बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
८२ नारदीयपुराणम्
काव्यं हस्तस्थदर्भग्रं तच्छिद्रे संन्यवेशयत् । दर्भाग्रेडभून्महाशस्त्रं कोटिसूर्यसमप्रभम् ॥१७५॥
अमोघं ब्राह्ममत्युग्रं काव्याक्षिग्रासलोलुपम् । आदाय भार्गवमुरानसुरानेकचक्षुषा ॥१७६॥
पश्येति व्यादिदेश च दर्भाग्रं शस्त्रसन्निभम् । बलिर्ददौ महाविष्णोर्महीं त्रिपदसंमिताम् ॥१७७॥
ववृधे सोऽपि विश्वात्मा आब्रह्मभुवनं तदा । अमिमीत महीं द्वाभ्यां पद्भ्यां विश्वतनुर्हरिः ॥१७८॥
स आब्रह्मकटाहांतपदान्येतानि सप्रभः । पादाङ्गुष्ठाग्रनिर्भिन्नं ब्रह्माण्डं बिभिदे द्विधा ॥१७९॥
तद्वारा बाह्यसलिलं बहुधारं समागतम् । धौतविष्णुपदं तोयं निर्मलं लोकपावनम् ॥१८०॥
अजाण्डबाह्यनिलयं धाराशरूपमवर्त्तत । तज्जलं पावनं श्रेष्ठं ब्रह्मादीन्पावयत्सुरान् ॥१८१॥
सप्तर्षिसेवितं चैव न्यपतन्मेरूमूर्द्धनि ।
एतद्दृष्ट्वाद्वभुतं कर्म ब्रह्माद्या देवतागणाः । ऋषयो मनवश्चैव ह्यस्तुवन्हर्षविह्वलः ॥१८३॥
देवा ऊचुः
नमः परेशाय परात्मरूपिणे परात्परायावररूपधारिणे ।
ब्रह्मरात्मने ब्रह्मरतात्मबुद्धये नमोऽस्तु तेऽव्याहतकमेकशीलिने ॥१८४॥
परेश परमानन्द परमात्मन्परात्पर । सर्वात्मने जगन्मूर्त्ते प्रमाणातीत ते नमः ॥१८५॥
विश्वतश्चक्षुषे तुभ्यं विश्वतो बाहवे नमः । विश्वतः शिरसे चैव विश्वतो गतये नमः ॥१८६॥
एवं स्तुतो महाविष्णुर्ब्रह्माद्यैः स्वर्द्दिवौकसाम् । दत्त्वाभयं च मुमुदे देवदेवः सनातनः ॥१८७॥
पृथिवी दान देने के लिए हाथ में पकड़ा। सर्वज्ञ विष्णु ने जलधारा को रोकने के लिए कमण्डल के छिद्र पर बैठे
शुक्र को जान लिया और अपने हाथ के कुश के अग्रभाग को उस कमण्डलु की नलिका में चुभो दिया उस कुश
की नोक कोटि सूर्य के समान प्रभावान्, अति कठोर, अमोघ तथा शुक्राचार्य के नेत्र को कवलित करने के लिए
लोलुप ब्रह्म अस्त्र के समान कोई महान् शस्त्र हो गई । तब शस्त्र के समान उस कुश के अग्रभाग को वामन ने यह
कहते हुए कि हे शुक्राचार्य ! देवों और असुरों को एक आँख से देखो, शुक्राचार्य के नेत्र में घुसेड़ दिया। तब बलि
ने महाविष्णु को तीन पद परिमित पृथ्वी दे दी ॥१६६-१७७॥ तत्पश्चात् विश्वात्मा हरि ने ब्राह्म लोक तक
अपना आकार बढ़ा दिया और उस विश्वरूप हरि ने दो ही डगों से पृथ्वी को नाप डाला। उस परम तेजस्वी ने
अपने डगों से सारे ब्रह्माण्ड को नाप दिया। उसी समय उसके पैर के अंगूठे के नख से ब्रह्माण्ड दो भागों में बँट
गया। उस ब्रह्माण्ड के मध्य से जल की अनेक धारायें बह निकलीं। विष्णु के चरण को धोने वाली जलधारा
ब्रह्माण्ड के बाह्य आश्रयभूत धारा रूप में बहने लगी और वह पुनीत धारा ब्रह्मा आदि सुरों को पवित्र करती
हुई सप्तर्षि से सुशोभित सुमेरु पर्वत के शिखर पर गिरी ॥१७८-१८२॥ इस आश्चर्य-जनक कार्य को देखकर
देवगण, ऋषि, मुनि और मनुगण आनन्द से विह्वल होकर भगवान् की स्तुति करने लगे ॥१८३॥
देवगण बोले-महाप्रभु, परात्मस्वरूप, परात्पर और अपर रूपधारी को नमस्कार है। ब्रह्मस्वरूप,
ज्ञानरत, आत्मबुद्ध और अबाध कर्म करने वाले को नमस्कार है। परेश ! परमानन्द ! परमात्मन् ! परात्पर !
प्रमाण से परे ! जगन्मूर्त्ति ! सर्वात्मा ! प्रमाणातीत ! आपको नमस्कार है। विश्वतश्चक्षु (चारों ओर दृष्टि रखने वाले)
विश्वतो बाहु (अनन्त भुजवाले) तुमको नमस्कार है। विश्वतः शिरस् (अनन्त शिर वाले) सर्वत्र गति वाले तुमको नमस्कार
है। ब्रह्मा आदि देवों की ऐसी स्तुति सुनकर देवाधिदेव सनातन देव प्रसन्न हो गए और देवताओं को अभय वर दिया।
अब तृतीय डग के लिए उपयुक्त भूमि न पाकर उन्होंने बलि को नांध दिया। इस प्रकार बलि को सर्वथा शरणागत
एकादशोऽध्यायः ८३
विरोचनात्मजं दैत्यं पदैकार्थं बबन्ध ह । ततः प्रपन्नं तु बलिं ज्ञात्वा चास्मै रसातलम् ।
ददौ तद्द्वारपालश्च भक्तवश्यो बभूव ह ॥१८८॥
नारद उवाच
रसातले महाविष्णुर्विरोचनसुतस्य वै । किं भोज्यं कल्पयामास घोरे सर्पभयाकुले ॥१८६॥
सनक उवाच
अमन्त्रितं हविर्यत्तु हूयते जातवेदसि । अपात्रे दीयते यच्च तद्घोरं भोगसाधनम् ॥१९०॥
हुतं हविरशुचिना दत्तं सत्कर्म यत्कृतम् । तत्सर्वं तत्र भोगार्हमधःपातफलप्रदम् ॥१९१॥
एवं रसातलं विष्णुर्बलये सासुराय तु । दत्त्वाभयं च सर्वेषां सुराणां त्रिदिवं ददौ ॥१९२॥
पूज्यमानोऽमरगणैः स्तूयमानो महर्षिभिः । गन्धर्वैर्गीयमानश्च पुनर्वामनतां गतः ॥१९३॥
एतद्दृष्ट्वा महत्कर्म मुनयो ब्रह्मवादिनः । परस्परं स्मितमुखाः प्रणेमुः पुरुषोत्तमम् ॥१९४॥
सर्वभूतात्मको विष्णुर्वामनत्वमुपागतः । मोहयन्निखिलं लोकं प्रपेदे तपसे वनम् ॥१९५॥
एवं प्रभावा सा देवी गङ्गा विष्णुपदोद्भवा । यस्याः स्मरणमात्रेण मुच्यते सर्वपातकैः ॥१९६॥
इदं तु गङ्गामाहात्म्यं यः पठेच्छृणुयादपि । देवालये नदीतीरे सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥१९७॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे गङ्गोत्पत्तिर्गङ्गामाहात्म्यं नामैकादशोऽध्यायः ॥११॥
समझकर उसको रसातल भेज दिया और उसका द्वारपाल बनकर उस भक्त की सेवा भी स्वीकार
की ॥१८४-१८८॥
नारद बोले—महाविष्णु ने सर्पों से भरे अतएव भयङ्कर उस रसातल में विरोचन पुत्र बलि के लिए
भोजन की क्या व्यवस्था की ? ॥१८६॥
सनक बोले—बिना मन्त्र के जिस हवि को अग्नि में छोड़ा जाता है, अथवा अपात्र को जो दान दिया
जाता है वही बलि के लिये भयंकर भोग का साधन बनता है। अपवित्र भाव से हवन में दी हुई हवि और किये
हुए सत्कर्म,जो अधःपतन रूप फल के देने वाले हैं, बलि के लिए भोगोपयोगी होते हैं । इस प्रकार बलि को
रसातल पहुँचाकर विष्णु ने सब देवों को निर्भय करके स्वर्गलोक का अधिकारी बना दिया । पुनः देवगणों ने
उनकी पूजा की, महर्षियों ने स्तुति की और गन्धर्वों ने उनका यशोगान किया । इस प्रकार भक्तों से आदर प्राप्त
कर पुनः उन्होंने अपना वामनरूप बना लिया ॥१९०-१९३॥ विष्णु के इस महान् अद्भुत कार्य को देखकर
ब्रह्मज्ञानी मुनिगण परस्पर एक दूसरे को देखकर मुस्कराने लगे और उन पुरुषोत्तम को प्रणाम किया । इस प्रकार
सब प्राणियों के रूप में और अन्तःकरण में विराजमान रहने वाले विष्णु अपना वामन रूप धारण कर सब लोकों
को मन्त्र-मुग्ध करते हुए तपस्या के लिए वन को चले गये । विष्णु के चरणों से निकलने वाली गंगा का ऐसा
प्रभाव है, जिसके स्मरणमात्र से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है । जो कोई इस गंगा-माहात्म्य को नदी तीर
पर अथवा देवालय में सुनता है वह भी अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है ॥१९४-१९७॥
श्रीनारदीयपुराण में गंगा-माहात्म्य-वर्णन नामक ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त ॥११॥
अथ द्वादशोऽध्यायः
नारद उवाच
श्रुतं तु गङ्गामाहात्म्यं वाञ्छितं पापनाशनम् । अधुना लक्षणं ब्रूहि भ्रातर्मे दानपात्रयोः ॥१॥
सनक उवाच
सर्वेषामेव वर्णानां ब्राह्मणः परमो गुरुः। तस्मै दानानि देयानि दत्तस्यानन्त्यमिच्छता ॥२॥
ब्राह्मणः प्रतिगृह्णीयात्सर्वतो भयवर्जितः । न कदापि क्षत्रविशौ गृह्णीयातां प्रतिग्रहम् ॥३॥
चण्डस्य पुत्रहीनस्य दम्भाचाररतस्य च । स्वकर्मत्यागिनश्चापि दत्तं भवति निष्फलम् ॥४॥
परदाररतस्यापि परद्रव्याभिलाषिणः । नक्षत्रसूचकस्यापि दत्तं भवति निष्फलम् ॥५॥
असूयाविष्टमनसः कृतघ्नस्य च मायिनः । अयाज्ययाजकस्यापि दत्तं भवति निष्फलम् ॥६॥
नित्यं याच्ञापरस्यापि हिंसकस्य खलस्य च । रसविक्रयिणश्चैव दत्तं भवति निष्फलम् ॥७॥
वेदविक्रयिणश्चापि स्मृतिविक्रयिणस्तथा । धर्मविक्रयिणो विप्र दत्तं भवति निष्फलम् ॥८॥
गानेन जीविका यस्य यस्य भार्या च पुंश्चली । परोपतापिनश्चापि दत्तं भवति निष्फलम् ॥६॥
असिजीवी मषीजीवी देवलो ग्रामयाजकः । धावको वा भवेत्तेषां दत्तं भवति निष्फलम् ॥१०॥
अध्याय १२
धर्माख्यान-प्रसंग
नारद बोले- भाई ! पापों को नष्ट करने वाले अभीष्ट गंगा-माहात्म्य को तो सुन लिया, अब दान
और दानयोग्य पात्रों का लक्षण कहिये ॥१॥
सनक बोले- ब्राह्मण सब वर्णों का परमश्रेष्ठ गुरु माना गया है। इसलिए अपने दान को अनन्त बनाने
की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को ब्राह्मण को अवश्य दान देना चाहिए। ब्राह्मण बिना किसी प्रकार के भय के सबसे
दान ले सकता है। क्षत्रिय और वैश्य कभी भी दान न लें । अत्यन्त क्रोधी, पुत्रहीन, पाखण्ड में लीन रहने वाले
और अपने कर्त्तव्य से विमुख व्यक्ति को दिया हुआ दान व्यर्थ होता है। परस्त्रीगामी, परद्रव्य-लोभी और
ज्योतिषी को दिया हुआ दान व्यर्थ हो जाता है। ईर्ष्यालु, कृतघ्न, मायावी और अनधिकारी को यज्ञ कराने
वाले को दान देना व्यर्थ हो जाता है । सर्वदा भिक्षा मांगने वाले, हिंसक, दुष्ट और रस बेचने वाले को दिया
हुआ दान व्यर्थ जाता है ॥२-७॥ वेद-विक्रयी, स्मृति और धर्म के विक्रेता (पैसे लेकर वेद-स्मृति और धर्म का
उपदेश करने वाले) ब्राह्मण को दान देना निष्फल होता है। गाकर जीविका चलाने वाला, जिसकी भार्या
आचारहीन हो और जो दूसरो को पीड़ा पहुँचावे ऐसे विप्र को दान देना व्यर्थ होता है। तलवार के सहारे जीने
