बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 109, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें६० नारदीयपुराणम्
उपदेष्टा स्वयं चासौ धर्मकार्यस्य भूपते। तस्माद्धर्मविमानं तु समारोढुमिहार्हति ॥८२॥
इत्युक्ते चित्रगुप्तेन समाज्ञप्तो मया नृप। विमानं धर्मसंज्ञं तु आरोढुं बुद्धिसাগরः ॥८३॥
अथ कालान्तरे राजन्स राजावीरभद्रकः। मृतो ऽतो मम स्थानं नमश्चक्रे मुदान्वितः ॥८४॥
मया तु तत्र तस्यापि पृष्टं कर्माखिलं नृप। कथितं चित्रगुप्तेन धर्मं संसर्गसंभवम् ॥८५॥
तदा सम्यङ्मया राजा बोधितोऽद्यथा शृणु। अधित्यकायां भूपाल सैकतस्य गिरेः पुरा ॥८६॥
लावकेनामुना चञ्च्वा खातं द्व्यङ्गुलमम्बुनि। ततः कालान्तरे तेन वाराहेण नृपोत्तम ॥८७॥
खनितं हस्तमात्रं तु जलं तुण्डेन चात्मनः। ततोऽन्यदाऽमुया कात्या हस्तयुग्ममितः कृतः ॥८८॥
खातो जले महाराज तोयं मासद्वयं स्थितम्। पीतं क्षुद्रैर्वनेचरैः सत्त्वैस्तृष्णासमाकुलैः ॥८९॥
ततो वर्षत्रयान्ते तु गजेनानेन सुव्रत। हस्तत्रयमितः खातः कृतस्तत्राधिकं जलम् ॥९०॥
मासत्रयं स्थितं तच्च पयो जीवैर्वनेचरैः। भवांस्तत्र समायातो जलशोषानन्तरम् ॥९१॥
मासे तत्र तु संप्राप्तं हस्तं खात्वा जलं नृप। ततस्तयोपदेशेन मन्त्रिणो नृपते त्वया ॥९२॥
पञ्चाशद्धनुरुत्खातं जातं तत्र महाजलम्। पुनः शिलाभिः सुदृढं बद्धं जातं महत्सरः।
वृक्षाश्च रोपितास्तत्र सर्वलोकोपकारिणः ॥९३॥
तेन स्वस्वेन पुण्येन पञ्चैते जगतीपते। विमानं धर्म्यमारूढास्त्वमप्येनं समारुह ॥९४॥
इति वाक्यं समाकर्ण्य मम राजा स भूमिप। आरुरोह विमानं तत्षष्ठो राजा समांशभाक् ॥९५॥
स्वयं भूपति को धर्म कार्य करने का उपदेश दिया है, अतः इस पुण्य के प्रभाव से यह धर्म-विमान पर आरोहण
करने का अधिकारी है ॥७५-८२॥ चित्रगुप्त के ऐसा कहने पर मैंने बुद्धिसাগর को धर्मनामक विमान पर
आरूढ़ होने का आदेश दे दिया। राजन् ! कुछ काल बीत जाने पर वह राजा वीरभद्रक भी मरकर मेरे यहाँ
गया और प्रसन्नतापूर्वक मेरे सामने प्रस्तुत हुआ। नृप ! मैंने भी उसके सब कर्त्तव्यों का लेखा पूछा। चित्र-
गुप्त ने उस सागर सम्बन्धी पुण्य को बताया ! उस समय हे राजन् ! मैंने जो कुछ उस राजा से कहा उसको
भली भाँति सुनो ॥८३-८५३॥
भूपाल ! पहले इस लावक पक्षी ने जल में अपनी चोंच से दो अङ्गुल का गड्डा खोद दिया, नृपोत्तम
कुछ समय के अनन्तर एक वाराह ने अपने थूथन से उसको एक हाथ लम्बा खोद डाला। तदनन्तर अन्य समय
इस काली ने उसको बढ़ाकर दो हाथ का बना डाला। उस गड्ढे में जो जल इकट्ठा हुआ उसको वन के प्यासे
क्षुद्र जीवों और अन्य प्राणी दो महीने तक पीते रहे। उत्तम व्रत वाले ! तदनन्तर तीन वर्ष बीत जाने पर इस
हाथी ने उसको तीन हाथ और अधिक खनकर बढ़ा दिया जिससे उसमें और अधिक जल इकट्ठा हो गया
॥८६-६०॥ उस जल से तीन मास तक जल के आधार पर जीने वाले जंगली पशुओं की प्यास बुझती रही।
यानी सूख जाने के बाद आप वहाँ पर आये। नृप ! उस समय उसको एक हाथ और खोदा गया और उसके
जल से अनुचरों की प्यास बुझाई गई। तत्पश्चात् नृपते ! उस समय मन्त्री के उपदेश से तुमने उसको पचास
धनुष (दो सौ-हाथ) लम्बा और उतना चौड़ा खुदवा दिया और वह झील के रूप में हो गया। पुनः पत्थरों से
चारों ओर बँध जाने के कारण वह एक बहुत बड़ा और रमणीय सरोवर हो गया। पुनः सबका भला करने
वाले वृक्ष भी किनारे पर लगा दिये गये ॥६१-६३॥ जगतीपते ! अपने-अपने उस पुण्य के प्रभाव से ये सभी धर्म
विमान पर आरूढ़ हो गये हैं। तुम भी इस विमान पर चढ़ो। मेरी इन बातों को सुनकर वह राजा, जो उस
पुण्य के समान अंश का छठा अधिकारी था, उस विमान पर आरूढ़ हुआ। तुमसे मैंने तड़ाग बनवाने से कुछ फल
होता है, उसको इस कथा के द्वारा कह दिया। इस आख्यान को सुनकर मनुष्य अपने जन्म-मरण के बन्धन में