बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
३५८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
पुत्रस्थानाधिपे दुःस्थे चन्द्रे पापांशसंयुते।
लग्ने पुत्रे पापयुते मातृशापात्सुतक्षयः ।।३६।।
पंचमेश ६, ८, १२ भाव में हो, चन्द्रमा पापांश में हो, लग्न और पंचम
में पापग्रह हों तो माता के शाप से संतान की हानि होती है।।३६।।
पुत्रस्थानाधिपे चन्द्रे मन्दराह्वारसंयुते ।
भाग्ये वा पुत्रराशौ वा कारके पुत्रनाशनम् ।।३७ ।।
पंचमेश चन्द्रमा शनि, राहु, भौम से युत हो, कारक (गुरु) भाग्य वा
पाँचवें भाव में हो तो संतान की हानि होती है।।३७।।
मातृस्थानाधिपे भौमे शनिराहुसमन्विते ।
भानुचन्द्रयुते पुत्रे लग्ने सन्ततिनाशनम् ।। ३८ ।।
चौथे भाव का स्वामी भौम, शनि, राहु से युत हो, संतान भाव और लग्न
सूर्य-चन्द्र से युत हों तो संतान की हानि होती है।। ३८।।
लग्नात्मजेशौ शत्रुस्थौ रन्ध्रे मात्राधिपे स्थितौ।
पितृनाशाधिपौ लग्ने मातृशापात्सुतक्षयः ।।३९।।
लग्नेश, पंचमेश छठे भाव में, आठवें भाव में मातृभावेश हों और दशम,
अष्टम भाव के स्वामी लग्न में हों तो माता के शाप से संतान की हानि
होती है।।३९।।
षष्ठाष्टमेशौ लग्नस्थौ व्यये मात्राधिपे सुते।
चन्द्रे जीवे पापयुते मातृशापात्सुतक्षयः ।।४०।।
६, ८ भाव के स्वामी लग्न में, १२वें भाव में सुखेश और चन्द्रमा-गुरु
पाप से युक्त होकर पाँचवें भाव में हों तो माता के शाप से संतान की हानि
होती है।।४०।।
पापमध्यगते लग्ने क्षीणे चन्द्रे च सप्तमे ।
मातृपुत्रे राहुमन्दौ मातृशापात्सुतक्षयः ।। ४१ ।।
लग्न पापग्रहों के मध्य में हो, क्षीण चन्द्रमा सातवें भाव में हो, ४,
५ भाव में राहु-शनि हों तो माता के शाप से सन्तान की हानि होती
है।।४१।।
नाशस्थानाधिपे पुत्रे पुत्रेशे नाशराशिभे ।
चन्द्रमातृपतौ दुःस्थे मातृशापात्सुतक्षयः ।।४२।।
अथ पूर्वजन्मशापद्योतकाध्यायः ३५९
अष्टमेश पाँचवें भाव में और पंचमेश आठवें भाव में हो और चन्द्रमा
तथा सुखेश ६, ८, १२ भाव में हो तो माता के शाप से संतान की हानि
होती है।।४२।।
चन्द्रक्षेत्रे यदा लग्ने कुजराहुसमन्विते।
चन्द्रमन्दौ पुत्रसंस्थौ मातृशापात्सुतक्षयः।।४३।।
यदि कर्क राशि लग्न में हो तथा भौम-राहु से युत हो; चन्द्र-शनि पाँचवें
भाव में हों तो माता के शाप से संतान की हानि होती है।।४३।।
लग्ने पुत्रे रन्ध्ररिःफे आरराहुर्विः शनिः।
मातृलग्नाधिपौ दुःस्थौ मातृशापात्सुतक्षयः।।४४।।
लग्न, पंचम, आठवें, बारहवें भाव में भौम, राहु, रवि और शनि हों
तथा मातृभावेश ६, ८, १२ में हो तो माता के शाप से संतान की हानि
होती है।।४४।।
नाशस्थानं गते जीवे कुजराहुसमन्विते।
पुत्रस्थाने मन्दचन्द्रौ मातृशापात्सुतक्षयः।।४५।।
आठवें भाव में भौम-राहु से युक्त गुरु हो और पाँचवें भाव में शनि-
चन्द्र हों तो माता के शाप से संतान की हानि होती है।।४५।।
ग्रहयोगपदैः सर्वं फलं ब्रूयाद्विचक्षणः।
शुभे सौख्यं विनिर्दिष्टं मिश्रे मिश्रं प्रकीर्त्तितम् ।।४६।।
ग्रहयोगवश सभी फलों को करे। शुभयोग से शुभ फल, पापयोग से
पापफल तथा मिश्रयोग से मिश्रित फल कहना चाहिए।।४६।।
अथास्य शान्तिमाह—
सेतुस्नानं प्रकुर्वीत गायत्री लक्षसंज्ञके।
ग्रहदानं च कर्त्तव्यं रौप्यपात्रे पयःस्थितिः।।४७।।
एक लक्ष गायत्री का जप कराके वा करके सेतुस्नान करे। ग्रहदान
और चाँदी के पात्र में दूध का दान करे।।४७।।
ब्राह्मणान् भोजयेत्तद्वदश्वत्थस्य प्रदक्षिणम्।
कर्तव्यं भक्तियुक्तेन चाष्टविंशसहस्रकम् ।।४८।।
ब्राह्मणों को भोजन करावे और भक्ति से युक्त होकर २८ हजार पीपल
की प्रदक्षिणा करे।।४८।।
३६० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
एवं कृते तदा देवि शापान्मोक्षो भविष्यति ।
सत्पुत्रं लभते पश्चाद्वृद्धिः स्यात्तस्य सन्ततेः ॥४९॥
ऐसा करने से शाप से मुक्ति मिल जाती है और अच्छे पुत्र का लाभ
होता है तथा संतान की वृद्धि होती है॥४९॥
अथ भ्रातृशापात्सुतक्षययोगः-
भ्रातृस्थानाधिपे पुत्रे कुजराहुसमन्विते ।
पुत्रलग्नेश्वरौ रन्ध्रे भ्रातृशापात्सुतक्षयः ॥५०॥
भ्रातृस्थान (३) के स्वामी भौम-राहु से युत होकर पाँचवें भाव में
हों और पंचमेश, लग्नेश आठवें भाव में हों तो भाई के शाप से संतान
की हानि होती है॥५०॥
लग्ने सुते कुजे मन्दे भ्रातृपे भाग्यराशिगे ।
कारके नाशराशिस्थे भ्रातृशापात्सुतक्षयः ॥५१॥
लग्न पंचम भाव में भौम-शनि हों, भ्रातृभावेश भाग्य भाव में हो तथा
