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सर्वकोश
बृहद्देशी (मतंग मुनि - राग-पद्धति का विश्व में सर्वप्रथम प्रतिपादक ग्रन्थ)

बृहद्देशी (मतंग मुनि - राग-पद्धति का विश्व में सर्वप्रथम प्रतिपादक ग्रन्थ)

The Brihaddeshi of Sri Matanga Muni

मतंग मुनि (सम्पादक: के. साम्बशिव शास्त्री) द्वारा

DevanagariSanskritpublished175 पृष्ठ

पृष्ठ 121, कुल 175 में से

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पृष्ठ 121

:
गार्गिग्नसासा or गार्निनिसासा?
Let's look at line 12 very carefully:
ध ा न ि स ा स ा स ध ा न ी ग ा र ी ग ा [भा/मा?] त्रा ग न ि स ा न ी [गार्गि / गार्नि?] न् गि [or न्नि?] स ा स ा । न ि -
Wait, look at "गार्गिग्निसासा":
Is that 'ग्न'? Look: ग with न below it: 'ग्न'!
Wait, could it be 'गार्गिग्निसासा'?
Let's look at the letters:
ग + ा + र् = गार्
then 'गि' or 'नि'? It has 'ि' matra.
then 'ग्न' with 'ि' matra? 'ग्नि'!
then 'स' + 'ा' + 'स' + 'ा' = सासा.
Yes: गार्गिग्निसासा or गार्निग्निसासा!

धावामागारीगासा । मानीधनीधासा । छेवाज
Wait, the last word of line 13:
छेवाज or छेवाजा?
It is छेवाज!
Wait, "छेवाज" is the name of the next Bhasha or Vibhasha!
Yes, "छेवाज" (Chhevāja) or "छे