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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 564, कुल 800 में से

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पृष्ठ 564

५६४ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ।
अपने वृत्ति का उच्छेद, और अग्नि तथा सूर्य से भय होता है।।१७।।
विवाहो, भूमिलाभश्च वस्त्राभरणवैभवम् ।
राज्यलाभश्च कीर्त्तिश्च चन्द्रसूक्ष्मगते भृगौ ।।१८।। (चं.शु.)
चन्द्रमा के प्रत्यन्तर में शुक्र के सूक्ष्मान्तर में विवाह, भूमि का लाभ, वस्त्र,
आभूषण आदि वैभव, राज्यलाभ और यश होता है।।१८।।
क्लेशात्क्लेशः कार्यनाशः पशुधान्यधनक्षयः ।
गात्रवैषम्यभूमिश्च चन्द्रसूक्ष्मगते रवौ ।।१९।। (चं.सू.)
चन्द्रमा के प्रत्यन्तर में सूर्य के सूक्ष्मान्तर में क्लेश से क्लेश, कार्य की हानि,
पशु, धान्य और पशु का नाश, शरीर तथा भूमि में विषमता होती है।।१९।।
इति चन्द्रसूक्ष्मान्तर फलम्।
अथ भौम प्रत्यन्तरे भौमादीनां सूक्ष्मान्तर फलम् -
भूमिहानिर्मनः खेदोह्यपस्मारी च बंधुयुक् ।
पुरक्षोभमनस्तापो भौमसूक्ष्मदशाफलम् ।।२०।। (मं.मं.)
भौम के प्रत्यन्तर में भौम के सूक्ष्म अंतर में भूमि की हानि, चित्त में खेद,
मृगी रोग, बंधु से युक्त, ग्राम से क्षोभ और मन में संताप होता है।।२०।।
अङ्गदोषो जनाद्भीतिः प्रमदावंशनाशनम् ।
वह्निसर्पभयं घोरं भौमसूक्ष्मगतेप्यहौ ।।२१।। (मं.रा.)
भौम के प्रत्यन्तर में राहु के सूक्ष्मान्तर में किसी अंग में विकार लोगों से
भय, कन्या की हानि, और अग्नि तथा सर्प से बड़ा भय होता है।।२१।।
देहपूजारतिश्चात्र मंत्राभ्युत्थानतत्परः ।
लोकपूज्यं प्रमादं च भौमसूक्ष्मगते गुरौ ।।२२।। (मं.वृ.)
भौम के प्रत्यन्तर गुरु के सूक्ष्मान्तर में देह की पूजा, मंत्र साधन में रति,
लोक से पूजा और प्रमाद होता है।।२२।।
बंधनान्मुच्यते बद्धो धनधान्यपरिच्छदः ।
भृत्यार्थबहुलः श्रीमान्भौमसूक्ष्मगते शनौ ।।२३।। (मं.श.)
भौम के प्रत्यन्तर में शनि के सूक्ष्मान्तर में बंधन से मुक्ति, धन, धान्य, नौकर
आदि विशेष होते हैं।।२३।।