बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ८ ) बिहारीलालजीका-
बिहारीलालजी नहीं हैं, और सनाढ्यब्राह्मणभी नहीं हैं.
क्योंकि इनके और केशदासजीके समयमें बड़ा अन्तर है।
अब दूसरा विचार है कि, कितनेही विचारशीलोंके मतसे
बिहारीलालको माथुरवंशदिवाकर एवं भाषाकाव्यसंग्रहमें
इनको कान्यकुब्जवंशोत्पन्न वर्णन किया है।
यदि इनको कान्यकुब्ज मानें तो सतसईमें केवल इतनी
उपपत्ति प्राप्त होती है कि, “प्रगट भये द्विजराजकुल” अर्थात्
श्रेष्ठ ब्राह्मणकुलमें जन्म लिया और ब्रजमें आकर बसे इसमें
यह विदित होता है कि, कविवरके पिता अन्यस्थानसे यहां
आकर बसे थे, और कुछ सन्देह नहीं कि, वे केशवरायजी
कान्यकुब्ज हों अबभी देखाजाता है कि, कान्यकुब्जोंको कुला-
भिमान अत्यन्त होता है और कविवरने भी अपने निमित्त द्वि-
जराजकुल कहा है इससे अधिक कान्यकुब्जोंमें धीरता वीर-
ता भी होती है और बिहारीलाल जयसाहके साथ संग्रामोंमें
भी रहे हैं यथा।
यौं दल काढ़े बलखतें, तैं जयसिंह भुआल ।
वदन अघासुरके परे, ज्यों हरि गाय गुवाल ॥१॥
बस इससे अधिक और प्रमाण हमारें दृष्टिगोचर नहीं
हुआ दूसरा पक्ष बिहारीलालके माथुर एवं एक और ग्वॉलि-
यरके निकट बसुआ गोविन्दपुर गाँव इनकी जन्मभूमि गाई.