कारक (भौम) आठवें भाव में हों तो भाई के शाप से संतान की हानि
होती है॥५१॥
भ्रातृस्थाने गुरौ नीचे मन्दः पञ्चमगो यदि ।
नाशस्थौ तु चन्द्रारौ भ्रातृशापात्सुतक्षयः ॥५२॥
भ्रातृस्थान (३) में नीच राशि में गुरु हो और शनि पाँचवें भाव में
हो और आठवें भाव में चन्द्र-शनि हों तो भाई के शाप से संतान की हानि
होती है॥५२॥
मूर्त्तिस्थानाधिपे रिःफे भौमः पञ्चमगो यदि ।
पुत्रेशे रन्ध्रभावस्थे भ्रातृशापात्सुतक्षयः ॥५३॥
लग्नेश बारहवें भाव में, पंचम भाव में भौम हो और पंचमेश आठवें
भाव में हो तो भाई के शाप से संतान की हानि होती है॥५३॥
पापमध्यगते लग्ने सुतभे पापमध्यगे ।
नाथौ च कारकौ दुःस्थौ भ्रातृशापात्सुतक्षयः ॥५४॥
पापग्रह के मध्य में लग्न हो और पंचम भाव भी पापग्रह के मध्य में
हो, दोनों के स्वामी और कारक ६, ८, १२ भाव में हो तो भाई के
शाप से संतान की हानि होती है॥५४॥
अथ पूर्वजन्मशापद्योतकाध्यायः ३६१
कर्मेशे भ्रातृभादत्थे पापयुक्ते तथा शुभे ।
पुत्रे च कुजसंयुक्ते भ्रातृशापात्सुतक्षयः ।।५५।।
कर्मेश पापग्रह से युत होकर भ्रातृस्थान में हो और पाँचवें भाव में भौम
युत हो तो भाई के शाप से संतान की हानि होती है।।५५।।
पुत्रस्थाने बुधक्षेत्रे शनिराहुसमन्विते ।
रिःफे विदारौ वर्त्तेते भ्रातृशापात्सुतक्षयः ।।५६।।
पंचम भाव में बुध की राशि (३।६) हो और उसमें शनि-राहु युक्त हों
तथा बारहवें भाव में बुध-भौम हों तो भाई के शाप से संतान की हानि
होती है।।५६।।
लग्नेशे भ्रातृराशिस्थे भ्रातृस्थानाधिपे सुते ।
लग्नभ्रातृसुते पापे भ्रातृशापात्सुतक्षयः ।।५७।।
लग्नेश भ्रातृभाव में, भ्रातृभावेश पाँचवें भाव में हो तथा लग्न
भ्रातृ पाँचवें भाव में पापग्रह हो तो भाई के शाप से संतान की हानि होती
है।।५७।।
भ्रात्रीशे नाशराशिस्थे पुत्रस्थे कारके तथा ।
राहुमान्दियुते दृष्टे भ्रातृशापात्सुतक्षयः ।।५८।।
तृतीय भाव का स्वामी ८वें भाव में और पाँचवें भाव में कारक राहु-
मांदि (गुलिक) से युत वा दृष्ट हो तो भाई के शाप से संतान को कष्ट
होता है।।५८।।
नाशस्थानाधिपे पुत्रे भ्रातृनाथेन संयुते ।
रन्ध्रे आरार्किसंयुक्ते भ्रातृशापात्सुतक्षयः ।।५९।।
अष्टमेश पाँचवें भाव में तृतीयेश से युक्त हो, आठवें भाव में भौम-शनि
हों तो भाई के शाप से संतान की हानि होती है।।५९।।
अस्य शान्तिमाह—
भ्रातृशापविमोक्षार्थं श्रवणं विष्णुकीर्त्तनम् ।
चान्द्रायणं चरेत्पश्चात्कावेर्य्यां विष्णुसन्निधौ ।।६०।।
भाई के शाप की शान्त्यर्थ विष्णु का कीर्त्तन सुनना चाहिए। चान्द्रायण
व्रत करे। बाद में कावेरी नदी के किनारे विष्णु के सन्निकट ।।६०।।
अस्वत्थस्थापनं कार्यं दशधेनूः प्रदापयेत् ।
प्राजापत्यं चरेत्तत्र भूमिं दद्यात्फलान्विताम् ।
एवं यः कुरुते भक्त्या पुत्रवृद्धिः प्रजायते ।।६१।।
३६२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
पीपल के वृक्ष की स्थापना कर दस गौ का दान करे, इसके बाद
प्राजापत्य करके भूमि का दान करे। इस प्रकार भक्तिपूर्वक करने से पुत्र
की वृद्धि होती है॥६१॥
अथ मातुलात्सुतक्षययोगः-
पुत्रस्थाने बुधे जीवे कुजराहुसमन्विते।
लग्ने मन्दसमायोगे मातुलात्सुतनाशनम् ॥६२॥
यदि पाँचवें भाव में बुध, गुरु, भौम, राहु हों, लग्न में शनि हो तो मामा
के शाप से सन्तान की हानि होती है॥६२॥
लग्नपुत्रेश्वरौ पुत्रे शनिभौमबुधान्विते ।
ज्ञेयो मातुलशापत्त्वात्पुत्रसन्ततिनाशनम् ॥६३॥
लग्नेश और पंचमेश शनि, भौम, बुध के साथ एकत्र हों तो मामा के
शाप से संतान की हानि होती है॥६३॥
लुप्ते पुत्राधिपे लग्ने सप्तमे भानुनन्दने।
लग्नेशे बुधसंयुक्ते तस्य सन्ततिनाशनम् ॥६४॥
लग्नेश अस्त होकर लग्न में हो और सातवें भाव में शनि हो और
लग्नेश बुध के साथ हो तो मामा के शाप से संतान की हानि होती
है॥६४॥
ज्ञातिस्थानाधिपे लग्ने व्ययेशेन समन्विते।
शशिसौम्यकुजे पुत्रे तस्य सन्ततिनाशनम् ॥६५॥
व्ययेश से युत होकर सुखेश लग्न में हो और चन्द्रमा, बुध, भौम संतान
भाव में हों तो मामा के शाप से संतान की हानि होती है॥६५॥
अस्य शान्तिमाह-
तद्दोषपरिहारार्थं विष्णुस्थापनमुच्यते।
वापीकूपतडागादेर्निर्माणं सेतुबन्धनम् ॥६६॥
उपर्युक्त दोष की शान्ति के लिए विष्णु की स्थापना करे। बावली, कूआँ,
तालाब को बनवाये॥६६॥
पुत्रवृद्धिर्भवेत्तस्य सम्पद्वृद्धिः प्रजायते।
एवं योगग्रहेणैव फलं ब्रूयाद्विचक्षणैः ॥६७॥
