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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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परशुराम का शिवाराधन ] [ २५५

तुम किस प्रकार से मार देना चाहते हो ? ।५१। भगवान् शंकर तो करुणा
के अथाह सागर हैं और करुणा से ही सिद्ध हो जाते हैं। यह विभु तो परम
समर्थ हैं सभी कुछ अन्यथा भी कर सकते हैं। हे पुत्र ! भगवान् शंकर के
अतिरिक्त अन्य कोई भी इस कार्य के करने में समर्थ नहीं है ।५२। इसके
अनन्तर देवी के इन वचनों से दया के सागर भगवान् शम्भु ने दुर्गा देवी की
भी अनुमति प्राप्त कर ली थी और फिर विभु शम्भु ने जमदग्नि के पुत्र से
परम भद्र वाणी के द्वारा कहा था ।५३। भगवान शिव ने कहा-हे विप्र !
आज से लेकर तुम मेरे पुत्र कार्तिकेय के समान हो जाओगे। हे महान् मति
वाले ! मैं आपको परम दिव्य मन्त्र और कवच दे दूँगा ।५४। योंही बिनाही
किसी आयास के लीला ही से जिनके प्रसाद के प्रभाव से आप कार्त्तवीर्य
का हनन कर दोगे और जैसी तुम्हारी प्रतिज्ञा है वह भी पूर्ण होगी और
इक्कीस बार इस पृथ्वी को भी भूपों से रहित तुम कर दोगे ।५५। इतना यह
इस रीति से कहकर भगवान् शम्भु ने उस परशुराम के लिए सुदुर्लभ मन्त्र
प्रदान कर दिया था और तीनों लोकों का विजय करने वाला परम अद्भुत
कवच भी उसे दे दिया था ।५६।

नागपाशं पाशुपतं ब्रह्मास्त्रं च सुदुर्लभम् ।
नारायणास्त्रमाग्नेयं वायव्यं वारुणं तथा ॥५७
गांधर्वं गारुडं चैव जृंभणास्त्रं महाद्भुतम् ।
गदां शक्तिं च परशुं शूलं दण्डमनुत्तमम् ॥५८
शस्त्रास्त्रग्राममखिलं प्रहृष्टः संबभूव ह ।
नमस्कृत्य शिवं शांतं दुर्गा स्कन्दं गणेश्वरम् ॥५९
परिक्रम्य ययौ रामः पुष्करं तीर्थमुत्तमम् ।
सिद्धं कृत्वा शिवोक्तं तु मन्त्रं कवचमुत्तमम् ॥६०
साधयामास निखिलं स्वकार्यं भृगुनन्दनः ।
निहत्य कार्त्तवीर्यं तं ससैन्यं सकुलं मुदा ।
विनिवृत्तो गृहं प्रागात्पितुः स्वस्य भृगूद्वहः ॥६१

नागपाश—पाशुपत और सुदुर्लभ ब्रह्मास्त्र—नारायणास्त्र—आग्नेय
—वायव्य-वारुण अस्त्र भी दिये थे ।५७। गान्धर्व-गारुड़ और परम अद्भुत
जृम्भणा भी प्रदत्त कर दिया था। तथा गदा-शक्ति-शूल-उत्तम दण्ड उसको