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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२५४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

नीचे को ओर अपना मुख करके चिन्तन करने वाले प्रभु शंकर हो गये थे
।४७। इसी अन्तर में जगदम्बा देवी दुर्गा विस्मित होती हुई अत्यधिक हँस
गयी थीं। और हे महाराज ! बैर के साधक उस भार्गव राम से बोली ।४८।
जगदम्बा ने कहा था कि हे तपस्विन् ! द्विज के पुत्र ! क्या तुम इस
भूमण्डल को भूपों से विहीन करने की इच्छा कर रहे हो ? और वह भी
एक-दो बार नहीं प्रत्युत कोप से इक्कीस बार ऐसा करना चाहते हो । हे
बटो ! यह तो आपका एक बहुत ही महान साहस है ।४६।

हंतुमिच्छसि निःशस्त्रः सहस्रार्जुनमीश्वरम् ।
भ्रूभंगलीलया येन रावणोऽपि निराकृतः ॥५०
तस्मै प्रदत्तं दत्तेन श्रीहरेः कवचं पुरा ।
शक्तिरत्यर्थवीर्या च तं कथं हंतुमिच्छसि ॥५१
शंकरः करुणासिद्धः कत्तुं चाप्यन्यथा विभुः ।
न चान्यः शंकरात्पुत्र सत्कार्यं कत्तुं मीश्वरः ॥५२
अथ देव्या अनुमतिं प्राप्य शंभुद्द यार्णवः ।
अभ्यधाद्भद्रया वाचा जमदग्निसुतं विभु ॥५३

शिव उवाच-
अद्यप्रभृति विप्र त्वं मम स्कन्दसमो भव ।
दास्यामि मंत्रं दिव्यं ते कवचं च महामते ॥५४
लीलया यत्प्रसादेन कार्त्तवीर्यं हनिष्यसि ।
त्रिःसप्तकृत्वो निर्भू पां महीं चापि करिष्यसि ॥५५
इत्युक्त वा शंकरस्तस्मै ददौ मंत्रं सुदुर्लभम् ।
त्रैलोक्यविजयं नाम कवचं परमाद्भुतम् ॥५६

उस राजा सहस्रार्जुन का बिना ही शस्त्रों वाले होते हुए तुम हनन
करने की इच्छा कर रहे हो जिसने अपनी भ्रूभङ्ग की लीला से अर्थात्
जरा सी भृकुटी तिरछी करके रावण जैसे महापराक्रमी को भी निराहत कर
दिया था अर्थात् अपने सामने निराहत करके भगा दिया था ।५०। उस
राजा को तो पहिले दत्तात्रेय मुनि ने श्री हरि का कवच प्रदान किया था
और अत्यन्त वीर्य से समन्वित एक शक्ति भी उसके लिए दी थी । उसको