बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
१३२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
पद से १२वें भाव में शुभग्रह-पापग्रह युत हों और देखते हों तो विशेष
लाभ के कारण द्रव्य का अधिक खर्च होता है।। १५५।।
शुभग्रहे सुमार्गेषु कुमार्गात्पापखेचरैः।
मिश्रैर्मिश्रफलं वाच्यं यथालाभेषु पूर्ववत् ।।१६।।
शुभग्रह का संबंध होने से सुमार्ग में और पापग्रह का संबंध होने से कुमार्ग
में व्यय होता है। दोनों (शुभ-पाप) के रहने से दोनों मार्ग में व्यय होता
है।।१६।।
आरूढाद्द्वादशे शुक्रे भानुस्वर्भानुवीक्षिते ।
राजमूलाद्व्ययं वाच्यं चन्द्रदृष्ट्या विशेषतः ।।१७।।
आरूढ से १२वें शुक्र हो, सूर्य-राहु से देखा जाता हो तो राजा के द्वारा
व्यय होता है। चन्द्रमा देखता हो तो विशेष व्यय होता ही है।।१७।।
आरूढाद्द्वादशे सौम्ये शुभखेटयुतेक्षिते।
ज्ञातिमध्ये व्ययो नित्यं पापदृक्कल्हाद्व्ययः।।१८।।
आरूढ़ से १२वें भाव में बुध हो और शुभग्रह से दृष्ट वा युत
हो तो जाति (भाई-बंधु) में व्यय होता है और पापग्रह देखता हो
तो कलह होने से व्यय होता है।।१८।।
पदाद्व्यये सुराचार्ये वीक्षिते चान्यखेचरैः।
करमूलाद्व्ययं वाच्यं करवाजेन वै द्विज ।।१९।।
पद से १२वें भाव में गुरु हो और अन्य ग्रहों से देखा जाता हो तो कर
(लगान) आदि से व्यय होता है।।१९।।
आरूढाद्द्वादशे सौरी धरापुत्रेण संयुते।
अन्यग्रहेक्षिते विप्र भ्रातृमूलाद्धनव्ययम् ।।२०।।
आरूढ से व्ययभाव में शनि हो और भौम से देखा जाता हो तथां
शेष ग्रहों से देखा जाता हो तो भाई, कुटुंब के कारण धन का व्यय होता
है।।२०।।
पदाद्द्वादशे भावे ये योगा गदिता मया।
लाभस्थानेषु ते योगा लाभयोगकराः सदा।।२१।।
पद से बारहवें भाव में जिन योगों को मैंने कहा है वे ही योग लाभभाव
में हों तो लाभ करने वाले होते हैं।।२१।।
अथाऽऽरूढमाह १३३
पदात्सप्तमभावफलम्-
पदाच्च सप्तमे राहुरथवा संस्थितः शिखी ।
उदरव्यथायुतो बालः शिखिना पीडितोऽधिकम् ॥२२॥
पद से सातवें भाव में राहु अथवा केतु हो तो बालक पेट की बीमारी
से व्यथित रहता है। केतु से अधिक पीड़ायुक्त होता है।।२२।।
पदाच्च सप्तमे केतुः पापखेटयुतेक्षिते।
साहसी श्वेतकेशी च दीर्घलिङ्गी भवेन्नरः॥२३।।
पद से सातवें केतु हो और पापग्रह से युत वा दृष्ट हो तो बालक साहसी,
सफेद बालों वाला और दीर्घलिंगी होता है।।२३।।
पदाच्च सप्तमे स्थाने गुरुशुक्रनिशाकराः।
एको द्वयं त्रयं वा स्याल्लक्ष्मीवान् कारयेद्बुधः।।२४।।
पद से सातवें भाव में गुरु, शुक्र, चन्द्रमा तीनों हों वा इनमें से एक या
दो हों तो बालक धनी होता है।।२४।।
तुङ्गर्क्षे सप्तमे खेटे शुभो वाप्यशुभः पदात्।
श्रीमान् सोऽपि भवेन्नूनं सत्कीर्त्तिसहितो द्विज ।।२५।।
पद से सातवें भाव में अपनी उच्चराशि में शुभग्रह या पापग्रह में
से कोई हो तो बालक कीर्त्तिमान् और लक्ष्मीवान् होता है।।२५।।
ये योगाः सप्तमे भावे आरूढात् कथिता मया।
ते योगा द्यूनवच्चिन्त्या वित्तभावेऽपि वै द्विज ।।२६।।
पद से सातवें भाव में जिन योगों को मैंने कहा है उनको उसी प्रकार
दूसरे भाव में भी विचार करना चाहिए।।२६।।
तुङ्गस्थो रौहिणेयो वा जीवो वा शुक्र एव वा।
एको बली धनगतः श्रियं दिशति देहिनः ।।२७।।
यदि बुध, गुरु, शुक्र इनमें से कोई भी अपनी उच्चराशि में बली होकर
धनभाव में हो तो धन को देता है।।२७।।
ये योगाश्च पदे लग्ने यथावद्गदिता मया।
कारकांशस्थकुण्डल्यां निर्बाधका विचिन्तयेत् ।।२८।।
जो योग लग्न पद में कहे गये हैं उनको कारकांश कुंडली
में भी देखना चाहिए।।२८।।
१३४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
आरूढाद्वित्तभे सौम्ये सर्वदेशाधिपो भवेत्।
सर्वज्ञो वा भवेद्बालः कविर्वाग्मी च भार्गवे ।।२९ ।।
पद से दूसरे भाव में शुभग्रह हो तो सभी देशों का स्वामी होता है
अथवा सर्वज्ञ होता है। केवल शुक्र हो तो कवि और वक्ता होता है।।२९।।
आरूढात्केन्द्रकोणेषु तथा लाभपदे द्विज।
लग्नदारपदे वापि सबलग्रहसंयुते ।।३० ।।
श्रीमांश्च जायते नूनं देशं विख्यातिमान् भवेत्।
षष्ठाष्टमे व्ययस्थाने श्रीमान्स न भवेत्तदा ।।३१।।
पद से केन्द्र तथा कोण में लाभ पद में अथवा लग्न दारपद में बलवान्
