बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
अथ दशाध्यायः ३८७
मतान्तर से चक्रदशा-
चक्राख्याथ दशां वक्ष्ये तवाग्रे द्विजनन्दन।
लग्नस्थस्य दशा चादौ ततो वित्तस्थितादयः।।१।।
यह दशा दो प्रकार की होती है। प्रथम भावस्थ ग्रह की और दूसरी
भावों की। हे द्विजनंदन ! मैं तुमसे चक्रदशा को कहता हूँ। पहले जन्मलग्न
में बैठे ग्रह की, उसके बाद धन आदि भावों में बैठे हुए ग्रहों की दशा होती
है।।१।।
द्वित्र्यादयो यदैकस्था तदा भागादयोऽधिकात्।
तत्रापि तुल्ये नैसर्गाद्बलात्सर्वाधिकस्य च।।२।।
यदि एक ही भाव में दो या तीन ग्रह हों तो उनमें जिसका अधिक अंश
हो उसका पहले, इसके बाद उससे न्यूनांश की दशा होती है। यदि
अंशादि भी समान हों तो नैसर्गिक बल जिसका अधिक हो उसी की पहले
दशा होगी।।२।।
राशिप्रमितवर्षाणि भागाह्नश्चानुपातः।
भावानामपि लग्नाच्च वर्षाणि दिङ्मितानि च।।३।।
जिस भाव में ग्रह है उस भाव की राशि से संख्या तुल्य वर्ष प्रमाण दशा
वर्ष और अंश से अनुपात द्वारा मासादि लेना चाहिए। भावों की दशा
जन्मलग्न से आरम्भ कर प्रत्येक भावों की दशा होती है। इनका दशा
वर्ष प्रत्येक भाव का दश-दश वर्ष का होता है।।३।।
भुक्ता दशाऽनुयाताद्वा विज्ञेया स्वस्वकल्पनात्।
अन्तर्दशापि सुधिया सूक्ष्मादेशाय चिन्तयेत्।।४।।
दशा का भुक्त अनुपात द्वारा लाना चाहिए। इसी प्रकार सूक्ष्म फल
कहने के लिए अन्तर्दशा का भी साधन करना चाहिए।।४।।
अथ कालचक्रदशामाह-
वन्देऽहं गोपिकानाथं भारतीं गणनायकम्।
पार्वत्यै कथिता पूर्वं कालचक्रं पिनाकिना।।५२।।
श्रीकृष्ण, सरस्वती एवं गणेशजी को प्रणाम कर जो कि शंकरजी ने
पार्वती से पूर्व में कालचक्र को कहा था।।५२।।
तच्चक्रसारमुद्धृत्य लघुमार्गेण कथ्यते।
शुभाशुभं मनुष्याणां भूतभव्यं च भावि तत्।।५३।।
उसके तत्त्व को लेकर लाघव से मैं कालचक्र को कह रहा हूँ, जो
३८८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
मनुष्यों के भूत, वर्तमान और भविष्य के शुभ-अशुभ को बताने वाला
है।।५३।।
द्वादशारं लिखेच्चक्रं तिर्यगूर्ध्वं समानकम्।
गृहा द्वादश जायन्ते सव्यचक्रे यथाक्रमम् ।।५४।।
खड़ी और आड़ी रेखाओं से १२ कोष्ठ का चक्र बना के।।५४।।
द्वितीयादिषु कोष्ठेषु राशीन्मेषादिकाँल्लिखेत्।
एवं द्वादशराश्याख्यं कालचक्रमुदीरितम्।।५५।।
उसके दूसरे आदि कोष्ठ में मेषादि राशियों को लिखे। उनके आगे
कहे अनुसार नक्षत्रों का न्यास करे। इसी प्रकार एक दूसरा चक्र भी बनावे।
दोनों में एक की सव्य और दूसरे की अपसव्य कल्पना कर आगे
कहे हुए रीति के अनुसार राशि तथा नक्षत्रों का न्यासं करे। इसी को १२
राशि का कालचक्र कहते हैं।।५५।।
चक्रे नक्षत्रन्यासविधिः-
अश्विन्यादित्रयं चैव सव्यमार्गे प्रतिष्ठितम्।
रोहिण्यादि त्रयं चैव अपसव्ये यथाक्रमम् ।।५६।।
अश्विनी से तीन नक्षत्रं सव्य चक्र में, रोहिणी से ३ नक्षत्र अपसव्य चक्र
में।।५६।।
अश्विन्यादितिहस्तर्क्षमूलवाताहिवह्नयः।
विश्वर्क्षपूर्वाभाद्रं च रेवती सव्यतारकाः।।५७।।
पुनर्वसु से ३-३ नक्षत्र सव्य-अपसव्य चक्र में लिखने से सव्य चक्र
में अश्विनी, पुनर्वसु, हस्त, मूल, स्वाती, श्लेषा, कृत्तिका, उत्तराषाढ़,
पूर्वाभाद्रपद और रेवती- ये १० नक्षत्र सव्य चक्र में हुए।।५७।।
एतद्दशोडुपादानामश्विन्यादौ च वीक्षयेत्।
विशदस्तत्प्रकारस्तु कथ्यते शृणु पार्वति।।५८।।
इन नक्षत्रों के चरणों को अश्विनी के चरणों के समान ही देखना
चाहिए। इसका विशद प्रकार आगे कह रहा हूँ।।५८।।
देहजीवज्ञानप्रकारमाह-
देहजीवौ मेषचापौ दस्रादाद्यचरणस्य च।
मेषादि चापपर्यन्तं राशिपाश्च दशाधिपाः।।५९।।
अश्विनी नक्षत्र के पहले चरण मेष देह और धनराशि जीव संज्ञक होती
है और मेष से धन पर्यन्त नव राशियाँ (मेष, वृष, मिथुन, कर्क,
अथ दशाध्यायः ३८९
सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धन) और इनके स्वामी क्रम से दशाधीश होते
हैं।।५९।।
देहजीवौ नक्रयुग्मौ दिगीशार्काष्टभूधराः।
षड्वेदशरलोकानां राशिपाश्च दशाधिपाः।।६०।।
अश्विनी के दूसरे चरण में मकर देह और मिथुन जीव संज्ञक होता
है और १०, ११, १२, ८, ७, ६, ४, ५, ३ राशियों अर्थात् मकर, कुम्भ,
मीन, वृश्चिक, तुला, कन्या, कर्क, सिंह और मिथुन के स्वामी दशाधिपति
होते हैं।।६०।।
दास्त्रादि दशताराणां तृतीयचरणेषु च।
गौर्देहो मिथुनं जीवो द्वेकार्केशदशाङ्ककाः।।६१।।
क्वक्षिरामाख्यनाथास्ते दशाधिपतयः क्रमात्।
अश्विन्यादिदशोडूनां चतुर्थचरणेषु च।।६२।।
अश्विनी आदि १० नक्षत्रों के ३ रे चरण में वृष देह और मिथुन राशि
जीव संज्ञक होती है और २, १, १२, ११, १०, ९, १, २, ३ राशियों
के स्वामी क्रम से दशा के स्वामी होते हैं। अश्विनी आदि १० नक्षत्रों के
चौथे चरण में।।६२।।
