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भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

६२१
चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र, शनि
(२०) चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र और शनि की
युति हो तो जातक धनी, सुखी, अत्यन्त गुणवान्,
विद्वान्, यशस्वी, गणाधीश, लोकपूजित तथा राजा का
मंत्री होता है।
१५३४
मंगल, बुध गुरु, शुक्र, शनि
(२१) मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि
की युति हो तो जातक चंचल, आलसी, धनी, सुखी,
लोकप्रिय, पवित्र वक्ता, दीर्घायु, अधिक सोने वाला
तथा तामसी स्वभाव का होता है।
१५३५
छः ग्रहों की युति का फलादेश
सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र
(१) सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु और शुक्र
की युति हो तो जातक यशस्वी, भाग्यवान्, भोगी, धन-
धान्य तथा विद्या से युक्त, धर्मात्मा, अल्पभाषी तथा
सुखी जीवन बिताने वाला होता है।
१५३६
सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शनि
(२) सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु और शनि की
युति हो तो जातक दयालु, परोपकारी, मंगल चिह्न शुद्ध
अन्तःकरण वाला, विवाद में विजय पानेवाला तथा वनों
में विचरण करनेवाला होता है।
१५३७

६२२
सूर्य, चन्द्र, मंगल बुध, शुक्र, शनि
(३) सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, शुक्र और शनि
की युति हो तो जातक चिन्तित, प्रत्येक बात में संशय
करने वाला, संग्राम अथवा विवाद में विजय पाने वाला,
वन-पर्वतों में विचरण करने वाला तथा जातक स्वभाव
का होता है।
१४३८
सूर्य, चन्द्र, मंगल, गुरु, शुक्र, शनि
(४) सूर्य, चन्द्र, मंगल, गुरु, शुक्र और शनि
की युति हो तो जातक क्रोधी, कृपण, धनी, सुखी,
लोभी, सुन्दर, स्त्रियों को प्रिय, भ्रान्त-बुद्धि, राजाओं
का कृपापात्र तथा युद्ध करने के लिए तैयार रहने वाला
होता है।
१४३९
सूर्य, चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र, शनि
(५) सूर्य, चन्द्र बुध, गुरु, शुक्र और शनि की
युति हो तो जातक धर्मज्ञ, वेदज्ञ, दयालु, क्षमाशील,
स्त्री-विहीन, राज-मन्त्री, राजा द्वारा सम्मानित तथा
लोक में प्रसिद्ध होता है।
१४४०
सूर्य, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि
(६) सूर्य, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि
की युति हो तो जातक क्षमाशील, ब्रह्म-विद्या का वेत्ता,
भिक्षुक, वनवासी, तीर्थयात्री तथा धन, स्त्री एवं पुत्र से
विहीन होता है।
१४४१

६२३
चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि
(६) चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और
शनि की युति हो तो जातक धनी, गुणी, यशस्वी,
पवित्र हृदय वाला, आलसी, अनेक पत्नियों वाला,
गुणवान्, राजमान्य अथवा राजमंत्री होता है।
सात ग्रहों की युति का फलादेश
सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि
यदि सातों ग्रह—सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध,
गुरु, शुक्र और शनि एक ही भाव में बैठे हों तो
जातक सूर्य के समान तेजस्वी, धनी, दानी,
राजाओं द्वारा सम्मानित तथा शिवजी का परम
भक्त होता है।
स्त्री-जातक
सामान्यतः पुरुष अथवा स्त्री की जन्म-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
ग्रहों का फलादेश एक-जैसा ही होता है, परन्तु कुछ ग्रहों की विभिन्न भावों में स्थिति
के फलस्वरूप स्त्रियों के सम्बन्ध में उनके फलादेश में अन्तर भी आ जाता है। ऐसे
अन्तर वाले फलादेश के विषय में आगे लिखे अनुसार समझ लेना चाहिए।
स्त्रियों के सम्बन्ध में विशिष्ट फलादेश की विस्तृत जानकारी के लिए हमारी
लिखी पुस्तक 'स्त्री-जातक' का अध्ययन करना चाहिए।
(१) जिस स्त्री के जन्म-काल में लग्न
तथा चन्द्रमा सम-राशि पर हो (चित्र १५४४),
यह स्त्री स्वाभाविक आकार वाली होती है।