ग्रह हों तो श्रीमान् और प्रसिद्ध होता है। यदि छठे, आठवें, बारहवें स्थान
में हों तो श्रीमान् नहीं होता है।।३०-३१।।
पदालग्ने सप्तमे वा केन्द्रत्रिकोणोपचये।
सुवीर्यसंस्थिते खेटे भार्याभर्तृसुखप्रदः ।।३२।।
पद से लग्न में वा सातवें वा केन्द्र, त्रिकोण, उपचय स्थान में बली ग्रह
हों तो स्त्री, भाई आदि का सुख होता है।।३२।।
एवं लग्नपदाद्विप्र पुत्रभावादि चिन्तयेत्।
मित्रामित्रे विजानीयात्त्रिकभावेषु वै द्विज ।।३३ ।।
इसी प्रकार लग्नपद से पुत्रभाव आदि का भी विचार करना चाहिए।
यदि दोनों में मित्रता हो तो मित्रता, अन्यथा शत्रुता होती है।।३३।।
लग्नारूढं दारपदं मिथः केन्द्रगते यदि।
लाभे वा त्रित्रिकोणे वा तदा राजा धराधिपः ।। ३४ ।।
लग्नपद और दारपद परस्पर केन्द्रगत, लाभ, तृतीय वा त्रिकोण में हो
तो पृथ्वी का राजा होता है।।३४।।
एवं दारादिभावानामर्जायित्वारिमित्रता।
जातकद्वयमालोक्य चिन्तनीयं विचक्षणैः।।३५।।
इसी प्रकार दारा आदि भावों के शत्रु-मित्रादि का विचार कर उनके फलों
को भी कहना चाहिए।।३५।।
इति पाराशरहोरायां पूर्वखण्डे सुबोधिन्यां आरूढफलाध्यायः नवमः।
उपपदप्रकरणम् १३५
उपपदप्रकरणम्
पराशर उवाच-
अधुना सम्प्रवक्ष्याम्युपपदं च द्विजोत्तम।
यस्य विज्ञानमात्रेण जायते फलसूचकः॥१॥
अब मैं उपपद को कह रहा हूँ, जिसके ज्ञान मात्र से फल का निर्णय
होता है॥१॥
लग्ने विषमे विप्र धनस्य पदोपपदम्।
समे लग्ने व्ययस्य च पदमुपपदं भवेत्॥२॥
लग्न यदि विषम हो तो धनभाव का पद उपपद होता है, यदि समलग्न
हो तो बारहवें का पद उपपद होता है॥२॥
तदेवोपारूढगौणपदं च कथ्यते द्विज।
तस्मादेव फलं सर्वं शुभाशुभं विचारयेत्॥३॥
उपपद को ही उपारूढ़ और गौणपद कहते हैं। इसी से शुभ-अशुभ फलों
का विचार करना चाहिए॥३॥
पापाक्रान्ते पापयुते पापर्क्षे पापवीक्षिते।
पापसम्बन्धसंयोगे उपपदाद् द्वितीयके।॥४॥
उपपद से दूसरे भाव में पापग्रह हो, पापग्रह की राशि पापग्रह से
देखी जाती हो तो॥४॥
प्रव्रज्या योगो विज्ञेयः संन्यासो भवति ध्रुवम्।
तथा भार्याविरोधी स्यादथवा स्त्रीविनाशकृत्॥५॥
व्रज्या (संन्यास) योग होता है। इसमें उत्पन्न बालक अवश्य संन्यासी
होता है तथा स्त्री का विरोधी वा स्त्री का नाश करने वाला होता है॥५॥
रवेः पापत्वमात्रैव सिंहर्क्षे स्वोच्चभे सति।
पूर्वोक्तं नो फलं ज्ञेयं जायते गृहिणीसुखम्॥६॥
यदि सूर्य सिंह राशि में वा अपनी उच्चराशि में हो तो सूर्य पापग्रह
नहीं होता है। ऐसी स्थिति का सूर्य उक्त भाव में हो तो प्रव्रज्या योग नहीं
होता अपितु स्त्री का सुख होता है॥६॥
मेषादिपापराशौ चेत्संस्थिते दिवसाधिपे।
पूर्वोक्तं च फलं ज्ञेयं प्रव्रज्यादारनाशकः॥७॥
१३६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
यदि मेषादि पापराशियों में सूर्य हो तो पूर्वोक्त फल होता है और स्त्री
का नाश होता है।।७।।
उपपदाच्च द्वितीयं वै शुभसम्बन्धदृष्टियुक्।
शुभर्क्षे शुभसंयोगे पूर्वोक्तफलदो भवेत्।।८।।
उपपद से दूसरे भाव में शुभग्रह का संबंध हो, शुभग्रह देखते हों
अथवा शुभग्रह की राशि हो तो पूर्वोक्त फल होता है।।८।।
उपपदे द्वितीये वा नीचांशे नीचखेटयुक्।
नीचसम्बन्धयोगे वा प्रव्रज्यादारनाशकृत्।।९।।
उपपद में उससे दूसरे भाव में नीचांश वा नीच राशि में नीच ग्रह युक्त
हो, नीचस्थ ग्रह से संबंध होता हो तो प्रव्रज्या योग और स्त्री का नाश
होता है।।९।।
उच्चांशे उच्चराशौ वा उच्चसम्बन्धदृष्टियुक्।
बहुदारा भवेत्तस्य रूपलक्षणसंयुताः।।१०।।
यदि उच्चांश का उच्चराशि में उच्चस्थ ग्रह से संबंध और दृष्टि हो तो
उसे रूपवती अनेक स्त्रियाँ होती हैं।।१०।।
उपपदे द्वितीये वा युग्मर्क्षे संस्थिते यदा।
तत्र प्रजातः पुरुषः बहुदारसमन्वितः।।११।।
उपपद वा दूसरे भाव में मिथुन राशि हो तो जातक को अनेक स्त्रियाँ
होती हैं।।११।।
उपपदे द्वितीये वा स्वस्वामिखेटसंयुते।
उत्तरायुषि निर्दारो भवत्येव न संशयः।।१२।।
स्वराशौ संस्थिते वापि नित्याख्ये दारकारके।
उत्तरायुषि भो विप्र! निर्दारः स नरो भवेत्।।१३।।
उपपद या दूसरा भाव अपने स्वामी शुभग्रह से युत हो तो आयुष्य
के उत्तरार्ध में बिना स्त्री के पुरुष होता है।।१३।।
उपपदेऽपि तुङ्गर्क्षे नित्याख्ये दारकारके।