कर्कमीनौ देहजीवौ कर्कादिनवमेश्वराः।
दशाधिपाश्च विज्ञेया श्रृणु पार्वति निश्चितम् ।।६३ ।।
कर्क देह और मीन राशि जीव संज्ञक होती है और कर्क से मीन पर्यन्त
९ राशियों के स्वामी दशेश होते हैं।।६३।।
याम्येज्यचित्रातोयर्क्ष उत्तराभाद्रपदांस्तथा।
एतत्पञ्चजोडुपादानां भरण्यादौ च वीक्षयेत् ।।६४।।
भरणी, पुष्य, चित्रा, पूर्वाषाढ़, उत्तराभाद्रपद इन पाँच नक्षत्रों के चरणों
का भरणी नक्षत्र के समान ही विचार करना चाहिए।।६४।।
याम्यप्रथमपादस्य देहजीवावलिर्झषः।
नागागर्तुपयोधीषु रामाक्षीन्द्वर्कभेश्वराः।।६५।।
भरणी के प्रथम चरण में वृश्चिक देह और मीन राशि जीव संज्ञक
हैं। ८।७।६।४।५।३।२।१।१२ राशियों के स्वामी क्रम से दशेश होते
हैं।।६५।।
३९० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
याम्यद्वितीयपादस्य देहजीवौ घटाङ्गने।
रुद्रदिङ्नन्दचन्द्राक्षिश्रामाब्धीषु दशेश्वराः।।६६।।
भरणी के दूसरे चरण में कुम्भ देह और कन्या जीव संज्ञक है।
११।१०।९।१।२।३।४।५।६ राशियों के स्वामी क्रम से दशेश होते
हैं।।६६।।
याम्यतृतीयपादस्य देहजीवौ तुलाङ्गने।
सप्ताष्टाङ्कदिगीशार्कगजाद्रिरसराशिपाः।।६७।।
भरणी के तीसरे चरण में तुला देह और कन्या जीव संज्ञक होते
हैं। ७।८।९।१०।११।१२।८।७।६ राशियों के स्वामी क्रम से दशेश होते
हैं।।६७।।
देहजीवौ कर्कचापौ चतुर्थचरणे स्मृतौ।
वेदबाणाग्निनेत्रेन्दुसूर्येशदशनन्दपाः ।।६८।।
भरणी के चौथे चरण में कर्क देह और धन राशि जीवसंज्ञक है।
४।५।३।२।१।१२।११।१०।९ राशियों के स्वामी क्रम से दशेश होते
हैं।।६८।।
सव्यमेवं विजानीयादपसव्यं तु कथ्यते।
द्वादशारं लिखेच्चक्रं तिर्यगूर्ध्वं समानकम्।।६९।।
उपर्युक्त सव्य चक्र को कहा, अब अपसव्य चक्र को कह रहा हूँ। १२
कोष्ठ का ऊपर-नीचे चक्र को लिखकर।।६९।।
द्वितीयादिषु कोष्ठेषु वृश्चिकाद्व्यस्तमालिखेत्।
प्राजापत्यमघेन्द्राग्निं श्रवणं च चतुष्टयम्।।७०।।
दूसरे आदि कोष्ठ में वृश्चिकादि उलटे राशियों को लिखे। उसमें
रोहिणी, मघा, विशाखा और श्रवण इन चार नक्षत्रों को लिखे।।७०।।
धातृवद्दीक्षयेद्देहजीवौ कर्कधनुर्धरौ।
नवदिग्रुद्रसूर्येन्दुनेत्राङ्गीष्वब्धिराशिपाः।।७१।।
उपर्युक्त चार नक्षत्रों में रोहिणी के समान ही देह-जीव का विचार करना
चाहिए। यथा रोहिणी के प्रथम चरण में कर्क देह और धन राशि जीवसंज्ञक
है। ९।१०।११।१२।१।२।३।५।४ राशियों के स्वामी दशेश होते हैं।।७१।।
धातृद्वितीयचरणे तुलास्त्रीदेहजीवकौ।
षष्ठसप्ताष्टार्करुद्रा दिगङ्कवसुसप्तपाः।।७२।।
अथ दशाध्यायः ३९१
रोहिणी के दूसरे चरण में तुला देह और कन्या जीव संज्ञक हैं।
६।७।८।१२।११।१०।९।८।७ राशियों के स्वामी दशेश होते हैं।।७२।।
धातृतृतीयचरणे देहजीवौ कुम्भाङ्गने।
षट्बाणाब्धिगुणाक्षीन्दुनन्ददिगुद्रराशिपाः।।७३।।
रोहिणी के तीसरे चरण में कुम्भ देह और कन्या जीव संज्ञक है।
६।५।४।३।२।१।९।१०।११ राशियों के स्वामी क्रम से दशेश होते
हैं।।७३।।
रोहिण्यन्तपदे देहजीवालिझषौ स्मृतौ।
सूर्येन्दुद्विगुणेष्वब्धितर्कशैलाष्टराशिपाः।।७४।।
रोहिणी के चौथे चरण में वृश्चिक देह और मीन जीव संज्ञक हैं।
१२।१।२।३।४।५।६।७।८ राशियों के स्वामी क्रम से दशेश होते
हैं।।७४।।
चान्द्ररौद्रभगार्य्यममित्रेन्द्रवसुवारुणम्।
एतत्ताराष्टकं चैव विज्ञेयं चान्द्रवत्क्रमात्।।७५।।
मृगशिरा, आर्द्रा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, अनुराधा, ज्येष्ठा, धनिष्ठा
और शतभिषा- इन आठ नक्षत्रों के देह-जीवादि को मृगशिरा के समान
समझना।।७५।।
देहजीवौ कर्कमीनौ मृगाद्यचरणस्य च।
व्यस्तमीनादि कर्कान्तं राशिपाश्च दशाधिपाः।।७६।।
मृगशिरा के प्रथम चरण में कर्क देह और मीन राशि जीव संज्ञक हैं।
मीन से उलटे कर्क पर्यन्त (१२।११।१०।९।८।७।७।६।५।४) राशियों
के स्वामी दशेश होते हैं।।७६।।
गौर्देहो मिथुनं जीवो इन्दुभस्य द्वितीयेके।
त्रिद्वेकाङ्कदिगीशार्कचन्द्रद्विभवनाधिपाः।।७७।।
मृगशिरा के दूसरे चरण में वृष देह और मिथुन राशि जीव संज्ञक
होती हैं। ३।२।१।९।१०।११।१२।१।२ राशियों के स्वामी दशेश होते
हैं।।७७।।
देहजीवौ नक्रयुग्मे मृगपादे तृतीयके।
त्रिबाणाब्धिरसागाष्टसूर्येशदशराशिपाः।।७८।।
मृगशिरा के तीसरे चरण में मकर देह और मिथुन राशि जीव संज्ञक
होती है। ३।५।४।६।७।८।१२।११।१० राशियों के स्वामी दशेश होते
हैं।।७८।।
३९२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
मेषचापौ देहजीवाविन्दुभस्य चतुर्थके।
व्यस्तं चापादि मेषान्तं राशिपाश्च दशाधिपाः।।७९।।
मृगशिरा के चौथे चरण में मेष देह और धन जीव संज्ञक हैं। धन राशि
से मेष पर्यन्त विलोम (९।८।७।६।५।४।३।२।१) राशियों के स्वामी
दशेश होते हैं।।७९।।
एवं व्यस्ततरे ज्ञेयं देहजीवदशादिकम्।
