बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजीवनचरित्र । ( ९ )
जाती है, और मथुरामें ससुराल कही जाती है परन्तु माथुर-
वंशसे इस पक्षमें विरोध नहीं है, लोकमें कृष्णकविको वि-
हारीलालका पुत्र और शिष्यभी कहते हैं यदि सत्यही यह वि-
हारीलालके पुत्र हैं तो नीचे लिखे दोहेके अनुसार वह माथुर-
ब्राह्मण हैं ।
माथुर विप्र ककोरकुल, बसत मधुपरी गाँव ॥
जो हो उनके आचार व्यवहारसे तथा गोविन्दपुरमें केश-
वरायका वर्णन मिलनेसे अधिकतर यही विदित होता है कि,
कदाचित् विहारीलालजी माथुरवंशावतंसही हों कारण कि,
और स्थानोंकी अपेक्षा माथुरवंशमें इनकी चरचा अधिक है,
जो कुछभीहो कविवर विहारीलालके उच्चकुल ब्राह्मण होनेमें
तथा अनेकभाषाके ज्ञाता और संस्कृतके पंडित होनेमें तो
किसीको किसीप्रकारका सन्देह नहीं है ।
अभी यह बातभी जाननेयोग्य है कि, सतसई किसप्रकार
निर्मित हुई स्वयं यदा तदा विहारीलालजी लिखतेरहे वा
इसमें किसीकी प्रेरणाथी इसके लिये इतनाही बहुत होगा कि-
हुकुम पाय जयसाहको, हरिराधिका प्रसाद ।
करी विहारी सतसई, भरी अनेक सवाद ॥
इस वचनसे जयशाहकी आज्ञासे सतसईका निर्माण होना
जानाजाता है और राजाज्ञाकेही कारण बहुत समझ सोचकर