बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
नवम में हो तो ८ वर्ष, दशम में हो तो ९ वर्ष, एकादश में हो तो १०
वर्ष और बारहवें भाव में हो तो ११ वर्ष की दशा होती है। यह पूर्व
में कहे हुए प्रकार से जानना।।१३।।
द्विराश्यधिपतौ विशेषः-
वृश्चिकाधिपती द्वौ च कुजकेतू द्विजोत्तम।
स्वर्भानुपङ्गू कुम्भस्य पती द्वौ चिन्तयेद्द्विज ।।१४।।
वृश्चिक राशि के भौम और केतु ये दो स्वामी हैं और कुम्भ राशि के
राहु तथा शनि ये दो स्वामी हैं।।१४।।
स्वर्क्षे यदि स्थितौ द्वौ च भानुवर्षप्रदायकौ।
परर्क्षे सङ्गतौ द्वौ च नाथान्ते न विचिन्तयेत् ।।१५।।
यदि दोनों स्वामी अपनी राशि में हों तो १२ वर्ष की दशा होती है। यदि
दोनों भिन्न राशि में हो तो स्वामी पर्यन्त दशा की गणना नहीं करना
चाहिए।।१५।।
परर्क्षे भिन्नभिन्नस्थौ द्वयोर्मध्ये तु यो बली।
तस्य नाथान्तरीत्या च वर्षाणि संलिखेद्द्विज ।।१६।।
भिन्न राशि में दोनों अलग-अलग हों तो दोनों में जो बली हो उसी के
साथ पर्यन्त रीति से दशावर्ष लेना चाहिए।।१६।।
अग्रहात्सग्रहः प्राणी सग्रहादधिकग्रहः।
साम्ये चरस्थिरद्वन्द्वाः क्रमात्स्युर्बलिनो द्विज ।।१७।।
बल विचार में ग्रहहीन से ग्रह युक्त बली होता है। यदि दोनों ग्रह
युक्त हों तो जिसके साथ अधिक ग्रह हों वह बली होता है। यदि
ग्रह में समानता हो तो चर, स्थिर, द्विस्वभाव क्रम से बल का विचार करना
चाहिए।।१७।।
राशिसाम्ये सदा विप्र बहुवर्षप्रदो बली।
तद्बाधादुच्चगः खेटो बलवान्भवति द्विज ।।१८।।
यदि राशि में भी समानता हो तो जिसका अधिक वर्ष हो वह बली होता
है। इसमें भी उच्चस्थ ग्रह बली होता है।।१८।।
यद्यप्यल्पवर्षदो विप्र तदापि तुङ्गगो बली।
नाथान्तेन समाज्ञेया पूर्वोक्तेन क्रमेण हि।।१९।।