानि और शत्रु का भय होता है।।४८।।
बन्धः शत्रुगृहे जातो वर्णहानिर्बहुक्षुधा ।
चित्तेचिन्ता भयं त्रासः शनेःसौरान्तरे शिखी ।।४९।। (श.के.)
शनि के अन्तर में केतु के प्रत्यंतर में शत्रु गृह में बन्धन, तेज की हानि.
.५५६. बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
बहुत भूख लगती है, चित्त में चिन्ता, भय और त्रास होता है।।४९।।
चिंतितं फलितं वस्तु कल्याणं स्वजने तथा ।
मनुष्यकृतितो लाभः शनेः शन्यन्तरे भृगुः ।।५०।। (श.शु.)
शनि की दशा में शुक्र के अन्तर में चिंतित वस्तु का लाभ, आत्मीयजनों
का कल्याण, मनुष्य की कृति से लाभ होता है।।५०।।
राजतेजोऽधिकारित्वं स्वगृहे जायते कलिः ।
ज्वरादिव्याधिपीडाच कोणे कोणान्तरे रविः ।।५१।। (श.सू.)
शनि के अन्तर में सूर्य के प्रत्यन्तर में राजा के ऐसा तेज, अधिकार
की प्राप्ति, अपने घर में कलह और ज्वर आदि व्याधि से पीड़ा होती
है।।५१।।
स्फीतबुद्धिर्महारम्भो मंदतेजो बहुव्ययः ।
बहुस्त्रीभिःसमं भोगं कोणे कोणान्तरे शशी ।।५२।। (श.चं.)
शनि के अन्तर में चन्द्रमा के प्रत्यंतर में स्वच्छ बुद्धि, महान् कार्य का आरम्भ,
कान्ति की कमी, अधिक खर्च, अनेक स्त्रियों से संभोग होता है।।५२।।
तेजोहानिः पुत्रघातो वह्निभीतिरिपोर्भयम् ।
वातपित्तकृतापींडा कोणेकोणान्तरे कुजः ।।५३।। (श.मं.)
शनि के अंतर में भौम के प्रत्यंतर में कान्ति की हानि, पुत्र को कष्ट, अग्नि
का भय, शत्रु भय और बात-पित्त से पीड़ा होती है।।५३।।
धननाशो वस्त्रहानिर्भूमिनाशो भयं भवेत् ।
विदेशगमनं मृत्युः कोणेकोणान्तरे तमः ।।५४।। (श.रा.)
शनि के अंतर में भौम के प्रत्यंतर में धन का नाश, वस्त्र की हानि, भूमि
की हानि, भय, विदेश यात्रा और मृत्यु होती है।।५४।।
गृहेषु स्त्रीकृतं छिद्रं ह्यसमर्थो निरीक्षणे ।
अथवा कलिमुद्वेगं दाने सौरान्तरे गुरुः ।।५५।। (श.बृ.)
शनि के अन्तर में गुरु के प्रत्यन्तर में गृह में स्त्री द्वारा कलह की उत्पत्ति
जिसके निरीक्षण में असमर्थ, कलह और उद्वेग होता है।।५५।।
इति शनि प्रत्यंतरफलम्।
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५५८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
बुध के अन्तर में गुरु के प्रत्यंतर में राज्य वा राज्याधिकारी की प्राप्ति, राजा-
से पूजा, विद्याधर से अन्न वस्त्र की प्राप्ति होती है।।६३।।
वातपित्तमहापीडा देहघातसमुद्भवा ।
धननाशमवाप्नोति सौम्यसौम्यन्तरे शनिः ।।६४।। (बु.श.)
बुध के अंतर में शनि के प्रत्यंतर में वात-पित्त से महापीडा, देह में चोट
आदि लगने की सम्भावना और धन का नाश होता है।।६४।।
इति बुधप्रत्यन्तरफलम्।
अथ केत्वन्तरे केत्वादीनांप्रत्यन्तरफलम्-
अपां समुद्भवोऽकस्माद्देशान्तरसमागमः ।
धननाशोऽल्पमृत्युश्च केतोः केत्वन्तरे शिखी ।।६५।। (के.के.)