वाले (सैनिक), लिपिक (क्लर्क), पुजारी, ग्राम पुरोहित और हरकारे को दिया हुआ दान निष्फल होता है ॥८-
८५
द्वादशोऽध्यायः
पाककर्तुः परस्यार्थे कवये गदहारिणे । अभक्ष्यभक्षकस्यापि दत्तं भवति निष्फलम् ॥११॥
शूद्रान्नभोजिनश्चैव शूद्राणां शवदाहिनः । पौंश्चलान्नभुजश्चापि दत्तं भवति निष्फलम् ॥१२॥
नामविक्रयिणो विष्णोः संध्याकर्मोज्झितस्य च । दुष्प्रतिग्रहदग्धस्य दत्तं भवति निष्फलम् ॥१३॥
दिवाशयनशीलस्य तथा मैथुनकारिणः । संध्याभोजिन एवापि दत्तं भवति निष्फलम् ॥१४॥
महापातकयुक्तस्य त्यक्तस्य ज्ञातिबान्धवैः । कुण्डस्य चापि गोलस्य दत्तं भवति निष्फलम् ॥१५॥
परिवित्तिः शठस्यापि परिवेत्तुः प्रमादिनः । स्त्रीजितस्यातिदुष्टस्य दत्तं भवति निष्फलम् ॥१६॥
मद्यमांसाशिनश्चापि स्त्रीविटस्यातिलोभिनः । चौरस्य पिशुनस्यापि दत्तं ० ॥१७॥
ये केचित्पापनिरता निन्दिताः सुजनैः सदा । न तेभ्यः प्रतिगृह्णीयान्न च दद्याद्द्विजोत्तम ।
सत्कर्मनिरतायापि देयं यत्नेन नारद ॥१८॥
यद्दानं श्रद्धया दत्तं तथा विष्णुसमर्पणम् । याचि वापि पात्रे ण भवेत्तद्दानमुत्तमम् ॥१९॥
परलोकं समुद्दिश्य ह्यैहिकं वापि नारद । यद्दानं दीयते पात्रे तद्दानं मध्यमं स्मृतम् ॥२०॥
दम्भेन चापि हिंसार्थं परस्याविधिनापि च । क्रूद्धेनाश्रद्धयापात्रे तद्दानं मध्यमं स्मृतम् ॥२१॥
अधमं बलितोषाय मध्यमं स्वार्थसिद्धये । उत्तमं हरिप्रीत्यर्थं प्राहुर्वेदविदां वराः ॥२२॥
१०॥ दूसरे का भोजन बनाने वाले (रसोइया) कवि (भांट), वैद्य और अभक्ष्य-भक्षक को दान देना व्यर्थ होता
है । शूद्रों का अन्न खाने वाले, शूद्रों के शव का दाह करने वाले और वेश्या का अन्न खाने वाले विप्र को दान देना
निष्फल है । विष्णु के नाम को बेचने वाले (पैसे लेकर हरिकीर्तन करने वाले), सन्ध्या न करने वाले, अनुचित
दान रूपी अग्नि में अपने आचार और जीवन को जला देने वाले विप्र को दान देना व्यर्थ हो जाता है । दिन में
सोने वाले और स्त्री भोग करने वाले, संध्या समय भोजन करनेवाले ब्राह्मण को दिया हुआ दान निरर्थक है ।
महापापी, बन्धु-बान्धवों से बहिष्कृत, कुण्ड¹ और गोलक² को दान देना निष्फल होता है ॥११-१५॥
परिवेत्ता, शठ, परिवित्त³, प्रमादी स्त्री के वश में रहने वाले और अतिदुष्ट विप्र को दान देना निष्फल होता
है । मद्य मांस खाने वाले, अति लोभी, स्त्रीविट (स्त्रियों के दलाल) चोर और अति लोभी को दान देना निष्फल होता
है । द्विजोत्तम ! जो कोई पाप करने पर ही तुले रहते अथवा सर्वदा सज्जन जिसकी निन्दा करते हैं उनसे भी
न तो दान लेना चाहिए और न देना ही चाहिए । नारद ! सत्कर्म करने वाले विप्र को प्रयत्नपूर्वक ढूंढ कर दान
देना चाहिए, श्रद्धापूर्वक जो दान दिया जाता है अथवा जो विष्णु को समर्पित किया जाता है, अथवा स्वयं
सत्पात्र की याचना पर जो दिया जाता है वह उत्तम दान कहा जाता है ॥१६-१६॥ नारद ! परलोक अथवा
संसार सुख की कामना से जो दान सत्पात्र को दिया जाता है, वह काम्य दान है और वह मध्यम श्रेणी का है ।
दम्भ-पूर्वक, दूसरे की हिंसा के लिए (दूसरे को चिढ़ाने की दृष्टि से अथवा कष्ट देने की दृष्टि से), अविधि पूर्वक,
क्रोधपूर्वक, अश्रद्धा से अपात्र में दिया हुआ दान मध्यम कोटि का माना गया है। बलि के लिए दिया हुआ दान
अधम कोटि का और स्वार्थ सिद्धि के निमित्त दिया हुआ दान मध्यम कोटि का होता है। वेदज्ञों में श्रेष्ठ पण्डितों
ने विष्णु प्रीति के लिए दिये हुए दान को उत्तम माना है । दान, भोग और विनाश
१. पति के रहते अन्यपति से उत्पन्न पुत्र ।
२. पति के मर जाने पर उत्पन्न किया हुआ पुत्र
३. वह बड़ा भाई जिससे पहले उसके छोटे भाई ने ब्याह कर लिया हो ।
८६ नारदीयपुराणम्
दानभोगविनाशाश्च त्रयः स्युर्गतयस्त्रिधा ॥२३॥
यो ददाति च नो भुंक्ते तद्धनं नाशकारणम् । धनं धर्मफलं विप्र धर्मो माधवतुष्टिकृत् ॥२४॥
तरवः किं न जीवन्ति तेऽपि लोके परार्थकाः । यत्र मूलफलैर्वृक्षाः परकार्यं प्रकुर्वते ॥२५॥
मनुष्या यदि विप्राग्र्य न परार्थास्तदा मृताः । परकार्यं न ये मर्त्याः कायेनापि धनेन वा ॥२६॥
मनसा वचसा वापि ते ज्ञेयाः पापकृत्तमाः । अत्रेतिहास वक्ष्यामि शृणु नारद तत्त्वतः ॥२७॥
यत्र दानादिकानां तु लक्षणं परिकीर्तितम् । गङ्गामाहात्म्यसहितं सर्वपापप्रणाशनम् ॥२८॥
भगीरथस्य धर्मस्य संवादं पुण्यकारकम् । आसीद् भगीरथो राजा सागरान्वयसंभवः ॥२९॥
शशास पृथिवीमेतां सप्तद्वीपां ससागराम् । सर्वधर्मरतो नित्यं सत्यसंधः प्रतापवान् ॥३०॥
कन्दर्पसदृशो रूपे यायजूको विचक्षणः । प्रालेयाद्रिसमो धैर्ये धर्मे धर्मसमो नृपः ॥३१॥
सर्वलक्षणसंपन्नः सर्वशास्त्रार्थपारगः । सर्वसंपत्समायुक्तः सर्वानन्दकरो मुने ॥३२॥
आतिथ्यप्रयतो नित्यं वासुदेवार्चने रतः । पराक्रमी गुणनिधिर्मैत्रः कारुणिकः सुधीः ॥३३॥
एतादृशं तं राजानं ज्ञात्वा हृष्टो भगीरथम् । धर्मराजो द्विजश्रेष्ठ कदाचिद्द्रष्टुमागतः ॥३४॥
समागतं धर्मराजमर्हयामास भूपतिः । शास्त्रदृष्टेन विधिना धर्मः प्रीत उवाच तम् ॥३५॥
धर्मराज उवाच
राजन्र्धमविदां श्रेष्ठ प्रसिद्धोऽसि जगत्त्रये । धर्मराजोऽथ कीर्ति ते श्रुत्वा त्वां द्रष्टुमागतः ॥३६॥
सन्मार्गानिरतं सत्यं सर्वभूतहिते रतम् । द्रष्टुमिच्छन्ति विबुधास्तवोत्कृष्टगुणप्रियाः ॥३७॥
यही तीन धन की उपयोग-विधियाँ हैं। जो धन दान या भोग में नहीं लगाया जाता है वह यों ही नष्ट हो जाता है।
विप्र ! धन के द्वारा धर्म किया जाता है और धर्म से विष्णु प्रसन्न होते हैं। वृक्ष क्या इस संसार में नहीं जीते हैं ?
वे भी तो दूसरों के लिए ही हैं, जो (वृक्ष) अपने मूल और फलों से सर्वदा परोपकार किया करते हैं ॥२०-२५॥
विप्रवर्य ! मनुष्य यदि परोपकार नहीं करते तो वे मृततुल्य हैं जो मनुष्य शरीर धन से अथवा मन और वचन से
परोपकार नहीं करते हैं वे पापी समझे जाते हैं। नारद ! इस विषय में एक इतिहास बतला रहा हूँ, सुनो, जिसमें
दान आदि के लक्षण और सब पापों को नष्ट करने वाले गंगा-माहात्म्य का वर्णन भी प्रसङ्गवश हो जाता है। यह
आख्यान भगीरथ और धर्म के पुण्य जनक संवाद से सम्बन्ध रखता है। सगर-वंश में उत्पन्न भगीरथ नाम के
राजा थे, उन्होंने सप्त सागर पर्यन्त पृथ्वी पर शासन किया। वे नित्य धर्म कार्यों में निरत रहने वाले, प्रतापी
और सत्यप्रतिज्ञ थे ॥२६-३०॥ रूप में कामदेव के समान, धैर्य में हिमालय के समान और धर्म में साक्षात् धर्म
के समान एवं विद्वान् और अनेकों यज्ञों के करने वाले थे। मुने ! वे सब लक्षणों से युक्त, सब शास्त्रों के पारगामी
विद्वान्, सब ऐश्वर्यों से सम्पन्न और सब के आनन्द देने वाले थे। अतिथि सत्कार में विशेष ध्यान देने वाला, पराक्रमी,
गुणवान्, मन्त्रियों से सर्वदा परामर्श करने वाला, कारुणिक और बुद्धिमान् राजा सर्वदा वासुदेव की पूजा में लगा
रहता था। द्विजवर्य ! ऐसे भगीरथ राजा का यश सुनकर धर्मराज किसी समय उनसे मिलने के लिए आये।
भूपाल ने अतिथिरूप से आये हुए धर्मराज का शास्त्रोक्त विधि से सत्कार किया। धर्मराज स्वागत विधि से
प्रसन्न हो बोले ॥३१-३५॥
धर्मराज बोले—राजन् ! धर्मज्ञों में श्रेष्ठ ! तुम जगद् विख्यात हो, इसीलिए तुम्हारी कीर्ति को सुनकर
मै (धर्मराज) (तुमको देखने के लिए) तुमसे मिलने के लिए आया हूँ। तुम्हारे उत्कृष्ट गुणों से प्रसन्न होकर देवता
भी सन्मार्ग और सब प्राणियों के हित में तत्पर रहने वाले सत्य-प्रेमी तुमको देखना चाहते हैं। भूपते ! जहाँ
८७
द्वादशोऽध्यायः
कीर्तिर्नीतिश्च संपत्तिर्वर्तते यत्र भूपते । वसन्ति तत्र नियतं गुणास्सन्तश्च देवताः ॥३८॥
अहो राजन्महाभाग शोभनं चरितं तव । सर्वभूतहितत्वादि मादृशामपि दुर्लभम् ॥३६॥
इत्युक्तवन्तं तं धर्मं प्रणिपत्य भगीरथः । प्रोवाच विनयाविष्टः संहृष्टः श्लक्ष्णया गिरा ॥४०॥
भगीरथ उवाच
भगवन्सर्वधर्मज्ञ समदर्शिन् सुरेश्वर । कृपया परयाविष्टो यत्पृच्छामि वदस्व तत् ॥४१॥
धर्मा कीदृग्विधाः प्रोक्ताः के लोका धर्मशालिनाम् । ॥४२॥
कियत्यो यातनाः प्रोक्ताः केषां ताः परिकीर्तिताः
त्वया संमाननीया ये शासनीयाश्च ये यथा । तत्सर्वं मे महाभाग विस्तराद्वक्तुमर्हसि ॥४३॥
धर्मराज उवाच
साधु साधु महाबुद्धे मतिस्ते विमलोर्जिता । धर्माधर्मांन्प्रवक्ष्यामि तत्त्वतः शृणु भक्तितः ॥४४॥
धर्मा बहुविधाः प्रोक्ताः पुण्यलोकप्रदायकाः । तथैव यातनाः प्रोक्ता असंख्या घोरदर्शनाः ॥४५॥
विस्तराद्गदितुं नालमपि वर्षशतायुतैः । तस्मात्समासतो वक्ष्ये धर्माधर्मनिदर्शनम् ॥४६॥
वृत्तिदानं द्विजानां वै महापुण्यं प्रकीर्तितम् । तथैवाध्यात्मविदुषो दत्तं भवति चाक्षयम् ॥४७॥
कुटुम्बिनं वा शास्त्रज्ञं श्रोत्रियं वा गुणान्वितम् । यो दत्त्वा स्थापयेद्वृत्तिं तस्य पुण्यफलं शृणु ॥४८॥
मातृतः पितृतश्चैव द्विजः कोटिकुलान्वितः । निर्विश्य विष्णुभवनं कल्पं तत्रैव मोदते ॥४६॥
गण्यन्ते पांसवो भूमेर्गण्यन्ते वृष्टिबिन्दवः । न गण्यन्ते विधात्रापि ब्रह्मवृत्तिफलानि वै ॥५०॥
कीर्ति, नीति के साथ सम्पत्ति रहती है वहाँ सभी गुण, सज्जन पुरुष और देवगण सर्वदा निवास करते हैं। अहो !