पुल का निर्माण करावे तो पुत्र की वृद्धि, संपत्ति की भी वृद्धि होती
है। इस प्रकार ग्रहयोगवश पंडित लोग फल का विचार करें॥६७॥
अथ पूर्वजन्मशापद्योतकाध्यायः ३६३
ब्रह्मशापात्सुतक्षययोगः—
गुरुक्षेत्रे यदा राहुः पुत्रे जीववारभानुजाः।
धर्मस्थानाधिपे नाशे ब्रह्मशापात्सुतक्षयः।।६८।।
यदि गुरु की राशि (९, १२) में राहु हो, पाँचवें भाव में गुरु, भौम,
शनि हों और धर्मेश आठवें भाव में हो तो ब्रह्म (ब्राह्मण) के
शाप से संतान का अभाव होता है।।६८।।
विद्याबलेन यो मर्त्यो ब्राह्मणानवमन्यते।
तद्दोषाद्ब्रह्मशापाच्च तस्य सन्ततिनाशनम्।।६९।।
विद्या वा बलप्रयोग से जो कोई ब्राह्मण का अपमान करता है,
उसके दोष और ब्राह्मण के शाप से वह संतानहीन होता है।।६९।।
धर्मेशे पुत्रभावस्थे पुत्रेशे नाशराशिगे।
जीववारराहुमृत्युस्थे ब्रह्मशापात्सुतक्षयः।।७०।।
धर्मेश पाँचवें भाव में हो और पंचमेश धर्म भाव में हो तथा गुरु,
भौम, राहु आठवें भाव में हों तो ब्रह्मशाप से संतान का अभाव होता
है।।७०।।
धर्माधिपे नीचगते व्ययेशे पुत्रराशिगे।
राहुयुक्तेक्षिते वापि ब्रह्मशापात्सुतक्षयः।।७१।।
धर्मेश अपनी नीचराशि में हो और व्ययेश पंचम भाव में हो, राहु से
युत वा दृष्ट हो तो ब्रह्मशाप से संतान का अभाव होता है।।७१।।
जीवे नीचगते राहुर्लग्ने वा पुत्रराशिगे।
पुत्रस्थानाधिपे दुःस्थे ब्रह्मशापात्सुतक्षयः।।७२।।
गुरु नीचराशि में हो, राहु लग्न वा पंचम भाव में हो और पंचमेश ६,
८, १२ भाव में हो तो ब्रह्मशाप से संतान का अभाव होता है।।७२।।
पुत्रस्थानाधिपे जीवे रन्ध्रे पापसमन्विते।
पुत्रेशावार्कचन्द्रौ वा ब्रह्मशापात्सुतक्षयः।।७३।।
पंचमेश गुरु आठवें भाव में पापग्रह से युक्त हो अथवा पंचमेश रवि-
चन्द्र हों तो भी ब्रह्मशाप से संतान का अभाव होता है।।७३।।
मन्दांशे मन्दसंयुक्ते जीवे भौमसमन्विते।
पुत्रेशे व्ययराशिस्थे ब्रह्मशापात्सुतक्षयः।।७४।।
३६४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
शनि के अंश में शनि-भौम संयुक्त गुरु हो, पंचमेश बारहवें भाव में हो
तो ब्रह्मशाप से संतान का अभाव होता है॥७४॥
लग्ने गुरुयुते मन्दे भाग्ये राहुसमन्विते।
व्यये गुरुसमायुक्ते ब्रह्मशापात्सुतक्षयः॥७५॥
लग्न में गुरु हो, शनि-राहु से युक्त हो, भाग्यभाव में और गुरु व्यय भाव
में हो तो ब्रह्मशाप से संतान का अभाव होता है॥७५॥
अस्य शान्तिमाह-
तस्य दोषस्य शान्त्यर्थं कुर्याच्चान्द्रायणं नरः।
ब्रह्मकूर्चत्रयं कृत्वा धेनुर्दद्यात्सदक्षिणाम्॥७६॥
उस दोष की शान्ति के लिए चान्द्रायण एवं ब्रह्मकूर्च व्रत (प्रायश्चित्त)
करके दक्षिणा सहित गोदान॥७६॥
पञ्चरत्नानि देयानि सुवर्णेन समन्वितम्।
अन्नदानं ततः कुर्यादयुतं च सहस्रकम्॥७७॥
और पंचरत्न सोने के साथ दान करके दस हजार वा एक हजार
का अन्नदान करें॥७७॥
एवं कृते तु सत्पुत्रं लभते नात्र संशयः।
मुक्तशापो विशुद्धात्मा स पुत्रसुखमेधते॥७८॥
ऐसा करने से मनुष्य शाप से मुक्त होकर पुत्र को प्राप्त करता है और
शापमुक्त होकर शुद्धात्मा होकर सुख को भोगता है॥७८॥
पत्नीशापात्सुतक्षययोगः-
दारेशे पुत्रभावस्थे दारेशस्थांशपे शनौ।
पुत्रेशे नाशराशिस्थे पत्नीशापात्सुतक्षयः॥७९॥
सप्तमेश पंचम भाव में हो तथा सप्तमेश के नवांश का स्वामी
शनि हो, पंचमेश आठवें भाव में हो तो स्त्री के शाप से संतान की हानि
होती है॥७९॥
कलत्रेशे नाशसंस्थे रिःफेशे पुत्रराशिगे।
कारके पापसंयुक्ते पत्नीशापात्सुतक्षयः॥८०॥
सप्तमेश आठवें भाव में और व्ययेश पाँचवें भाव में हो, कारक (शुक्र)
पापयुक्त हो तो स्त्री के शाप से संतान का अभाव होता है॥८०॥
अथ पूर्वजन्मशापद्योतकाध्यायः ३६५
पुत्रस्थानगते शुक्रे कामपे रन्ध्रमाश्रिते।
कारके पापसंयुक्ते पत्नीशापात्सुतक्षयः॥८१॥
पंचम स्थान में शुक्र हो, सप्तमेश आठवें भाव में हो तथा कारक
पापयुक्त हो तो स्त्रीशाप से संतान का अभाव होता है॥८१॥
कुटुम्बे पापसम्बन्धे कामेशे नाशराशिगे।
पुत्रे पापग्रहैर्युक्ते पत्नीशापात्सुतक्षयः॥८२॥
दूसरे भाव में पापग्रह हो, सप्तमेश आठवें भाव में हो और पाँचवें
भाव में पापग्रह युत हों तो स्त्री के शाप से संतान का अभाव होता
है॥८२॥
भाग्यस्थानगते शुक्रे दारेशे नाशराशिगे।
लग्ने पापे सुते पापे पत्नीशापात्सुतक्षयः॥८३॥
नवम भाव में शुक्र, पंचमेश आठवें भाव में तथा लग्न और पाँचवें में
पापग्रह हों तो स्त्री के शाप से संतान का अभाव होता है॥८३॥