स्पष्टं तवाग्रे कथितं पार्वति प्राणवल्लभे।।८०।।
हे पार्वति ! यह अपसव्य चक्र के देह-जीव आदि को तुम्हारे सामने
कहा।।८०।।
अथ दशावर्षाणि-
भूतैकविंशगिरयो नवदिक् षोडशाब्धयः।।८१।।
सूर्यादीनां क्रमादब्दाः राशीनां स्वामिनो वशात्।।८१।।
५ । १२ । ७ । ९ । १० । १६ । ४ यह क्रम से सूर्यादि ग्रहों के दशावर्ष राशियों
के अधिपति के क्रम से हैं। विशेष चक्र को देखिए।।८१।।
चक्रम्-
| मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | कं. | तु. | वृ. | ध. | म. | कुं. | मी. | राशयः |
| मं. | शु. | बु. | चं. | सू. | बु. | शु. | मं. | बृ. | श. | श. | बृ. | अधिपाः |
| ७ | १६ | ९ | २१ | ५ | ९ | १६ | ७ | १० | ४ | ४ | १० | दशावर्षाणि |
दशाज्ञानप्रकारमाह-
नरस्य जन्मकाले वा प्रश्नकाले यदंशकः।
तदादि नवपर्यन्तमायुषं परिचक्षते।।८२।।
मनुष्य के जन्मकाल वा प्रश्नकाल में नक्षत्र का जो अंश (चरण) हो
उससे आरम्भ करके नव (९) राशियों के वर्ष संख्या तुल्य उस मनुष्य
की आयु होती है।।८२।।
सम्पूर्णायुर्भवेदादावर्धमंशस्य मध्यमम्।
अपमृत्युसमं कष्टमंशान्ते चापरे जगुः।।८३।।
अन्य विद्वानों का कहना है कि नक्षत्र के चरण के आदि में जन्म
हो तो पूर्णायु, मध्य में आधी और अन्त में कष्ट वा अल्पायु होती है।।८३।।
अथ दशाध्यायः ३९३
नक्ष'चरणतः नवांशज्ञानम्—
ज्ञात्वैवं स्फुटसिद्धान्तं राश्यंशं गणयेद्बुधः।
अनुपातेन वक्ष्यामि तदुपायमतः परम्।।८४।।
इस सिद्धान्त को जानकर राशि के अंश की गणना करना चाहिए।
अब मैं अनुपात द्वारा उसके जानने का उपाय कह रहा हूँ।।८४।।
गततारा त्रिभिर्भक्ता शेषं चत्वारि संगुणम्।
वर्तमानपदेनाढ्यं राशीनामंशको भवेत्।।८५।।
गतनक्षत्र संख्या (अश्विनी से जन्मनक्षत्र के पूर्व नक्षत्र की संख्या) को
३ से भाग देने से जो शेष बचे उसे ४ से गुणाकर गुणनफल में जन्मनक्षत्र
वा वर्तमान नक्षत्र के वर्तमान चरण संख्या को जोड़ दे। जो संख्या हो वही
मेष से गिनने से नवांश होता है।।८५।।
उदाहरण— जैसे पुनर्वसु के प्रथम चरण में जन्म है तो गतनक्षत्र (आर्द्रा)
संख्या ६ में तीन से भाग देने पर शेष को ४ से गुणाकर उसमें पुनर्वसु
के प्रथम चरण की संख्या १ जोड़ने से १० मेष से गिनने से मेष ही का
नवांश हुआ।
चक्रे राशीनां वर्षयोगसंख्यामाह—
मेषगोयमकुलीरराशिषुस्वांशकेषु परमायुरुच्यते।
ज्ञानकं १०० मंद ८५ गज ८३ स्त्तदा ८६ क्रमात्त-
त्त्रिकोणभवनेषु तद्भवेत्।।८६।।
कालचक्र में स्थित मेषादि राशियों से मेषांश में १००, वृषांश में ८५,
मिथुनांश में ८३ और कर्कांश में ८६ वर्ष योग वा परमायु होता है।
इन राशियों के त्रिकोण (५।९) राशियों में भी यही वर्ष योग होते
हैं।।८६।।
स्पष्टार्थ चक्रम्—
| मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | कं. | तु. | वृ. | ध. | म. | कुं. | मी. | अंशकाः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १०० | ८५ | ८३ | ८६ | १०० | ८५ | ८३ | ८६ | १०० | ८५ | ८३ | ८६ | वर्षयोगः |
| विशेष— यहाँ ज्ञानकं मंदगज आदि शब्दों से 'कटपयवर्गभवैरिहः | ||||||||||||
| अंकाः' इत्यादि के अनुसार अंकों को समझना चाहिए। |
३९४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
.दशारम्भज्ञानप्रकारमाह-
ये जीवा अंशके जाता गतनाडीपलेन तु।
तदंशस्य हताङ्कस्तु पञ्चभूमिविभाजिताः॥८७॥
मनुष्य का जन्म नक्षत्र के जिस चरण में हो उसके गत घटी-पल को
उसके वर्ष संख्या से गुणाकर गुणन फल में १५ का भाग देने से॥८७॥
एवं महादशारम्भे सूर्यादीनां यथाक्रमात्।
गणयेन्नवपर्यन्तमायुष्यं तत्प्रकीर्त्तितम्॥८८॥
लब्धि दशा का भुक्त वर्षादि होता है। इसे दशावर्ष में घटाने से भोग्य
वर्षादि होता है। इस प्रकार से दशा का आरम्भ होता है॥८८॥
.उदाहरण- किसी का पुनर्वसु नक्षत्र के तृतीय चरण में जन्म है। पुनर्वसु
सव्य नक्षत्र है। उसका देहाधिपति भौम और जीवाधिपति गुरु है। पुनर्वसु
का भभोग ५५।५२ भयात ३२।१० है। भभोग का चार भाग करने से एक
भाग घट्यादि १३।४८।१५ हुआ। यही एक चरण का मान है। इसे
दूना कर भयात से घटाने से शेष ४।१३।३० यह पुनर्वसु के तीसरे चरण
की भुक्त घट्यादि है। इसका दशा वर्ष १०० है, इससे शेष घट्यादि
को गुणा करने से ४००।१३००।३००० सवर्णन करने से ४२२।३०।१०
हुआ। इसमें १५ का भाग देने से २८।३।१८ वर्षादि जन्मकाल में भुक्त हुआ।
पुनर्वसु सव्य गणना में है, देहादि जीव पर्यन्त गणना होगी। अतः पुनर्वसु
प्रथम चरण में देह मेष और जीव धनु है। अतः भुक्त वर्षादि २८।३।१८
में मेष से वृष पर्यन्त के योग-वर्ष २३ को घटाने से ५।३।१८ यह
वर्षादि मिथुन के भुक्त वर्षादि हुए। अतः इसे बुध के वर्षमान ९ से घटाने
से ३।८।४२ वर्षादि भोग्य हुआ। अतः विंशोत्तरी दशा के समान ही