उत्तमकुलाद्दारलाभो नीचस्थे तु विपर्ययः।।१४।।
उपपद में उच्च में नित्य स्त्रीकारक हो तो उत्तम कुल से स्त्री का
लाभ होता है। नीच राशि में हो तो विपर्यय होता है।।१४।।
उपपदप्रकरणम् १३७
शुभग्रहयुते दृष्टे उपपदे दारकारके।
सुन्दरी लभ्यते भार्या भव्या रूपवती द्विज।।१५।।
उपपद और स्त्रीकारक शुभग्रह से युत-दृष्ट हों तो बहुत सुन्दर स्त्री
प्राप्त होती है।।१५।।
उपपदे द्वितीये वा शनिराहुयुते सति।
अपवादात्स्त्रियस्त्यागो भार्यानाशोऽथवा भवेत् ।।१६।।
उपपद वा द्वितीय में शनि-राहु युत हों तो अपवाद के कारण स्त्री का
त्याग या स्त्री का नाश होता है।।१६।।
उपपदे च द्वितीये वा शिखिशुक्रौ स्थितौ यदा।
रक्तप्रदररोगार्त्ता जायते तस्य भामिनी।।१७।।
उपपद या द्वितीय में केतु-शुक्र युत हों तो स्त्री रक्तप्रदर रोग से रोगिणी
होती है।।१७।।
उपपदादिषु संयोगो बुधकेत्वोर्द्विजोत्तम।
अस्थिस्रावयुता बाला गृहे तस्य न संशयः।।१८।।
यदि बुध-केतु का संयोग हों तो अस्थिस्राव से स्त्री रोगिणी होती
है।।१८।।
रविराहुस्तथा पङ्गुरूपपदे योगकारकः।
अस्थिज्वरवती बाला तप्ताङ्गा च दिवानिशम् ।।१९।।
रवि, राहु, शनि उपपद में हों तो स्त्री अस्थिज्वर से पीड़ित होती है।।१९।।
उपपदे बुधकेतुभ्यां योगसम्बन्धके द्विज।
स्थूलाङ्गी गृहिणी तस्य जायते नात्र संशयः।।२०।।
उपपद में बुध-केतु का योग वा संबंध हो तो उसकी स्त्री स्थूल शरीर
की होती है।।२०।।
उपपदे बुधक्षेत्रे भौमर्क्षे चाथवा द्विज।
मन्दारौ संस्थितौ तत्र नासिकारोगयुग्भवेत् ।।२१।।
उपपद में बुध की राशि या भौम की राशि हो और शनि-भौम युत हों
तो स्त्री की नाक में रोग होता है।।२१।।
यदि तत्र युतो सौरिः गुरुणा सहितो भवेत्।
कर्णरोगवती बाला नेत्ररोगयुता तथा।।२२।।
१३८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
यदि गुरु-शनि का योग हो तो स्त्री कान तथा आँख के रोग वाली होती
है।।२२।।
कुजसौम्यौ चान्यक्षेत्रे उपपदे द्विजोत्तम।
योगे स्वर्भानुदेवेज्यौ दन्तार्ता गृहिणी भवेत्।।२३।।
यदि भौम-बुध वा गुरु-राहु उपपद में हों तो दाँत के रोग से पीड़ित
स्त्री होती है।।२३।।
उपपदे च कुम्भस्थे मीनस्थेऽपि तथा द्विज।
शनिस्वर्भानुयोगश्चेत्पंग्वंगी तस्य भामिनी।।२४।।
उपपद में कुम्भ या मीन राशि हो और उसमें शनि-राहु का योग हो तो
उसकी स्त्री पंगुल (वातव्याधि से) होती है।।२४।।
ये योगाः पूर्वकथिता मया ते विप्रसत्तम।
शुभयुग्दृष्टिसंयोगे न भवेयुः फलप्रदाः।।२५।।
पूर्वोक्त जो योग कहे गये हैं वे यदि शुभग्रह से युक्त या दृष्ट हों तो
फलप्रद नहीं होते हैं।।२५।।
लग्नादुपपदाद्वापि यो राशिः सप्तमो द्विज।
तदीशात्तन्नवांशाच्च फलमेव विचारयेत्।।२६।।
लग्न से वा उपपद से सातवीं राशि के जो स्वामि और उसके नवांश
से भी इसी प्रकार फल का विचार करना चाहिए।।२६।।
शनिः शुक्रस्तथा चान्द्रिः सप्तमांशग्रहेभ्यश्च।
नवमे संस्थितो विप्र अपत्यरहितो नरः।।२७।।
उक्त प्रकार से सप्तमेश से नवम में शनि, शुक्र और बुध हों तो
पुरुष पुत्रहीन होता है।।२७।।
पदोपपदलग्नाच्च सप्तमांशग्रहेभ्यश्च।
नवमस्थे गुरौ भावौ स्वर्भानौ योगकृत्तथा।।२८।।
उपपद से वा सप्तमांश ग्रह से नवमभाव में गुरु, सूर्य, राहु का योग हो
तो।।२८।।
बहुपुत्रो भवेन्नूनं प्रतापी बलवीर्ययुक्।
प्रचण्डविजयी विप्र रिपुनिग्रहकारकः।।२९।।
बड़े बलवान् पराक्रमी, प्रतापी शत्रुओं का दमन करने वाले अनेक पुत्र
होते हैं।।२९।।
उपपदप्रकरणम् १३९
उक्तस्थाने निशानाथे एकपुत्रो भवेद्द्विज।
उक्तस्थाने शुभे पापे पुत्रसौख्यं विलम्बितम् ।।३०।।
उक्त स्थान में चन्द्रमा हो तो एक पुत्र होता है। यदि उक्त स्थान में
शुभ-पाप दोनों हों तो विलंब से पुत्र का सुख होता है।।३०।।
उक्तस्थाने कुजशनिर्जायते च ह्यपुत्रवान्।
परपुत्रयुतो वापि सहोढ सुतवान् भवेत् ।।३१।।
उक्त स्थान में भौम-शनि हों तो पुत्रहीन होता है और दूसरे के पुत्र से
(दत्तक पुत्र) पुत्रवान् होता है, वा सहोदर के पुत्र से पुत्रवाला होता है।।३२।।
उक्तस्थाने चोजराशौ बहुपुत्रप्रदो भवेत्।
युग्मराशौ स्थिते तत्र स्वल्पापत्यो भवेन्नरः ।।३२।।
उक्त स्थान में विषम राशि हो तो बहुत पुत्र होते हैं। समराशि हो