भाग्यस्थानाधिपे शुक्रे पुत्रेशे शत्रुराशिगे।
गुरुलग्नेशदारेशा दुःस्थाः सन्ततिनाशनम्॥८४॥
भाग्येश शुक्र हो, पंचमेश छठे स्थान में हो और गुरु, लग्नेश,
दारेश ६, ८, १२ भावों में हों तो स्त्रीशाप से संतान का अभाव होता
है॥८४॥
पुत्रस्थाने भृगुक्षेत्रे राहुचन्द्रसमन्विते।
व्यये लग्ने धने पापे स्त्रीशापात्सुतक्षयः॥८५॥
पंचम भाव में शुक्र की राशि (२,७) राहु-चन्द्र से युक्त हो और १२,
१, २ भावों में पापग्रह हों तो स्त्रीशाप से संतान का अभाव होता
है॥८५॥
सप्तमे मन्दशुक्रौ च रन्ध्रेशे पुत्रभे रवौ।
लग्ने राहुसमायोगे पत्नीशापात्सुतक्षयः॥८६॥
सातवें भाव में शनि-शुक्र हों, अष्टमेश पाँचवें भाव में हो, रवि
राहु लग्न में हों तो स्त्रीशाप से संतान का अभाव होता है॥८६॥
धने कुजे व्यये जीवे पुत्रस्थे भृगुनन्दने।
राहुयुक्तेक्षिते वापि पत्नीशापात्सुतक्षयः॥८७॥
३६६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
दूसरे भाव में भौम, बारहवें भाव में गुरु, पाँचवें भाव में शुक्र हों, दाहयुक्त
वा दृष्ट हों तो स्त्रीशाप से पुत्र का अभाव होता है।।८७।।
नाशस्थौ वित्तदारेशौ पुत्रलग्ने कुजे शनौ।
कारके पापसंयुक्ते पत्नीशापात्सुतक्षयः ।।८८।।
आठवें भाव में धनेश, सप्तमेश हों, पाँचवें और लग्न में भौम-शनि
हों तथा कारक पापयुक्त हो तो स्त्रीशाप से संतान का अभाव होता
है।।८८।।
लग्नपञ्चमभाग्यस्था राहुमन्दकुजाः क्रमात्।
रन्ध्रस्थौ पुत्रदारेशौ पत्नीशापात्सुतक्षयः ।।८९।।
लग्न पंचम, नवम में राहु, शनि, भौम हों और आठवें भाव में पंचमेश,
सप्तमेश हों तो स्त्री के शाप से संतान का अभाव होता है।।८९।।
अस्य शान्तिमाह-
तस्य दोषस्य शान्त्यर्थं कन्यादानं समाचरेत्।
लक्ष्मीनारायणं देयं सर्वाभरणभूषितम् ।।९०।।
इस दोष के शान्त्यर्थ कन्यादान करे। लक्ष्मीनारायण की मूर्त्ति सभी
आभरणों से युक्त।।९०।।
मूर्त्तिदानं च कर्त्तव्यं दशधेनूः प्रदापयेत्।
शय्यां च भूषणं चैव दम्पत्योर्दापयेत्सुधीः।
पुत्रं प्रसूयते तस्य भाग्यवृद्धिश्च जायते ।।९१।।
दान करे, दश धेनु का दान करें, शय्या-आभूषण सपत्नीक ब्राह्मण
को दे। ऐसा करने से पुत्र होता है तथा भाग्यवृद्धि भी होती है।।९१।।
प्रेतशापात्सुतक्षययोगः-
मन्त्रशापमिदं मर्त्यः पिशाचं बाध्यते सदा।
कर्मलोपं पितृभ्यश्च तच्छापाद्वंशनाशनम् ।।९२।।
जब पितरों के कर्म का लोप होता है अर्थात् उनके श्राद्धादि ठीक से
नहीं होते हैं तो पिशाच (प्रेत) हो जाते हैं तथा वे वंशवृद्धि को नहीं होने
देते।।९२।।
पुत्रस्थितौ मन्दसूर्यौ क्षीणचन्द्रस्तु संप्तमे।
लग्ने व्यये राहुजीवौ प्रेतशापात्सुतक्षयः ।।९३।।
अथ पूर्वजन्मशापद्योतकाध्यायः ३६७
पाँचवें भाव में शनि-सूर्य हों और सातवें भाव में क्षीण चन्द्र हो तथा
लग्न और बारहवें भाव में राहु तथा गुरु हों तो प्रेतशाप से वंश का अभाव
होता है।।९३।।
पुत्रस्थानाधिपे मन्दे नाशस्थे लग्नगे कुजे।
कारके नाशराशिस्थे प्रेतशापात्सुतक्षयः।।९४।।
पंचमेश शनि आठवें भाव में, लग्न में भौम और कारक आठवें भाव
में हो तो प्रेतशाप से वंश का अभाव होता है।।९४।।
लग्ने पापे व्यये भानौ सुते चारार्किसोमजाः।
पुत्रेशे रन्ध्रभावस्थे प्रेतशापात्सुतक्षयः।।९५।।
लग्न में पापग्रह हों तथा बारहवें भाव में सूर्य हो और पाँचवें भाव में
भौम, शनि, बुध हों और पंचमेश आठवें भाव में हो तो प्रेतशाप से संतान
का अभाव होता है।।९५।।
लग्ने राहुसमायोगे पुत्रस्थे भानुनन्दने।
कारके नाशराशिस्थे प्रेतशापात्सुतक्षयः।।९६।।
लग्न में राहु, पाँचवें भाव में शनि और कारक आठवें भाव में हों तो
प्रेतशाप से वंश का अभाव होता है।।९६।।
लग्ने राहौ च शुक्रेज्ये चन्द्रे मन्दयुते तथा।
लग्नेशे मृत्युराशिस्थे प्रेतशापात्सुतक्षयः।।९७।।
लग्न में राहु, शुक्र, गुरु हों, चन्द्रमा शनि से युत हो, लग्नेश आठवें
भाव में हो तो प्रेतशाप से पुत्र का अभाव होता है।।९७।।
लग्ने राहुसमायोगे पुत्रस्थे भानुनन्दने।
कुजदृष्टे युते वापि प्रेतशापात्सुतक्षयः।।९८।।
लग्न में राहु तथा पाँचवें भाव में शनि हो, भौम से युत वा दृष्ट हो तो
प्रेतशाप से पुत्र का अभाव होता है।।९८।।
कारके नीचराशिस्थे पुत्रस्थानाधिपे तथा।
नीचदृष्टे नीचयुते प्रेतशापात्सुतक्षयः।।९९।।
कारक नीचराशि में हो और पंचमेश भी अपने नीच में हो तथा
नीचराशिस्थ ग्रह से युत वा दृष्ट हो तो प्रेतशाप से वंश का अभाव होता