राजन् ! महाभाग ! आपका चरित्र परमशोभन है। सब प्राणियों की रक्षा आदि गुण मेरे समान देवों में भी
दुर्लभ हैं। धर्म के इस प्रकार कहने पर भगीरथ उनके चरणों पर गिर पड़े और प्रसन्न होकर विनम्र भाव से
मधुर शब्दों में बोले ॥३६-४०॥
भगीरथ बोले—भगवन् ! सब धर्म के जानने वाले समदर्शी ! सुरेश्वर ! मैं जो पूछ रहा हूँ, वह कृपया
बताइए। धर्म कितने प्रकार के हैं, धर्माचरण करने वालों को कौन लोक प्राप्त होते और यातनाएं (नरक) कितनी
होती हैं, किन लोगों को यातनाएं दी जाती हैं, आपका किसके ऊपर सम्मान भाव रहता और किसको आप दण्ड
देते हैं ? हे महाभाग ! आप इन विषयों को विस्तृत व्याख्या कीजिए ॥४१-४३॥
धर्मराज बोले—महाबुद्धिमान् ! धन्य हो, धन्य हो क्योंकि तुमने विमल बुद्धि प्राप्त की है, मैं धर्म और
अधर्म की यथार्थ रूप से व्याख्या कर रहा हूँ, तुम ध्यानपूर्वक सुनो। पुण्य लोकों के देने वाले धर्म बहुत प्रकार के
कहे गये हैं। उसी प्रकार अत्यन्त भयङ्कर दीखने वाली यातनायें (नरक) भी असंख्य कही गयी हैं। इस विषय पर
विस्तार पूर्वक कुछ कहना सैकड़ों, हजारों वर्षों में भी सम्भव नहीं हो सकता। इसलिए संक्षेप में धर्म और अधर्म का
दिग्दर्शन करा रहा हूँ। ब्राह्मणों को जीविका निर्वाह के लिए कुछ देना अत्यन्त पुण्य-प्रद कहा गया है। उसी प्रकार
अध्यात्मज्ञाताओं को भी दिया हुआ दान अक्षय पुण्य को देने वाला होता है। जो किसी कुटुम्बी शास्त्रज्ञ अथवा
गुणी वेदपाठी को कुछ देकर उसकी जीविका का स्थायी प्रबन्ध कर देता है, उसके पुण्य के फल को सुनो—वह
व्यक्ति मातृकुल और पितृकुल के करोड़ों पुरखों सहित विष्णु लोक को जाता है और वहाँ कल्प पर्यन्त सुख भोग
करता है ॥४४-४६॥ पृथ्वी के रेणुकण गिने जा सकते हैं और वर्षा की बूंदें भी गिनी जा सकती हैं परन्तु ब्रह्मा भी
८८ नारदीयपुराणम्
समस्तदेवतारूपो ब्राह्मणः परिकीर्तितः । जीवनं ददतस्तस्य कः पुण्यं गदितुं क्षमः ॥५१॥
यो विप्रहितकृन्नित्यं स सर्वान्कृतवान्मखान् । स स्नातः सर्वतीर्थेषु तप्तं तेनाखिलं तपः ॥५२॥
यो ददस्वेति विप्राणां जीवनं प्रेरयेत्परम् । सोऽपि तत्फलमाप्नोति किमन्यैर्बहुभाषितैः ॥५३॥
तडागं कारयेद्यस्तु स्वयमेवापरेण वा । वक्तुं तत्पुण्यसंख्यानं नालं वर्षशतायुषा ॥५४॥
एकश्चेदध्वगो राजंस्तडागस्य जलं पिवेत् । तत्कर्तुः सर्वपापानि नश्यन्त्येव न संशयः ॥५५॥
एकाहमपि यत्कुर्याद्भूमिस्थमुदकं नरः । स मुक्तः सर्वपापेभ्यः शतवर्षं वसेद्दिवि ॥५६॥
कर्तुं तडागं यो मर्त्यः साहाय्यकः शक्तितो भवेत् । सोऽपि तत्फलमाप्नोति तुष्टः प्रेरक एव च ॥५७॥
मृदं सिद्धार्थमात्रां वा तडागाद्यो बहिः क्षिपेत् । तिष्ठत्यब्दशतं स्वर्गे विमुक्तः पापरकोटिभिः ॥५८॥
देवता यस्य तुष्यन्ति गुरवो वा नृपोत्तम । तडागपुण्यभाक्स स्यादित्येषा शाश्वती श्रुतिः ॥५९॥
इतिहास प्रवक्ष्यामि तवात्र नृपसत्तम । यं श्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ॥६०॥
गौडदेशेऽतिविख्यातो राजासीद्वीरभद्रकः । महाप्रतापी विद्वान्सदा विप्रप्रपूजकः ॥६१॥
वेदशास्त्रकुलाचारयुक्तो मित्रविवर्धनः । तस्य राज्ञी महाभागा नाम्ना चम्पकमञ्जरी ॥६२॥
तस्य राज्ञो महामात्याः कृत्याकृत्यविचारणाः । धर्मार्णा धर्मशास्त्रैस्तु सदा कुर्वन्ति निश्चयम् ॥६३॥
प्रायश्चित्तं चिकित्सां च ज्योतिषे धर्मनिर्णयम् । विना शास्त्रेण यो ब्रूयात्तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥६४॥
इति निश्चित्य मनसा मन्वादीरितधर्मकान् । आचार्येभ्यः सदा भूपः शृणोति विधिपूर्वकम् ॥६५॥
ब्राह्मण को वृत्ति देने के फल की गणना नहीं कर सकते । ब्राह्मण सब देवताओं का रूप कहा गया है, उसको जीविका
देने वाले पुरुष के पुण्यों को कौन गिनने में समर्थ हो सकता है ? जो सर्वदा ब्राह्मणों का हित करता है उसने मानो
सब यज्ञों का अनुष्ठान कर लिया, सब तीर्थों में स्नान कर लिया और सम्पूर्ण तपस्यायें भी कर लीं । जो ब्राह्मणों
को कुछ देने के लिए दूसरों को प्रेरित करता है वह भी दान का फल पाता है । अब इस विषय में अधिक क्या
कहा जाय ? जो स्वयं तालाब बनाता या दूसरों से बनवाता है, उसके पुण्यों की गिनती सौ वर्ष की पूरी आयु में
नहीं हो सकती है ॥५०-५४॥
एक भी पथिक यदि उस तालाब का जल पी लेगा तो उसको बनाने वाले के सारे पाप धुल जायँगे,
इसमें सन्देह नहीं । जो एक दिन के लिए भी जल को किसी गड्ढे या निम्न भूमि में रहने के योग्य बना देता है,
वह अपने पापों से मुक्त हो जाता और सौ वर्ष तक स्वर्ग में रहता है। जो मनुष्य तालाब बनवाने में अपनी शक्ति
के अनुसार सहायता पहुँचाता है वह भी तालाब बनाने वाले के समान ही फल पाता है और उस कार्य को देखकर
प्रसन्न होने वाला या प्रेरित करने वाला भी वही फल पाता है । जो तालाब से थोड़ी सी भी मिट्टी बाहर फेंक
देता है वह अपने कोटि पापों से मुक्त हो कर सौ वर्षों तक स्वर्ग में निवास करता है ॥५५-५८॥ नृपोत्तम !
जिसके ऊपर देवता या गुरु प्रसन्न होते हैं, वही तडाग बनवाने का यश प्राप्त करता है, ऐसी श्रुति-परम्परा
सुनी जाती है । नृपसत्तम ! इस विषय में तुमसे एक प्राचीन इतिहास कह रहा हूँ, जिसको सुनकर निःसन्देह
मनुष्य पापों से छूट जाता है । गौड़ देश में अति विख्यात वीरभद्रक नामक राजा था। वह महाप्रतापी,
विद्वान् और ब्राह्मणों का पूजक था ॥५६-६१॥ वह वेद-शास्त्रों तथा अपने कुलाचार से युक्त था और मित्रों को
बढ़ाने वाला था । उसकी महाभाग्यशालिनी रानी का नाम चंपकमंजरी था । उस राजा के कर्त्तव्या-
कर्त्तव्य का विवेक करने वाले महामन्त्री थे। वे धर्मशास्त्रों के अनुसार न्याय का निर्णय करते थे। प्रायश्चित्त,
चिकित्सा और ज्योतिष शास्त्र सम्बन्धी धर्मनिर्णय जो शास्त्र के अनुकूल नहीं करता है, उसको ब्रह्मघाती कहा
जाता है, ऐसा मन में निश्चय कर वह आचार्यों से मनु आदि धर्माचार्यों के बारे में सर्वदा विधिपूर्वक
द्वादशोऽध्यायः ८६
न कोऽप्यन्यायवर्ती च तस्य राज्येऽवरोऽपि च। धर्मेण पाल्यमानस्य तस्य देशस्य भूपतेः ॥६६॥
जातं समत्वं स्वर्गस्य सौराज्यस्य शुभावहम्। स चैकदा तु नृपतिर्मृगयायां महावने ॥६७॥
मन्त्र्यादिभिः परिवृतो बभ्राम मध्यभास्करम्। दैवादाखेटशून्यस्य ह्यतिश्रान्तस्य यत्र वै ॥६८॥
नृपरीतस्य संजातं सरसो दर्शनं नृप। ततः शुष्कां तु सरसीं दृष्ट्वा तत्र व्यचिन्तयत् ॥६९॥
किमियं सरसी शृङ्गे भुवः केन विनिर्मिता। कथं जलं भवेदत्र येन जीवेदयं नृपः ॥७०॥
ततो बुद्धिः समभवत्खाते तस्या नृपोत्तम। हस्तमात्रं ततो गर्तं खात्वा तोयमवाप्तवान् ॥७१॥
तेन तोयेन पीतेन राजंस्तृप्तिरजायत। मन्त्रिणश्चापि भूमीश बुद्धिसागरसंज्ञिनः ॥७२॥
स बुद्धिसागरो भूपं प्राह धर्मार्थकोविदः। राजन्नीयं पुष्करिणी वर्षाजलवती पुरा ॥७३॥
अद्यैनां बद्धवप्रां च कर्तुं जाता मतिर्मम। तद्भवन्मोदतां देव दत्तादाज्ञां च मेऽनघ ॥७४॥
इति श्रुत्वा वचस्तस्य मन्त्रिणो नृपसत्तमः। मुमुदेऽतितरां भूपः स्वयं कर्तुं समुद्यतः ॥७५॥
तमेव मन्त्रिणं तत्र युयोज शुभकर्मणि। ततो राजाज्ञया सोऽपि बुद्धिसागरको मुदा ॥७६॥
सरसीं सागरं कर्तुमुद्यतः पुण्यकृत्तमः। धनुषां चैव पञ्चाशत्सर्वतो विस्तृतायताम् ॥७७॥
सरसीं बद्धसुशिलां चकरागाधशम्बराम्। तां विनिर्माय सरसीं राज्ञे सर्वं न्यवेदयत् ॥७८॥
तस्यां ततः प्रभृति वै सर्वेऽपि वनचारिणः। पान्थाः पिपासिता भूप लभन्ते स्म जलं शुभम् ॥७९॥
कदाचित्स्वायुषश्चान्ते स मन्त्री बुद्धिसागरः। प्रमृतो गतवाँल्लोकं लोकशास्तुर्मम प्रभो ॥८०॥
तदर्थं तु मया पृष्टो धर्मो धर्मलिपिकरः। चित्रगुप्तस्तु तत्कर्म मह्यं सर्वं न्यवेदयत् ॥८१॥
सुना करता था ॥६१-६५॥ धर्म पूर्वक प्रजापालन करने वाले उस भूपति के देश में कोई भी अन्याय नहीं करता था
और न कोई अधम था। उसका राज्य शुभ दायक स्वर्ग की कोटि में गिना जाने लगा। वह राजा एक दिन मृगया के
लिए महावन में गया। वहाँ दुपहरी में मन्त्रियों के साथ इधर उधर घूमने लगा। दैवयोग से आखेट न पाकर अपने
अनुचरों के सहित वह थक गया। उसी समय उसको एक सरोवर दिखाई दिया। उस सरोवर को सूखा देखकर
सभी विचार करने लगे कि इस ऊँची भूमि पर किसने इस सरोवर को बनवाया। किस प्रकार इस सरोवर में
जल प्राप्त किया जा सकता है, जिससे कि यह राजा अपनी पिपासा शान्त कर जीवित रह सके। नृपोत्तम !
