बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशभावविचाराध्यायः १५१
शुक्रः शुक्रश्च नेत्रं च चन्द्रमा मनसस्तथा।
आत्मा वै दिनकृत्तत्र जीवो जीवितसौख्यदः॥१७॥
शुक्र धातु का स्वामी, नेत्र और मन का चन्द्रमा, आत्मा का सूर्य, गुरु
सुख का॥१७॥
क्रोधः पराक्रमो भौमो बुधो बालत्वधीमतः।
शनिर्दुःखप्रदो ज्ञेयो राहुरैश्वर्यदायकः॥१८॥
क्रोध, पराक्रम का भौम, बुध बुद्धि का, शनि दुःख का और राहु ऐश्वर्य
का स्वामी होता है॥१८॥
शिरोनेत्रे तथा कर्णे नासा चापि कपोलकौ।
हनूमुखं तथा वाच्यं लग्नादाद्यदृकाणके॥१९॥
एक लग्न में तीन द्रेष्काण होते हैं। यदि जन्म समय लग्न में प्रथम
द्रेष्काण हो तो लग्न को मुख, २, १२ भाव को नेत्रं, ३, ११ भाव को
कान, ४, १२ को नाक, ५, ९ भाव को कपोल, ६, ८ भाव को दाढ़ी,
७ भाव को मुख कल्पना करना चाहिए॥१९॥
लग्नान्मध्यदृकाणे च कण्ठांशौ बाहुकौ तथा।
पार्श्वे च हृदयक्रोडे नाभिं चैव यथाक्रमम्॥२०॥
दूसरा द्रेष्काण हो तो लग्न को कण्ठ, २, १२ भाव को कंधा, ३,११
भाव को बाहु, ४,१० भाव को पार्श्व, ५,९ भाव को हृदय, ६, ८
भाव को पेट, ७ भाव को नाभि कल्पना करना चाहिए॥२०॥
वस्तिर्लिङ्गगुदे वृषणावूरू जानुजङ्घके।
पदेति चैवमुदितैर्वाममङ्गं तृतीयके॥१२१॥
तीसरा द्रेष्काण हो तो लग्न को वस्ति (नाभि-लिंग के मध्य का स्थान),
२।१२ भाव को लिंग और गुदा, ३।१० भाव को जंघा, ५।९ भाव को
घुटना, ६।८ भाव को ठेहुने के नीचे, ७ भाव को पैर समझना चाहिए।
सप्तम से १२ भाव तक वामभाग और लग्न से छठे भाव तक दाहिने भाग
की कल्पना करना चाहिए।२१।
यस्मिन्नङ्गे स्थितः क्रूरस्तत्र चिह्नं समादिशेत्।
ससौम्यैर्नियतं विप्र सौम्यैर्लक्ष्म समादिशेत्॥२२॥