६२४
(२) जिस स्त्री के जन्म-काल में लग्न
तथा चन्द्रमा विषम राशि पर हों (चित्र १५४५),
वह पुरुष-जैसे आकार वाली होती है।
(३) जिस स्त्री के लग्न तथा चन्द्रमा
सम-राशि पर हों और उन पर शुभ ग्रहों की दृष्टि
पड़ रही हो (चित्र १५४६), वह श्रेष्ठ शीलवती
तथा सुन्दर वस्त्राभूषणों को धारण करने वाली
होती है।
(४) जिस स्त्री के लग्न तथा चन्द्रमा
विषम-राशि पर हों और उन पर पाप-ग्रहों की
दृष्टि पड़ रही हो (चित्र १५४७), वह पापिष्ठ
तथा बुरे कर्म करने वाली होती है।
(५) जिस स्त्री के लग्न तथा चन्द्रमा
विषम-राशि पर हों और उन पर शुभ ग्रहों की
दृष्टि पड़ रही हो (चित्र १५४८), तो उसे मध्यम
स्वभाव वाली समझना चाहिए।

६२५
(६) जिस स्त्री के लग्न तथा चन्द्रमा
सम-राशि पर हों और उस पर पाप-ग्रहों की दृष्टि
पड़ रही हो (चित्र १५४६), तो उसे भी मध्यम
स्वभाव वाली समझना चाहिए ।
टिप्पणी : जो ग्रह अधिक बली हो, उसी
के अनुसार स्त्री का स्वभाव समझना चाहिए ।
(७) जिस स्त्री की कुण्डली में जन्म-लग्न
अथवा चन्द्रमा से सातवें घर में कोई भी ग्रह न
बैठा हो, अथवा निर्बल ग्रह बैठा ही (चित्र १५५०),
उसका पति निरुद्यमी होता है ।
(८) जिस स्त्री की कुण्डली में जन्म-लग्न
अथवा सातवें घर पर शत्रु-ग्रहों की दृष्टि न हो
(चित्र १५५१), उसका पति भी निरुद्यमी
होता है ।
(६) जिस स्त्री की जन्म-कुण्डली के
सातवें घर में बुध तथा शनि बैठे हों (चित्र १५५२),
उसका पति नपुंसक होता है ।

६२६
(१०) जिस स्त्री के सातवें घर में स्थिर
राशि हो (चित्र १५५३), उसका पति सदैव घर
में रहता है।
(११) जिस स्त्री के सातवें घर में चर
राशि हो (चित्र १५५४), उसका पति सदैव
परदेश में रहता है।
(१२) जिस स्त्री के सातवें घर में द्वि-
स्वभाव राशि हो (चित्र १५५५), उसका पति
घर तथा परदेश में दोनों जगह रहता है।
(१३) जिस स्त्री की जन्म-कुण्डली के
सप्तमभाव में 'सूर्य' की स्थिति हो (चित्र १५५६),
वह अपने पति द्वारा त्याग दी जाती है।

६२७
(१४) जिस स्त्री की जन्म-कुण्डली के
सप्तमभाव में 'मंगल' की स्थिति हो (चित्र १५५७),
वह बाल-विधवा होती है।
(१५) जिस स्त्री की जन्म-कुण्डली के
सप्तम भाव में 'शनि' की स्थिति हो तथा सभी
पाप-ग्रहों की उस पर दृष्टि हो (चित्र १५५८),
वह अनब्याही ही रह जाती है। यदि विवाह हो
भी तो उसके पति की मृत्यु शीघ्र हो जाती है।
(१६) जिस स्त्री की जन्म-कुण्डली के
सप्तम भाव में सभी पाप-ग्रह एकत्र हो गए हों
(चित्र १५५६), वह अवश्य विधवा होती है।
(१७) जिस स्त्री की जन्म-कुण्डली के
सप्तमभाव में शुभग्रह बलहीन हों तथा पाप-ग्रह भी
हों (चित्र १५६०°), वह अपने पति को छोड़कर
दूसरा पति करती है।

६२८
(१८) जिस स्त्री की जन्म-कुण्डली के
सप्तम भाव में एक पाप-ग्रह बलहीन बैठा हो और
उसे कोई शुभ ग्रह देखता न हो (चित्र १५६१),
उसे उसका पति त्याग देता है।
(१९) जिस स्त्री की जन्म-कुण्डली के
सातवें घर में चन्द्रमा के साथ मंगल की युति हो
(चित्र १५६२), वह अपने पति की आज्ञा से पर-
पुरुष-गमन करती है।
(२०) जिस स्त्री की जन्मकुण्डली में मेष,
वृश्चिक, मकर अथवा कुम्भ में से कोई लग्न हो
और उसमें चन्द्रमा तथा शुक्र दोनों ही बैठे हों
तथा उन पर पाप-ग्रहों की दृष्टि पड़ रही हो
(चित १५६३), तो ऐसी स्त्री अपनी माता के साथ
पर-पुरुष-गमन करती है।
(२१) जिस स्त्री के जन्म-लग्न में चन्द्रमा
और शुक्र दोनों बैठे हों (चित्र १५६४), वह
ईर्ष्यालु स्वभाव वाली, दूसरों को सन्ताप देने वाली
तथा स्वयं सदैव सुखी रहने वाली होती है।