केतु के अन्तर में केतु के प्रत्यन्तर में अकस्मात जलमार्ग से देशान्तरं की
यात्रा, धन की हानि और प्राणभय होता है।।६५।।
म्लेक्षभीत्यर्थनाशो वा नेत्ररोगः शिरोव्यथा ।
हानिश्चतुष्पदानांच केतोः केत्वन्तरे भृगुः ।।६६।। (के.शु.)
केतु के अन्तर में शुक्र के प्रत्यन्तर में म्लेक्ष से भय, अत्यंत धन का नाश,
नेत्र रोग, शिर में व्यथा और चतुष्पद जीव की हानि होती है।।६६।।
मित्रैः सह विरोधश्च स्वल्पमृत्यु, पराजयः ।
मतिभ्रंशो विवादश्च केतो, केत्वन्तरे रविः ।।६७।। (के.सू.)
केतु के अन्तर में सूर्य के प्रत्यंतर में मित्रों से विरोध, अल्पमृत्यु, पराजय,
बुद्धि का नाश और विवाद उपस्थित होता है।।६७।।
अन्ननाशो यशोहानिर्देहपीडा मतिभ्रमः ।
आमवातादिवृद्धिश्च केतोः केत्वन्तरे शशी ।।६८।। (के.चं.)
केतु के अंतर में चन्द्रमा के प्रत्यंतर में अन्न की हानि, यश की हानि, देह
में पीड़ा, बुद्धि में भ्रम और आम-बात की वृद्धि होती है।।६८।।
शस्त्रघातेन पातेन पीडितो वह्निपीडया ।
नीचाद्धीति रिपोः शङ्का केतोः केत्वन्तरं कुजः ।।६९।। (के.मं.)
केतु के अंतर में भौम के प्रत्यंतर में शस्त्रलगने से वा गिरने से पीड़ा, अग्नि
अथ प्रत्यन्तर्दशाऽध्यायः । ५५९
से पीड़ा, नीच से भय और शत्रु भय की शंक' होती है।।६९।।
कामिनीभ्यो भयं भूयात्तथा वैरिसमुद्भवः ।
शूद्रादपि भवेद्भीतिः केतोः केत्वन्तरे तमः ।।७०।। (के.र.)
केतु के अंतर में राहु के प्रत्यंतर में स्त्रियों से भय, राजा से तथा शत्रुओं
से भय शूद्र से भी भय होता है।।७०।।
धनहानिर्महोत्पातो वस्त्रमित्रविनाशनम् ।
सर्वत्र लभते क्लेशं केतोः केत्वन्तरे गुरुः ।।७१।। (के.बृ.)
केतु के अंतर में गुरु के प्रत्यंतर में धन की हानि, महाउत्पात, वस्त्र, मित्र
की हानि और सर्वत्र क्लेश होता है।।७१।।
गोमहिष्यादिमरणं देहपीडा सुहृद्वधः ।
स्वल्पालपलाभकरणं केतोः केत्वंतरे शनिः ।।७२।। (के.श.)
केतु के अंतर में शनि के प्रत्यंतर में गौ भैंस आदि का मरण, शरीर में पीड़ा,
मित्रों का वध और थोड़ा-थोड़ा लाभ होता है।।७२।।
बुद्धिनाशो महोद्वेगो विद्याहानिर्महाभयम् ।
कार्यसिद्धिर्न जायेत केतोः केत्वन्तरे बुधः ।।७३।। (के.बु.)