शीघ्र ही उनको उसको खनने की युक्ति सूझ गई। तदनन्तर एक हाथ भूमि के खनने से जल निकल आया
॥६६-७१॥ उस जल को पीकर राजा तृप्त हो गया। भूमेश ! उसके बुद्धिसागर नामक मन्त्री को भी उस
पानी के पीने से तृप्ति हुई। उस धर्मतत्त्वों के जानने वाले बुद्धिसागर ने राजा से कहा—
राजन् ! यह पुष्करिणी (पोखरी) पहले वर्षा के जल से भरी हुई थी। आज इसको चारों ओर से बांध
कर उत्तम बनवाने की मेरी इच्छा हो रही है, देव ! आप भी इसका अनुमोदन करें और हे अनघ ! इसके
लिये मुझे आदेश दें ॥७२-७४॥ नृपसत्तम अपने मन्त्री की बातों को सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुये और स्वयं उस
निर्माण कार्य के लिए तैयार हो गए और शुभ कर्म में उसी मन्त्री को नियुक्त कर दिया। तत्पश्चात् वह पुण्य-
शील मन्त्री बुद्धिसागर भी प्रसन्न होकर उस सरसी को सागर (झील) बनाने के लिए उद्यत हो गया। चारों
ओर पचास धनुष लम्बा और उतना ही चौड़ा सरोवर खनवाया और चारों ओर पत्थर से उसको बँधवा कर
अगाध जल से परिपूर्ण करा दिया। इस प्रकार उस सरसी को सागर बनवा देने के बाद राजा से निवेदन
किया। तब से उस सागर के स्वच्छ जल को सभी प्यासे जंगली जीव और पथिक पीने लगे। कुछ दिनों के
अनन्तर आयु के क्षीण हो जाने से वह मन्त्री बुद्धिसागर मर गया और लोकों पर शासन करने वाले मेरे लोक
में आया। उसके विषय में मैंने धर्मलिपिक चित्रगुप्त से पूछा। उसने उसके कर्मों को मुझसे कहा कि इसने
१२-ना० पु०
६० नारदीयपुराणम्
उपदेष्टा स्वयं चासौ धर्मकार्यस्य भूपते। तस्माद्धर्मविमानं तु समारोढुमिहार्हति ॥८२॥
इत्युक्ते चित्रगुप्तेन समाज्ञप्तो मया नृप। विमानं धर्मसंज्ञं तु आरोढुं बुद्धिसাগরः ॥८३॥
अथ कालान्तरे राजन्स राजावीरभद्रकः। मृतो ऽतो मम स्थानं नमश्चक्रे मुदान्वितः ॥८४॥
मया तु तत्र तस्यापि पृष्टं कर्माखिलं नृप। कथितं चित्रगुप्तेन धर्मं संसर्गसंभवम् ॥८५॥
तदा सम्यङ्मया राजा बोधितोऽद्यथा शृणु। अधित्यकायां भूपाल सैकतस्य गिरेः पुरा ॥८६॥
लावकेनामुना चञ्च्वा खातं द्व्यङ्गुलमम्बुनि। ततः कालान्तरे तेन वाराहेण नृपोत्तम ॥८७॥
खनितं हस्तमात्रं तु जलं तुण्डेन चात्मनः। ततोऽन्यदाऽमुया कात्या हस्तयुग्ममितः कृतः ॥८८॥
खातो जले महाराज तोयं मासद्वयं स्थितम्। पीतं क्षुद्रैर्वनेचरैः सत्त्वैस्तृष्णासमाकुलैः ॥८९॥
ततो वर्षत्रयान्ते तु गजेनानेन सुव्रत। हस्तत्रयमितः खातः कृतस्तत्राधिकं जलम् ॥९०॥
मासत्रयं स्थितं तच्च पयो जीवैर्वनेचरैः। भवांस्तत्र समायातो जलशोषानन्तरम् ॥९१॥
मासे तत्र तु संप्राप्तं हस्तं खात्वा जलं नृप। ततस्तयोपदेशेन मन्त्रिणो नृपते त्वया ॥९२॥
पञ्चाशद्धनुरुत्खातं जातं तत्र महाजलम्। पुनः शिलाभिः सुदृढं बद्धं जातं महत्सरः।
वृक्षाश्च रोपितास्तत्र सर्वलोकोपकारिणः ॥९३॥
तेन स्वस्वेन पुण्येन पञ्चैते जगतीपते। विमानं धर्म्यमारूढास्त्वमप्येनं समारुह ॥९४॥
इति वाक्यं समाकर्ण्य मम राजा स भूमिप। आरुरोह विमानं तत्षष्ठो राजा समांशभाक् ॥९५॥
स्वयं भूपति को धर्म कार्य करने का उपदेश दिया है, अतः इस पुण्य के प्रभाव से यह धर्म-विमान पर आरोहण
करने का अधिकारी है ॥७५-८२॥ चित्रगुप्त के ऐसा कहने पर मैंने बुद्धिसাগর को धर्मनामक विमान पर
आरूढ़ होने का आदेश दे दिया। राजन् ! कुछ काल बीत जाने पर वह राजा वीरभद्रक भी मरकर मेरे यहाँ
गया और प्रसन्नतापूर्वक मेरे सामने प्रस्तुत हुआ। नृप ! मैंने भी उसके सब कर्त्तव्यों का लेखा पूछा। चित्र-
गुप्त ने उस सागर सम्बन्धी पुण्य को बताया ! उस समय हे राजन् ! मैंने जो कुछ उस राजा से कहा उसको
भली भाँति सुनो ॥८३-८५३॥
भूपाल ! पहले इस लावक पक्षी ने जल में अपनी चोंच से दो अङ्गुल का गड्डा खोद दिया, नृपोत्तम
कुछ समय के अनन्तर एक वाराह ने अपने थूथन से उसको एक हाथ लम्बा खोद डाला। तदनन्तर अन्य समय
इस काली ने उसको बढ़ाकर दो हाथ का बना डाला। उस गड्ढे में जो जल इकट्ठा हुआ उसको वन के प्यासे
क्षुद्र जीवों और अन्य प्राणी दो महीने तक पीते रहे। उत्तम व्रत वाले ! तदनन्तर तीन वर्ष बीत जाने पर इस
हाथी ने उसको तीन हाथ और अधिक खनकर बढ़ा दिया जिससे उसमें और अधिक जल इकट्ठा हो गया
॥८६-६०॥ उस जल से तीन मास तक जल के आधार पर जीने वाले जंगली पशुओं की प्यास बुझती रही।
यानी सूख जाने के बाद आप वहाँ पर आये। नृप ! उस समय उसको एक हाथ और खोदा गया और उसके
जल से अनुचरों की प्यास बुझाई गई। तत्पश्चात् नृपते ! उस समय मन्त्री के उपदेश से तुमने उसको पचास
धनुष (दो सौ-हाथ) लम्बा और उतना चौड़ा खुदवा दिया और वह झील के रूप में हो गया। पुनः पत्थरों से
चारों ओर बँध जाने के कारण वह एक बहुत बड़ा और रमणीय सरोवर हो गया। पुनः सबका भला करने
वाले वृक्ष भी किनारे पर लगा दिये गये ॥६१-६३॥ जगतीपते ! अपने-अपने उस पुण्य के प्रभाव से ये सभी धर्म
विमान पर आरूढ़ हो गये हैं। तुम भी इस विमान पर चढ़ो। मेरी इन बातों को सुनकर वह राजा, जो उस
पुण्य के समान अंश का छठा अधिकारी था, उस विमान पर आरूढ़ हुआ। तुमसे मैंने तड़ाग बनवाने से कुछ फल
होता है, उसको इस कथा के द्वारा कह दिया। इस आख्यान को सुनकर मनुष्य अपने जन्म-मरण के बन्धन में
त्रयोदशोऽध्यायः ६१
इति ते सर्वमाख्यातं तडागजनितं फलम् । श्रुत्वैतन्मुच्यते पापादाजन्ममरणान्तिकात् ॥६६॥
यो नरः श्रद्धया युक्तो व्याख्यानं शृणुयात्पठेत् । सोऽप्याप्नोत्यखिलं पुण्यं सरोनिर्माणसंभवम् ॥६७॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे धर्माख्याने द्वादशोऽध्यायः ॥१२॥
अथ त्रयोदशोऽध्यायः
धर्मराज उवाच
देवायतनं यस्तु कुरुते कारयत्यपि । शिवस्यापि हरेर्वापि तस्य पुण्यफलं शृणु ॥१॥
मातुतः पितृतश्चैव लक्षकोटिकुलान्वितः । कल्पत्रयं विष्णुपदं तिष्ठत्येव न संशयः ॥२॥
मृदैव कुरुते यस्तु देवायतनं नरः । यावत्पुण्यं भवेत्तस्य तन्मे निगदतः शृणु ॥३॥
दिव्यदेहधरो भूत्वा विमानवरमास्थितः । कल्पत्रयं विष्णुपदे तिष्ठत्येव न संशयः ॥४॥
सृदैव कुरुते यस्तु देवायतनं नरः । यावत्पुण्यं भवेत्तस्य तन्मे निगदतः शृणु ॥५॥
दिव्यदेहधरो भूत्वा विमानवरमास्थितः । कल्पत्रयं विष्णुपदे स्थित्वा ब्रह्मपुरं व्रजेत् ॥६॥
कल्पद्वयं स्थितस्तत्र पुनः कल्पं वसेद्दिवि । ततस्तु योगिनामेव कुले जातो दयान्वितः ॥७॥
वैष्णवं योगमास्थाय मुक्तिं व्रजति शाश्वतीम् । दारुभिः कुरुते यस्तु तस्य स्याद्द्विगुणं फलम् ॥८॥
डालने वाले पापों से छूट जाता है। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इस आख्यान को पढ़ता है, वह भी सरोवर बनवाने
से जो कुछ फल मिलता है उसको प्राप्त करता है ॥६४-६८॥
श्रीनारदीयमहापुराण में धर्माख्यान नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त ॥१२॥
अध्याय १३
धर्मराज बोले—जो मनुष्य शिव अथवा विष्णु का मन्दिर बनवाता है या बनाता है, उसको कौन सा
पुण्य फल मिलता है, इसको सुनो ॥१॥
वह व्यक्ति मातृ और पितृ कुलकी लाखों पीढ़ियों के सहित तीन कल्प तक विष्णु लोक में रहता है, इसमें
सन्देह नहीं । जो केवल मिट्टी से ही देव-मन्दिर बनवाता है, उससे जो पुण्य होता है, उसको कह रहा हूँ
सुनो--वह व्यक्ति दिव्य रूप धारण कर उत्तम विमान पर आरूढ़ होता है और तीन कल्पों तक विष्णुलोक में
सुखोपभोग कर पुनः ब्रह्मलोक में चला आता है ॥२-६॥ वहाँ दो कल्प तक रहकर पुनः स्वर्ग में चला आता
और एक कल्प तक वहाँ रहता है । पुनः वह भाग्यशाली वहाँ से मृत्युलोक में आकर योगिकुल में जन्म लेता है
और वैष्णव योग को प्राप्त कर शाश्वत मुक्ति को प्राप्त करता है । जो लकड़ी से मन्दिर बनवाता है उसको
दूना फल मिलता है । ईंटों से मन्दिर बनवाने वाले को तिगुना और पत्थर से बनवाने वाले को चौगुना फल
मिलता है, स्फटिक शिला से बनाने वाले को दशगुना फल मिलता है । ताम्रपत्र से बनवाने वाले को सौगुना
६२ नारदीयपुराणम्
त्रिगुणं चेष्टकाभिस्तु शिलाभिस्तच्चतुर्गुणम् । स्फाटिकाभिः शिलाभिस्तु ज्ञेयं दशगुणेतरम् ॥८॥
ताम्रीभिस्तच्छतगुणं हेम्ना कोटिगुणं भवेत् । देवालयं तडागं वा ग्रामं वा पालयेत्तु यः ॥१०॥
कर्तुः शतगुणं तस्य पुण्यं भवति भूपते । देवालयस्य शुश्रूषां लेपसेचनलंडनैः ॥११॥
कुर्याद्यस्सततं भक्त्या तस्य पुण्यमनन्तकम् । वेतनाद्विष्टितो वापि पुण्यकर्मप्रवर्त्तिताः ॥१२॥
ते गच्छंति धराधाराः शाश्वतं वैष्णवं पदम् । तडागार्द्धफलं राजन्कासारे परिकीर्तितम् ॥१३॥
कूपे पादफलं ज्ञेयं वाप्यां पद्माकरोन्मितम् । वापीशतगुणं प्रोक्तं कुल्यायां भूपतेः फलम् ॥१४॥
दृषद्विभस्तु धनी कुर्यान्मृदा निष्किञ्चनो जनः । तयोः फलं समानं स्यादित्याह कमलोद्भवः ॥१५॥
दद्यादाढ्यस्तु नगरं हस्तमात्रमकिंचनः । भुवं तयोः समफलं प्राहुर्वेदविदो जनाः ॥१६॥
धनाढ्यः कुरुते यस्तु तडागं फलसाधनम् । दरिद्रः कुरुते कूपं समं पुण्यं प्रकीर्तितम् ॥१७॥
आश्रमं कारयेद्यस्तु बहुजन्तूपकारकम् । स याति ब्रह्मभुवनं कुलत्रयसमन्वितः ॥१८॥
धेनुर्वा ब्राह्मणो वापि यो वा को वापि भूपते । क्षणार्द्धं तस्य छायायां तिष्ठन्स्वर्गं नयेत्प्रभुम् ॥१९॥
आरामारका राजन्देवतागृहकारिणः । तडागग्रामकर्त्तारः पूज्यन्ते हरिणा सह ॥२०॥
सर्वलोकोपकारार्थं पुष्पारामं जनेश्वर । कुर्वते देवतार्थं वा तेषां पुण्यफलं शृणु ॥२१॥
तत्र यावन्ति पर्णानि कुसुमानि भवन्ति च । तावद्वर्षाणि नाकस्थो मोदते कुलकोटिभिः ॥२२॥
प्राकारकारिणस्तस्य कंटकावरणप्रदाः । प्रयान्ति ब्रह्मणः स्थानं युगानामेकसप्ततिम् ॥२३॥
तुलसीरोपणं ये तु कुर्वते मनुजेश्वर । तेषां पुण्यफलं राजन्वदतो मे निशामय ॥२४॥
और सुवर्ण से बनवाने वाले को करोड़ गुना फल मिलता है। जो बने हुए तड़ाग, मन्दिर या ग्राम की रक्षा या
पुनः निर्माण कराता है उसको बनवाने वाले की अपेक्षा सौगुना अधिक फल मिलता है ॥७-१०१/२॥ जो स्वच्छता
लिपाई और सजावट के द्वारा देव मन्दिर की भक्ति से सेवा करता है, उसको तो असंख्य पुण्य मिलता है। जो
स्वयं अपनी इच्छा से अथवा प्रतियोगिता की भावना से पुण्य कर्मों में प्रवृत्त होते हैं वे पृथ्वी को सुशोभित करने
करने वाले महापुरुष शाश्वत वैष्णव पद को प्राप्त करते हैं। राजन् ! तड़ाग की अपेक्षा कासार (छोटा तालाब)
बनवाने में आधा फल, कुआँ बनवाने में चौथाई और बावली बनवाने में सरोवर-निर्माण तुल्य फल मिलता है।
भूपते ! बावली से सौगुना फल कुल्या बनवाने से मिलता है। धनी लोग यदि पत्थर से बँधे घाट वाले तालाब
आदि बनवावें और साधारण व्यक्ति मिट्टी का ही बनवावें तो भी दोनों को समान ही फल मिलता है, ऐसा स्वयं
ब्रह्मा ने कहा है ॥११-१५॥ वेदज्ञों ने बतलाया है कि धनी व्यक्ति बड़े नगर का दान करे और दरिद्र व्यक्ति यदि
एक हाथ भूमि का दान करे तो भी बराबर ही फल मिलता है। जो धनाढ्य व्यक्ति पुण्य देने वाले तड़ाग को
बनवाता है उसको भी उतना ही फल मिलता है जितना एक साधारण व्यक्ति को कुआँ बनवाने से। जो बहुत
लोगों की भलाई के लिए सत्यता पूर्वक किसी वस्तु की स्थापना करता है वह अपनी तीन पीढ़ियों के साथ ब्रह्म