मिथुन आदि दशा का क्रम हुआ। शेष चक्र से स्पष्ट है।
कालचक्रदशा-
| मि. | क. | सिं. | कं. | तु. | वृ. | ध. | मे. | वृ. | |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ५<br>३<br>१८ | २१ | ५ | ९ | १६ | ७ | १० | ७ | १६ | |
| २०१३ | २०१८ | २०३९ | २०४४ | २०५१ | २०६२ | २०७४ | २०८४ | २०९१ | २१०७ |
| ३ | ७ | ७ | ७ | ७ | ७ | ७ | ७ | ७ | ७ |
| १८ | ०६ | १६ | १६ | १६ | १६ | १६ | १६ | १६ | १६ |
अथ दशाध्यायः ३९५
| दशानां नक्षत्राणि तत्पादानि च | नक्ष. | पा. | जीवाधिपाः | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | परमा. वर्षा. | देहाधिपाः | राश. अंशा |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मृ. १च. अ. १च. पू. १च. घ. १च. | मृगशिरा, पूर्वाफाल्गुनी, अनुराधा, धनिष्ठा | १ | बृ. | बृ. = १०व. | श. = ४व. | श. = ४व. | बू. = १०व. | मं. = ७व. | शु. = १६व. | बु. = ९व. | सू. = ५व. | चं. = २१व. | ८६ | चं. | क. |
| मृ. २च. अ. २च. पू. २च. घ. २च. | २ | बु. | बु. = ९व. | शु. = १६व. | मं. = ७व. | बृ. = १०व. | श. = ४व. | श. = ४व. | बू. = १०व. | मं. = ७व. | शु. = १६व. | ८३ | शु. | मि. | |
| मृ. ३च. अ. ३च. पू. ३च. घ. ३च. | ३ | बु. | बु. = ९व. | सू. = ५व. | चं. = २१व. | बु. = ९व. | शु. = १६व. | मं. = ७व. | बृ. = १०व. | श. = ४व. | श. = ४व. | ८५ | श. | वृ. | |
| मृ. ४च. अ. ४च. पू. ४च. घ. ४च. | ४ | बृ. | बृ. = १०व. | मं. = ७व. | शु. = १६व. | बु. = ९व. | सू. = ५व. | चं. = २१व. | बु. = ९व. | शु. = १६व. | मं. = ७व. | १०० | मं. | मे. | |
| आ. १च. ज्ये. १च. उ. १च. शत. १च. | आर्द्रा, उत्तराफाल्गुनी ज्येष्ठा, शतभिषा | १ | बृ. | बृ. = १०व. | श. = ४व. | श. = ४व. | बू. = १०व. | मं. = ७व. | शु. = १६व. | बु. = ९व. | सू. = ५व. | चं. = २१व. | ८६ | चं. | मी. |
| आ. २च. ज्ये. २च. उ. २च. शत. २च. | २ | बु. | बु. = ९व. | शु. = १६व. | मं. = ७व. | बृ. = १०व. | श. = ४व. | श. = ४व. | बू. = १०व. | मं. = ७व. | शु. = १६व. | ८३ | शु. | कुं. | |
| आ. ३च. ज्ये. ३च. उ. ३च. शत. ३च. | ३ | बु. | बु. = ९व. | सू. = ५व. | चं. = २१व. | बु. = ९व. | शु. = १६व. | मं. = ७व. | बृ. = १०व. | श. = ४व. | श. = ४व. | ८५ | श. | म. | |
| आ. ४च. ज्ये. ४च. उ. ४च. शत. ४च. | ४ | बृ. | बृ. = १०व. | मं. = ७व. | शु. = १६व. | बु. = ९व. | सू. = ५व. | चं. = २१व. | बु. = ९व. | शु. = १६व. | मं. = ७व. | १०० | मं. | ध. |
३९६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
अथ कालचक्रदशायां सव्यमार्गचक्रम्
| दशानां नक्षत्राणि तत्पादानि च | नक्ष. | पा. | देहाधी. | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | परमा. वर्षा. | जीवाधिपाः | राश. अंशाः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ. १च. मू. १च. पुन. १च. पू. १च. ह. १च. | अश्विनी, पुनर्वसु, हस्त, मूल, पूर्वाभाद्रपद | १ | मं. | मं. = ७व. | शु. = १६व. | बु. = ९व. | चं. = २१व. | सू. = ५व. | बु. = ९व. | शु. = १६व. | मं. = ७व. | बृ. = १०व. | १०० वर्ष | बृ. | मे. |
| अ. २च. मू. २च. पुन. २च. पू. २च. ह. २च. | अश्विनी, पुनर्वसु, हस्त, मूल, पूर्वाभाद्रपद | २ | श. | श. = ४व. | श. = ४व. | बृ. = १०व. | मं. = ७व. | शु. = १६व. | बु. = ९व. | चं. = २१व. | सू. = ५व. | बु. = ९व. | ८५ वर्ष | बु. | वृ. |
| अ. ३च. मू. ३च. पुन. ३च. पू. ३च. ह. ३च. | अश्विनी, पुनर्वसु, हस्त, मूल, पूर्वाभाद्रपद | ३ | शु. | शु. = १६व. | मं. = ७व. | बृ. = १०व. | श. = ४व. | श. = ४व. | बृ. = १०व. | मं. = ७व. | शु. = १६व. | बु. = ९व. | ८३ वर्ष | बु. | मि. |
| अ. ४च. मू. ४च. पुन. ४च. पू. ४च. ह. ४च. | अश्विनी, पुनर्वसु, हस्त, मूल, पूर्वाभाद्रपद | ४ | चं. | चं. = २१व. | सू. = ५व. | बु. = ९व. | शु. = १६व. | मं. = ७व. | बृ. = १०व. | श. = ४व. | श. = ४व. | बृ. = १०व. | ८६ वर्ष | बृ. | कं. |
| भ. १च. चि. १च. पु. १च. पू.षा. १च. उ.भा. १च. | भरणी, पुष्य, चित्रा, पूर्वाषाढ़, उत्तराभाद्रपद | १ | मं. | मं. = ७व. | शु. = १६व. | बु. = ९व. | चं. = २१व. | सू. = ५व. | बु. = ९व. | शु. = १६व. | मं. = ७व. | बृ. = १०व. | १०० वर्ष | बृ. | सिं. |
| भ. २च. चि. २च. पु. २च. पू.षा. २च. उ.भा. २च. | भरणी, पुष्य, चित्रा, पूर्वाषाढ़, उत्तराभाद्रपद | २ | श. | श. = ४व. | श. = ४व. | बृ. = १०व. | मं. = ७व. | शु. = १६व. | बु. = ९व. | चं. = २१व. | सू. = ५व. | बु. = ९व. | ८५ वर्ष | बु. | क. |