केतु के अन्तर में बुध के प्रत्यंतर में बुद्धि का नाश, बड़ा उद्वेग, विद्या की
हानि महाभय और कार्य की सिद्धि में बाधा होती है।।७३।।
इति केतु प्रत्यंतर फलम्।
अथ शुक्रान्तरेशुक्रादीनां प्रत्यतरफलम्-
श्वेताश्ववस्त्रमुक्ताद्याः स्वर्णमाणिक्य संभवः ।
लभते सुन्दरी नारी शुक्रे शुक्रांतरे भृगुः ।।७४।। (शु.शु.)
शुक्र के अन्तर में शुक्र के प्रत्यंतर में सफेद घोड़ा, सफेद वस्त्र, मोती का
लाभ सुवर्ण माणिवय के लाभ की संभावना और सुन्दरी स्त्री का लाभ होता
है।।७४।।
वातज्वरः शिरःपीडा राज्ञः पीडा रिपोरपि ।
जायते स्वल्पलाभोऽपि शुक्रे शुक्रान्तरे रविः ।।७५।। (शु.सू.)
शुक्र के अंतर में सूर्य के प्रत्यंतर में वातज्वर, शिर में पीड़ा, राजा और
शत्रु से पीड़ा और अल्प लाभ होता है।।७५।।
५६० वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
कन्याजन्म नृपाल्लाभो वस्त्राभरणसंयुतः ।
राज्याधिकारसंप्राप्ति शुक्रे शुक्रान्तरे शशी ॥७६॥ (शु.चं.)
शुक्र के अंतर में चन्द्रमा के प्रत्यंतर में कन्या का जन्म, राजा से वस्त्र-आभूषण
का लाभ और राज्याधिकार की प्राप्ति होती है।।७६।।
रक्तपित्तादिरोगश्च कलहंताडनं भवेत् ।
महान्क्लेशोभवेद्र शुक्रे शुक्रान्तरे कुजः ।।७७।। (शु.मं.)
शुक्र के अंतर में भौम के प्रत्यंतर में रक्त-पित्त के रोग, कलह-ताडना, और
बड़ा कष्ट होता है।।७७।।
कलहो जायते स्त्रीभिरकस्माद्भयसंभवः ।
राजतः शत्रुत: पीडा शुक्रे शुक्रान्तरेतमः ।।७८।। (शु.रा.)
शुक्र के अंतर में राहु के प्रत्यंतर में काक सतत् स्त्री से झगड़ा और भय
और राजा तथा शत्रु से पीड़ा होती है।।७८।।
महद्द्रव्यं महद्राज्यं वस्त्रमुक्तादिभूषणम् ।
गजाश्वादिपदप्राप्तिः शुक्रे शुक्रान्तरे गुरुः ।।७९।। (शु.वृ.)
शुक्र के अंतर में गुरु के प्रत्यंतर में बड़े द्रव्य, बड़े राज्य, वस्त्र, मुक्ता आदि
के. आभूषण, हाथी-घोड़ा पद की प्राप्ति होती है।।७९।।
खरोष्ट्रछागसम्प्राप्तिर्लोहमाषतिलादिकम् ।
अथ सूक्ष्मान्तरदशाध्यायः । ५६१
अथ सूक्ष्मान्तरदशाध्यायः ।
तत्रादौ सूक्ष्मांतरानयनप्रकारः-
ग्रहवर्षेण संगुण्यं प्रत्यन्तरघटिकादिकम् ।
विंशोत्तरशतेनाप्तं सूक्ष्मान्तरदशामितिः ॥१॥
जिस ग्रह के प्रत्यंतर में जिस ग्रह का सूक्ष्मान्तर लाना हो उस ग्रह की दशा
वर्ष से प्रत्यन्तर के (घटिकादिपिंडबनाकर) घटिकादि को गुणाकर गुणनफल में १२०
का भाग देने से लब्धि घटिका और शेष को ६० से गुणाकर पुनः १२० का भाग
देने से फल जो प्राप्त होता है इस प्रकार घटी-पल वा दिन (यदि घटी ६० से