लोक को चला जाता है। धेनु और ब्राह्मण चाहे कैसा ही क्यों न हो, उस (वृक्ष आदि) की छाया में क्षण भर रह
प्रतिष्ठापक को स्वर्ग को प्राप्त कराता है। राजन् ! वाटिका लगाने वाले, देवमन्दिर बनवाने वाले तड़ाग और
गाँव बनवाने वाला व्यक्ति विष्णु के साथ पूजित होता है ॥१६-२०॥ जो सबकी भलाई के लिए या देवता की
पूजा के लिए पुष्पवाटिका निर्माण कराता है उनके पुण्य फल को सुनो ॥२१॥
उस पुष्प वाटिका में जितनी पत्तियां या फूल होते हैं उतने वर्षों तक अपने कोटि वंशों के साथ आनन्द
पूर्वक स्वर्ग में निवास करता है। उस वाटिका की रक्षा के लिए चहारदीवारी बनवाने वाले या कँटीले तार से
घेर कर सुरक्षित बनाने वाले इकहत्तर युग तक ब्रह्म लोक में रहते हैं। मनुजेश्वर ! जो तुलसी का पौधा लगाते
६३
त्रयोदशोऽध्यायः
सप्तकोटिकुलैर्युक्तो मातृतः पितृतस्तथा । वसेत्कल्पशतं साग्रं नारायणपदे नृप ॥२४॥
ऊर्ध्वपुण्ड्रधरो यस्तु तुलसीमूलमृत्स्नया । गोपिकाचन्दनेनापि वा चित्रकूटमृदापि वा ।
गङ्गामृत्सिकया चैव तस्य पुण्यफलं शृणु ॥२६॥
विमानवरमारूढो गन्धर्वाप्सरसां गणैः । संगीयमानचरितो मोदते विष्णुमंदिरे ॥२७॥
पत्राणि तुलसीमूलाद्यावन्ति पतितानि वै । तावन्ति ब्रह्महत्यादिपातकानि हतानि च ॥२८॥
तुलस्यां सेचयेद्यस्तु जलं चुलुकमात्रकम् । क्षीरोदवासिना सार्द्धं वसेदाचंद्रतारकम् ॥२६॥
ददाति ब्राह्मणानां यः कोमलं तुलसीदलम् । स याति ब्रह्मसदने कुलत्रितयसंयुतः ॥३०॥
शालग्रामेऽर्पयेद्यस्तु तुलस्यास्तु दलानि च । स वसेद्विष्णुभवने यावदाहूतसंप्लवम् ॥३१॥
कण्टकावरणं यस्तु प्राकारं वापि कारयेत् । सोऽप्येकविंशतिकुलैर्मोदते विष्णुमंदिरे ॥३२॥
योऽर्चयेद्धरिपादाब्जं तुलस्याः कोमलैर्दलैः । न तस्य पुनरावृत्तिर्विष्णुलौकान्नरेश्वर ॥३३॥
द्वादश्यां पौर्णमास्यां यः क्षीरेण स्नापयेद्धरिम् । कुलायुतयुतः सोऽपि मोदते वैष्णवे पदे ॥३४॥
प्रस्थमात्रेण पयसा यः स्नापयति केशवम् । कुलायुतायुतवृतः सोऽपि विष्णुपुरे वसेत् ॥३५॥
घृतप्रस्थेन यो विष्णुं द्वादश्यां स्नापयेन्नरः । कुलकोटियुतो राजन्सायुज्यं लभते हरेः ॥३६॥
पञ्चामृतेन यः स्नानमेकादश्यां तु कारयेत् । विष्णोः सायुज्यकं तस्य भवेत्कुलशतायुतैः ॥३७॥
एकादश्यां पौर्णमास्यां द्वादश्यां वा नृपोत्तम । नालिकेरोदकैर्विष्णुं स्नापयेत्तत्फलं शृणु ॥३८॥
दशजन्मार्जितैः पापैर्विमुक्तो नृपसत्तम । शतद्वयकुलैर्युक्तो मोदते विष्णुना सह ॥३६॥
हैं राजन् ! उनके पुण्यों को बता रहा हूँ सुनो ॥२२-२४॥ हे नृप ! वह माता और पिता कुल की सात करोड़
पीढ़ियों के सहित सौ कल्पों तक नारायण लोक में निवास करता है। जो तुलसी मूल की मिट्टी से ऊर्ध्व पुण्ड्र
लगाता है, अथवा गोपी चन्दन या चित्रकूट की मिट्टी या गंगा की मिट्टी का चन्दन लगाता है उसके पुण्य फल को
सुनो--वह श्रेष्ठ विमान पर आरूढ़ होकर गन्धर्व और अप्सराओं के द्वारा अपनी स्तुति सुनता हुआ विष्णु
भवन में आनन्द प्राप्त करता है। तुलसी वृक्ष के मूल से जितनी पत्तियां गिरती हैं उतने ब्रह्महत्यादि
पातक नष्ट हो जाते हैं । जो तुलसी की जड़ को एक चुल्लू जल से भी सींचता है, वह प्रलय
पर्यन्त क्षीरशायी विष्णु के साथ निवास करता है ॥२५-२६॥ जो ब्राह्मणों को तुलसी की कोमल
पत्तियां प्रदान करता है वह अपनी तीन पीढ़ियों के साथ ब्रह्मलोक में निवास करता है। जो शालग्राम की
मूर्ति पर तुलसी पत्र समर्पित करता है, वह कल्प पर्यन्त विष्णु भवन में रहता है। जो कांटेदार तार से घेराव
करा देता या चहारदीवारी बनवा देता है वह अपनी इक्कीस कुल परम्परा के साथ विष्णु मन्दिर में आनन्द पूर्वक
निवास करता है । जो भगवान् के कमलवत् चरणों की तुलसी की कोमल पत्तियों से पूजा करता है, नरेश्वर !
उसको पुनः विष्णु लोक से लौटना नहीं पड़ता ॥३०-३३॥ द्वादशी और पूर्णमासी के दिन जो दूध से भगवान् को
नहलाता है वह अपने दश हजार कुलों के सहित विष्णुलौक में सुख भोग करता है। जो केशव को एक प्रस्थ (सेर) दूध
से स्नान कराता हे वह भी अपनी एक लाख वंश परम्परा के साथ विष्णु लोक में निवास करता है। जो मनुष्य
एक सेर घी से द्वादशी के दिन विष्णु को स्नान करता है, वह अपने कोटि कुल के साथ विष्णु की सायुज्य मुक्ति
प्राप्त करता है। जो एकादशी के दिन पंचामृत से विष्णु भगवान् को नहलाता है वह अपने सौ कुल के साथ विष्णु
की सायुज्य मुक्ति प्राप्त करता है ॥३४-३७॥ नृपोत्तम ! जो एकादशी, द्वादशी और पूर्णिमा के दिन नारियल के
जल से विष्णु को स्नान कराता है उसका फल सुनो-नृपोत्तम ! वह अपने दश जन्म के पापों से मुक्त होकर
अपनी दो सौ कुल परम्परा के साथ विष्णुलौक में भगवान् के साथ परमानन्द प्राप्त करता है। भूपते ! गन्ने के
यहाँ दिए गए पृष्ठ का संपूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति (Line-by-line) रूप में प्रस्तुत है:
[पृष्ठ शीर्ष]
६४ नारदीयपुराणम्
संस्कृत श्लोक
इक्षुतोयेन देवेशं यः स्नापयति भूपते । केशवं लक्षपितृभिः सार्द्धं विष्णुपदं व्रजेत् ॥४०॥
पुष्पोदकेन गोविन्दं तथा गन्धोदकेन च । स्नापयित्वा हरिं भक्त्या वैष्णवं पदमाप्नुयात् ॥४१॥
जलेन वस्त्रपूतेन यः स्नापयति माधवम् । सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुना सह मोदते ॥४२॥
क्षीराद्यैः स्नापयेद्यस्तु रविसंक्रमणे हरिम् । स वसेद्विष्णुसदने त्रिसप्तपुरुषैः सह ॥४३॥
शुक्लपक्षे चतुर्दश्यामष्टम्यां पूर्णिमादिने ॥४४॥
एकादश्यां भानुवारे द्वादश्यां पञ्चमीतियौ । सोमसूर्योपरागे च मन्वादिषु युगादिषु ॥४५॥
अर्द्धोदये च सूर्यस्य पुष्यार्के रोहिणीबुधे । तथैव शनिरोहिण्यां भौमाश्विन्यां तथैव च ॥४६॥
शन्य भार्गवमृगे चैव भृगुरेवतिसङ्गमे । तथा बुधानुराधायां श्रवणार्के तथैव च ॥४७॥
तथा च सोमश्रवणे हस्तयुक्ते बृहस्पतौ । बुधाष्टम्यां बुधाषाढे पुण्ये चान्ये दिने तथा ॥४८॥
स्नापयेत्पयसा विष्णुं शान्तिमान् वाग्यतः शुचिः । घृतेन मधुना वापि दध्ना वा तत्फलं शृणु ॥४९॥
सर्वयज्ञफलं प्राप्य सर्वपापविवर्जितः । वसेद्विष्णोः पुरे सार्द्धं त्रिसप्तपुरुषैर्नृप ॥५०॥
तत्रैव ज्ञानमासाद्य योगिनामपि दुर्लभम् । मोक्षमाप्नोति नृपते पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥५१॥
कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां सोमवारे च भूपते । शिवं संस्नाप्य दुग्धेन शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥५२॥
नालिकेरोदकेनापि शिवं संस्नाप्य भक्तितः । अष्टम्यामिन्दुवारे वा शिवसायुज्यमश्नुते ॥५३॥
शुक्लपक्षे चतुर्दश्यामष्टम्यां वापि भूपते । घृतेन मधुना स्नाप्य शिवं तत्साम्यतां व्रजेत् ॥५४॥
तिलतैलेन संस्नाप्य विष्णुं वा शिवमेव च । स याति तत्तत्सारूप्यं पितृभिः सह सप्तभिः ॥५५॥
शिवमिक्षुरसेनापि यः स्नापयति भक्तितः । शिवलोके वसेत्कल्पं स सप्तपुरुषैः सह ॥५६॥
हिन्दी अनुवाद
रस से जो देवेश विष्णु को को नहलाता है वह अपने लाख पितरों के सहित विष्णुलोक को जाता है। जो पुष्प
मिश्रित जल और सुगन्धित जल से हरि को भक्ति पूर्वक स्नान कराता है वह वैष्णव पद को प्राप्त करता है।
॥३८-४१॥ जो मनुष्य कपड़े से छने हुए जल से माधव को नहलाता है वह सब पापों से मुक्त होकर विष्णु के
साथ आनन्द प्राप्त करता है। जो सूर्य ग्रहण के समय दूध आदि से भगवान् हरि को नहलाता है, वह इक्कीस
कुल पुरुषों के साथ विष्णुलोक में निवास करता है ॥४२-४३॥
शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी, अष्टमी, पूर्णमासी एकादशो, रविवार, द्वादशी और पंचमी तिथि को, एवं चन्द्र
और सूर्य के ग्रहण के समय, मन्वादि काल, युगादिकाल, सूर्य के अर्द्धोदय काल में, पुष्य के सूर्य, रोहिणी के बुध
और शनि, अश्विनी के मंगल, शनि के शुक्र और चन्द्रमा, रेवती और शुक्र के संगम, अनुराधा के बुध, श्रवण के
सूर्य एवं चन्द्रमा, हस्तनक्षत्र के बृहस्पति अष्टमीतिथि को बुध पड़ने पर, आषाढ़ में बुध के दिन अथवा अन्य पुण्य
पर्वों पर जो मनुष्य शान्त और मौन होकर पवित्र भाव से दूध, घी, मधु या दही से भगवान् विष्णु को नहलाता
हैं, उसका फल सुनो ॥४४-४६॥ नृप ! वह व्यक्ति सब पापों से मुक्त हो जाता और सब यज्ञों का फल पाकर
अपने इक्कीस कुलों के साथ विष्णुलोक में निवास करता है। वहीं योगियों के लिए भी दुर्लभ ज्ञान को प्राप्त कर
आवागमन से रहित निर्वाण को प्राप्त करता है। भूपते ! कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी और सोमवार के दिन शिव को
दूध से नहलाने से शिवसायुज्य प्राप्त होता है। अष्टमी या सोमवार को भक्ति पूर्वक नारियल के जल से शिव
को नहलाने से शिव सायुज्य प्राप्त होता है। शुक्ल-पक्ष की चतुर्दशी या अष्टमी को घृत और मधु से शिव को
स्नान कराने से शिव साम्य प्राप्त होता है ॥५०-५४॥ तिल के तेल से विष्णु अथवा शिव को नहलाने से वह व्यक्ति
अपनी सात पीढ़ियों के साथ शिव या विष्णु का सारूप्य प्राप्त करता है। जो शिव को गन्ने के रस से भक्ति पूर्वक
स्नान कराता है, वह कल्पान्त तक सात कुलों के साथ शिव लोक में निवास करता है। जो देवोत्थान एकादशो और
त्रयोदशोऽध्यायः ६५
घृतेन स्नापयेल्लिङ्गमुत्थाने द्वादशीदिने । क्षीरेण वा महाभाग तत्फलं शृणु मद्गिरा ॥५७॥
जन्मायुतकृतैः पापैर्विमुक्तो मनुजो नृप । कोटिसंख्यं समुद्धृत्य स्वकुलं शिवतां व्रजेत् ॥५८॥
सम्पूज्य गन्धकुसुमैर्विष्णुं विष्णुतियौ नृपः । जन्मायुताजितैः पापैर्मुक्तो व्रजति तत्पदम् ॥५६॥
पद्मपुष्पेण यो विष्णुं शिवं वा पूजयेन्नरः । स याति विष्णुभवनं कुलकोटिसमन्वितः ॥६०॥
हरिं च केतकीपुष्पैः शिवं धत्तूरजैर्निशि । संपूज्य पापनिर्मुक्तो वसेद्विष्णुपुरे युगम् ॥६१॥
हरिं तु चाम्पकैः पुष्पैर्धर्कपुष्पैश्च शंकरम् । समभ्यर्च्य महाराज तत्तत्सालोक्यमाप्नुयात् ॥६२॥
शंकरस्याथवा विष्णोर्घृतयुक्तं च गुग्गुलुम् । दत्त्वा धूपो नरो भक्त्या सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥६३॥
तिलतैलान्वितं दीपं विष्णोर्वा शंकरस्य वा । दत्त्वा नरः सर्वकामान्संप्राप्नोति नृपोत्तम ॥६४॥
घृतेन दीपं यो दद्याच्छंकरायाथ विष्णवे । स मुक्तः सर्वपापेभ्यो गङ्गास्नानफलं लभेत् ॥६५॥
ग्राम्येण वापि तैलेन राजन्नन्येन वा पुनः । दीपं दत्त्वा महाविष्णोः शिवस्यापि फलं शृणु ॥६६॥
सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वैश्वर्यसमन्वितः । तत्तत्सालोक्यमाप्नोति त्रिःसप्तपुरुषान्वितः ॥६७॥
यद्यदिष्टतमं भोज्यं तत्तदीशाय विष्णवे । दत्त्वा तत्तत्पदं याति चत्वारिंशत्कुलान्वितः ॥६८॥
यद्यदिष्टतमं वस्तु तत्तद्विप्राय दापयेत् । स याति विष्णुभवनं पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥६६॥
भ्रूणहा स्वर्णदानेन शुद्धो भवति भूपते । अन्नतोयसमं दानं न भूतं न भविष्यति ॥७०॥
अन्नदः प्राणदः प्रोक्तः प्राणदश्चापि सर्वदः । सर्वदानफलं यस्मादन्नदस्य नृपोत्तम ॥७१॥
द्वादशी के दिन दूध अथवा घी से शिवलिंग को नहलाता है, महाभाग, उसके फल को मैं कह रहा हूँ सुनो । नृप !