तो अल्पसंतान होते हैं।।३२।।
उपपदे सिंहलग्ने निशानाथयुतेक्षिते।
स्वल्पापत्यो भवेन्नूनं कन्यायां कन्यका भवेत् ।।३३।।
उपपद में सिंहलग्न हो और चन्द्रमा से युत वा दृष्ट हो तो थोड़ी संतान
होती है, कन्या राशि हो तो कन्या होती है।।३३।।
सुतभावनवांशाच्च तथापि पुत्रकारकात्।
यद्वा त्रिंशांशकुण्डल्यां तदंशाच्च सदा द्विज ।।३४।।
पंचम भाव के नवांश से, पुत्रकारक से, अथवा त्रिंशांश कुण्डली
वा उसके नवांश से ।।३४।।
तदीशाश्चिन्तयेद्विप्र सन्ततेर्योगमुत्तमम्।
एवं सर्वप्रकारेण चिन्तनीयं सदा बुधैः ।।३५।।
वा उसके स्वामी से संतान भावों के उत्तम योगों का विचार करना
चाहिए।।३५।।
उपारूढाच्च त्र्यायस्थौ शनिराहू भ्रातृनाशदौ।
एकादशे ज्येष्ठभ्रातुस्तृतीये च कनिष्ठकम् ।।३६।।
उपपद से ३रे, ११वें भाव में शनि-राहु हों तो भाइयों का नाश होता है।
११वें में ज्येष्ठ भाई का और तीसरे में छोटे भाई का विचार करना
चाहिए।।३६।।
१४० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
उपपदैकादशस्थाने तृतीये दानवेज्यके ।
व्यवहितगर्भस्य नाशः स्याद्यथा सम्भवति द्विज ।।३७।।
उपपद से ११वें, ३रे स्थान में शुक्र हो तो उससे व्यवहित गर्भ माता का
नाश हो जाता है।।३७।।
लग्नाद्वापि लये भावे दैत्याचार्ययुतेक्षिते।
व्यवहितगर्भस्य नाशः स्यादित्युक्तं गणकोत्तमैः ।।३८।।
लग्न से आठवें भाव में शुक्र युत हो वा देखता हो तो भी व्यवहित
गर्भ का नाश होता है।।३८।।
तृतीयैकादशे विप्र ! कुजेज्यबुधचन्द्रमाः ।
भ्रातृबाहुल्यता वाच्या प्रतापी बलवत्तरः ।।३९।।
उपपद से ३रे, ११वें भाव में भौम, गुरु, बुध, चन्द्रमा हों तो प्रतापी बलवान्
अधिक भाई होते हैं।।३९।।
शन्यारसंयुते दृष्टे तृतीयैकादशे द्विज।
कनिष्ठज्येष्ठयोर्नाशं भिन्नस्थे भिन्नभावहृत् ।।४०।।
३, ११ को शनि-भौम देखते हों वा युत हों तो छोटे-बड़े दोनों भाइयों
का नाश होता है। भिन्न भावों में हो तो उन भावों का नाश करते हैं।।४०।।
भ्रातृस्थाने युते सौरे लाभस्थे वा तृतीयगे ।
स्वमात्रमेव शेषः स्यादन्यं नश्यन्ति वै द्विज ।।४१।।
यदि शनि ३रे वा ११वें में हो तो केवल अपने बच जाता है और सभी
भाई नष्ट हो जाते हैं।।४१।।
तृतीयैकादशे केतुर्बाहुल्यं स्याद्भगिन्ययोः ।
भ्रात्रोः स्वल्पसुखं तस्य निर्विशङ्कं द्विजोत्तम ।।४२।।
३,११ वें भाव में केतु हो तो बहनें अधिक होती हैं और भाइयों का सुख
अल्प होता है।।४२।।
सप्तमेशाद्द्वितीये वै सैंहिकेययुतेक्षिते।
दंष्ट्रावान् स भवेद्बालो बहुभाग्ययुतो भवेत् ।।४३।।
सप्तमेश से दूसरे भाव में राहु युक्त हो अथवा देखता हो तो
बालक के दाँत बड़े-बड़े होते हैं और वह भाग्यशाली होता है।।४३।।
उपपदप्रकरणम् १४१
सप्तमेशाद्द्वितीये चेत्युच्छनाथयुतेक्षिते।
स्तब्धवाग् जायते बालस्तथा स्खलितवाग्द्विज ।।४४।।
सप्तमेश से दूसरे भाव को केतु देखता हो वा युत हो तो बालक
हकलाकर बोलने वाला होता है।।४४।।
आरूढान्मृत्युभावस्थे पापाख्ये शुभवर्जिते।
शुभसम्बन्धरहिते चोशे भवति निश्चितम् ।।४५।।
पद से आठवें भाव में पापग्रह हों, शुभग्रह से संबंध न हो तो चोर होता
है।।४५।।
आरूढभावे सौम्ये तु सर्वदेशाधिपो भवेत्।
सर्वज्ञस्तत्र जीवे स्यात्कविर्वाग्मी च भार्गवे ।।४६।।
पद में बुध हो तो चक्रवर्ती होता है, गुरु हो तो सर्वज्ञ होता है और
शुक्र हो तो कवि तथा वक्ता होता है।।४६।।
सप्तमे द्वादशे स्थाने सैंहिकेययुतेक्षिते।
ज्ञानवांश्च भवेद्बालो बहुभाग्ययुतो द्विज ।।४७।।
सातवें, बारहवें भाव में राहु हो अथवा देखता हो तो बालक
ज्ञानी तथा बहुत भाग्यशाली होता है।।४७।।
आरूढाच्च पदाद्वापि धनस्थे शुभखेचरे।
सर्वद्रव्याधिपो धीमान् जायते द्विजसत्तम ।।४८।।
आरूढ़ से वा पद से दूसरे भाव में शुभग्रह हो तो सम्पूर्ण द्रव्य का
अधिपति और बुद्धिमान् होता है।।४८।।
उपपदाद्धनपो यत्र वर्तते वित्तभे यदा।
पापखेचरसंयुक्ते चौरो भवति निश्चितम् ।।४९।।
उपपद से द्वितीयेश यदि धनभाव में हो और पापग्रह से संबंध करता
हो तो निश्चय ही चोर होता है।।४९।।
अमात्यानुचराद्विप्र देवभक्तिं विचिन्तयेत्।
नीचत्वादेव नीचत्वं शुभपापाच्छुभाशुभम् ।।५०।।
भ्रातृकारक से भी पूर्ववद् देवभक्ति-विचार करना चाहिए। यदि