| भ. ३च. चि. ३च. पु. ३च. पू.षा. ३च. उ.भा. ३च. | भरणी, पुष्य, चित्रा, पूर्वाषाढ़, उत्तराभाद्रपद | ३ | शु. | शु. = १६व. | मं. = ७व. | बृ. = १०व. | श. = ४व. | श. = ४व. | बृ. = १०व. | मं. = ७व. | शु. = १६व. | बु. = ९व. | ८३ वर्ष | बु. | तु. |
| भ. ४च. चि. ४च. पु. ४च. पू.षा. ४च. उ.भा. ४च. | भरणी, पुष्य, चित्रा, पूर्वाषाढ़, उत्तराभाद्रपद | ४ | चं. | चं. = २१व. | सू. = ५व. | बु. = ९व. | शु. = १६व. | मं. = ७व. | बृ. = १०व. | श. = ४व. | श. = ४व. | बृ. = १०व. | ८६ वर्ष | बृ. | वृ. |
अथ कालचक्रदशायां सव्यमार्गाच्चक्रम्
| दशानां नक्षत्राणि तत्पादानि च | नक्ष. | पा. | जीवाधिपाः | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | परमावर्षा. | देहाधिपाः | राश. अंशाः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कृ. १च. | उ.षा. १च. | श्ले. १च. | रे. १च. | स्वा. १च. | कृत्तिका, आश्लेषा, स्वाती, उत्तराषाढ, रेवती | १ | मं. | मं. = ७ व. | शु. = १६ व. | बु. = ९ व. | चं. = २१ व. | सू. = ५ व. | बु. = ९ व. | शु. = १६ व. | मं. = ७ व. |
| कृ. २च. | उ.षा. २च. | श्ले. २च. | रे. २च. | स्वा. २च. | २ | श. | श. = ४ व. | श. = ४ व. | बृ. = १० व. | मं. = ७ व. | शु. = १६ व. | बु. = ९ व. | चं. = २१ व. | सू. = ५ व. | |
| कृ. ३च. | उ.षा. ३च. | श्ले. ३च. | रे. ३च. | स्वा. ३च. | ३ | शु. | शु. = १६ व. | मं. = ७ व. | बृ. = १० व. | श. = ४ व. | श. = ४ व. | बृ. = १० व. | मं. = ७ व. | शु. = १६ व. | |
| कृ. ४च. | उ.षा. ४च. | श्ले. ४च. | रे. ४च. | स्वा. ४च. | ४ | चं. | चं. = २१ व. | सू. = ५ व. | बु. = ९ व. | शु. = १६ व. | मं. = ७ व. | बृ. = १० व. | श. = ४ व. | श. = ४ व. |
अथ कालचक्रदशायामपसव्यमार्गाच्चक्रम्
| दशानां नक्षत्राणि तत्पादानि च | नक्ष. | पा. | जीवाधिपाः | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | परमावर्षा. | देहाधिपाः | राश. अंशाः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रो. १च. | वि. १च. | म. १च. | श्र. १च. | रोहिणी, मघा, विशाखा, श्रवण | १ | बृ. | बृ. = १० व. | श. = ४ व. | श. = ४ व. | बृ. = १० व. | मं. = ७ व. | शु. = १६ व. | बु. = ९ व. | सू. = ५ व. | चं. = २१ व. |
| रो. २च. | वि. २च. | म. २च. | श्र. २च. | २ | बु. | बु. = ९ व. | शु. = १६ व. | मं. = ७ व. | बृ. = १० व. | श. = ४ व. | श. = ४ व. | बृ. = १० व. | मं. = ७ व. | शु. = १६ व. | |
| रो. ३च. | वि. ३च. | म. ३च. | श्र. ३च. | ३ | बु. | बु. = ९ व. | सू. = ५ व. | चं. = २१ व. | बु. = ९ व. | शु. = १६ व. | मं. = ७ व. | बृ. = १० व. | श. = ४ व. | श. = ४ व. | |
| रो. ४च. | वि. ४च. | म. ४च. | श्र. ४च. | ४ | बृ. | बृ. = १० व. | मं. = ७ व. | शु. = १६ व. | बु. = ९ व. | सू. = ५ व. | चं. = २१ व. | बु. = ९ व. | शु. = १६ व. | मं. = ७ व. |
(पृष्ठ-शीर्षकः) अथ दशाध्यायः ३९७
३९८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
अथ कालचक्रगतिभेदमाह-
प्रथमा गति मण्डूकी द्वितीया मर्कटी तथा।
बाणाच्च नवपर्यन्तं गतिः सिंहावलोकनम् ।।८८।।
कालचक्र की गति ३ प्रकार की होती है। पहली गति का नाम मण्डूकी
है, दूसरी का नाम मर्कटी और तीसरी का नाम सिंहावलोकन है।।८८।।
कन्यायां कर्कटे वापि सिंहभे मिथुनेऽपि च।
माण्डूकी गति विज्ञेया भवेद्रोगस्य कारणम् ।।८९।।
कन्या से कर्क में और सिंह से मिथुन में जाने को मण्डूकी गति कहते
हैं। इसमें रोग होता है।।८९।।
मीनवृश्चिकयोर्विप्र चापमेषस्तथैव च।
सिंहावलोकनं चैव तादृशं च फलं भवेत्।
सिंहावगतिमार्गे च मर्कटीगतिसम्भवः ।।९०।।
मीन से वृश्चिक में और धन से मेष में जाने को सिंहावलोकन गति
कहते हैं। नाम सदृश ही इसका फल होता है। सिंह से कर्क में
जाने को मर्कटी गति कहते हैं।।९०।।
गतिफलञ्चाह-
मीनात्तु वृश्चिके याते ज्वरो भवति निश्चितम्।
कन्यातः कर्कटे याते भ्रातृबन्धुविनाशनम् ।।९१।।
मीन से वृश्चिक प्राप्त हो तो उस दशा में निश्चय ही ज्वर होता है। कन्या
से कर्क प्राप्त हो तो उस दशा में माता और बन्धु का नाश होता है।।९१।।
सिंहात्तु मिथुने याते स्त्रिया व्याधिर्भवेद् ध्रुवम्।
कर्कटाच्च हरौ याते वधो भवति देहिनाम्।
पितृबन्धुमृतिं विद्याच्चापान्मेषगते पुनः ।।९२।।
सिंह से मिथुन प्राप्त हो तो इस दशा में स्त्री को रोग होता है। कर्क से
सिंह प्राप्त हो तो उस दशा में मनुष्य का वध होता है। धन से मेष
प्राप्त हो तो पिता के भाई (चाचा) की मृत्यु होती है।।९२।।
पुनः गतिफलमाह-
कन्यातः कर्कटे याते पूर्वभागे महत्फलम्।
उत्तरे देशमाश्रित्य शुभा यात्रा भविष्यति ।।९३।।
अथ दशाध्यायः . ३९९
कन्या से कर्क में जाने के समय पूर्वभाग से लाभ और उत्तर देश की
शुभकर यात्रा होती है।।९३।।