वह मनुष्य हजार जन्म के पापों से मुक्त होकर अपने करोड़ कुलों का उद्धार कर शिव स्वरूप हो जाता है ।
॥५७-५८॥ नृप ! जो विष्णु-तिथि (एकादशी) को गंध और फूल से विष्णु की पूजा करता है वह हजार जन्म के
पापों से मुक्त होकर विष्णु पद को प्राप्त करता है । जो मनुष्य कमल पुष्प से विष्णु या शिव की पूजा करता है,
वह अपने करोड़ कुलों के सहित विष्णु लोक को जाता है । जो विष्णु को केवड़े के फूल से और शिव को धतूरे के
फूल से रात में पूजा करता है वह अपने पापों से मुक्त होकर युग पर्यन्त विष्णु लोक में निवास करता है ।
॥५६-६०॥ महाराज ! जो हरि को चम्पे के फूल से और शिव को मदार के फूल से पूजा करता है वह उसकी
सालोक्य रूप मुक्ति पाता है । जो मनुष्य घृत युक्त गुग्गुल से विष्णु या शिव को भक्ति पूर्वक धूप देता है वह सब
पापों से मुक्त हो जाता है । नृपोत्तम ! जो तिल-तैल से भरे हुए दोपक से विष्णु अथवा शंकर को दीप दिखलाता है
वह अपने सब मनोरथों को प्राप्त करता है । जो शंकर अथवा विष्णु को घी का दीपक देता है, वह सब पापों से
मुक्त होकर गंगा-स्नान का फल पाता है । राजन् ! जो ग्राम्य या किसी अन्य तेल से विष्णु या शिव को दीपक
दिखाता है, उससे जो फल मिलता है, उसको सुनो ॥६१-६६॥
वह व्यक्ति सब प्रकार के पापों से छूट जाता और सब प्रकार के ऐश्वर्यों को प्राप्त कर अपने इक्कीस
कुलों के साथ उन देवों का सालोक्य प्राप्त करता है ॥६७॥ अपने जो प्रिय भोज्य पदार्थ हैं उनको अपने इष्ट
देवता शिव या विष्णु के लिए अर्पित करने से मनुष्य अपने चालीस कुलों के सहित शिव और विष्णुलोक को जाता
है । जो पदार्थ अपने को प्रिय लगते हैं उन उनको ब्राह्मणों के लिए अर्पित कर देना चाहिए, ऐसा करने से वह
व्यक्ति आवागमन से रहित विष्णुलोक को प्राप्त कर लेता है । भूपते ! भ्रूण हत्या करने वाला व्यक्ति सुवर्णदान
से पुनीत हो जाता है । भूपते ! जल और अन्न दान के समान कोई भी दान इस संसार में नहीं है। अन्न दान करने
वाला प्राणदाता कहा गया है और जो प्राणदाता है वह सर्वदाता है । नृपोत्तम ! इसलिये अन्न दान करने वाले
को सब दानों का फल प्राप्त होता है ॥६८-७१॥ अन्नदाता अपने परिवार सहित ब्रह्मलोक को जाता है। वह संसार
६६ नारदीयपुराणम्
अन्नदो ब्रह्मसदनं याति वंशायुतान्वितः । न तस्य पुनरावृत्तिरिति शास्त्रेषु निश्चितम् ॥७२॥
सद्यस्तुष्टिकरं ज्ञेयं जलदानं यतोऽधिकम् । अन्नदानान्नृपश्रेष्ठ निर्दिष्टं ब्रह्मवादिभिः ॥७३॥
महापातकयुक्तो वा युक्तो वाप्युपपातकैः । जलदो मुच्यते तेभ्य इत्याह कमलोद्भवः ॥७४॥
शरीरमन्नजं प्राहुः प्राणानप्यन्नजान्विदुः । तस्मादन्नप्रदो ज्ञेयः प्राणदः पृथिवीपते ॥७५॥
यद्यत्तुष्टिकरं दानं सर्वकामफलप्रदम् । तस्मादन्नसमं दानं नास्ति भूपाल भूतले ॥७६॥
अन्नदस्य कुले जाता आसहस्रं नृपोत्तम । नरकं ते न पश्यन्ति तस्मादन्नप्रदो वरः ॥७७॥
पादाभ्यङ्गं भक्तियुक्तो यदतिथेः कुरुते नरः । स स्नातः सर्वतीर्थेषु गङ्गास्नानपुरःसरम् ॥७८॥
तैलाभ्यङ्गं महाराज ब्राह्मणानां करोति यः । स स्नातोऽष्टशतं साग्रं गङ्गायां नात्र संशयः ॥७९॥
रोगितान्ब्राह्मणान्यस्तु प्रेम्णा रक्षति रक्षकः । स कोटिकुलसंयुक्तो वसेद्ब्रह्मपुरे युगम् ॥८०॥
यो रक्षेत्पृथिवीपाल रङ्कं वा रोगिणं नरम् । तस्य विष्णुः प्रसन्नात्मा सर्वान्कामान्प्रयच्छति ॥८१॥
मनसा कर्मणा वाचा यो रक्षेद्दामयान्वितम् । सर्वान्कामानवाप्नोति सर्वपापविवर्जितः ॥८२॥
यो ददाति महीपाल निवासं ब्राह्मणाथ वै । तस्य प्रसन्नो देवेशः स्वलोकं संप्रयच्छति ॥८३॥
ब्राह्मणाय ब्रह्मविदे यो दद्याद्गां पयस्विनीम् । स याति ब्रह्मसदनमन्येषामतिदुर्लभम् ॥८४॥
अन्येभ्यः प्रतिगृह्यापि यो दद्याद्गां पयस्विनीम् । तस्य पुण्यफलं वक्तुं नाहं शक्तोऽस्मि पण्डित ॥८५॥
कपिलां वेदविदुषे यो ददाति पयस्विनीम् । स एव रुद्रो भूपाल सर्वपापविवर्जितः ॥८६॥
विप्राय वेदविदुषे दद्यादुभयतोमुखीम् । यस्तस्य पुण्यं संख्यातुं न शक्तोऽब्दशतैरपि ॥८७॥
के आवागमन से मुक्त हो जाता है, ऐसा शास्त्रों का निर्णय है । यतः जल दान से मनुष्य को शीघ्र प्यास बुझ
जाती है और उसको सन्तोष मिलता है, अतः हे नृपश्रेष्ठ ! ब्रह्मवादियों ने उसको अन्नदान से भी श्रेष्ठ माना है।
महापापों अथवा उप पातक करने वाला मनुष्य जल का दान करने से अपने पापों से मुक्त हो जाता है, ऐसा
ब्रह्माजी ने स्वयं कहा है ॥७२-७४॥ शरीर को अन्न से उत्पन्न (बना हुआ) कहा जाता है और प्राणों की उत्पत्ति
अन्न से ही बताई गई है। इसलिये, पृथ्वोपते ! अन्नदाता को प्राणदाता समझना चाहिए। भूपाल ! जिन-जिन
दानों से मनुष्य की तृप्ति होती है वह दान सब मनोरथों को सिद्ध करने वाला माना जाता है। अतएव अन्नदान
के समान इस भूतले पर कोई दान नहीं है ॥७५-७६॥ नृपोत्तम ! अन्नदान करने वाले के कुल में हजार पीढ़ी तक
जो उत्पन्न होते हैं, वे भी नरक नहीं देखते हैं । इसलिए अन्नदाता इस संसार में श्रेष्ठ माना गया है । जो मनुष्य
भक्ति पूर्वक अतिथि का पैर धोता है, वह मानों गंगा सहित सब तीर्थों में स्नान कर चुका । महाराज ! जो व्यक्ति
ब्राह्मणों के शरीर में तेल लगाता है, वह तत्काल गंगा में एक सौ आठ बार स्नान का फल पा लेता है, इसमें
तनिक भी सन्देह नहीं । जो रोगी ब्राह्मण को प्रेम पूर्वक सेवा-शुश्रूषा द्वारा रक्षा करता है, वह युगों तक करोड़ों
कुलों के साथ ब्रह्मलोक में निवास करता है ॥७७-८०॥ पृथ्वीपाल ! जो मनुष्य दरिद्र अथवा रोगी की रक्षा
करता है उसके ऊपर विष्णु प्रसन्न होकर उसके सब मनोरथों को पूर्ण कर देते हैं । जो मन, वचन और कर्म से
किसी रोगी की रक्षा करता है वह अपने सब पापों से मुक्त होकर सब मनोरथों को प्राप्त करता है । महीपाल !