६२६
(२२) जिस स्त्री के जन्म-लग्न में बुध
तथा चन्द्रमा दोनों यह बैठे हों (चित्र १५६५), वह
संगीत-कुशल, सुखी, गुणवती, सुन्दरी तथा सब को
प्रिय होती है।
(२३) जिस स्त्री के जन्म-लग्न में बुध,
शुक्र तथा चन्द्रमा—तीनों ही ग्रह बैठे हुए हों
(चित्र १५६६), वह अनेक प्रकार के सुखों से युक्त,
धनी तथा गुणवती होती है।
(२४) जिस स्त्री की कुण्डली में लग्न से
आठवें स्थान पर (अष्टम भाव में) कोई पाप-ग्रह
बैठा हो तथा दूसरे स्थान में कोई शुभग्रह बैठा हो,
(चित्र १५६७), वह अपने पति से पहले
मृत्यु को प्राप्त होती है।
(२५) जिस स्त्री की जन्मकुण्डली में वृष,
वृश्चिक, सिंह अथवा कन्या—इनमें से किसी भी
राशि पर चन्द्रमा स्थित हो (चित्र १५६८), वह
अल्प-पुत्रवती होती है।

६३०
(२६) जिस स्त्री की जन्म-कुण्डली में
मंगल, शुभ और बुध बलवान हों तथा लग्न
समराशि में हो (चित्र १५६९), वह ब्रह्मविद्या में
प्रवीण, अनेक शास्त्रों की जानकार तथा ब्रह्म-
वादिनी होती है।
(२७) जिस स्त्री की जन्मकुण्डली के
सप्तम भाव में पाप-ग्रह बैठा हो तथा नवम भाव
में कोई अन्य ग्रह बैठा हो (चित्र १५७०), वह स्त्री
संन्यासिनी हो जाती है। नवें घर में जो ग्रह बैठा
हो, उसी की प्रव्रज्या समझनी चाहिए। सूर्य से
तपस्विनी, चन्द्रमा से कपालिनी, मंगल से रक्त-
वस्त्र-धारिणी, शुक्र से चक्रिणी, शनि से नग्ना, बुध
से दण्डी तथा गुरु से यति होती है।
(२८) जिस स्त्री की जन्मकुण्डली में केन्द्र
में शुभ ग्रह बैठे हों तथा पाप-ग्रह ६, ८ या १२वें
घर में हों तथा सप्तम भाव में पुरुष राशि हो
(चित्र १५७१), वह शान्त स्वभाव की, ऐश्वर्य-
शालिनी, पुत्रवती तथा रानी अथवा रानी-जैसी
होती है।
(२९) जिस स्त्री की जन्मकुण्डली में बुध
लग्न में उच्च का होकर बैठा हो तथा गुरु
एकादश भाव में हो (चित्र १५७२), वह ऐश्वर्य-
शालिनी, रानी अथवा रानी-जैसी होती है तथा
उसकी गणना संसार की प्रसिद्ध स्त्रियों में की
जाती है।

६३१
विशिष्ट योग
जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित विभिन्न ग्रहों की विशिष्ट स्थिति
के कारण विशिष्ट योग भी बनते हैं, जिनका फलादेश सामान्य स्थिति वाले ग्रहों से
भिन्न होता है।
अगले पृष्ठों में कुछ ऐसे ही विशिष्ट फलादेशों का वर्णन किया जा रहा है।
सहस्रों प्रकार के विशिष्ट योगों के फलादेश की विस्तृत जानकारी प्राप्त
करने के लिए हमारी लिखी पुस्तक 'योग-रत्नाकर' का अध्ययन करना चाहिए।
राजयोग
(१) लग्न में चन्द्रमा और गुरु, दसवें भाव में
शुक्र एवं तुला, मकर अथवा कुम्भ में शनि हो तो जातक
राजा के समान अथवा राजमान्य होता है।
(२) दसवें, ग्यारहवें, पहले, दूसरे तथा तीसरे
भाव में संपूर्ण शुभ ग्रह बैठे हों तो जातक राजा के समान
होता है।
(३) गुरु बुध के साथ बैठा हो अथवा बुध के
द्वारा दृष्ट हो तथा गुरु, मीन अथवा धनुराशि का होकर,
केन्द्र में बैठा हो तो ऐसे जातक की आज्ञा को राजागण
भी अपने मस्तक पर धारण करते हैं।