सिंहात्तु मिथुने याते पूर्वभागं विसृज्यते।
कार्यान्तेऽपि च नैर्ऋत्यां सुखं यात्रा भविष्यति ।।९४।।
सिंह से मिथुन में जाने के समय पूर्व दिशा को त्याग देना चाहिए। कार्य
हो जाने पर भी नैर्ऋत्य कोण की यात्रा से सुख होता है।।९४।।
कर्कटात्तु गते सिंहे कार्यहानिश्च जायते।
दक्षिणां दिशमाश्रित्य प्रत्यगामनं भवेत् ।।९५।।
कर्क से सिंह में जाने के समय दक्षिण दिशा में यात्रा करने से कार्य
की हानि होती है और दक्षिण से पश्चिम की यात्रा होती है।।९५।।
मीनात्तु वृश्चिके याते उदग्गच्छति सङ्कटम्।
चापाच्च मकरे विप्र दुःखं सङ्कटमुच्यते ।।९६।।
मीन से वृश्चिक में जाने के समय उत्तर की यात्रा से संकट होता है।
धन से मकर में जाने से दुःख और संकट होता है।।९६।।
चापान्मेषे तु यात्रायां वधबन्धो मृतिर्भवेत्।
तुला सम्पद्विवाहश्च स्त्रीप्राप्तिर्वृश्चिके गतिः ।।९७।।
धन से मेष में जाने के समय वध, बंधन और मृत्यु होती है। तुला
से वृश्चिक में जाने के समय सम्पत्ति, स्त्री की प्राप्ति होती है।।९७।।
अथ कालचक्रांशफलम्-
मेषांशे चोरको विन्द्याच्छ्रीमाञ्छुक्रांशके भवेत्।
बुधांशे ज्ञानसम्पन्नश्चन्द्रे च नृपतिर्भवेत् ।।९८।।
यदि कालचक्र की दशा में मेषांश में जन्म हो तो चोर होता
है। वृषांश में लक्ष्मीवान्, मिथुनांश में ज्ञानी, कर्कांश में राजा।।९८।।
सिंहांशे भूपतिः प्रोक्तः सौम्यांशे पण्डितो भवेत्।
तुलांशे राजमन्त्री च भौमांशे निर्धनो भवेत् ।।९९।।
सिंहाश में राजा, कन्यांश में पंडित, तुलांश में राजमन्त्री, [वृश्चिकां]श
में दरिद्र।।९९।।
चापांशे ज्ञानसंयुक्तो मकरांशे च पापकृत्।
कुम्भांशे च वणिक्कर्मा मीनांशे किल धान्यवान् ।।१००।।
४०० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
धन्वंश में बुद्धिमान्, मकरांश में पापी, कुम्भांश में व्यापारी और मीनांश
में धान्य से युक्त होता है।।१००।।
अथ देहजीवफलम्-
देहजीवसमायोगे भौमार्करविजादिभिः।
एकैकयोगे मरणं बहुयोगे तु का कथा।।१।।
यदि देह या जीव में कोई भी भौम, सूर्य, शनि में से किसी से युत
हो तो मरण होता है। यदि सभी से युक्त हो तो क्या कहना है।।१।।
देहयोगे महाबाधा जीवयोगे तु मृत्युदः।
द्वाभ्यां संयोगमात्रेण हन्यते नात्र संशयः।।२।।
देह में पापग्रह का योग हो तो महाबाधा होती है और जीव में पापयोग
हो तो मृत्यु होती है। यदि दोनों में पापयोग हो तो अवश्य मृत्यु होती
है।।२।।
देहे जीवे यदा राहुः सौरिर्वक्रो रविः स्थितः।
मृत्युकालगतिं ज्ञात्वा शान्तिं कुर्याद्यथाविधि ।।३।।
देह-जीव में जब राहु, शनि, भौम, सूर्य स्थित हों उस समय मृत्यु का
भय होता है। इसे जानकर शान्ति करनी चाहिए।।३।।
देहे जीवे यदि सोमे सौम्यजीवसितः स्थितः।
तदा सौख्यं प्रकुर्वन्ति रोगमृत्युविनाशनम् ।।४।।
देह-जीव में जब चन्द्रमा, बुध, गुरु, शुक्र होते हैं उस समय रोग
तथा मृत्यु का नाश कर सुख देते हैं।।४।।
पापक्षेत्रे दशायोगे देहजीवौ तु दुःखदौ।
शुभक्षेत्रे दशायोगे शुभयोगे शुभं भवेत् ।।५।।
देह-जीव पापक्षेत्र में हों और पापयुक्त हों तो उसकी दशा में दुःख होता
है। देह-जीव शुभक्षेत्र में हों और शुभयुक्त हों तो उसकी दशा में शुभ फल
होता है।।५।।
देहे शुभग्रहैर्युक्ते भूषणादि ध्रुवं भवेत्।
जीवे शुभग्रहैर्युक्ते पुत्रदारादिकाँल्लभेत ।।६।।
देह में शुभग्रह युक्त हों तो भूषण आदि का लाभ होता है। जीव शुभग्रह
से युक्त हो तो पुत्र-स्त्री आदि का लाभ होता है।।६।।
इति कालचक्रदशाज्ञानम्।
अथ दशाध्यायः ४०१
अथ चरदशानयनम्-
लग्नादि व्ययपर्यन्तं राशयो द्वादशो द्विज।
आयुर्वर्षप्रदातार एभिश्चरदशा मता।।७।।
लग्न से १२वें भाव पर्यन्त १२ राशियाँ होती हैं। ये आयु के वर्ष को
देने वाली होती हैं और इन्हीं से चरदशा भी होती है।।७।।
ओजर्क्षाणां क्रमाद्विप्र समानां व्युत्क्रमात्पुनः।
नाथान्तेन समाज्ञेया निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।।८।।
ओज (विषम) राशियों का क्रम से और सम राशियों का व्युत्क्रम
से उस राशि के स्वामी पर्यन्त गिनने से दशा के वर्ष का मान होता
है।।८।।
मेषो वृषोऽथ मिथुनो तुलालिश्च धनुर्धरः।
एतेषामोजसंज्ञा स्यादब्दानां गणनाक्रमात्।।९।।
मेष, वृष, मिथुन, तुला, वृश्चिक, धन राशियों की ओज संज्ञा है और
इसमें वर्ष के गणना क्रम से गिनना चाहिए।।९।।
कर्कः सिंहश्च कन्या च नक्रकुम्भझषा द्विज।
एतेषां समसंज्ञा स्यादृक्षाणां व्युत्क्रमाद्द्विज।।१०।।
कर्क, सिंह, कन्या, मकर, कुंभ और मीन इन राशियों की सम संज्ञा
है। इनमें व्युत्क्रम गणना से वर्ष की संख्या को जानना चाहिए।।१०।।
स्वर्क्षसंस्थितखेटस्य वर्षाणि द्वादशैव हि।
धनस्थे चैकवर्षं हि तृतीये हायनद्वयम्।।११।।