है।।९९।।
लग्ने मन्दे सुते राहौ रन्ध्रे भानुसमन्विते।
व्यये भौमसमायोगे प्रेतशापात्सुतक्षयः।।१००।।
३६८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
लग्न में शनि, पाँचवें भाव में राहु, आठवें भाव में सूर्य युक्त हो और
बारहवें भाव में भौम हो तो प्रेतशाप से वंश का अभाव होता
है॥१००॥
कामस्थानाधिपे दुःस्थे पुत्रे चन्द्रसमन्विते।
मन्दमान्दियुते लग्ने प्रेतशापात्सुतक्षयः॥१०१॥
सप्तमेश ६, ८, १२ भाव में भौम हो, पाँचवें भाव में चन्द्रमा हो, लग्न
में शनि और गुलिक हो तो प्रेतशाप से संतान का अभाव होता
है॥१०१॥
बाधास्थानाधिपे पुत्रे शनिशुक्रसमन्विते।
कारके नाशशशिस्थे प्रेतशापात्सुतक्षयः॥१०२॥
अष्टमेश शनि-शुक्र से युत होकर पाँचवें भाव में हो और कारक आठवें
भाव में हो तो प्रेतशाप से संतान का अभाव होता है॥१०२॥
अस्य शान्तिमाह-
तद्दोषस्य शान्त्यर्थं विष्णुश्राद्धं समाचरेत्।
रुद्राभिषेकं कुर्वीत ब्रह्ममूर्तिं प्रदापयेत्॥१०३॥
उपर्युक्त प्रेतशाप के निवृत्त्यर्थ विष्णुपद (गया) में श्राद्ध करना
चाहिए और रुद्राभिषेक करके ब्रह्म की मूर्ति का दान॥१०३॥
धेनुं रजतपात्रं च नीलं चैव प्रदापयेत्।
एतत्कर्मकृते तत्र शापमोक्षः प्रजायते॥१०४॥
तथा धेनु तथा चाँदी के पात्र और नीलमणि का दान करना चाहिए।
इतने कर्मों के करने से मुक्ति हो जाती है और कुलवृद्धि होती है॥१०४॥
अथ बहुपुत्रयोगः-
पुत्रे राहुरविः सौम्याः कारके शुभसंयुते।
शुभेन वीक्षिते वापि बहुपुत्रं समादिशेत्॥१०५॥
पंचम भाव में राहु, सूर्य, बुध हों, कारक (गुरु) शुभग्रह से युत हो
और शुभग्रह से देखा जाता हो तो बहुत-से पुत्र होते हैं॥१०५॥
पुत्रेशे शुभराशिस्थे शुभदृष्टिसमन्विते।
कारके केन्द्रभावस्थे बहुपुत्रं समादिशेत्॥१०६॥
पंचमेश शुभग्रह की राशि में शुभग्रह की दृष्टि से युक्त हो, कारक केन्द्र
में हो तो बहुत पुत्र होते हैं॥१०६॥
अथ पूर्वजन्मशापद्योतकाध्यायः ३६९
लग्नेशे पुत्रराशिस्थे पुत्रेशे लग्नमाश्रिते।
केन्द्रत्रिकोणगे जीवे बहुपुत्रं समादिशेत् ।।१०७।।
लग्नेश पाँचवें भाव में, पंचमेश लग्न में, केन्द्र (१,४,७,१०), त्रिकोण
(९,५) भाव में गुरु हो तो अनेक पुत्र होते हैं।।१०७।।
पुत्रस्थानगते राहौ मन्दांशकविवर्जिते।
बहुपुत्रं नरं विद्याच्छुभग्रहनिरीक्षिते ।।१०८।।
पाँचवें भाव में राहु शनि के नवांश में न हो, यदि शुभग्रह देखता हो तो
अनेक पुत्र होते हैं।।१०८।।
पुत्रस्थानाधिपे स्वोच्चे लग्नेशे शुभसंयुते।
कारके शुभसंयुक्ते बहुपुत्रं समादिशेत् ।।१०९।।
पंचमेश अपने उच्च में हो, लग्नेश शुभग्रह से युत हो और कारक
शुभग्रह हो तो अनेक पुत्र होते हैं।।१०९।।
पुत्रस्थानं तदीशे वा गुरौ वा शुभवीक्षिते।
शुभेन सहिते वापि बहुपुत्रं समादिशेत् ।।११०।।
पंचम स्थान में पंचमेश वा गुरु हो, शुभग्रह से दृष्ट हो या शुभग्रह से
युक्त हो तो अनेक पुत्र होते हैं।।११०।।
परिपूर्णबले जीवे लग्नेशे पुत्रराशिगे।
पुत्रेशे बलसंयुक्ते बहुपुत्रं समादिशेत् ।।१११।।
गुरु पूर्ण बली हो तथा लग्नेश पाँचवें भाव में हो और पंचमेश बली
हो तो अनेक पुत्र होते हैं।।१११।।
पुत्रस्थानगते जीवे परिपूर्णबलान्विते।
लग्नेशे बलयुक्ते पुत्रयोगा इमे स्मृताः ।।११२।।
पाँचवें पूर्ण बली गुरु हो, लग्नेश बली हो तो अनेक पुत्र होते हैं।।११२।।
वर्गोत्तमांशगे जीवे लग्नेशस्यांशपे शुभे।
पुत्रेशेन युते दृष्टे पुत्रयोगा इमे स्मृताः ।।११२।।
गुरु वर्गोत्तम नवांश में हो, लग्नेश के नवांश में शुभग्रह हो, पंचमेश से
युत वा दृष्ट हो तो बहुत पुत्र होते हैं।।११३।।
वित्तेशे पुत्रभावस्थे परिपूर्णबलान्विते।
वैशेषिकांशके जीवे पुत्रयोगा इमे स्मृताः ।।११४।।
३७० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
धनेश पूर्णबली होकर पाँचवें भाव में हो, गुरु वैशेषिकांश में हो तो
अनेक पुत्र होते हैं॥१९४॥
लग्नपुत्राधिपौ स्वोच्चे अन्योऽन्यं चापि वीक्षितौ।
परस्परस्थानगतौ पुत्रयोगा इमे स्मृताः॥१९५॥
लग्नेश और पंचमेश अपनी उच्चराशि में हों, परस्पर देखते हों और
परस्पर स्थान में हों तो अनेक पुत्र होते हैं॥१९५॥
पुत्रस्थानाधिपस्यांशराशीशे शुभसंयुते।
शुभेन वीक्षिते वापि पुत्रयोगा इमे स्मृताः॥१९६॥
पंचमेश जिस नवांश में हो, उसका स्वामी शुभग्रह से युत हो वा
शुभग्रह से दृष्ट हो तो अनेक संतान होती हैं॥१९६॥
लग्नपुत्राधिपौ केन्द्रे शुभग्रहसमन्वितौ।
