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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 556, कुल 800 में से

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पृष्ठ 556

.५५६. बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
बहुत भूख लगती है, चित्त में चिन्ता, भय और त्रास होता है।।४९।।
चिंतितं फलितं वस्तु कल्याणं स्वजने तथा ।
मनुष्यकृतितो लाभः शनेः शन्यन्तरे भृगुः ।।५०।। (श.शु.)
शनि की दशा में शुक्र के अन्तर में चिंतित वस्तु का लाभ, आत्मीयजनों
का कल्याण, मनुष्य की कृति से लाभ होता है।।५०।।
राजतेजोऽधिकारित्वं स्वगृहे जायते कलिः ।
ज्वरादिव्याधिपीडाच कोणे कोणान्तरे रविः ।।५१।। (श.सू.)
शनि के अन्तर में सूर्य के प्रत्यन्तर में राजा के ऐसा तेज, अधिकार
की प्राप्ति, अपने घर में कलह और ज्वर आदि व्याधि से पीड़ा होती
है।।५१।।
स्फीतबुद्धिर्महारम्भो मंदतेजो बहुव्ययः ।
बहुस्त्रीभिःसमं भोगं कोणे कोणान्तरे शशी ।।५२।। (श.चं.)
शनि के अन्तर में चन्द्रमा के प्रत्यंतर में स्वच्छ बुद्धि, महान् कार्य का आरम्भ,
कान्ति की कमी, अधिक खर्च, अनेक स्त्रियों से संभोग होता है।।५२।।
तेजोहानिः पुत्रघातो वह्निभीतिरिपोर्भयम् ।
वातपित्तकृतापींडा कोणेकोणान्तरे कुजः ।।५३।। (श.मं.)
शनि के अंतर में भौम के प्रत्यंतर में कान्ति की हानि, पुत्र को कष्ट, अग्नि
का भय, शत्रु भय और बात-पित्त से पीड़ा होती है।।५३।।
धननाशो वस्त्रहानिर्भूमिनाशो भयं भवेत् ।
विदेशगमनं मृत्युः कोणेकोणान्तरे तमः ।।५४।। (श.रा.)
शनि के अंतर में भौम के प्रत्यंतर में धन का नाश, वस्त्र की हानि, भूमि
की हानि, भय, विदेश यात्रा और मृत्यु होती है।।५४।।
गृहेषु स्त्रीकृतं छिद्रं ह्यसमर्थो निरीक्षणे ।
अथवा कलिमुद्वेगं दाने सौरान्तरे गुरुः ।।५५।। (श.बृ.)
शनि के अन्तर में गुरु के प्रत्यन्तर में गृह में स्त्री द्वारा कलह की उत्पत्ति
जिसके निरीक्षण में असमर्थ, कलह और उद्वेग होता है।।५५।।
इति शनि प्रत्यंतरफलम्।