नीचग्रह का संबंध हो तो नीच देवता और शुभ-पाप के संबंध
द्वारा शुभ-पाप देवता को समझना चाहिए।।५०।।
१४२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
कारकांशे पापखगैः पापांशे पापयोगकृत्।
पापवर्गे शुभैर्हीने जायते परजातकः।।५१।।
कारकांश में पापग्रह, पापांश में पापग्रह से योग करते हुए पापग्रह के
वर्ग में हों, शुभग्रह का सम्बन्ध न हो तो दूसरे से उत्पन्न हुआ होता है।।५१।।
इति पाराशरहोरायां पूर्वखण्डे सुबोधिन्यां उपपदफलं नाम दशमोऽध्यायः।
अथ कारकमारकविचाराध्यायः
पञ्चमं नवमं चैव विशेषधनमुच्यते।
चतुर्थं दशमं चैव विशेषसुखमुच्यते।।१।।
पाँचवाँ और नवम स्थान विशेष धनस्थान होता है और चौथा तथा
दशम विशेष सुखस्थान होता है।।१।।
चन्द्रभानू विना सर्वे मारके मारकाधिपाः।
षष्ठाष्टमव्ययेशास्तु राहुः केतुस्तथैव च।।२।।
चन्द्रमा-सूर्य को छोड़कर शेष सभी ग्रह मारकेश होते हैं। छठा, आठवाँ,
बारहवाँ स्थान के स्वामी और राहु तथा केतु ये सभी मारकेश होते हैं।।२।।
केन्द्राधिपतयः सौम्याः शुभं नैव दिशन्ति च।
क्रूराः नैवाशुभं कुर्युः कोणपौ शुभदायकौ।।३।।
यदि शुभग्रह केन्द्र के स्वामी हों तो शुभ फल नहीं देते हैं। पापग्रह
केन्द्राधिपति हों तो अशुभ फल नहीं देते हैं। यदि कोण (९/५) के स्वामी
हों तो शुभफल देते हैं।।३।।
धनेशो हि व्ययेशश्च संयोगात्फलदौ मताः।
लाभारित्र्यधिपा पापा रन्ध्रेशो न शुभप्रदः।।४।।
द्वितीयेश और व्ययेश संयोगवश (साहचर्य) फल देते हैं। ११/६/३भावों
के स्वामी पाप होते हैं। अष्टमेश शुभद नहीं होता है।।४।।
जायाकुटुम्बकाधीशौ मारकौ परिकीर्त्तितौ।
क्रूराश्चैते ग्रहा ज्ञेया क्षीणचन्द्रो रविस्तथा।।५।।
सप्तम और दूसरे भाव के स्वामी मारकेश होते हैं। क्षीणचन्द्र और रवि
क्रूर ग्रह हैं।।५।।
कारकमारकविचाराध्यायः १४३
शनिर्भौमश्च विज्ञेया प्रबला ह्युत्तरोत्तराः।
लग्नाम्बुद्यूनकर्माणि प्रबलान्युत्तराणि हि॥६॥
शनि, भौम ये क्रूर ग्रह कहे जाते हैं और उत्तरोत्तर प्रबल होते
हैं। लग्न, चतुर्थ, सप्तम, दशम ये उत्तरोत्तर प्रबल होते हैं॥६॥
सुतधर्मौ तथा ख्यातौ प्रबलौ चोत्तरोत्तरौ।
लाभारित्रितयस्थानं त्वधोधः प्रबलं भवेत्॥७॥
पंचम और नवम उत्तरोत्तर प्रबलं होते हैं। ११/६/३ स्थान क्रमशः प्रबल
होते हैं॥७॥
पुनर्मारकयोर्मध्ये ह्युत्तरं प्रबलं मतम्।
भाग्यस्थानाद्व्ययं विप्र तस्माच्चैवाशुभं वदेत्॥८॥
मारकों के मध्य में द्वितीयेश प्रबल मारक होता है। भाग्यस्थान
से व्ययस्थान (अष्टम) से भी अशुभ फल होता है॥८॥
एतत्स्थानानुसारेण ग्रहाणां मानमालिखेत्।
चन्द्रज्ञगुरुशुक्राणां केन्द्रदोषो यथोत्तरम्॥९॥
इस प्रकार ग्रहों की शुभ-अशुभ फलों की तालिका लिखकर फल
का विचार करें। चन्द्रमा, बुध, गुरु और शुक्र का केन्द्रदोष यथोत्तर बलवान्
होता है॥९॥
तथैव ग्रहाः क्रूरां प्रबलाश्चैवोत्तरोत्तरम्।
भाग्येशः सर्वदा सौम्यो न क्रूरः फलदायकः॥१०॥
उसी प्रकार उसमें स्थित ग्रह भी यथोत्तर बली होते हैं। भाग्येश सर्वदा
शुभफल देने वाला होता है, किन्तु क्रूरग्रह हो तो शुभ फलदायक नहीं होता
है॥१०॥
पुत्राधिपोऽपि शुभदः क्रूरोऽपि सुखदः स्मृतः।
त्रिलाभरिपुमृत्यूनां पतयो दुःखदायकाः॥११॥
पंचमेश शुभग्रह हो या पापग्रह हो शुभफल ही देता है। ३/११/६/
८ के अधिपति दुःखदायी होते हैं॥११॥
यद्यद्भावगतो राहुः केतुश्च जनने नृणाम्।
यद्यद्भावेशसंयुक्तस्तत्फलं प्रदिशेदलम्॥१२॥
राह-केतु जिन-जिन भावों में हों, जिन-जिन भावेशों से युत हों उनके
अनुसार फल को देते हैं॥१२॥
१४४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
अथ मेषलग्ने शुभाशुभदायकौ-
मन्दसौम्यसिताः पापाः शुभौ गुरुदिवाकरौ ।
न शुभं योगमात्रेण प्रभवेच्छनिजीवयोः ॥ १३ ॥
मेष लग्न में उत्पन्न बालक को शनि, बुध, शुक्र पापफल देने वाले और
गुरु-सूर्य शुभफल देनेवाले होते हैं। शनि-गुरु योग मात्र से शुभदायक
नहीं होते किन्तु सहायक होते हैं॥१३॥
परतन्त्रेण जीवस्य पापकर्माणि निश्चितम् ।
कविः साक्षान्निहन्ता स्यान्मारकत्वेन लक्षितः ॥ १४ ॥
गुरु के पारतन्त्र्य होने से (व्ययेश होने के कारण-पापसंबंध से) पीपफल
देना भी निश्चित है। शुक्र साक्षात् मारकेश होता है॥१४॥