कुटुम्बेशे बलाढ्ये तु पुत्रयोगा इमे स्मृताः॥१९७॥
लग्नेश और पंचमेश केन्द्र में शुभ ग्रह से युत हों, धनेश बलवान् हो
तो अनेक पुत्र होते हैं॥१९७॥
लग्नेशे दारभावस्थे दारेशे लग्नमाश्रिते।
द्वितीयेशे बलाढ्ये तु पुत्रयोगा इमे स्मृताः॥१९८॥
लग्नेश सातवें भाव में, सप्तमेश लग्न में हो और धनेश बली हो तो
अनेक पुत्र होते हैं॥१९८॥
दारेशग्रहसंयुक्तनवांशभवनाधिपे ।
पुत्रवित्तविलग्नेशैर्दृष्टे तु बहुपुत्रता॥१९९॥
दारेश से युत ग्रह का नवमांशेश पंचमेश, धनेश तथा लग्नेश से देखा
जाता हो तो अनेक पुत्र होते हैं॥१९९॥
इति बहुपुत्रयोगाः।
अथानपत्ययोगः-
पुत्रवित्तकलत्रेशसंयुक्तनवभागपाः ।
पापांशकाः पापयुता अनपत्यत्वमादिशेत्॥१२०॥
पंचम, धन, सप्तम के स्वामियों से युक्त नवमांशेश का नवांश पापग्रह
का हो अथवा पापयुत हो तो अनपत्य योग होता है॥१२०॥
व्ययेशसंयुतांशेशे मृत्युराशौ स्थिते सति।
पुत्रेशे क्रूरषष्ठ्यंशे अनपत्यत्वमादिशेत्॥१२१॥
अथ पूर्वजन्मशापद्योतकाध्यायः ३७१
लग्नेश से युत अंशेश आठवें भाव में हो और पंचमेश क्रूरग्रह से षष्ठ्यंश
में हो तो अनपत्य योग होता है।।१२१।।
गुरुलग्नेशदारेशपुत्रस्थानाधिपेषु च।
सर्वेषु बलहीनेषु वक्तव्या त्वनपत्यता।।१२२।।
गुरु, लग्नेश, सप्तमेश और पंचमेश निर्बल हों तो अनपत्य योग होता
है।।१२२।।
लग्नपुत्रेश्वरौ दुःस्थौ कारके नीचराशिगे।
अनपत्यग्रहे पुत्रे अनपत्यत्वमादिशेत्।।१२३।।
लग्नेश और पंचमेश ६, ८, १२ भाव में हों, कारक नीच राशि में हो,
कोई अनपत्यग्रह (पापग्रह) पाँचवें भाव में हो तो अनपत्य योग होता
है।।१२३।।
क्रूरषष्ठ्यंशके जीवे पुत्रस्थे नाशराशिपे।
पुत्रेशे नाशराशिस्थे अनपत्यत्वमादिशेत्।।१२४।।
गुरु क्रूरग्रह के षष्ठ्यंश में हो, पाँचवें भाव में अष्टमेश हो और पंचमेश
आठवें भाव में हो तो अनपत्य योग होता है।।१२४।।
इत्यनपत्ययोगाः।
अथ चिरकालात्पुत्रप्राप्तियोगः-
लग्नाधिपे कुजे स्वोच्चे रन्ध्रे मन्दयुते रवौ।
शुभदृष्टिसमायोगे चिरात्पुत्रमुपैति सः।।१२५।।
लग्नेश भौम अपनी उच्चराशि में, आठवें भाव में शनि से युत रवि हो
और शुभग्रह से देखा जाता हो तो अधिक दिन में संतान होती है।।१२५।।
लग्ने मन्दे गुरौ रन्ध्रे व्यये भौमसमन्विते।
शुभदृष्टे स्वतुङ्गे वा चिरात्पुत्रमुपैति सः।।१२६।।
लग्न भाव में शनि, गुरु आठवें भाव में, बारहवें भाव में भौम हो
वा शुभदृष्ट अपने उच्च में हो तो बहुत दिनों में संतान होती है।।१२६।।
पुत्रस्था मन्दजीवज्ञा लग्ने पुत्राधिपे शुभे।
पुत्रेशे शुभराशिस्थे चिरात्पुत्रमुपैति सः।।१२७।।
संतान भाव में शनि, गुरु और बुध हों, पंचमेश शुभग्रह हो, पंचमेश
शुभग्रह की राशि में हो तो अधिक समय में संतान होती है।।१२७।।
३७२. बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
सुते राह्वर्कशुक्रेज्याः शुभर्क्षे शुभवीक्षिते।
पुत्रेशे शुभराशिस्थे चिरात्पुत्रमुपैति सः॥१२८॥
पाँचवें भाव में शुभग्रह की राशि में राहु, सूर्य, शुक्र, गुरु हों, शुभग्रह
से देखे जाते हों और पंचमेश शुभ राशि में हो तो बहुत दिनों में संतान
होती है॥१२८॥
लग्ने सौम्ये धने पापे तृतीये पापखेचरे।
पुत्रेशे शुभराशिस्थे चिरात्पुत्रमुपैति सः॥१२९॥
लग्न में शुभग्रह, दूसरे भाव में पापग्रह, तीसरे में पापग्रह और पंचमेश
शुभराशि में हो तो बहुत समय में संतान होती है॥१२९॥
अथ दत्तकपुत्रयोगः-
पुत्रस्थाने कुजे मन्दे बुधक्षेत्रे विलग्नगे।
बुधदृष्टे युते वापि तदा दत्तसुतादयः॥१३०॥
पंचम भाव में भौम, शनि हों, जन्मलग्न में बुध की राशि हो और बुध
से दृष्ट वा युत हो तो दत्तक पुत्र होता है॥१३०॥
पुत्रस्थाने बुधक्षेत्रे मन्दक्षेत्रेऽथवा भवेत्।
मन्दमान्दियुते दृष्टे तदा दत्तादयः सुताः॥१३१॥
पंचम भाव में बुध वा शनि की राशि हो और शनि तथा गुलिक से
युत वा दृष्ट हो तो दत्तक पुत्र होते हैं॥१३१॥
पुत्रेशे मन्दसंयुक्ते कुजे सौम्यनिरीक्षिते।
लग्नाधिपे बुधांशे वा दत्तपुत्रा भवन्ति हि॥१३२॥
पंचमेश शनि से युत हो, भौम-बुध से देखा जाता हो, लग्नेश बुध के
नवांश में हो तो दत्तक पुत्र होता है॥१३२॥
कामेशे लाभभावस्थे पुत्रेशे शुभसंयुते।
पुत्रे मन्दे बुधे वापि दत्तपुत्रा भवन्ति हि॥१३३॥
सप्तमेश एकादश भाव में, पंचमेश शुभग्रह से युक्त हो, पाँचवें भाव में
शनि वा बुध हो तो दत्तक संतति होती है॥१३३॥
पुत्रेशे भाग्यभावस्थे भाग्येशे कर्मराशिगे।
पुत्रे मन्देन संदृष्टे दत्तपुत्रेण सन्ततिः॥१३४॥