ग्रह (राशीश) अपनी राशि में हो तो १२ वर्ष की दशा होती है। अपनी
राशि से धन भाव में हो तो १ वर्ष, तीसरे भाव में हो तो २ वर्ष।।११।।
तुर्ये वर्षत्रयं विप्र पञ्चमे तुर्यहायनम्।
रिपुस्थे पञ्चवर्षाणि षड्वर्षाणि च सप्तमे।।१२।।
चौथे में हो तो ३ वर्ष, पाँचवें में हो तो ४ वर्ष, छठे में हो तो ५ वर्ष,
सातवें में हो तो ६ वर्ष, आठवें में हो तो ७ वर्ष।।१२।।
रन्ध्रस्थे नगवर्षाणि चाष्टवर्षाणि पुण्यभे।
नभस्थे चाङ्कवर्षाणि दिग्वर्षाणि तु लाभगे।
व्ययस्थे रुद्रवर्षाणि राश्यङ्काश्च तथानघ।।१३।।
४०२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
नवम में हो तो ८ वर्ष, दशम में हो तो ९ वर्ष, एकादश में हो तो १०
वर्ष और बारहवें भाव में हो तो ११ वर्ष की दशा होती है। यह पूर्व
में कहे हुए प्रकार से जानना।।१३।।
द्विराश्यधिपतौ विशेषः-
वृश्चिकाधिपती द्वौ च कुजकेतू द्विजोत्तम।
स्वर्भानुपङ्गू कुम्भस्य पती द्वौ चिन्तयेद्द्विज ।।१४।।
वृश्चिक राशि के भौम और केतु ये दो स्वामी हैं और कुम्भ राशि के
राहु तथा शनि ये दो स्वामी हैं।।१४।।
स्वर्क्षे यदि स्थितौ द्वौ च भानुवर्षप्रदायकौ।
परर्क्षे सङ्गतौ द्वौ च नाथान्ते न विचिन्तयेत् ।।१५।।
यदि दोनों स्वामी अपनी राशि में हों तो १२ वर्ष की दशा होती है। यदि
दोनों भिन्न राशि में हो तो स्वामी पर्यन्त दशा की गणना नहीं करना
चाहिए।।१५।।
परर्क्षे भिन्नभिन्नस्थौ द्वयोर्मध्ये तु यो बली।
तस्य नाथान्तरीत्या च वर्षाणि संलिखेद्द्विज ।।१६।।
भिन्न राशि में दोनों अलग-अलग हों तो दोनों में जो बली हो उसी के
साथ पर्यन्त रीति से दशावर्ष लेना चाहिए।।१६।।
अग्रहात्सग्रहः प्राणी सग्रहादधिकग्रहः।
साम्ये चरस्थिरद्वन्द्वाः क्रमात्स्युर्बलिनो द्विज ।।१७।।
बल विचार में ग्रहहीन से ग्रह युक्त बली होता है। यदि दोनों ग्रह
युक्त हों तो जिसके साथ अधिक ग्रह हों वह बली होता है। यदि
ग्रह में समानता हो तो चर, स्थिर, द्विस्वभाव क्रम से बल का विचार करना
चाहिए।।१७।।
राशिसाम्ये सदा विप्र बहुवर्षप्रदो बली।
तद्बाधादुच्चगः खेटो बलवान्भवति द्विज ।।१८।।
यदि राशि में भी समानता हो तो जिसका अधिक वर्ष हो वह बली होता
है। इसमें भी उच्चस्थ ग्रह बली होता है।।१८।।
यद्यप्यल्पवर्षदो विप्र तदापि तुङ्गगो बली।
नाथान्तेन समाज्ञेया पूर्वोक्तेन क्रमेण हि।।१९।।
अथ दशाध्यायः ४०३
यद्यपि उच्चस्थ ग्रह अल्पवर्ष देने वाला हो तथापि वही बली होता है।
वहाँ स्वामी पर्यन्त दशावर्ष लेना चाहिए।।१९।।
उच्चखेटस्य सद्भावे वर्षमेकं तु निःक्षिपेत्।
तथैव नीचखेटस्य वर्षमेकं त्यजेद्द्विज।।२०।।
उच्चस्थ ग्रह के वर्ष में १ जोड़ देना चाहिए और नीचस्थ ग्रह में १ वर्ष
कम करना चाहिए।।२०।।
एकः स्वक्षेत्रगो अन्यस्तु परत्र यदि संस्थितः।
तदान्यत्र स्थितं नाथं परिगृह्य दशां नयेत्।।२१।।
यदि एक ग्रह अपनी राशि में हो और दूसरा अन्य राशि में हो तो वहाँ
अन्यत्र स्थित ग्रह के स्वामी से दशावर्ष लेना चाहिए।।२१।।
एकः स्वोच्चगतस्त्वन्यः परत्र यदि संस्थितः।
ग्राहयेदुच्चखेटस्थं राशिमन्यं विहाय वै।।२२।।
एक ग्रह अपने उच्च में हो और दूसरा अन्यत्र हो तो वहाँ उच्चस्थ ग्रह
की राशि को अन्य ग्रह की राशि को छोड़कर लेना चाहिए।।२२।।
चरदशाफलमाह—
एवं सर्वं समालोच्य दशायां निधनं वदेत्।
पापयोगे पापदृष्ट्या यस्य पापत्रिकोणगाः ।।२३।।
इस प्रकार सभी पदार्थों का विचार कर निधन को कहना। जिस दशा
की राशि में पापग्रह का योग हो अथवा दृष्टि हो वा पापग्रह से त्रिकोण
में हो तो।।२३।।
निधनं तद्दशायां वै भाषितं ब्रह्मणा यथा।
चरमुख्यदशायास्ते कथयिष्याम्यहं फलम्।।२४।।
उस दशा में अवश्य मृत्यु होती है, ऐसा ब्रह्मा ने कहा है। इस प्रकार
चर दशा का फल मैंने कहा।।२४।।
उदाहरण— जन्मांग के अनुसार जन्मलग्न मकर सम राशि है, अतः
६ उत्क्रम गणनां से मकर से दशा का आरम्भ हुआ और उसका
दशांवर्ष ३ हुआ। कुम्भ का शनिपर्यन्त ३ वर्ष, मीन का ७ वर्ष, मेष ओज
राशि है, अतः क्रम गणना से मेष का १० वर्ष, वृष का १ वर्ष, मिथुन
का २ वर्ष। इसी प्रकार अन्य राशियों के दशावर्ष भी लाना चाहिए, शेष
चक्र से स्पष्ट है।
४०४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
| १२ | मं. ११ | ९ |
| १ | १० | श. ८ रा. |
| २ के. | ४ सू. | ७ |
| चं. ३ शु. | ५ बृ. बु. | ६ |
चरदशाचक्रम्
| म. | ध. | वृ. | तु. | क. | सिं. | कं. | मि. | वृ. | मे. | मी. | कुं. | राशि |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| २ | ८ | ९ | ४ | ११ | ११ | १० | २ | १ | १० | ७ | ३ | वर्ष |
| २०१५ | २०२३ | २०३२ | २०३६ | २०४७ | २०५८ | २०६८ | २०७० | २०७१ | २०८१ | २०८८ | २०९१ | संवत् |
| ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | सूर्य |
