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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 119

१०० नारदीयपुराणम्
स्वस्तिकादीनि वा कुर्यात्तस्य पुण्यमनन्तकम् । यः कुर्याद्दीपरचनां देवायतने नृप ॥१३३॥
तस्य पुण्यं प्रसंख्यातुं नोत्सहेऽब्दशतैरपि । अखण्डदीपं यः कुर्याद्विष्णोर्वा शंकरस्य च ॥१३४॥
क्षणे क्षणेऽश्वमेधस्य फलं तस्य न दुर्लभम् । अर्चितं शंकरं दृष्ट्वा विष्णुं वापि नमेत्तु यः ॥१३५॥
स विष्णुभवनं प्राप्य मोदते च युगायुतम् । देव्याः प्रदक्षिणामेकां सप्त सूर्यस्य भूमिय ॥१३६॥
तिस्रो विनायकस्यापि चतस्रो विष्णुमन्दिरे । कृत्वा तत्तद्गृहं प्राप्य मोदते युगलक्षकम् ॥१३७॥
यो विष्णोर्भक्तिभावेन तथैव गोद्विजस्य च । प्रदक्षिणां चरेत्तस्य ह्यश्वमेधः पदे पदे ॥१३८॥
काश्यां माहेश्वरं लिङ्गं संपूज्य प्रणमेत्तु यः । न तस्य विद्यते कृत्यं संसृतिर्नैव जायते ॥१३९॥
शिवं प्रदक्षिणं कृत्वा सव्येनैव विधानतः । नरो न च्यवते स्वर्गाच्छंकरस्य प्रसादतः ॥१४०॥
स्तुत्वा स्तोत्रैर्जगन्नाथं नारायणमनामयम् । सर्वान्कामानवाप्नोति मनसा यद्यदिच्छति ॥१४१॥
देवायतने यस्तु भक्तियुक्तः प्रनृत्यति । गायते वा स भूपाल रुद्रलोके च मुक्तिभाक् ॥१४२॥
ये तु वाद्यं प्रकुर्वन्ति देवायतने नराः । ते हंसयानमारूढा व्रजन्ति ब्रह्मणः पदम् ॥१४३॥
करतालं प्रकुर्वन्ति देवायतने तु ये । ते सर्वपापनिर्मुक्ता विमानस्था युगायुतम् ॥१४४॥
देवायतने ये तु घण्टानादं प्रकुर्वते । तेषां पुण्यं निगदितुं न समर्थः शिवः स्वयम् ॥१४५॥
भेरी मृदङ्गपटहमुुरजैश्च सडिण्डिमैः । संप्रीणयन्ति देवेशं तेषां पुण्यफलं शृणु ॥१४६॥
देवस्त्रीगणसंयुक्ताः सर्वकामैः समर्पिताः । स्वर्गलोकमनुप्राप्य मोदन्ते कल्पपञ्चकम् ॥१४७॥
देवतामन्दिरे कुर्वन्नरः शङ्खरवं नृप । सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुना सह मोदते ॥१४८॥
नृप ! जो देव मन्दिर में दीप रचना करता है, उसके पुण्य की गणना सौ वर्षों में भी नहीं की जा सकती है ।
॥१२८-१३३॥
जो विष्णु या शंकर के समीप अखण्ड दीप जलाता है, उसके लिए क्षण-क्षण में अश्वमेध का फल मिलना
दुर्लभ नहीं है अर्थात् उसको क्षण-क्षण में अश्वमेध-फल मिलता है। जो पूजित शंकर या विष्णु की प्रतिमा को देखकर
प्रणाम करता है, वह विष्णु लोक में जाकर सहस्र युग तक आनन्द प्राप्त करता है। भूमिप ! जो देवी की एक
बार, सूर्य की सात बार, गणेश की तीन बार और विष्णु मन्दिर में चार बार प्रदक्षिणा करता है, वह लाख युगों
तक उन-उन देव लोकों में आनन्द पूर्वक निवास करता है ॥१३४-१३७॥ जो व्यक्ति भक्ति पूर्वक विष्णु, गौ, और
ब्राह्मण की प्रदक्षिणा करता है वह पग-पग में अश्वमेध का फल प्राप्त करता है । जो काशी में विश्वनाथ की पूजा
कर प्रणाम करता है, उसके पुण्य की गणना नहीं की जा सकती और वह कभी भी संसार में जन्म नहीं लेता । जो
विधान पूर्वक दक्षिण विधि से शिव की प्रदक्षिणा करता है, वह शंकर की कृपा से कभी भी स्वर्ग से च्युत नहीं
होता है । मनुष्य निर्विकार नारायण जगन्नाथ की स्तोत्रों से स्तुति करता है वह उन अपनी सभी मनः कामनाओं
को प्राप्त करता है ॥१३८-१४१॥ भूपाल ! जो देव मन्दिरों में भक्ति पूर्वक नाचता या गाता है वह मुक्ति लाभ
कर रुद्रलोक में जाता है । जो मनुष्य देव मन्दिर में बाजा बजाता है, वह हंसयान पर आरूढ़ होकर ब्रह्मलोक को
जाता है । जो देव मन्दिर में ताली बजाते हैं वे सब पापों से मुक्त होकर सहस्र युग तक विमानारोही देवता
होते हैं । जो देव मन्दिर में घण्टा बजाते हैं उनके पुण्यों को स्वयं शिव भी कहने में समर्थ नहीं हैं ॥१४२-१४५॥
जो भी मृदङ्ग , पटह, मुरज और ढोल से देवेश को प्रसन्न करते हैं, उनके पुण्य-फल को सुनिए । वे देव कन्याओं
के सहित अपनी मनः कामनाओं को प्राप्त करते हैं और स्वर्ग में जाकर पाँच कल्प तक निवास करते हैं । नृप !
जो मनुष्य देव मन्दिर में शंख बजाता है, वह अपने सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक में निवास करता है ।