मन्दादयो निहन्तारो भवेयुः पापिनो ग्रहाः।
शुभाशुभफलान्येवं ज्ञातव्यानि क्रियोद्भवैः ॥ १५ ॥
शनि आदि पापग्रह भी मारकेश के सहयोग से मारक होते हैं। इस प्रकार
मेषलग्न में उत्पन्न जातक के शुभ-अशुभ का निर्णय करना चाहिए।॥१५॥
विशेष-यहाँ मेषलग्न के स्वामी भौम अष्टमेश होने के कारण
अशुभ है। किन्तु लग्नेश होने के कारण शुभ फल देने वाले के
सहायक हैं। शनि केन्द्राधिपति होने के कारण शुभद है, किन्तु लाभाधिपति
होने के कारण पापी हो गया। बुध ३/६ भाव का अधिपति होने के
कारण अशुभ, शुक्र मारकस्थान (२/७) का स्वामी यानि केन्द्रेश होने
के कारण अशुभ, सूर्य (५) का स्वामी होने से शुभ, गुरु व्ययेश और
भाग्येश होने के कारण अपने सहयोगी के अनुसार पापफलद भी
हो सकता है। इसी प्रकार प्रत्येक लग्नों में समझना चाहिए।
वृषलग्नम्-
जीवशुक्रेन्दवः पापाः शुभौ शनिदिवाकरौ ।
राजयोगकरः साक्षादेक एव रवेः सुतः॥१६॥
वृष लग्न वाले को गुरु, शुक्र, चन्द्रमा पापफल देने वाले, शनि-सूर्य
शुभ फलदायक और राजयोगकारक होते हैं।॥१६॥
जीवादयो ग्रहाः पापाः सन्ति मारकलक्षणाः ।
बुधः स्वल्पफलान्येवं ज्ञेयानि वृषजन्मनः ॥१७॥
कारकमारकविचाराध्यायः १४५
गुरु, शुक्र, चन्द्रमा ये पापफलदायक मारकेश के फल को देने वाले होते
हैं और बुध अल्प शुभफल को देने वाला होता है। ऐसा लक्षण
वृषलग्न वालों का होता है॥१७॥
मिथुनलग्नम्—
भौमजीवारुणः पापा एक एव कविः शुभः।
शनैश्चरेण जीवस्य योगो मेषभवो यथा॥१८॥
मिथुन लग्नवाले को भौम, गुरु, सूर्य पापफल देने वाले, केवल
एक मात्र शुक्र शुभफल देने वाला होता है। शनि-गुरु का योग
मेषलग्न वाले के समान ही फलदायक होता है॥१८॥
नायं शशी निहन्ता स्याल्लक्षणं पापनिष्फलम्।
ज्ञातव्यानि द्वन्द्वजस्य फलान्येतानि सूरिभिः॥१९॥
चन्द्रमा मारक नहीं होता है किन्तु साहचर्यानुसार फल देने वाला होता
है। इस प्रकार मिथुन लग्न वालों के फल का विचार करना चाहिए॥१९॥
कर्कलग्नम्—
भार्गवेन्दुसुतौ पापौ भौमेज्यशशिनः शुभाः।
एकग्रहस्तु भवेत्साक्षान्महीसुतो योगकारकः॥२०॥
कर्क लग्नवाले को शुक्र-बुध पाप फल देने वाले और भौम, गुरु, चन्द्रमा
शुभ फल देने वाले होते हैं। केवल एक भौम ही राजयोगकारक होता
है॥२०॥
निहन्ता रविजोऽन्ये च साहचर्यात्फलप्रदाः।
कुलीरसम्भवस्यैव फलान्युक्तानि सूरिभिः॥२१॥
शनि मारकेश होता है, अन्य ग्रह साहचर्य के अनुसार फल देते हैं।
ऐसा कर्क लग्न वाले का फल होता है॥२१॥
अथ सिंहलग्नम्—
बुधशुक्रार्कजाः पापाः भौमेज्यार्काः शुभप्रदाः।
प्रभवेद्योगमात्रेण न शुभं गुरुशुक्रयोः॥२२॥
सिंह लग्नवाले को बुध, शुक्र, शनि पापफल देने वाले और भौम, गुरु,
सूर्य शुभ फल देने वाले होते हैं। गुरु-शुक्र के योगमात्र से शुभफल नहीं
होता है॥२२॥
१४६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
घ्नन्ति सौम्यादयः पापा मारकत्वेन लक्षिताः।
एवं फलानि वेद्यानि सिंहे यस्य जनुर्भवेत् ॥२३॥
बुध पापग्रहों के साहचर्य से मारकेश होता है। ऐसा सिंहलग्न वालों
का फल होता है।।२३।।
अथ कन्यालग्नम्-
कुजजीवेन्दवः पापा एक एव भृगुः शुभः।
भार्गवेन्दुसुतावेव भवेतां योगकारको ॥२४॥
कन्या लग्नवाले को भौम, गुरु, चन्द्रमा पापफल देने वाले, केवल
शुक्र ही शुभफलदायक है। शुक्र-बुध योगकारक होते हैं।।२४।।
निहन्ता कविरन्ये तु मारकास्तु कुजादयः।
प्रतीक्षते फलान्युक्तान्येवं कन्याभवे बुधैः ॥२५॥
मारकेश शुक्र ही होता है, अन्य भौम आदि मारकेश के साहचर्य से फल
देते हैं। यह कन्यालग्न का फल है।।२५।।
अथ तुलालग्नम्-
जीवार्कमहीजाः पापाः शनैश्चरबुधौ शुभौ।
भवेतां राजयोगस्य कारकौ चन्द्रतत्सुतौ ॥२६॥
तुलालग्न वाले को गुरु, सूर्य, भौम पापफल देनेवाले, शनि-बुध
शुभफलदाता, चंद्रमा-बुध राजयोगकारक होते हैं।।२६।।
कुजो निहन्ति जीवाद्याः परे मारकलक्षणाः।
निहन्तारः फलान्येवं काव्यो न तु तुलाभवः ॥२७॥
भौम मारकेश होता है, गुरु आदि अन्य ग्रह, जो मारकेश के
लक्षण के हैं, वे अनिष्टकारक और शुक्र समफलदाता होता है;
ऐसा तुलालग्न का फल जानना चाहिए।।२७।।
अथ वृश्चिकलग्नम्-
सौम्यभौमसिताः पापाः शुभौ गुरुनिशाकरौ।
सूर्यचन्द्रमसावेव भवेतां योगकारको ॥२८॥
वृश्चिक लग्नवाले को बुध, भौम, शुक्र पाप फल देने वाले, गुरु-चंद्रमा