| १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | |
| अथ नवांशस्थिरदशा- | ||||||||||||
| अधुना सम्प्रवक्ष्यामि दशास्थिरविशेषतः। | ||||||||||||
| नवांशकदशामानं तवाग्रे द्विजनन्दन ।।२५।। | ||||||||||||
| पाराशरजी ने कहा- हे द्विजोत्तम ! अब मैं तुमसे स्थिर दशा के मध्य | ||||||||||||
| में नवांशक दशा को कहता हूँ।।२५।। | ||||||||||||
| प्रतिराशिप्रदिष्टैवमङ्काङ्का च दशा स्थिरा। | ||||||||||||
| तन्वादिव्ययभावानां स्पष्टीकृत्वा द्विजोत्तम ।।२६।। | ||||||||||||
| लग्नादि द्वादश भावों को स्पष्ट करना चाहिए। प्रत्येक राशि में नव | ||||||||||||
| नवमांश होते हैं, इन्हीं की दशा को स्थिर दशा कहते हैं।।२६।। | ||||||||||||
| ग्रहनवांशायुरीत्या दशातुल्या नवांशका। | ||||||||||||
| अस्थिरा इति विज्ञेया परपक्षमिदं क्रमात् ।।२७।। | ||||||||||||
| इसे दो प्रकार की कोई-२ कहते हैं। एक राशि से और दूसरी ग्रह नवांश | ||||||||||||
| से दशा होती है।।२७।। | ||||||||||||
| पक्षद्वयं प्रवक्ष्यामि चरस्थिरं द्विजोत्तम। | ||||||||||||
| पूर्वं चरदशां वक्ष्ये तवाग्रे द्विजनन्दन ।।२८।। |
अथ दशाध्यायः ४०५
इसमें भी दो प्रकार है, पहला चर और दूसरा स्थिर दशा। उसमें
प्रथम प्रकार को कहता हूँ।।२८।।
ओजलग्ने जनुर्यस्य नवांशकदशा द्विज।
लग्नादिकं समारभ्य तस्य चांशदशा मता।।२९।।
जिसका जन्म विषम राशिलग्न में हो उसकी नवांश दशा लग्न से
क्रम गणना के अनुसार होती है।।२९।।
समराशौ जनुर्यस्य नवांशकदशा द्विज।
व्युत्क्रमाच्च समारभ्य पुरा शम्भुप्रचोदितम्।।३०।।
और जिसका जन्म लग्न समराशि हो उसकी दशा उत्क्रम गणना के
अनुसार होती है।।३०।।
दशाप्रवर्त्तको राशिः विषमर्क्ष समोऽपि वा।
राशिप्रतिनवाङ्कानां सर्वेषां गणयेत्क्रमात्।।३१।।
अष्टोत्तरशताङ्कानां संख्यापूर्वं तदंशकाः।
ख्याता स्थिरदशा विप्र निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।।३२।।
दशाप्रवर्त्तक राशियों का दशावर्ग ९ वर्ष ही होता है, चाहे वे विषम हों
वा सम हों। इस प्रकार सभी वर्षों का योग १०८ वर्ष होता है।।३२।।
उदाहरण— पूर्वोक्त जन्मकुंडली में जन्मलग्न मकर समराशि है, अतः
उत्क्रम गणना द्वारा दशा होगी। चक्र देखिए।
नवांशकस्थिरदशाचक्रम्
| म. | ध. | वृ. | तु. | क. | सिं. | कं. | मि. | वृ. | मे. | मी. | कुं. | रा. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ९ | ९ | ९ | ९ | ९ | ९ | ९ | ९ | ९ | ९ | ९ | ९ | व. |
| २०१३ | २२ | ३१ | ४० | ४९ | ५८ | ६७ | ७६ | ८५ | ९४ | २१०३ | १२ | २१ |
| ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | |
| १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ |
अथ स्थिरदशामाह—
अधुना सम्प्रवक्ष्यामि स्थिरदशां द्विजोत्तम।
चरस्थिरद्विस्वभावा राशयो त्रिविधाः क्रमात्।।३३।।
४०६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
हे द्विजोत्तम ! अब मैं स्थिर दशा को कह रहा हूँ। चर, स्थिर,
द्विस्वभाव ये तीन प्रकार की राशियाँ हैं।।३३।।
सप्ताष्टनवाङ्काभ्याम् आनयीत दशां स्थिराम् ।।३४।।
इसमें क्रम से ७, ८, ९ वर्ष के प्रमाण से दशा लानी चाहिए।।३४।।
मेषे सप्ताङ्कं विज्ञेया वृषे वसुसमा द्विज।
मिथुने नव वर्षाणि कर्केत्यादि यथाक्रमम् ।।३५।।
जैसे मेष का ७ वर्ष, वृष का ८ वर्ष और मिथुन का ९ वर्ष प्रमाण
होता है। इसी प्रकार आगे भी कर्क आदि का जानना।।३५।।
द्वादशराशिपर्यन्तं ज्ञायतेऽङ्का द्विजोत्तम।
षण्णवति समासंख्या जायते द्विजसत्तम।।३६।।
बारह राशियों के वर्षों का योग ९६ वर्ष होता है।।३६।।
एषा स्थिरदशा प्रोक्ता तस्या चापि प्रवर्त्तकम्।
ब्रह्मग्रहाश्रितारम्भस्तदग्रे पूर्ववत्क्रमः ।।३७।।
यह स्थिर दशा है और ब्रह्मग्रह से आरम्भ होती है।।३७।।
अथ ब्रह्मग्रहलक्षणमाह-
षष्ठाष्टमव्ययेशानां मध्ये यश्च बली ग्रहः।
स चेद्विषमर्क्षे स्तः सैव ब्रह्मा भविष्यति ।।३८।।
छठे, आठवें और बारहवें भावों के स्वामियों में जो बलवान् हो वह यदि
विषमराशि में हो तो वही ब्रह्मग्रह होता है।।३८।।
लग्नसप्तमयोर्मध्ये यो राशिः बलवान्भवेत् ।
तस्यानुचरराशीशो ओजे ब्रह्मग्रहो भवेत् ।।३९।।
लग्न और सातवें भाव में जो बली हो उसका अनुचर (अर्थात् उस भाव
से पीछे ६ राशि के अन्दर जो ग्रह हो, वह) यदि विषमराशि में हो तो
वही ब्रह्मा होता है।।३९।।
मध्ये शनिपातानां च यदि ब्रह्मस्य सम्भवः ।
तदा तस्माच्च षष्ठेशो ब्रह्मग्रहःसुनिश्चितम् ।।४०।।
शनि, राहु और केतु में से कोई भी ब्रह्मा होता हो तो उससे षष्ठेश
ब्रह्मा होता है।।४०।।
बहूनां ब्रह्मसद्भावेऽधिकांशो भवेद्विधिः ।
तत्र राहुसमायोगेऽल्पांशो ब्रह्मणो भवेत् ।।४१।।