६३२
(४) चन्द्रमा केन्द्र में हो तथा गुरु लग्न को
छोड़ कर, नवम अथवा पंचम दृष्टि से केन्द्र को देख रहा
हो, साथ ही बलवान दृष्टि से शुभ को भी देखता हो तो
जातक राजा के समान भाग्यशाली होता है।
(५) गुरु लग्न में तथा बुध केन्द्र में बैठा हो
तथा यह नवम भाव के स्वामी द्वारा दृष्ट भी हो तो
जातक राजमान्य होता है।
(६) गुरु सातवें, नवें अथवा पाँचवें भाव में बैठा
हो तथा लग्नेश की उस पर दृष्टि भी हो तो जातक
राजमान्य होता है।
(७) शनि केन्द्र, पंचम अथवा नवम भाव में
अपनी उच्च राशि अथवा मूल त्रिकोण राशि में हो तथा
दशम भाव पर उसकी दृष्टि भी हो तो जातक राजमान्य
होता है।

६३३
(८) नवम भाव का स्वामी चन्द्रमा के साथ
द्वितीय भाव में बैठा हो तो जातक राजमान्य होता है।
१४८०
(९) चन्द्रमा मंगल के साथ द्वितीय अथवा
तृतीय भाव में बैठा हो अथवा राहु के साथ पंचम भाव
में बैठा हो तो जातक राजमान्य होता है।
१४८१
(१०) यदि जन्म-काल में पाँच ग्रह उच्च के हों,
तो जातक चक्रवर्ती राजा अथवा मंत्री होता है।
१४८२
(११) यदि जन्म-काल में बुध उच्च राशि का
हो, मंगल तथा शनि मकर राशि में हों तथा गुरु, चन्द्रमा
तथा शुक्र तीनों धनु राशि में बैठे हों तो ऐसा जातक
महाराजाधिराज होता है।
१४८३

६३४
(१२) यदि सूर्य सिंह राशि में, मगल मकर में,
शनि कुम्भ में तथा चन्द्रमा मीन राशि में हो तथा लग्न
भी मीन ही हो तो ऐसा जातक महाराजा होता है।
(१३) यदि मंगल मेष राशि का होकर लग्न में
बैठा हो तो ऐसा जातक राजा होता है।
(१४) गुरु कर्क लग्न में हो तथा मगल मेष
राशि का होकर दशमभाव में बैठा हो तो ऐसा जातक
राजनीतिज्ञ एवं शत्रु-जयी राजा होता है।
(१५) बृहस्पति उच्च का होकर लग्न में बैठा
हो, दशम भाव में मेष का सूर्य हो तथा एकादश भाव में
शनि, शुक्र और बुध तीनों बैठेहों, तो ऐसा जातक अत्यन्त
पराक्रमी राजा होता है।

६३५
(१६) शनि मकर राशि का होकर लग्न में
बैठा हो, सूर्य सिंह राशि का, बुध मिथुन का, मंगल मेष
का, शुक्र तुला का तथा चन्द्रमा कर्क का हो तो ऐसे योग
में उत्पन्न जातक समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी का अधिपति
(राजा) होता है।
(१७) शुक्र मिथुन का हो, बुध कन्या का होकर
लग्न में बैठा हो, मंगल तथा शनि मकर राशि में हों
तथा चन्द्रमा और गुरु मीन राशि में हों, तो ऐसे योग
में उत्पन्न जातक शत्रुनाशक, परम पराक्रमी तथा ऐश्वर्य-
शाली राजा होता है।
(१८) सिंह का सूर्य लग्न में हो एवं चन्द्रमा
मेष में, शनि कुम्भ में, गुरु धनु में तथा मंगल मकर में हो
तो ऐसे योग में उत्पन्न व्यक्ति राजाधिराज होता है।
(१६) मेष का गुरु लग्न में हो, चन्द्रमा चतुर्थ
तथा शुक्र दशम भाव में हो, तो ऐसा व्यक्ति बहुत बड़ा
राजा होता है।

