बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
पृष्ठ 131, कुल 800 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथाऽऽरूढमाह १३३
पदात्सप्तमभावफलम्-
पदाच्च सप्तमे राहुरथवा संस्थितः शिखी ।
उदरव्यथायुतो बालः शिखिना पीडितोऽधिकम् ॥२२॥
पद से सातवें भाव में राहु अथवा केतु हो तो बालक पेट की बीमारी
से व्यथित रहता है। केतु से अधिक पीड़ायुक्त होता है।।२२।।
पदाच्च सप्तमे केतुः पापखेटयुतेक्षिते।
साहसी श्वेतकेशी च दीर्घलिङ्गी भवेन्नरः॥२३।।
पद से सातवें केतु हो और पापग्रह से युत वा दृष्ट हो तो बालक साहसी,
सफेद बालों वाला और दीर्घलिंगी होता है।।२३।।
पदाच्च सप्तमे स्थाने गुरुशुक्रनिशाकराः।
एको द्वयं त्रयं वा स्याल्लक्ष्मीवान् कारयेद्बुधः।।२४।।
पद से सातवें भाव में गुरु, शुक्र, चन्द्रमा तीनों हों वा इनमें से एक या
दो हों तो बालक धनी होता है।।२४।।
तुङ्गर्क्षे सप्तमे खेटे शुभो वाप्यशुभः पदात्।
श्रीमान् सोऽपि भवेन्नूनं सत्कीर्त्तिसहितो द्विज ।।२५।।
पद से सातवें भाव में अपनी उच्चराशि में शुभग्रह या पापग्रह में
से कोई हो तो बालक कीर्त्तिमान् और लक्ष्मीवान् होता है।।२५।।
ये योगाः सप्तमे भावे आरूढात् कथिता मया।
ते योगा द्यूनवच्चिन्त्या वित्तभावेऽपि वै द्विज ।।२६।।
पद से सातवें भाव में जिन योगों को मैंने कहा है उनको उसी प्रकार
दूसरे भाव में भी विचार करना चाहिए।।२६।।
तुङ्गस्थो रौहिणेयो वा जीवो वा शुक्र एव वा।
एको बली धनगतः श्रियं दिशति देहिनः ।।२७।।
यदि बुध, गुरु, शुक्र इनमें से कोई भी अपनी उच्चराशि में बली होकर
धनभाव में हो तो धन को देता है।।२७।।
ये योगाश्च पदे लग्ने यथावद्गदिता मया।
कारकांशस्थकुण्डल्यां निर्बाधका विचिन्तयेत् ।।२८।।
जो योग लग्न पद में कहे गये हैं उनको कारकांश कुंडली
में भी देखना चाहिए।।२८।।