सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 249, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 249

परशुराम का शिवाराधन ] [ २५३

मया सह सुदुःखार्त्तान्भ्रातॄन्मात्रा सहैव मे ।
सान्त्वयित्वा स मंत्रज्ञोऽजीवयत्पितरं मम ॥४३
आनामते भृगौ मातुर्दुःखेनाहं प्रकोपितः ।
प्रतिज्ञां कृतवान्देव सांत्वयन्मातरं स्वकाम् ॥४४
त्रिःसप्तकृत्वो यदुरस्ताडितं मातुरात्मनः ।
तावत्संख्यमहं पृथ्वीं करिष्ये क्षत्रवर्जिताम् ॥४५
इत्येवं परिपूर्णा मे कर्त्ता देवो जगत्पतिः ।
महादेवो ह्यतो नाथ त्वत्सकाशमिहागतः ॥४६
वसिष्ठ उवाच--
इत्येवं तद्वचः श्रुत्वा दृष्ट्वा दुर्गामुखं हरः ।
बभूवानम्रवदनश्चिन्तयानः क्षणं तदा ॥४७
एतस्मिन्नंतरे दुर्गा विस्मिता प्राहसद्भृशम् ।
उवाच च महाराज भार्गवं वैरसाधकम् ॥४८
तपस्विन्द्विजपुत्र क्षमां निर्मूलां कर्त्तुमिच्छसि ।
त्रिः सप्तकृत्वः कोपेन साहसस्ते महाम्बटो ॥४९

उस समय में मैं रुदन कर रहा था और अपनी माता के साथ मेरे सब भाई भी क्रन्दन कर रहे थे। उस मन्त्र शास्त्र के ज्ञाता मुनि ने सबको सान्त्वना देकर मेरे मृत पिता जमदग्नि को संजीवनी विद्या से जीवित कर दिया था।४३। जब तक भृगु मुनि वहाँ पर नहीं आये थे उस बीच में मैं माता के वैधव्य के दुःख से बहुत ही कुपित हो गया था। हे देव! मैंने अपनी माता को सान्त्वना देते हुए एक प्रतिज्ञा कर डाली थी।४४। मेरी माता ने करुण क्रन्दन करते हुई ने जो इक्कीस वार अपना उरःस्थल ताड़ित किया था उसी गणना को लेकर ही मैंने यह प्रतिज्ञा की थी कि इक्कीस वार ही मैं इस पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित कर दूँगा।४५। यह इस रीति से की हुई मेरी प्रतिज्ञा परिपूर्ण हो जावे--इसके पूर्ण करने वाले जगत् के पति देवेश्वर आप ही हैं। आप तो सब से बड़े देव हैं। हे नाथ! इसीलिए मैं अब आपके चरणों की सन्निधि में यहाँ पर आया हूँ।४६। वसिष्ठजी ने कहा--भगवान् शंकर ने इस प्रकार से उस राम के वचनों का श्रवण करके जगज्जननी दुर्गा के मुख की ओर देखा था और उस समय में एक क्षण के लिए