अधिक हो तो उसमें साठ से भाग देने से लब्धि दिन होता है) सूक्ष्म अन्तर होता
है॥१॥
उदाहरण-जैसे सूर्य के प्रत्यंतर में सूर्यादि ग्रहों का सूक्ष्मान्तर लाना है तो
सूर्य का प्रत्यन्तर ५ दिन २४ घटी है। इसका पिड ५×६०+२४ = ३२४ घटी
हुआ इसे सूर्य के दशावर्ष ६ से गुणने ३२४×६ = १९४४ हुआ इसमें १२०
का भाग देने से लब्धि १६ घटी और शेष २४ को ६० गुणने से २४×६० =
१४४० हुआ इसमें १२० का भाग देने से १२ पल हुआ अर्थात् सूर्य के प्रत्यंतर
घटी पिंड को चन्द्रमा के दशा वर्ष १० से गुणनकर १२० का भाग देने से २७
घटी सूर्य के प्रत्यंतर में चंद्रमा का सूक्ष्मान्तर हुआ। इसी प्रकार सभी ग्रहों का सूक्ष्मांतर
लाना चाहिये।
अथसूर्यप्रत्यंतरे सूर्यादीनांसूक्ष्मन्तरदशाफलम्-
नृणां भूमिपरित्यागो नियतं प्राणनाशनम् ।
स्थाननाशो महाहानिः सूर्यसूक्ष्मदशाफलम् ॥२॥ (सू.सू.)
सूर्य के प्रत्यंतर में सूर्य के सूक्ष्मांतर में मनुष्य को भूमि का त्याग करना पड़ता
है, प्राण नाश की आशंका और स्थान का नाश होता है॥२॥
देवब्राह्मणभक्तिश्च नित्यकर्मरतस्तथा ।
सुप्रीतिः सर्वमित्रैश्च रवेः सूक्ष्मगते विधौ ॥३॥ (सू.चं.)
सूर्य के प्रत्यंतर में चन्द्रमा के सूक्ष्मांतर में देवता ब्राह्मण में भक्ति, नित्यकर्म
में आसक्ति और सभी मित्रों से सुन्दर प्रेम होता है॥३॥
क्रूरकर्मरतिस्तिग्मशत्रुभिः परिपीडनम् ।
रक्तस्त्रावादिरोगश्च रवेः सूक्ष्मगते कुजे ॥४॥ (सू. मं.)
५६२ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
सूर्य के प्रत्यंतर में भौम के सूक्ष्मान्तर में क्रूरकर्म में आसक्ति, शत्रुओं से पीड़ा
और रक्तस्राव के रोग होते हैं ।।४।।
चौराग्विविषभीतिश्च रणे भंगः पराजयः ।
दानधर्मादिहीनश्च रवेः सूक्ष्मगते ह्यगौ ।।५।। (सू.रा.)
सूर्य के प्रत्यंतर में राहु के सूक्ष्मांतर में चोर, अग्नि, विष से भय, संग्राम
में विफलता वा पराजय और दान-धर्म से हीन होता है।।५।।
नृपसत्कारराजार्हः सेवकैः परिपूजितः ।
राजचक्षुर्गतः शान्तः सूर्यसूक्ष्मगतेगुरौ ।।६।। (सू.वृ.)
सूर्य के प्रत्यंतर में गुरु के सूक्ष्मांतर में राजा के समान सत्कार, नौकरो से
पूजित और राजा का कृपापात्र और शांत होता है।।६।।
धैर्यसाहसकर्मार्थ देवब्राह्मणपीड़नम् ।
स्थानच्युतिं मनोदुःखं रवेः सूक्ष्मगतेशनौ ।।७।। (सू.शं.)
सूर्य के प्रत्यंतर में शनि के सूक्ष्मांतर में धैर्य और साहस के कार्य के लिये
देवता और ब्राह्मण का पीड़न, स्थान की हानि और मन में दुःख होता है।।७।।
दिव्याम्बरादिलब्धिश्च दिव्यस्त्रीपरिभोगता ।
अचिंतितार्थसिद्धिश्च रवेः सूक्ष्ममते बुधे ।।८।। (सू.बु.)
