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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 402, कुल 800 में से

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पृष्ठ 402

४०४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
| १२ | मं. ११ | ९ |
| १ | १० | श. ८ रा. |
| २ के. | ४ सू. | ७ |
| चं. ३ शु. | ५ बृ. बु. | ६ |
चरदशाचक्रम्

म.ध.वृ.तु.क.सिं.कं.मि.वृ.मे.मी.कुं.राशि
२८९४१११११०२११०७३वर्ष
२०१५२०२३२०३२२०३६२०४७२०५८२०६८२०७०२०७१२०८१२०८८२०९१संवत्
३३३३३३३३३३३३सूर्य
१८१८१८१८१८१८१८१८१८१८१८१८
अथ नवांशस्थिरदशा-
अधुना सम्प्रवक्ष्यामि दशास्थिरविशेषतः।
नवांशकदशामानं तवाग्रे द्विजनन्दन ।।२५।।
पाराशरजी ने कहा- हे द्विजोत्तम ! अब मैं तुमसे स्थिर दशा के मध्य
में नवांशक दशा को कहता हूँ।।२५।।
प्रतिराशिप्रदिष्टैवमङ्काङ्का च दशा स्थिरा।
तन्वादिव्ययभावानां स्पष्टीकृत्वा द्विजोत्तम ।।२६।।
लग्नादि द्वादश भावों को स्पष्ट करना चाहिए। प्रत्येक राशि में नव
नवमांश होते हैं, इन्हीं की दशा को स्थिर दशा कहते हैं।।२६।।
ग्रहनवांशायुरीत्या दशातुल्या नवांशका।
अस्थिरा इति विज्ञेया परपक्षमिदं क्रमात् ।।२७।।
इसे दो प्रकार की कोई-२ कहते हैं। एक राशि से और दूसरी ग्रह नवांश
से दशा होती है।।२७।।
पक्षद्वयं प्रवक्ष्यामि चरस्थिरं द्विजोत्तम।
पूर्वं चरदशां वक्ष्ये तवाग्रे द्विजनन्दन ।।२८।।