बृहद्देशी (मतंग मुनि - राग-पद्धति का विश्व में सर्वप्रथम प्रतिपादक ग्रन्थ)
The Brihaddeshi of Sri Matanga Muni
मतंग मुनि (सम्पादक: के. साम्बशिव शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[स्वरनिर्णयः।] [२३]
ग्रामे। गरिसनिधपमा ऊर्ध्वा मध्यमग्रामे १। एवं तावदुभयग्रा-
मिक्यश्चतुर्दश मूर्च्छनाः सम्पूर्णाः—सरिगमपधनि। निसरि-
गमपध। धनिसरिगमप। पधनिसरिगम। मपधनिसरिग।
गमपधनिसरि। रिगमपधनिस इति षड्जग्रामे। मपधनि-
सरिग। गमपधनिसरि। रिगमपधनिस। सरिगमपधनि। निस-
रिगमपध। धनिसरिगमप। पधनिसरिगम। इति मध्यम-
ग्रामे। मूर्च्छनामण्डलम् —
| नि | ध | प | म | ग | रि | स |
| ध | प | म | ग | रि | स | नि |
| प | म | ग | रि | स | नि | ध | इति षड्जग्रामे
| म | ग | रि | स | नि | ध | प | मूर्च्छनामण्डलम्।
| ग | रि | स | नि | ध | प | म |
| रि | स | नि | ध | प | म | ग |
| स | नि | ध | प | म | ग | रि |
| ग | रि | स | नि | ध | प | म |
| रि | स | नि | ध | प | म | ग |
| स | नि | ध | प | म | ग | रि | इति मध्यमग्रामे
| नि | ध | प | म | ग | रि | स | मूर्च्छनामण्डलम्।
| ध | प | म | ग | रि | स | नि |
| प | म | ग | रि | स | नि | ध |
| म | ग | रि | स | नि | ध | प |
एवं तावदुभयग्रामिक्यश्चतुर्दशमूर्च्छनाः सम्पूर्णाः
कथिताः। इदानीं तासां नामानि कथ्यन्ते—
१. 'मे। नियगूर्ध्वा अपि स्युः। एवं' क. पाठः.