भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
४२५
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १०४१
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १०४२
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १०४३
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १०४४
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १०४५
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १०४६
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १०४७
'धनु' लग्न में 'शुक्र' का फलादेश
१. 'धनु' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'शुक्र' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १०४८ से १०५६ के बीच देखना
चाहिए।
'धनु' लग्नवालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शुक्र' का
अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस महीने में 'शुक्र'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १०४८
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १०४६
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १०५०
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १०५१
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १०५२
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १०५३
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १०५४
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १०५५
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १०५६
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १०५७
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १०५८
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १०५६
'धनु' लग्न में 'शनि' का फलादेश
१. 'धनु' लग्नवालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'शनि' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ६२४ से ६३५ के बीच देखना
चाहिए।
२. 'धनु' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शनि'
४२६
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस वर्ष में ‘शनि’—
(क) ‘मेष’ राशि पर हो तो संख्या १०६०
(ख) ‘वृष’ राशि पर हो तो संख्या १०६१
(ग) ‘मिथुन’ राशि पर हो तो संख्या १०६२
(घ) ‘कर्क’ राशि पर हो तो संख्या १०६३
(ङ) ‘सिंह’ राशि पर हो तो संख्या १०६४
(च) ‘कन्या’ राशि पर हो तो संख्या १०६५
(छ) ‘तुला’ राशि पर हो तो संख्या १०६६
(ज) ‘वृश्चिक’ राशि पर हो तो संख्या १०६७
(झ) ‘धनु’ राशि पर हो तो संख्या १०६८
(ञ) ‘मकर’ राशि पर हो तो संख्या १०६६
(ट) ‘कुम्भ’ राशि पर हो तो संख्या १०७०
(ठ) ‘मीन’ राशि पर हो तो संख्या १०७१
‘धनु’ लग्न में ‘राहु’ का फलादेश
१ ‘धनु’ लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
‘राहु’ का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १०७२ से १०८३ के बीच देखना
चाहिए।
२- ‘धनु’ लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित ‘राहु’
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस वर्ष में ‘राहु’—
(क) ‘मेष’ राशि पर हो तो संख्या १०७२
(ख) ‘वृष’ राशि पर हो तो संख्या १०७३
(ग) ‘मिथुन’ राशि पर हो तो संख्या १०७४
(घ) ‘कर्क’ राशि पर हो तो संख्या १०७५
(ङ) ‘सिंह’ राशि पर हो तो संख्या १०७६
(थ) ‘कन्या’ राशि पर हो तो संख्या १०७७
(छ) ‘तुला’ राशि पर हो तो संख्या १०७८
(ज) ‘वृश्चिक’ राशि पर हो तो संख्या १०७६
(झ) ‘धनु’ राशि पर हो तो संख्या १०८०
(ञ) ‘मकर’ राशि पर हो तो संख्या १०८१
(ट) ‘कुम्भ’ राशि पर हो तो संख्या १०८२
(ठ) ‘मीन’ राशि पर हो तो संख्या १०८३
४२७
'धनु' लग्न में 'केतु' का फलादेश
१. 'धनु' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'केतु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १०८४ से १०९५ के बीच देखना
चाहिए।
२. 'धनु' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित. 'केतु'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस वर्ष में 'केतु'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १०८४
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १०८५
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १०८६
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १०८७
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १०८८
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १०८९
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १०९०
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १०९१
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १०९२
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १०९३
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १०९४
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १०९५
'धनु' लग्न में सूर्य
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
धनु लग्न : प्रथमभाव : सूर्य
