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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 110, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 110

त्रयोदशोऽध्यायः ६१
इति ते सर्वमाख्यातं तडागजनितं फलम् । श्रुत्वैतन्मुच्यते पापादाजन्ममरणान्तिकात् ॥६६॥
यो नरः श्रद्धया युक्तो व्याख्यानं शृणुयात्पठेत् । सोऽप्याप्नोत्यखिलं पुण्यं सरोनिर्माणसंभवम् ॥६७॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे धर्माख्याने द्वादशोऽध्यायः ॥१२॥
अथ त्रयोदशोऽध्यायः
धर्मराज उवाच
देवायतनं यस्तु कुरुते कारयत्यपि । शिवस्यापि हरेर्वापि तस्य पुण्यफलं शृणु ॥१॥
मातुतः पितृतश्चैव लक्षकोटिकुलान्वितः । कल्पत्रयं विष्णुपदं तिष्ठत्येव न संशयः ॥२॥
मृदैव कुरुते यस्तु देवायतनं नरः । यावत्पुण्यं भवेत्तस्य तन्मे निगदतः शृणु ॥३॥
दिव्यदेहधरो भूत्वा विमानवरमास्थितः । कल्पत्रयं विष्णुपदे तिष्ठत्येव न संशयः ॥४॥
सृदैव कुरुते यस्तु देवायतनं नरः । यावत्पुण्यं भवेत्तस्य तन्मे निगदतः शृणु ॥५॥
दिव्यदेहधरो भूत्वा विमानवरमास्थितः । कल्पत्रयं विष्णुपदे स्थित्वा ब्रह्मपुरं व्रजेत् ॥६॥
कल्पद्वयं स्थितस्तत्र पुनः कल्पं वसेद्दिवि । ततस्तु योगिनामेव कुले जातो दयान्वितः ॥७॥
वैष्णवं योगमास्थाय मुक्तिं व्रजति शाश्वतीम् । दारुभिः कुरुते यस्तु तस्य स्याद्द्विगुणं फलम् ॥८॥
डालने वाले पापों से छूट जाता है। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इस आख्यान को पढ़ता है, वह भी सरोवर बनवाने
से जो कुछ फल मिलता है उसको प्राप्त करता है ॥६४-६८॥
श्रीनारदीयमहापुराण में धर्माख्यान नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त ॥१२॥
अध्याय १३
धर्मराज बोले—जो मनुष्य शिव अथवा विष्णु का मन्दिर बनवाता है या बनाता है, उसको कौन सा
पुण्य फल मिलता है, इसको सुनो ॥१॥
वह व्यक्ति मातृ और पितृ कुलकी लाखों पीढ़ियों के सहित तीन कल्प तक विष्णु लोक में रहता है, इसमें
सन्देह नहीं । जो केवल मिट्टी से ही देव-मन्दिर बनवाता है, उससे जो पुण्य होता है, उसको कह रहा हूँ
सुनो--वह व्यक्ति दिव्य रूप धारण कर उत्तम विमान पर आरूढ़ होता है और तीन कल्पों तक विष्णुलोक में
सुखोपभोग कर पुनः ब्रह्मलोक में चला आता है ॥२-६॥ वहाँ दो कल्प तक रहकर पुनः स्वर्ग में चला आता
और एक कल्प तक वहाँ रहता है । पुनः वह भाग्यशाली वहाँ से मृत्युलोक में आकर योगिकुल में जन्म लेता है
और वैष्णव योग को प्राप्त कर शाश्वत मुक्ति को प्राप्त करता है । जो लकड़ी से मन्दिर बनवाता है उसको
दूना फल मिलता है । ईंटों से मन्दिर बनवाने वाले को तिगुना और पत्थर से बनवाने वाले को चौगुना फल
मिलता है, स्फटिक शिला से बनाने वाले को दशगुना फल मिलता है । ताम्रपत्र से बनवाने वाले को सौगुना