जो ब्राह्मण को रहने के लिए घर देता है, विष्णु उसके ऊपर प्रसन्न होकर अपना लोक उसको दे देते हैं । जो
वेदज्ञ ब्राह्मण को दुधार गौ देता है वह ब्रह्मलोक को जाता है, जो दूसरों के लिए दुर्लभ है । पण्डित ! जो दूसरे से
दान लेकर भी दुधार गौ का दान करता है, उसके पुण्य का वर्णन करने में मैं समर्थ नहीं हूँ ॥८१-८५॥
जो वेद-विद् ब्राह्मण को कपिला गाय देता है, भूपाल ! वही रुद्र है और वही पाप मुक्त धार्मिक पुरुष है ।
जो मनुष्य द्विमुखी गौ (जो बच्चा जन रही हो) किसी ब्राह्मण को देता है और उससे उसको जो पुण्य मिलता
त्रयोदशोऽध्यायः ८७
तस्य पुण्यफलं राजञ्छृणु वक्ष्यामि तत्त्वतः । एकतः क्रतवः सर्वे समग्रवरदक्षिणाः ॥८८॥
एकतो भयभीतस्य प्राणिनः प्राणरक्षणम् । संरक्षति महीपाल यो विप्रं भयविह्वलम् ॥८९॥
स स्नातः सर्वतीर्थेषु सर्वयज्ञेषु दीक्षितः । वस्त्रदो रुद्रभवनं कन्यादो ब्रह्मणः पदम् ॥९०॥
हेमदो विष्णुभवनं प्रयाति स्वकुलान्वितः । यस्तु कन्यामलंकृत्य दद्यादध्यात्मवेदिने ॥९१॥
शतवंशसमायुक्तः स व्रजेद्ब्रह्मणः पदम् । कात्तिक्यां पौर्णमास्यां वा आषाढ्यां वापि भूपते ॥९२॥
वृषभं शिवतुष्ट्यर्थमुत्सृजेत्तत्फलं शृणु । सप्तजन्मार्जितैः पापैर्विमुक्तो रुद्ररूपभाक् ॥९३॥
कुलसप्ततिसंयुक्तो रुद्रेण सह मोदते । शिवलिङ्गाङ्कितं कृत्वा महिषं यः समुत्सृजेत् ॥९४॥
न तस्य यातनालोको भवेन्नृपतिसत्तम । ताम्बूलदानं यः कुर्याच्छक्तितो नृपसत्तम ॥९५॥
तस्य विष्णुः प्रसन्नात्मा दद्यादायुर्यशः श्रियम् । क्षीरोदो घृतदश्चैव मधुदो दधिदस्तथा ॥९६॥
दिव्याब्दयुतपर्यन्तं स्वर्गलोके महीयते । प्रयाति ब्रह्मसदनमिक्षुदाता नृपोत्तम ॥९७॥
गन्धदः पुण्यफलदः प्रयाति ब्रह्मणः पदम् । गुडेक्षुरसदश्चैव प्रयाति चोत्तमोत्तमम् ॥९८॥
घटानां जलदो याति सूर्यलोकमनुत्तमम् । विद्यादानेन सायुज्यं माधवस्य व्रजेन्नरः ॥९९॥
विद्यादानं महीदानं गोदानं चोत्तमोत्तमम् । नरकादुद्धरन्त्येव जपवाहनदोहनात् ॥१००॥
सर्वेषामपि दानानां विद्यादानं विशिष्यते । विद्यादानेन सायुज्यं विष्णोर्याति नृपोत्तम ॥१०१॥
नरस्त्विन्धनदानेन मुच्यते ह्युपपातकैः । शालग्रामशिलादानं महादानं प्रकीर्तितम् ॥१०२॥
है, उसकी गणना मैं सो वर्षों में भी नहीं कर सकता हूँ। राजन् ! उसके पुण्य फल को संक्षेप में कह रहा हूँ सुनो-
एक ओर अत्यन्त विपुल दक्षिणा वाले यज्ञों का फल और दूसरी ओर भयभीत प्राणियों की प्राण रक्षा करने का
फल, दोनों कदाचित् ही तुलना प्राप्त कर सकें। महीपाल ! जो भयाकुल विप्र की रक्षा करता है वह सब तीर्थों में
स्नान करने का और सब यज्ञों में दीक्षित होने का फल पा जाता है। वस्त्र दान देने वाला, रुद्रलोक को और
कन्यादान करने वाला ब्रह्मलोक को जाता है ॥८६-६०॥ सुवर्ण दान करने वाला अपने कुल के सहित
विष्णुलोक को चला जाता है। जो कन्या को अलङ्कारों से भूषित करके अध्यात्मज्ञानी ब्राह्मण को अर्पित कर
देता है, वह अपने सौ कुलों के सहित ब्रह्मलोक को चला जाता है। भूपते ! जो कार्तिक पूर्णिमा और आषाढ़ी
पूर्णिमा को शिव की प्रसन्नता के लिए साँड़ को छोड़ता है, उसके फल को सुनो-वह अपने सात जन्मों के पापों से
मुक्त हो कर रुद्र रूप हो जाता है और सत्तर कुलों के सहित रुद्रलोक में रुद्र के साथ आनन्द प्राप्त करता
है ॥६१-६३॥ नृपतिवर ! जो शिव लिंग का चिह्न भैंसे के शरीर पर बनाकर उसको छोड़ देता है उसको
किसी लोक में (नरक में) यातना नहीं दी जाती । नृपश्रेष्ठ ! जो शक्ति के अनुसार ताम्बूल दान करता है, उसके
ऊपर विष्णु प्रसन्न होकर उसको दीर्घायु, यश और सम्पत्ति प्रदान करते हैं। दूध दान करने वाला घी, मधु और
दही का दान करने वाला व्यक्ति सहस्र दिव्य वर्षों तक स्वर्ग लोक में पूजित होता है । नृपोत्तम ! गन्ना दान करने
वाला ब्रह्मलोक को जाता है, गन्ध और पवित्र फलों का दान करने वाला ब्रह्मपद को प्राप्त करता है। गुड़, गन्ना
और रस का दान करने वाला उत्तमोत्तम लोक को प्राप्त करता है ॥६४-६८॥ घड़ों का जल दान करने वाला उस
परमोत्तम सूर्यलोक को जाता है जहाँ वीर रणभूमि में मर कर जाते हैं। नर विद्या दान से माधव का सायुज्य प्राप्त
करता है। विद्या दान, भूदान और गोदान परमोत्तम दान हैं। जप, वाहन तथा दोहन दान से नरक से उद्धार होता
ही है । सब दानों में विद्यादान उत्तम दान है। नृपोत्तम ! विद्या दान से मनुष्य विष्णु का सायुज्य प्राप्त करता है।
मनुष्य इन्धन (लकड़ी) दान से सब उपपातकों से छूट जाता है। शालिग्राम शिला (वह पत्थर जिससे विष्णु की
मूर्ति बनती है)दान महादान कहा गया है। उस दान को देकर मनुष्य मोक्ष प्राप्त करता है। इसी प्रकार शिव लिङ्ग
१२-नार०
६८ नारदीयपुराणम्
यद्दत्त्वा मोक्षमाप्नोति लिङ्गदानं तथा स्मृतम् । ब्रह्माण्डकोटिदानेन यत्फलं लभते नरः ॥१०३॥
तत्फलं समवाप्नोति लिङ्गदानान्न संशयः । शालग्रामशिलादाने ततोऽपि द्विगुणं फलम् ॥१०४॥
शालग्रामशिलारूपी विष्णुरेवेति विश्रुतः । यो ददाति नरो दानं गृहेषु बहलां प्रभो ॥१०५॥
गङ्गास्नानफलं तस्य निश्चितं नृप जायते । रत्नान्वितसुवर्णस्य प्रदानेन नृपोत्तम ॥१०६॥
भुक्तिमुक्तिमवाप्नोति महादानं यतः स्मृतम् । नरो माणिक्यदानेन परं मोक्षमवाप्नुयात् ॥१०७॥
ध्रुवलोकमवाप्नोति वज्रदानेन मानवः । स्वर्गं विद्रुमदानेन रुद्रलोकमवाप्नुयात् ॥१०८॥
प्रयाति यानदानेन मुक्तादानेन चैन्द्रवम् । वैदूर्यदो रुद्रलोकं पुष्परागप्रदस्तथा ॥१०९॥
पुष्परागप्रदानेन सर्वत्र सुखमश्नुते । अश्वदो ह्यश्वसांनिध्यं चिरं व्रजति भूमिप ॥११०॥
गजदानेन महता सर्वान्कामानवाप्नुयात् । प्रयाति यानदानेन स्वर्गं स्वयनिमास्थितः ॥१११॥
महिषीदो जयत्येव ह्यपमृत्युं न संशयः । गवां तृणप्रदानेन रुद्रलोकमवाप्नुयात् ॥११२॥
वारुणं लोकमाप्नोति महीश लवणप्रदः । स्वाश्रमाचारनिरताः प्रयान्ति सदनं हरेः ॥११३॥
अदाम्भिका गतासूयाः प्रयान्ति ब्रह्मणः पदम् । परोपदेशनिरता वीतरागा विगतज्वराः ॥११४॥
हरिपादार्चनरताः प्रयान्ति सदनं हरेः । सत्सङ्गाह्लादनिरताः सत्कर्मसु सदोद्यताः ॥११५॥
परापवादविमुखाः प्रयान्ति हरिमन्दिरम् । नित्यं हितकरा ये तु ब्राह्मणेषु च गोषु च ॥११६॥
परस्त्रीसङ्गविमुखा न पश्यन्ति यमालयम् । जितेन्द्रिया जिताहारा गोषु क्षान्ताः सुशीलिनः ॥११७॥
ब्राह्मणेषु क्षमाशीलाः प्रयान्ति भवनं हरेः । अग्निशुश्रूषवश्चैव गुरुशुश्रूषकास्तथा ॥११८॥
दान का भी महत्त्व कहा गया है। कोटि ब्रह्माण्ड के दान से मनुष्य को जो फल मिलता है, वह फल निःसन्देह शिव
लिङ्ग के दान से प्राप्त हो जाता है। शालग्राम शिला के दान से उससे भी दूना फल मिलता है ॥१६६-१०४॥
शालग्राम शिला विष्णु का ही रूप है, ऐसा प्रसिद्ध है। प्रभो ! जो मनुष्य देव मन्दिरों में अपना अंश
(पाई हुई सम्पत्ति) दान करता है, नृप ! उसको अवश्य ही गंगा स्नान का फल मिलता है। नृप ! रत्न सहित
सुवर्ण के दान से मनुष्य भुक्ति और मुक्ति दोनों प्राप्त करता है; क्योंकि वह महादान माना गया है। मनुष्य
माणिक्य के दान से परम मोक्ष को प्राप्त करता है ॥१०५-१०७॥ मानव वज्रमणि के दान से ध्रुव लोक को,
विद्रुम (मूँगा) के दान से स्वर्ग को, यान दान से रुद्र लोक को और मुक्ता दान से इन्द्र-पद को प्राप्त करता है।
वैदूर्य मणि और पुष्पराग मणि के दान से रुद्र लोक की प्राप्ति होती है—और सर्वत्र सुख मिलता है। भूमिप !