सूर्य के प्रत्यंतर में बुध के सूक्ष्मांतर में दिव्य वस्त्र आदि की प्राप्ति, दिव्य
स्त्री का योग और अचिंतित कार्य की सिद्धि होती है।।८।।
गुरुतार्त्तिविनाशश्च भृत्यदारभवस्तथा ।
क्वचित्सेवकसम्बन्धो रवेः सूक्ष्मतेध्वजे ।।९।। (सू.के.)
सूर्य के प्रत्यंतर में केतु के सूक्ष्मांतर में गौरव नौकर और स्त्री जनित दुःख
का नाश और कभी किसी सेवक से संबंध भी होता है।।९।।
पुत्रमित्रकलत्रादिसौख्यसम्पन्न एव च ।
नानाविद्या च सम्पत्ती रवेः सूक्ष्मगते भृगौ ।।१०।। (सू.शु.)
सूर्य के प्रत्यंतर में शुक्र के सूक्ष्मांतर में पुत्र, मित्र, स्त्री आदि का सुख सम्पन्न
होता है और अनेक प्रकार की सम्पत्ति का लाभ होता है।।१०।।
इति रवौ सूक्ष्मांतरफलम्।
अथ सूक्ष्मन्तरदशाध्यायः । ५६३
अथचंद्राप्रत्यंतरेचंद्रादीनांसूक्ष्मांतरफलम्-
भूषणं भूमिलाभश्च सन्मानं नृपपूजनम् ।
तामसत्वं गुरुत्वं च चन्दसूक्ष्मदशाफलम् ॥१९१॥ (चं.चं.)
चन्द्रमा के प्रत्यन्तर में चन्द्रमा के सूक्ष्मान्तर में आभूषण तथा भूमि का लाभ,
सन्मान और राजा से पूजन, तामस और गुरुता होता है॥१९१॥
दुःखं शत्रुविरोधश्च कुक्षिरोगः पितुर्मृतिः ।
वातपित्तकफोद्रेकः शशिसूक्ष्मगते कुजः ॥१९२॥ (चं.मं.)
चन्द्रमा के प्रत्यंतर में भौम के सूक्ष्मान्तर में दुःख, शत्रु से विरोध, कुक्षीस्थान
में रोग, पिता की मृत्यु और वात-पित्त-कफ का रोग होता है॥१९२॥
क्रोधनं मित्रबंधूनां देशत्यागो धनक्षयः ।
विंदेशात्रिगडप्राप्तिरिन्दुसूक्ष्मगतेत्यहौ ॥१९३॥ (चं.स.)
चन्द्रमा के प्रत्यंतर में राहु के सूक्ष्मान्तर में मित्र तथा बन्धुओं से द्वेष, देश
का त्याग, धन का नाश, विदेश में बंधन होता है॥१९३॥
छत्रचामर संयुक्तं वैभवं पुत्रसम्पदः ।
सर्वत्र सुखमाप्नोति चन्द्रसूक्ष्मगतेगुरौ ॥१९४॥ (चं.रा.)
चन्द्रमा के प्रत्यंतर में गुरु के सूक्ष्मान्तर में छत्र-चामर युक्त राज वैभव की
प्राप्ति पुत्र का लाभ और सुख होता है॥१९४॥
राजोपद्रवनाशः स्याद्व्यवहारे धनक्षयः ।
चौरत्वं विप्रभीतिश्च चन्द्रसूक्ष्मगते शनौ ॥१९५॥ (चं.श.)