६३६
(२०) कर्क का गुरु लग्न में हो तथा सप्तम,
चतुर्थ अथवा दशम स्थान में शुक्र, शनि और मंगल हों,
तो ऐसा व्यक्ति अत्यन्त प्रतापी राजा होता है।
(२१) वृष का चन्द्रमा लग्न में हो तथा चतुर्थ
सप्तम एवं दशम भाव में सूर्य, गुरु तथा शनि बैठे हों, तो
ऐसा व्यक्ति अत्यन्त प्रतापी एवं यशस्वी राजा होता है।
(२२) गुरु, चन्द्र, बुध तथा शुक्र, लग्न, तृतीय,
नवम एवं एकादश भाव में बैठे हों, तथा मकर का शनि
लग्न में बैठा हो तो ऐसा व्यक्ति राजाधिराज होता है।
(२३) मीन राशि का शुक्र बुध के साथ लग्न
में बैठा हो, मकर का मंगल हो तथा गुरु एवं चन्द्रमा
धनु राशि के हों, तो ऐसा जातक चक्रवर्ती राजा होता
है।

६३७
(२४) बुध उच्च का होकर केन्द्र में बैठा हो
तथा शुक्र दशम भाव में हो तो ऐसा व्यक्ति परम यशस्वी
राजा होता है।
(२५) मेष के बुध तथा सूर्य लग्न में हों, मंगल
दशम भाव में तथा शुक्र, बुध एवं चन्द्रमा नवम भाव में
हों तो ऐसा जातक दिग्विजयी राजा होता है।
(२६) मेष में सूर्य, कर्क में गुरु और तुला में
शनि तथा चन्द्रमा हों तो ऐसा व्यक्ति बहुत बड़ा राजा
होता है।
(२७) द्वितीय भाव में सूर्य हो तथा शुक्र, बुध
एवं चन्द्रमा केन्द्र में हों परन्तु वे न तो अस्त हों और न
शत्रु-ग्रहों द्वारा दृष्ट ही हों, तो ऐसा जातक शत्रुजयी एवं
अत्यन्त प्रतापी राजा होता है।

६३८
(२८) कर्क में गुरु, मेष में सूर्य, मीन में शुक्र
तथा वृष में चन्द्रमा हो और वह शनि द्वारा दृष्ट भी हो,
तो ऐसा व्यक्ति अत्यन्त प्रतापी राजा होता है।
(३६) पंचम भाव में बुध, शुक्र तथा गुरु हों,
परन्तु वे अस्त न हों, मकर का मंगल तुला से रहित हो
तथा नवम भाव में शनि बैठा हो, तो ऐसा जातक राजा-
धिराज होता है।
(३०) गुरु तथा शुक्र चतुर्थ भाव में हों तो ऐसा
जातक धनी, पराक्रमी एवं पृथिवीपति होता है।
(३१) कर्क राशि में गुरु के साथ चन्द्रमा बैठा
हो तो ऐसा जातक कश्मीर देश का राजा होता है।

६३६
(३२) उच्च राशिस्थ चन्द्रमा बुध के साथ बैठा
हो तो जातक मगध देश का राजा होता है। यदि चन्द्रमा
बलवान् हो तो जातक किसी भी अन्य स्थान का राजा
हो सकता है।
१६०४
(३३) जन्म-राशि का स्वामी लग्न में हो तथा
लग्नेश बली होकर केन्द्र में बैठा हो तो नीच कुल में उत्पन्न
व्यक्ति तो राजा होता है।
१६०५
(३४) मेष का सूर्य चन्द्रमा के साथ बैठा हो तो
ऐसा जातक राजा होता है।
१६०६
(३५) गुरु तथा शुक्र उच्च राशिस्थ होकर
केन्द्र अथवा त्रिकोण में बैठे हों, तो ऐसा जातक राजा
अथवा राजमंत्री होता है।
१६०७

६४०
(३६) पापग्रह लग्न में हो और उस पर कर्क
के गुरु की दृष्टि पड़ रही हो, तो ऐसा व्यक्ति बड़ा
धनी तथा यशस्वी राजा अथवा राजा के समान होता
है।
(३७) गुरु मकर राशि के अतिरिक्त किसी
और लग्न में बैठा हो अथवा कर्क राशिगत होकर कर्क
के नवांश में हो तो जातक राजा होता है।
(३८) गुरु चन्द्रमा के साथ केन्द्र में बैठा हो
तथा उस पर शुक्र की दृष्टि हो एवं कोई ग्रह नीच का
न हो तो ऐसा जातक यशस्वी राजा होता है।
(३६) द्वितीय भाव में बुध, शुक्र और गुरु बैठे
हों तथा सप्तम भाव में मंगल और चन्द्रमा हों, तो ऐसा
व्यक्ति शत्रुजयी एवं अत्यन्त प्रतापी राजा होता है।