पंचमेश भाग्यभाव में, भाग्येश कर्मभाव में, पाँचवें भाव को शनि देखता
हो तो दत्तक पुत्र होता है॥१३४॥
अथ पूर्वजन्मशापद्योतकाध्यायः ३७३
लग्नाधिपे भृगुः स्वोच्चे पुत्रे मन्दसमन्विते ।
कारके बलसंयुक्ते दत्तपुत्रा तु सन्ततिः ॥ १३५ ॥
लग्नेश और शुक्र उच्च में हो, पाँचवें भाव में शनि हो और कारक बली
हो तो दत्तक पुत्र होता है ॥ १३५ ॥
पुत्रस्थानाधिपे चन्द्रे लग्ने पुत्रे शनैश्चरे ।
परिपूर्णबले जीवे दत्तपुत्रात्सुतो भवेत् ॥ १३६ ॥
पंचमेश चन्द्र लग्न में, पाँचवें भाव में शनि हो, गुरु बलवान् हो तो दत्तक
पुत्र होता है ॥ १३६ ॥
पुत्राधिपे रवौ लग्ने पुत्रस्थौ शनिसोमजौ ।
पुत्राधिपे बलयुते दत्तपुत्रात्सुतो भवेत् ॥ १३७ ॥
पंचमेश रवि लग्न में और पंचम में शनि-बुध हों, पंचमेश बली हो
तो दत्तक पुत्र होता है ॥ १३७ ॥
लग्नाधिपे बुधे पुत्रे कुजदृष्टिसमन्विते ।
कारके लाभराशिस्थे दत्तपुत्रात्सुतो भवेत् ॥ १३८ ॥
लग्नेश बुध पाँचवें भाव में भौम से देखा जाता हो और कारक लाभभाव
में हो तो दत्तक पुत्र होता है ॥ १३८ ॥
लग्नाधिपे गुरौ पुत्रे शनिदृष्टिसमन्विते ।
पुत्रेशे भौमराशिस्थे दत्तपुत्रा भवन्ति हि ॥ १३९ ॥
लग्नेश गुरु पाँचवें भाव में शनि से देखा जाता हो और पंचमेश भौम
की राशि में हो तो दत्तक पुत्र होता है ॥ १३९ ॥
अस्य शान्तिमाह-
वंशान्तो हरिकृष्णगो त्रिपुरहाऽब्जे भूसुते रुद्रियं
सौम्ये सम्पुटकांस्यपात्रविविधवज्जीवेन पैत्र्यातिथिः ।
शुक्रे गोप्रतिपालनं च कथितं मन्दे च मृत्युञ्जयः
कन्यादानभुजङ्गकेतुकपिलाः सन्तानसौख्यप्रदाः ॥ १४० ॥
यदि संतान के बाधक सूर्य हो तो हरिवंशपुराण सुनना चाहिए। चन्द्रमा
के लिए शिवपूजन, भौम हो तो रुद्राभिषेक, बुध हो तो विधिवत् कांस्यपात्र
और संपुट, गुरु हो तो पितृपूजन (गयाश्राद्ध), शुक्र हो तो गो-सेवा, शनि
हो तो मृत्युञ्जय का जप, राहु हो तो कन्यादान और केतु हो तो
कपिला गौ का दान करने से सन्तान का सुख होता है ॥ १४० ॥
३७४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
यावत्संख्या भवेद्राशिस्तावद्वारं विनिर्दिशेत्।
शिवविष्णुस्थापनाद्वा लक्षजापात्सुखं भवेत्।।१४१।।
पाँचवें भाव की राशिसंख्या के समान वार हरिवंश सुनना चाहिए।
अथवा शिव-विष्णु की मूर्त्ति की स्थापना करे और लक्ष जप करावें
तो अवश्य संतान का सुख होता है।।१४१।।
इति पूर्वजन्मशापद्योतकोध्यायः।
अथ दशाध्यायः
अथ दशाभेदमाह-
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि दशाभेदाननेकशः।
विंशोत्तरी दशा चोक्ता षोडशोत्तरी तथैव च।।२।।
पराशरजी बोले- मैं अनेक प्रकार के दशा के भेदों को कह रहा
हूँ, उसे सुनो। विंशोत्तरी दशा, षोडशोत्तरी दशा।।२।।
द्वादशोत्तरीका ज्ञेया तथैवाष्टोत्तरी दशा।
पञ्चोत्तरी दशा तद्वद्दशा शतसमा स्मृता।।३।।
द्वादशोत्तरी दशा, अष्टोत्तरी दशा, पंचोत्तरी दशा, शतसमा दशा।।३।।
दशा हि चतुरशीतिः प्राह चाथ द्विसप्ततिः।
तथा षष्टिसमा चोक्ता दशा षड्विंशतिः समा।।४।।
चतुरशीतिसमा दशा, द्विसप्ततिसमा दशा, षष्टिसमा दशा,
षड्विंशतिसमा दशा।।४।।
नवमांशनवदशा राश्यंशकदशाः स्मृताः।
दशा कालाभिधा चक्रदशा चक्र मुनीश्वरैः।।५।।
नवमांशनव दशा, राश्यंशक दशा, काल दशा, कालचक्र दशा, चक्र
दशा।।५।।
चरपर्या दशा चाथ स्थिरदशा च द्विजोत्तम।
अथोत्तरदशा विप्र ब्रह्मता चापरा दशा।।६।।
चरपर्याय दशा, स्थिर दशा, उत्तर दशा, ब्रह्मग्रह दशा।।६।।
केन्द्राद्या च दशा ज्ञेया कारकादि दशा मता।
माण्डूकी च दशा प्रोक्ता तथा शूलदशापि च।।७।।
केन्द्रादि दशा, कारकादि दशा, मांडूकी दशा, शूल दशा।।७।।
अथ दशाध्यायः ३७५
योगार्धजा दशा विप्र दृग्दशां कथयाम्यहम्।
दशा त्रिकोणनामा वै राशीनां च दशा तथा।।८।।
योगार्धदशा, दृग्दशा, त्रिकोण दशा, राशि दशा।।८।।
तारा दशा तथा ज्ञेया दशा रोगा च वर्णदा।
पञ्चस्वरदशा विप्र योगिनी च दशा स्मृता।।९।।
तारा दशा, वर्णद दशा, पंचस्वर दशा, योगिनी दशा।।९।।
ततः पैण्ड्यदशा ज्ञेया तथांशकदशा द्विज।
नैसर्गिकदशा विप्र अष्टवर्गदशा स्मृता।।१०।।
पिंड दशा, अंश दशा, नैसर्गिक दशा, अष्टवर्ग दशा।।१०।।
सन्ध्या दशा च ज्ञातव्या पाचका च दशा द्विज।
द्विचत्वारिंशद्भेदाः स्युः कथयामि तवाग्रतः।।११।।
सन्ध्या दशा और पाचक दशा— इस प्रकार ४२ प्रकार की दशा होती
है।।११।।
अथ विंशोत्तरीदशामाह—
आनयनप्रकारं च शृणुष्व द्विजपुङ्गव।
नामनक्षत्रपर्यन्तमार्क्षादि कृत्तिकादितः।।१२।।