अश्व का दान करने से मनुष्य चिर काल तक अश्व पाता रहता है। महान् गज के दान से सब कामनायें पूरी
होती हैं। सवारी के दान देने से मनुष्य स्वर्गीय विमानों पर आरूढ़ होकर स्वर्ग को जाता है ॥१०८-१११॥
भैंस का दान करने वाला अकाल मृत्यु से बचा रहता है और गौवों को घास खिलाने से रुद्र लोक मिलता है,
इसमें कुछ भी सन्देह नहीं। महीश ! नमक का दान करने से वरुण लोक प्राप्त होता और अपने कुलाचार को
पालन करने वाले, सब प्राणियों के हित में लगे रहने वाले, शुद्ध हृदय, निष्कपट और उदार व्यक्ति ब्रह्मलोक को
प्राप्त करते हैं। परोपदेश में लीन रहने वाले वीतराग, मात्सर्य हीन और हरि की पूजा में सदा तत्पर रहने
वाले जन विष्णु लोक को पाते हैं। सत्संग सुख के भोग करने तथा सत्कर्म करने के लिए सदा उद्यत रहने वाले और
पर निन्दा से विमुख रहने वाले विष्णु-भवन में स्थान पाते हैं ॥११२-११५॥
गो ब्राह्मण का नित्य हित करने वाले और पर स्त्री को माता के समान समझने वाले कभी भी यमलोक
को नहीं जाते हैं। जितेन्द्रिय, क्षुधा को वश में करने वाले, गौओं पर कभी भी क्रोध न करने वाले, सुशील और
ब्राह्मणों पर सर्वदा क्षमा का व्यवहार करने वाले व्यक्ति हरि-भवन को जाते हैं। अग्नि की पूजा एवं गुरु सेवा में
त्रयोदशोऽध्यायः ६६
पतिशुश्रूषणरता न वै संसृतिभागिनः । सदा देवार्चनरता हरिनामपरायणाः ॥११६॥
प्रतिग्रहविवृत्ताश्च प्रयान्ति परमं पदम् । अनाथं विप्रकुणपं ये दहेयुर्नृपोत्तम ॥१२०॥
अश्वमेधसहस्राणां फलमश्नुवते सदा । पत्रैः पुष्पैः फलैर्वापि जलैर्वा मनुजेश्वर ॥१२१॥
पूजया सहितं लिङ्गमर्चयेत्तत्फलं शृणु । अप्सरोगणगन्धर्वैः स्तूयमानो विमानगः ॥१२२॥
प्रयाति शिवसान्निध्यमित्याह कमलोद्भवः । चुलुकोदकमात्रेण लिङ्गं संस्नाप्य भूमिप ॥१२३॥
लक्षाश्वमेधजं पुण्यं संप्राप्नोति न संशयः । पूजया रहितं लिङ्गं कुसुमैर्योऽर्चयेत्सुधीः ॥१२४॥
अश्वमेधायुतफलं लभेतस्य जनेश्वर । भक्ष्यैर्भोज्यैः फलैर्वापि शून्यं लिङ्गं प्रपूज्य च ॥१२५॥
शिवसायुज्यमाप्नोति पुनरावृत्तिवर्जितम् । पूजया रहितं विष्णुं योऽर्चयेदर्कवंशज ॥१२६॥
जलेनापि स सालोक्यं विष्णोर्याति नरोत्तम । देवतायतने यस्तु कुर्यात्संमार्जनं सुधीः ॥१२७॥
यावत्पांसु युगावासं वैष्णवे मन्दिरे लभेत् । शीर्णं स्फटिकलिङ्गं तु यः संदध्यान्नृपोत्तम ॥१२८॥
शतजन्मार्जितैः पापैर्मुच्यते स तु मानवः । यस्तु देवालये राजन्नपि गोचर्ममात्रकम् ॥१२६॥
जलेन सिञ्चेद्भूभागं सोऽपि स्वर्गं लभेन्नरः । गन्धोदकेन यः सिञ्चद्देवतायतने भुवम् ॥१३०॥
यावत्कणानुकल्पं तु तिष्ठेत देवसन्निधौ । मृदा धातुविकारैर्वा यो लिम्पेद्देवतागृहम् ॥१३१॥
स कोटिकुलमुद्धृत्य याति साम्यं मधुद्विषः । शिलाचूर्णेन यो मर्त्यो देवागारं तु लेपयेत् ॥१३२॥
निरत रहने वाले, पतिव्रता स्त्रियाँ, सदा देव पूजा में लीन रहने वाले एवं हरि कीर्तन परायण व्यक्ति संसार-
बन्धन में नहीं पड़ते । नृपोत्तम ! कभी भी दान न लेने वाला व्यक्ति परम पद को प्राप्त करता है और जो अनाथ
ब्राह्मण के शव दाह करता है वह सर्वदा सहस्र अश्वमेध का फल भोगता है । मनुजेश्वर ! जो पत्र, पुष्प, फल अथवा
केवल जल से भी भक्ति पूर्वक शिवलिङ्ग की पूजा करता है, उसका फल सुनो ॥११६-१२११/२॥ वह विमान पर
पर आरूढ़ होकर शिव के समीप जाता है और अप्सरा एवं गन्धर्व उसकी स्तुति करते हैं, ऐसा ब्रह्मा ने कहा है ।
भूमिपाल ! केवल एक चुल्लू जल से जो ऐसे शिवलिङ्ग की, जिसकी पूजा न होती हो-पूजा करता है वह लाख
अश्वमेध यज्ञ का फल पाता है। जो बुद्धिमान् ऐसे लिङ्ग की, जिसकी पूजा न होती हो, फूलों से पूजा करता है,
उसको सहस्र अश्वमेध का फल मिलता है। फल अथवा किसी प्रकार के भोजन योग्य पदार्थ से जो शून्य¹ लिङ्ग
की पूजा करते हैं वे आवागमन से रहित शिव की सायुज्य मुक्ति प्राप्त करते हैं । सूर्य-वंश में उत्पन्न ! इसी
प्रकार ऐसी विष्णु मूर्ति की, जिसकी बहुत दिनों से जो पूजा न होती हो, जल से पूजा करता है, नरोत्तम ! वह
विष्णु का सालोक्य प्राप्त करता है। जो सुधी मन्दिर में सफाई का कार्य करता है वह धूलि के कणों के बराबर
युग तक विष्णु मन्दिर में निवास करता है ॥१२२-१२७१/२॥ नृपोत्तम ! जो मनुष्य टूटे हुए स्फटिक के शिव लिङ्ग
को पुनः जोड़ कर यथारूप कर देता है वह अपने सौ जन्म के पापों से भी छूट जाता है । राजन् ! जो व्यक्ति
देवालय में गोचर्म परिमित (एक चरमा) भूमि को जल से सींचता है वह भी स्वर्ग को जाता है। जो सुगन्धित
जल से देव मन्दिर के अन्तःकक्ष या आंगन को सींचता है वह देव विष्णु के समीप उस देव भूमि के कण परिमाण
के बराबर कल्प तक रहता है। जो देव मन्दिर को मिट्टी या किसी धातु विकार (गेरु) आदि से लीपते हैं वे
अपने करोड़ कुलों का उद्धार कर मधुसूदन के समान रूप पाते हैं। जो मनुष्य शिला चूर्ण (पत्थर के चूने) से
देव मन्दिर को लीपता या लिपाता है या स्वस्तिक चिह्न आदि बनवाता है उसको अनन्त पुण्य मिलता है ।
१. जो एकान्त में पड़ा हो, जिस पर कभी पूजन की सामग्री न दी गई हो ।
१०० नारदीयपुराणम्
स्वस्तिकादीनि वा कुर्यात्तस्य पुण्यमनन्तकम् । यः कुर्याद्दीपरचनां देवायतने नृप ॥१३३॥
तस्य पुण्यं प्रसंख्यातुं नोत्सहेऽब्दशतैरपि । अखण्डदीपं यः कुर्याद्विष्णोर्वा शंकरस्य च ॥१३४॥
क्षणे क्षणेऽश्वमेधस्य फलं तस्य न दुर्लभम् । अर्चितं शंकरं दृष्ट्वा विष्णुं वापि नमेत्तु यः ॥१३५॥
स विष्णुभवनं प्राप्य मोदते च युगायुतम् । देव्याः प्रदक्षिणामेकां सप्त सूर्यस्य भूमिय ॥१३६॥
तिस्रो विनायकस्यापि चतस्रो विष्णुमन्दिरे । कृत्वा तत्तद्गृहं प्राप्य मोदते युगलक्षकम् ॥१३७॥
यो विष्णोर्भक्तिभावेन तथैव गोद्विजस्य च । प्रदक्षिणां चरेत्तस्य ह्यश्वमेधः पदे पदे ॥१३८॥
काश्यां माहेश्वरं लिङ्गं संपूज्य प्रणमेत्तु यः । न तस्य विद्यते कृत्यं संसृतिर्नैव जायते ॥१३९॥
शिवं प्रदक्षिणं कृत्वा सव्येनैव विधानतः । नरो न च्यवते स्वर्गाच्छंकरस्य प्रसादतः ॥१४०॥
स्तुत्वा स्तोत्रैर्जगन्नाथं नारायणमनामयम् । सर्वान्कामानवाप्नोति मनसा यद्यदिच्छति ॥१४१॥
देवायतने यस्तु भक्तियुक्तः प्रनृत्यति । गायते वा स भूपाल रुद्रलोके च मुक्तिभाक् ॥१४२॥
ये तु वाद्यं प्रकुर्वन्ति देवायतने नराः । ते हंसयानमारूढा व्रजन्ति ब्रह्मणः पदम् ॥१४३॥
करतालं प्रकुर्वन्ति देवायतने तु ये । ते सर्वपापनिर्मुक्ता विमानस्था युगायुतम् ॥१४४॥
देवायतने ये तु घण्टानादं प्रकुर्वते । तेषां पुण्यं निगदितुं न समर्थः शिवः स्वयम् ॥१४५॥
भेरी मृदङ्गपटहमुुरजैश्च सडिण्डिमैः । संप्रीणयन्ति देवेशं तेषां पुण्यफलं शृणु ॥१४६॥
देवस्त्रीगणसंयुक्ताः सर्वकामैः समर्पिताः । स्वर्गलोकमनुप्राप्य मोदन्ते कल्पपञ्चकम् ॥१४७॥
देवतामन्दिरे कुर्वन्नरः शङ्खरवं नृप । सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुना सह मोदते ॥१४८॥
नृप ! जो देव मन्दिर में दीप रचना करता है, उसके पुण्य की गणना सौ वर्षों में भी नहीं की जा सकती है ।
॥१२८-१३३॥
जो विष्णु या शंकर के समीप अखण्ड दीप जलाता है, उसके लिए क्षण-क्षण में अश्वमेध का फल मिलना
दुर्लभ नहीं है अर्थात् उसको क्षण-क्षण में अश्वमेध-फल मिलता है। जो पूजित शंकर या विष्णु की प्रतिमा को देखकर
प्रणाम करता है, वह विष्णु लोक में जाकर सहस्र युग तक आनन्द प्राप्त करता है। भूमिप ! जो देवी की एक
बार, सूर्य की सात बार, गणेश की तीन बार और विष्णु मन्दिर में चार बार प्रदक्षिणा करता है, वह लाख युगों
तक उन-उन देव लोकों में आनन्द पूर्वक निवास करता है ॥१३४-१३७॥ जो व्यक्ति भक्ति पूर्वक विष्णु, गौ, और
ब्राह्मण की प्रदक्षिणा करता है वह पग-पग में अश्वमेध का फल प्राप्त करता है । जो काशी में विश्वनाथ की पूजा
कर प्रणाम करता है, उसके पुण्य की गणना नहीं की जा सकती और वह कभी भी संसार में जन्म नहीं लेता । जो
विधान पूर्वक दक्षिण विधि से शिव की प्रदक्षिणा करता है, वह शंकर की कृपा से कभी भी स्वर्ग से च्युत नहीं
होता है । मनुष्य निर्विकार नारायण जगन्नाथ की स्तोत्रों से स्तुति करता है वह उन अपनी सभी मनः कामनाओं
को प्राप्त करता है ॥१३८-१४१॥ भूपाल ! जो देव मन्दिरों में भक्ति पूर्वक नाचता या गाता है वह मुक्ति लाभ
कर रुद्रलोक में जाता है । जो मनुष्य देव मन्दिर में बाजा बजाता है, वह हंसयान पर आरूढ़ होकर ब्रह्मलोक को
जाता है । जो देव मन्दिर में ताली बजाते हैं वे सब पापों से मुक्त होकर सहस्र युग तक विमानारोही देवता
होते हैं । जो देव मन्दिर में घण्टा बजाते हैं उनके पुण्यों को स्वयं शिव भी कहने में समर्थ नहीं हैं ॥१४२-१४५॥
जो भी मृदङ्ग , पटह, मुरज और ढोल से देवेश को प्रसन्न करते हैं, उनके पुण्य-फल को सुनिए । वे देव कन्याओं
के सहित अपनी मनः कामनाओं को प्राप्त करते हैं और स्वर्ग में जाकर पाँच कल्प तक निवास करते हैं । नृप !
जो मनुष्य देव मन्दिर में शंख बजाता है, वह अपने सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक में निवास करता है ।
चतुर्दशोऽध्यायः १०१
तालकांस्यादिनिनदं कुर्वन् विष्णुगृहे नरः । सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकमवाप्नुयात् ॥१४६॥
यो देवः सर्वदृग्विष्णुर्ज्ञानरूपी निरञ्जनः । सर्वधर्मफलं पूर्णं संतुष्टः प्रददाति च ॥१५०॥
यस्य स्मरणमात्रेण देवदेवस्य चक्रिणः । सफलानि भवन्त्येव सर्वकर्माणि भूपते ॥१५१॥
परमात्मा जगन्नाथः सर्वकर्मफलप्रदः । सत्कर्मकर्तृभिर्नित्यं स्मृतः सर्वार्तिनाशनः ॥
तमुद्दिश्य कृतं यच्च तदानन्त्याय कल्पते ।१५२॥
धर्माणि विष्णुश्च फलानि विष्णुः कर्माणि विष्णुश्च फलानि भोक्ता ।
कार्यं च विष्णुः करणानि विष्णुरस्मान्न किंचिद्व्यतिरिक्तमस्ति ॥१५३॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे धर्मानुकथनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥१३॥
अथ चतुर्दशोऽध्यायः
धर्मराज उवाच
श्रुतिस्मृत्युदितं धर्मं वर्णानामनुपूर्वशः । प्रवक्ष्यामि नृपश्रेष्ठ तं शृणुष्व समाहितः ॥१॥
यो भुञ्जानोऽशुचिर्वापि चाण्डालं पतितं स्पृशेत् । क्रोधादज्ञानतो वापि तस्य वक्ष्यामि निष्कृतिम् ॥२॥
त्रिरात्रं वाथ षड्रात्रं यथासंख्यं समाचरेत् । स्नानं त्रिषवणं विप्र पञ्चगव्येन शुध्यति ॥३॥
भुञ्जानस्य तु विप्रस्य कदाचित्स्रवते गुदम् । उत्तिष्ठेत्त्वेऽशुचित्वे च तस्य शुद्धिं वदामि ते ॥४॥
मनुष्य विष्णु मन्दिर में ताल, कांस्य (झाल) आदि बाजे बजाकर सब पापों से छूट जाता है और विष्णुलोक को प्राप्त
करता है। जो विष्णु ज्ञान स्वरूप, निरञ्जन और सब को देखने वाले हैं वे प्रसन्न होने पर सब धर्म-फलों को पूर्ण
रूप से प्रदान करते हैं ॥१४६-१५०॥ भूपते ! जिस देवाधि-देव चक्रधर विष्णु के स्मरण मात्र से सब कार्य पूर्ण हो
जाते हैं और जो देव परमात्मा, जगन्नाथ, सब मनोरथों को देने वाले और जिनके स्मरण मात्र से सत्कर्म करने
वाले मनुष्यों की सारी विपदायें नष्ट हो जाती हैं, उनके उद्देश्य से जो कुछ कार्य किया जाता है वह अनन्त फल
को प्रदान करने में समर्थ होता है । विष्णु ही सब धर्म, सब फल, सब कर्म और सब फलों के भोग करने वाले
हैं । वे ही कार्य और वे ही कारण भी हैं । इस भगवान् विष्णु को छोड़कर इस संसार में दूसरा कुछ नहीं है ।
॥१५१-१५३॥
"श्री नारदीय महापुराण में धर्मानुकथन नामक तेरहवां अध्याय समाप्त ॥१३॥
अध्याय १४
पापों का प्रायश्चित्त तथा श्राद्ध-पञ्चक निरूपण
धर्मराज बोले-नृपश्रेष्ठ ! अब मैं श्रुतिस्मृति में कहे गए वर्णों के धर्म को अक्षरशः कह रहा हूँ, उसको
ध्यान पूर्वक सुनो । जो भोजन करते समय क्रोध-वश या अज्ञान-वश अपवित्र, पतित या चाण्डाल को छू देता है,
उसका प्रायश्चित्त कहता हूँ । वह तीन रात या छह रात्रि तक व्रत रखे और तीनों काल स्नान करे और पंच गव्य
पान करे तब वह शुद्ध होता है ॥१-३॥ यदि कदाचित् भोजन करते समय किसी ब्राह्मण को मल स्राव हो जाय