शुभ फल देने वाले और सूर्य-चंद्रमा योगकारक होते हैं।।२८।।
जीवो निहन्ता सौम्याद्या हन्तारो मारकाह्वयाः।
तत्तत्फलानि विज्ञान्येवं वृश्चिकजन्मनः ॥२९॥
कारकमारकविचाराध्यायः १४७
गुरु मारकेश होता है, बुध आदि मारक के समान ही फलदाता होते हैं।
ऐसा वृश्चिक लग्न वाले का फल होता है।।२९।।
अथ धनुर्लग्नम्-
एक एव कविः पापः शुभौ सौम्यदिवाकरौ।
योगो भास्करसौम्याभ्यां निहन्ता भास्करःसुतः।।३०।।
धनुलग्नवाले को शुक्र पाप फल देने वाला, बुध-सूर्य शुभफल देने
वाले, सूर्य-बुध का योग राजयोगकारक होता है।।३०।।
घ्नन्ति शुक्रादयः पापा मारकत्वेन लक्षिताः।
ज्ञातव्यानि फलान्येवं चापजस्य मनीषिभिः।।३१।।
शनि मारकेश होता है, शुक्र आदि मारकेश के समान ही पापफल देने
वाले होते हैं; ऐसा धन लग्न का फल होतां है।।३१।।
अथ मकरलग्नम्-
कुजजीवेन्दवः पापाः शुभौ भार्गवचन्द्रजौ।
स्वयं चैव निहन्ता स्यान्मन्दो भौमादयः परे।।३२।।
मकर लग्न वाले को भौम, गुरु, चंद्रमा पाप फल देने वाले
शुक्र और चंद्रमा शुभफल देने वाले, शनि मारकेश होता है। भौम
आदि मारकेश के लक्षण के समान होने से मारक होते हैं।।३२।'
तल्लक्षणानि हन्तारः कविरेकः सुयोगकृत्।
ज्ञातव्यानि फलान्येवं विबुधैर्मृगजन्मनः।।३३।।
शुक्र योगकारक होता है। इस प्रकार का फल मकर लग्न का होता
है।।३३।।
अथ कुम्भलग्नम्-
जीवचन्द्रकुजाः पापा एको दैत्यगुरुः शुभः।
राजयोगकरः शुक्रो भौमश्चैव बृहस्पतिः।।३४।।
कुंभ लग्न वाले को गुरु, चंद्रमा, भौम पापफल देने वाले और
शुक्र केवल राजयोग कारक होता है।।३४।।
निहन्ता सन्ति भौमाद्या मारकत्वेन लक्षिताः।
एवमेव फलान्यूह्यान्येतानि घटजन्मनः।।३५।।
भौम-गुरु मारकेश होते हैं, अन्य ग्रह भी मारकेश से संबंध होने से उनके
फलों को देते हैं।।३५।।
१४८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
अथ मीनलग्नम्—
मन्दशुक्रांशुमद् पापाः सौम्यो भौमविधू शुभौ।
महीसुतगुरुश्चैव भवेतां योगकारको ॥३६॥
मीनलग्न वाले को शनि, शुक्र, सूर्य पाप फल देनेवाले, बुध, भौम,
चंद्रमा शुभफलदायक और भौम-गुरु राजयोगकारक होते हैं ॥३६॥
भौमः मारकत्वेऽपि न हन्तामन्दज्ञौ पापिनः ।
इत्यूहानि फलान्येवं बुधैस्तु झषजन्मनः ॥३७॥
भौम मारकेश होते हुए भी मारता नहीं है, किन्तु शनि-बुध मारक होते
हैं। इस प्रकार मीनलग्न का फल जानना चाहिए ॥३७॥
एतच्छास्त्रानुसारेण मारकान्निर्दिशेद् बुधः।
चन्द्रसूर्य विना सर्वे मारकाः परिकीर्त्तिताः ॥३८॥
इस शास्त्र के अनुसार मारकेश का निर्देश करना चाहिए। रवि-चंद्र को
छोड़कर शेष सभी मारकेश होते हैं ॥३८॥
स्वदशायां स्वमुक्तौ च नराणां निधनं न हि।
क्वचिद्दशायामिच्छन्ति स्वभुक्तौ न कदाचन ॥३९॥
मारकेश की दशा और अन्तर्दशा में मृत्यु नहीं होती है। किसी-
किसी के मत से मारकेश की दशा में मृत्यु होती है और कभी अंतर्दशा
में नहीं होती है। ॥३९॥
इति पाराशरहोरायां पूर्वखण्डे सुबोधिन्यां कारकमारकादिविचारो
नामैकादशोऽध्यायः।
अथ द्वादशभावेषु विचार्यत्वमाह
तनोरूपं च ज्ञानं च वर्णं चैव बलाबलम्।
शीलं वै प्रकृतिं चैव तनुस्थानाद्विचारयेत् ॥१॥
प्रथम भाव से शरीर, रूप (रंग), ज्ञान, वर्ण (ब्राह्मणादि), बल,
निर्बल, शील(स्वभाव) और प्रकृति का विचार करना चाहिए ॥१॥
धनं धान्यं कुटुम्बं च मृत्युजालममित्रकम्।
धातुरत्नादिकं सर्वं धनस्थानाद्विचारयेत् ॥२॥
द्वादशभावविचाराध्यायः १४९
दूसरे भाव में धन, धान्य, कुटुंब, मृत्यु, शत्रु का और धातु, रत्न आदि
का विचार करना चाहिए॥२॥
विक्रमं भृत्यभ्रात्रादि चोपदेशप्रयाणकम्।
पित्रोर्वे मरणं विप्र दुश्चिक्याच्च निरीक्षयेत् ॥३॥
तीसरे भाव में नौकर, भाई, उपदेश, यात्रा और पिता के मरण का
विचार करना चाहिए॥३॥
वाहनस्याथ बन्धूनां मातृसौख्यादिकानपि।
निधिक्षेत्रं गृहं चापि पातालाच्च निरीक्षयेत् ॥४॥
चौथे भाव से वाहन (सवारी) का, बंधुओं का, मातृसुख का, निधि
(गड़े धन) का, क्षेत्र (खेत) तथा गृह का विचार करना चाहिए॥४॥
यन्त्रमन्त्रौ तथा विद्या बुद्धेश्चैव प्रबन्धकम्।
पुत्रराज्यापभ्रंशादि पश्येत्पुत्रालयाद् बुधः॥५॥
पाँचवें भाव से यंत्र, मंत्र, विद्या, बुद्धि, प्रबंध, पुत्र और राज्य के स्खलन