हे द्विजश्रेष्ठ ! उसके आनयन प्रकार को कह रहा हूँ। कृत्तिका से
राशिनाम पर्यन्त ही गिनना चाहिए।।१२।।
सैषा कृष्णेऽर्कहोरायां चन्द्रहोरागते सिते।
दहनात्स्वर्क्षपर्यन्तं गणयेन्नवभिर्हरेत्।।१३।।
कृष्णपक्ष में रवि के होरा में और शुक्लपक्ष में चन्द्रमा की होरा
में कृत्तिका से कृत्तिका नक्षत्र से अपने जन्मनक्षत्र तक गिन कर ९
से भाग देने पर शेष तुल्य।।१३।।
सूर्येन्दुक्ष्माजतमसो वाक्पतिर्मन्दचन्द्रजा।
केतुशुक्रौ क्रमादेते विज्ञेयाश्च दशाधिपाः।।१४।।
क्रम से सूर्य, चन्द्र, भौम, राहु, गुरु, शनि, बुध, केतु, शुक्र की दशा होती
है।।१४।।
रसाशामुनिधृत्यब्दा भूपविधृतिवत्सराः।
सप्तेन्दवो नगा व्योमबाहवो क्रमतो मताः।।१५।।
३७६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
और क्रम से ६,१०,७,१८,१६,१९,१७,७,२० वर्ष इन की दशा के वर्ष
होते हैं॥१५॥
अथ दशायाः भुक्तभोग्यानयनम्—
दशामानं भयातघ्नं भभोगेनोद्धृतं फलम्।
भुक्तवर्षादिकं ज्ञेयं दशावर्षाच्च संशोध्यम्।
शेषं वर्षादिकं भोग्यं दशायाः भवति ध्रुवम्॥१६॥
जिस ग्रह की दशा में जन्म हो, उसके वर्षमान से भयात को गुणाकर
गुणन फल में भभोग से भाग देने से लब्धि वर्ष- मास- दिन- घटी-
पल भुक्त दशा होती है। इसे दशा के सम्पूर्ण वर्ष में घटा देने से भाग्यदशा
शेष होती है॥१६॥
स्फुटतरो हि मगुः कलिकात्मकः खखगजैर्विभजेद्गत ऋक्षकम्।
तदुडुवर्षगुणं च समादिकं खखगजैर्विभजेत्फलमत्र हि॥१७॥
अथवा स्पष्ट चन्द्रमा की कला बनाकर ८०० से भाग देने से लब्धि गत
नक्षत्र होता है। उससे दशा का ज्ञान कर दशावर्ष से शेष को गुणा कर
८०० से भाग देने से मास आदि भुक्त होते हैं। उसे दशावर्ष में घटाने से
शेष भोग्य वर्षादि होता है॥१७॥
अथ विंशोत्तरीदशाज्ञानार्थं चक्रम्—
| सू. | चं. | मं. | रा. | बृ. | श. | बु. | के. | शु. | ग्रहाः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ६ | १० | ७ | १८ | १६ | १९ | १७ | ७ | २० | दशावर्षाणि |
| कृ. | रो. | मृ. | आ. | पुन. | पु. | श्ले. | म. | पू.फा. | |
| उ.फा. | ह. | चि. | स्वा. | वि. | अनु. | ज्ये. | मू. | पू.षा. | नक्षत्राणि |
| उ.षा. | श्र. | ध. | शत. | पू.भा. | उ.भा. | रे. | अ. | भ. | |
| उदाहरण— पुनर्वसु नक्षत्र के प्रथम चरण का भयात १०।३२ भभोग | |||||||||
| ५५।५३ है। कृतिका से गिनने से गुरु की दशा में जन्म हुआ। गुरु | |||||||||
| के दशा वर्ष १६ से भयात के पल ६३२ को गुणाकर गुणनफल १०११२ | |||||||||
| में पलात्मक भभोग ३३५३ से भाग देने से लब्धि ३ वर्ष हुआ। | |||||||||
| शेष ५३ को १२ से गुणाकर गुणनफल ६३६ में भभोग का भाग देने से |
अथ दशाध्यायः ३७७
लब्धि शून्य मास और शेष ६३६ को ३० से गुणाकर गुणनफल १९०८०
में भभोग का भाग देने से लब्ध ५० दिन हुआ। शेष २३१५ को
६० से गुणाकर गुणनफल १३८९०० में भभोग का भाग देने से लब्धि ४१
घटी हुआ। शेष १४२७ को ६० से गुणाकर गुणनफल ८५६२० में भभोग
से भाग देने से लब्धि २५ पल हुआ। इस प्रकार जन्म के पूर्व गुरु की दशा
३ वर्ष मास ५ दिन ४१ घटी और २५ पल भुक्त हो चुकी। इसे गुरु
के दशावर्ष १६ में घटाने से भोग्य अर्थात् शेष दशावर्ष १२, मास ११, दिन
२४, घटी १८ और ३५ पल भोग्य था।
विंशोत्तरीदशाचक्रम्—
| बृ. | श. | बु. | के. | शु. | सू. | चं. | मं. | रा. | ग्रहाः |
| १२ | १९ | १७ | ७ | २० | ६ | १० | ७ | १८ | वर्ष |
| ११ | | | | | | | | | मा. |
| २४ | | | | | | | | | दि. |
| १८ | | | | | | | | | घ. |
| ३५ | | | | | | | | | प. |
| २०१३ | २०२६ | २०४५ | २०६२ | २०६९ | २०८९ | २०९५ | २१०५ | २११२ | २१३० |
| ३ | ३ | ३ | | | | | | | |
| १८ | १२ | १२ | | | | | | | |
| २६ | ४४ | ४४ | | | | | | | |
| १४ | ४९ | ४९ | | | | | | | |
इति विंशोत्तरीदशाक्रमः।
अथ षोडशोत्तरीदशाक्रम—
एकोपचयते रुद्राद्धृत्यन्तं वत्सराः क्रमात्।
रविर्भौमो गुरुर्मन्दः केतुश्चन्द्रो बुधो भृगुः॥१९८॥
११ में एक-एक १८ तक जोड़ने से दशावर्ष
११।१२।१३।१४।१५।१६।१७।१८ क्रम से सूर्य, भौम, गुरु, शनि, केतु,
चन्द्रमा, बुध और शुक्र का होता है॥१९८॥
अष्टौ दशाधिपाः प्रोक्ता राहुहीना नवग्रहाः।
पुष्यभाज्जन्मभं यावद्गणयेद्वसुभिर्हरेत् ॥१९९॥
राहु को छोड़कर नवग्रह में आठ ही ग्रह दशेश होते हैं। पुष्य से जन्म-
नक्षत्र तक गिनने से जो संख्या हो उसमें ८ से भाग देने पर शेषांक तुल्य
सूर्य आदि की दशा होती है॥१९९॥