चन्द्रमा के प्रत्यन्तर में शनि के सूक्ष्मान्तर में राजा के उपद्रव से हानि, रोजगार
में धन की हानि, चोरी और ब्राह्मण से भय होता है॥१९५॥
राजमानं वस्तुलाभं विदेद्वाहनादिकम् ।
पुत्रपौत्रसमृद्धिश्च चन्द्र सूक्ष्मगते बुधे ॥१९६॥ (चं.बु.)
चन्द्रमा के प्रत्यन्तर में बुध के सूक्ष्मान्तर में राजा से प्रतिष्ठा, वस्तु का लाभ,
विदेश से वाहनादि का लाभ और पुत्र-पौत्र आदि समृद्धि का लाभ होता है॥१९६॥
आत्मनो वृत्तिहननं सस्यशृंगवृषादिभिः ।
अग्निसूर्यादिभीतिः स्याच्चन्द्रसूक्ष्मगतेध्वजे ॥१९७॥ (चं.के.)
चन्द्रमा के प्रत्यन्तर में केतु के सूक्ष्मान्तर में धान्य मृग और बैल आदि से
५६४ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
अपने वृत्ति का उच्छेद, और अग्नि तथा सूर्य से भय होता है।।१७।।
विवाहो, भूमिलाभश्च वस्त्राभरणवैभवम् ।
राज्यलाभश्च कीर्त्तिश्च चन्द्रसूक्ष्मगते भृगौ ।।१८।। (चं.शु.)
चन्द्रमा के प्रत्यन्तर में शुक्र के सूक्ष्मान्तर में विवाह, भूमि का लाभ, वस्त्र,
आभूषण आदि वैभव, राज्यलाभ और यश होता है।।१८।।
क्लेशात्क्लेशः कार्यनाशः पशुधान्यधनक्षयः ।
गात्रवैषम्यभूमिश्च चन्द्रसूक्ष्मगते रवौ ।।१९।। (चं.सू.)
चन्द्रमा के प्रत्यन्तर में सूर्य के सूक्ष्मान्तर में क्लेश से क्लेश, कार्य की हानि,
पशु, धान्य और पशु का नाश, शरीर तथा भूमि में विषमता होती है।।१९।।
इति चन्द्रसूक्ष्मान्तर फलम्।
अथ भौम प्रत्यन्तरे भौमादीनां सूक्ष्मान्तर फलम् -
भूमिहानिर्मनः खेदोह्यपस्मारी च बंधुयुक् ।
पुरक्षोभमनस्तापो भौमसूक्ष्मदशाफलम् ।।२०।। (मं.मं.)
भौम के प्रत्यन्तर में भौम के सूक्ष्म अंतर में भूमि की हानि, चित्त में खेद,
मृगी रोग, बंधु से युक्त, ग्राम से क्षोभ और मन में संताप होता है।।२०।।
अङ्गदोषो जनाद्भीतिः प्रमदावंशनाशनम् ।
वह्निसर्पभयं घोरं भौमसूक्ष्मगतेप्यहौ ।।२१।। (मं.रा.)
भौम के प्रत्यन्तर में राहु के सूक्ष्मान्तर में किसी अंग में विकार लोगों से
भय, कन्या की हानि, और अग्नि तथा सर्प से बड़ा भय होता है।।२१।।
देहपूजारतिश्चात्र मंत्राभ्युत्थानतत्परः ।
लोकपूज्यं प्रमादं च भौमसूक्ष्मगते गुरौ ।।२२।। (मं.वृ.)
भौम के प्रत्यन्तर गुरु के सूक्ष्मान्तर में देह की पूजा, मंत्र साधन में रति,
लोक से पूजा और प्रमाद होता है।।२२।।
बंधनान्मुच्यते बद्धो धनधान्यपरिच्छदः ।
भृत्यार्थबहुलः श्रीमान्भौमसूक्ष्मगते शनौ ।।२३।। (मं.श.)
भौम के प्रत्यन्तर में शनि के सूक्ष्मान्तर में बंधन से मुक्ति, धन, धान्य, नौकर
आदि विशेष होते हैं।।२३।।