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बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 11

( १० ) बिहारीलालजीका-
शनैः २ यह ग्रन्थ निर्मित हुआ है, और जयसाहके परलोक
पहुँचनेपरभी पीछे कुछ दोहे लिखेगये हैं, जिनमें कुछ नीति
वैराग्य आदिकीभी छटा लक्षितहोती है ।
जयसिंह कौन थे इनके यहाँ बिहारीलाल कैसे पहुँचे इस
बातकाभी प्रगटहोना अवश्य है यद्यपि इसमेंभी कुछमतभेद
पडता है क्योंकि कई जयसिंह हुए हैं परन्तु इतिहाससे जैसा
कुछ मिलता है सो वर्णन करते हैं ।
सम्वत् १६७२ में राजा मानसिंहका देवलोक हुआ
तदुपगन्त महाराज कुँवर भाऊसिंह गद्दीपर बैठे यह कुछ प्र-
तापशाली न हुए, इसकारण इनके कुछही दिन उपरान्त
महासिंह राजा हुए सम्वत् १६७५ में महासिंहने गद्दी पाई
यहभी पूर्वजके समान अत्यन्त पानासक्त होकर अकालमें
कालकवलित हुए, राजा मानसिंहके इन दो उत्तराधिकारि-
योंकी अयोग्यतासे अम्बरका गौरव मलीन होगया था, इसी
अवसरमें जोधपुरके राजा सम्राट् सभामें प्रधानताके पदको
पागयेथे, जहांगीरने अपनी बेगम महारानी जोधबाईकी स-
म्मतिसे जगतसिंहके पुत्र ( मानसिंहके भतीजे ) को अम्ब-
रका सिंहासन देदिया, इसकारण सम्राट्‌की प्यारी बीवी नूर-
जहांको अत्यन्त डाह हुआ भट्टग्रन्थमें लिखाहै कि, रनवा-
सके एक बगमदेमें बैठकर बादशाहने अपनी स्त्री जोधबाईसे
जयसिंहको राज देनेके लिये सम्मति की थी, जयसिंहभी एक