का विचार करना चाहिए॥५॥
मातुलान्तकशङ्कानां शत्रूंश्चैव व्रणादिकान्।
सपत्नीमातरञ्चापि शत्रुस्थानान्निरीक्षयेत्॥६॥
छठे भाव से मामा के मरण की शंका का, शत्रु और व्रण का तथा
सौतेली माँ का विचार करना चाहिए॥६॥
जायामध्वप्रयाणं च व्यापारं हतवीक्षणम्।
मरणं च स्वदेहस्य जायाभावान्निरीक्षयेत्॥७॥
सप्तम भाव से स्त्री, मार्ग, यात्रा, व्यापार, नष्ट वस्तु और मृत्यु
का विचार करना चाहिए॥७॥
ऋणदानग्रहणयोर्गुदे चैवाङ्कुरादयः।
गत्यनूकादिकं सर्वं पश्येद्रन्ध्राद्विचक्षणः॥८॥
आठवें भाव से ऋण देना-लेना, गुदा की बीमारी, पूर्वजन्म और
इस जन्म का विवरण— ये सब विचार करना चाहिए॥८॥
भाग्यं धर्मं च श्यालं च भ्रातृपत्न्यादिकांस्तथा।
तीर्थयात्रादिकं सर्वं धर्मस्थानान्निरीक्षयेत्॥९॥
नवम भाव से भाग्य, साला, भाई की स्त्री, तीर्थयात्रा आदि का विचार
करना चाहिए॥९॥
१५० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
राज्यं चाकाशवृत्तिं च मानं चैव पितुस्तथा।
प्रवासस्य ऋणस्यापि व्योमस्थानान्निरीक्षयेत् ।।१०।।
दशम स्थान से राज्य, आकाशवृत्ति, प्रतिष्ठा, पिता, परदेश आदि का
विचार करना चाहिए।।१०।।
नानावस्तुभवस्यापि पुत्रजायादिकस्य च।
लाभवृद्धिपशूनां च भवस्थानाद्विचारयेत् ।।११।।
एकादश भाव से अनेक वस्तुओं की प्राप्ति, पुत्र, स्त्री, पशुओं की
वृद्धि तथा लाभ आदि का विचार करना चाहिए।।११।।
व्ययं च वैरिवृत्तान्तं फलमन्त्यादिकं तथा।
व्ययभावाच्च तत्सर्वं ज्ञातव्यं हि विपश्चिता ।।१२।।
बारहवें भाव से व्यय, शत्रु का वृत्तांत आदि का विचार करना
चाहिए।।१२।।
यो यो भावपतिर्नष्टस्त्रिकेशाद्यैश्च संयुतः ।।१३।।
भावं न वीक्षते सम्यग्ग्रहो वापि मृतो यदा।
स्थविरो वा भवेत्खेटः सुप्तो वापि प्रपीडितः।
तदा तद्भावजं सौख्यं नष्टं ब्रूयाद्विशङ्कितः ।।१४।।
जिन-जिन भावों के स्वामी अस्त हों, त्रिकेश (६।८।१२ के स्वामी) से
युत हों, भाव को न देखते हों, मृत अवस्था में हों, वृद्ध अथवा सुप्त
हों वा पीडित हों तो उन भावों के फल नष्ट हो जाते हैं।।१३-१४।।
यदा सौम्यग्रहैर्दृष्टो भावो भावेशसौम्ययुक्।
युवा प्रबुद्धराजस्थः कुमारो वापि तद् भवेत् ।।१५।।
जो भाव शुभग्रह से दृष्ट हों, भाव अपने स्वामी शुभग्रह से युत हो,
भावेश युवा, प्रबुद्ध, राजकुमार अवस्था में हो।।१५।।
ईशेक्षणवशात्तत्र भावसौख्यं वदेद्बुधः।
एवं हि सर्वभावेषु ज्ञेयो साधारणो नयः ।।१६।।
भाव को भावेश देखता हो तो उस भाव के सुख की वृद्धि होती है।
यह नियम सभी भावों में साधारणतः समझना चाहिए।।१६।।
द्वादशभावविचाराध्यायः १५१
शुक्रः शुक्रश्च नेत्रं च चन्द्रमा मनसस्तथा।
आत्मा वै दिनकृत्तत्र जीवो जीवितसौख्यदः॥१७॥
शुक्र धातु का स्वामी, नेत्र और मन का चन्द्रमा, आत्मा का सूर्य, गुरु
सुख का॥१७॥
क्रोधः पराक्रमो भौमो बुधो बालत्वधीमतः।
शनिर्दुःखप्रदो ज्ञेयो राहुरैश्वर्यदायकः॥१८॥
क्रोध, पराक्रम का भौम, बुध बुद्धि का, शनि दुःख का और राहु ऐश्वर्य
का स्वामी होता है॥१८॥
शिरोनेत्रे तथा कर्णे नासा चापि कपोलकौ।
हनूमुखं तथा वाच्यं लग्नादाद्यदृकाणके॥१९॥
एक लग्न में तीन द्रेष्काण होते हैं। यदि जन्म समय लग्न में प्रथम
द्रेष्काण हो तो लग्न को मुख, २, १२ भाव को नेत्रं, ३, ११ भाव को
कान, ४, १२ को नाक, ५, ९ भाव को कपोल, ६, ८ भाव को दाढ़ी,
७ भाव को मुख कल्पना करना चाहिए॥१९॥
लग्नान्मध्यदृकाणे च कण्ठांशौ बाहुकौ तथा।
पार्श्वे च हृदयक्रोडे नाभिं चैव यथाक्रमम्॥२०॥
दूसरा द्रेष्काण हो तो लग्न को कण्ठ, २, १२ भाव को कंधा, ३,११
भाव को बाहु, ४,१० भाव को पार्श्व, ५,९ भाव को हृदय, ६, ८
भाव को पेट, ७ भाव को नाभि कल्पना करना चाहिए॥२०॥
वस्तिर्लिङ्गगुदे वृषणावूरू जानुजङ्घके।
पदेति चैवमुदितैर्वाममङ्गं तृतीयके॥१२१॥
तीसरा द्रेष्काण हो तो लग्न को वस्ति (नाभि-लिंग के मध्य का स्थान),
२।१२ भाव को लिंग और गुदा, ३।१० भाव को जंघा, ५।९ भाव को
घुटना, ६।८ भाव को ठेहुने के नीचे, ७ भाव को पैर समझना चाहिए।
सप्तम से १२ भाव तक वामभाग और लग्न से छठे भाव तक दाहिने भाग
की कल्पना करना चाहिए।२१।
यस्मिन्नङ्गे स्थितः क्रूरस्तत्र चिह्नं समादिशेत्।
ससौम्यैर्नियतं विप्र सौम्यैर्लक्ष्म समादिशेत्॥२२॥