[कुण्डली: लग्न (प्रथम भाव) में ९, सू०; द्वितीय भाव में १०; तृतीय भाव में ११; चतुर्थ भाव में १२; पंचम भाव में १; षष्ठ भाव में २; सप्तम भाव में ३; अष्टम भाव में ४; नवम भाव में ५; दशम भाव में ६; एकादश भाव में ७; द्वादश भाव में ८।]
केन्द्र तथा शरीर-स्थान में अपने मित्र 'गुरु' की
राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को उत्तम
शक्तिशाली शरीर की प्राप्ति होती है। ऐसा व्यक्ति
भाग्यशाली, धार्मिक रुचि वाला तथा आस्तिक होता
है। सातवीं दृष्टि से बुध की राशि में सप्तमभाव को
देखने से जातक को सुन्दर स्त्री का सहयोग और
गृहस्थ-सुख प्राप्त होता है। साथ ही दैनिक व्यवसाय
में लाभ भी होता है।
४२८
'धनु' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
धनु लग्न : द्वितीयभाव : सूर्य दूसरे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित
'सूर्य' के प्रभाव से जातक को कुछ कठिनाइयों के साथ
धन-संग्रह में श्रेष्ठ सफलता मिलती है तथा कुछ मत-
भेदों के साथ कुटुम्ब का सुख भी प्राप्त होता है। ऐसा
व्यक्ति स्वार्थ-सिद्धि के लिए धर्म का पालन करता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से
जातक को आयु में वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का
लाभ भी होता है। ऐसे व्यक्ति की भाग्योन्नति भी
अच्छी होती है।
'धनु' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
धनु लग्न : तृतीयभाव : सूर्य
तीसरे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित
'सूर्य' के प्रभाव से जातक को भाई-बहिनों का सुख
कुछ असंतोष के साथ मिलता है तथा पराक्रम में
अत्यधिक वृद्धि होती है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में नवमभाव को
देखने से पुरुषार्थ द्वारा भाग्य की अत्यधिक वृद्धि होती
है, साथ ही धर्म का भी पालन होता है। ऐसा व्यक्ति
बड़ा हिम्मती तथा यशस्वी होता है।
'धनु' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
धनु लग्न : चतुर्थभाव : सूर्य चौथे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित
'सूर्य' के प्रभाव से जातक को माता का सुख अधिक
मिलता है तथा भूमि, भवन का सुख भी प्राप्त होता
है। धर्म तथा भाग्य की उन्नति भी होती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से दशमभाव को देखने से
पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सहयोग, सम्मान,
लाभ तथा सफलता के अवसर भी प्राप्त होते रहते हैं।
४२६
'धनु' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
धनु लग्न : पंचमभाव : सूर्य पाँचवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित
उच्च के 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को सन्तान, विद्या
एवं बुद्धि का यथेष्ट लाभ होता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा
विद्वान्, धर्मात्मा, ज्ञानी तथा बुद्धिमान् होता है।
सातवीं नीच-दृष्टि से एकादशभाव को देखने
से आमदनी के क्षेत्र में कठिनाइयाँ आती हैं : वाणी में
सुप्रखरता तथा शिष्टाचार एवं सज्जनता में कमी होने
के कारण आर्थिक उन्नति अधिक नहीं होती।
'धनु' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
धनु लग्न : षष्ठभाव : सूर्य छठे भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'सूर्य'
के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर अत्यधिक प्रभाव
रखता है तथा झगड़े के मामलों से लाभ उठाता है।
धर्म-पालन में विशेष रुचि नहीं होती।
बारहवें भाव में मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को
देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के
सम्बन्ध से लाभ मिलता है, जिसके कारण खर्च चलता
है तथा भाग्य की वृद्धि भी होती है।
'धनु' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
धनु लग्न : सप्तमभाव : सूर्य सातवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
'सूर्य' के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से सुख मिलता
है तथा दैनिक व्यवसाय में सफलताएँ मिलती रहती
है। वह भाग्यशाली तथा ईश्वरभक्त भी होता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से
श्रेष्ठ शारीरिक सुख एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व की
प्राप्ति होती है।
ऐसे व्यक्ति की पत्नी कुछ तेज स्वभाव की
होती है।
४३०
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
धनु लग्न : अष्टमभाव : सूर्य
आठवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर
स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक की आयु में वृद्धि होती
है तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। दैनिक जीवन
प्रभावपूर्ण रहता है, परन्तु भाग्योन्नति में अनेक रुकावटें
आती हैं।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से
धन-संचय तथा कौटुम्बिक सुख के क्षेत्र में भी कुछ कमी
रहती है।
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
धनु लग्न : नवमभाव : सूर्य
नवें भाव में स्वराशि-स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से
जातक के भाग्य तथा धर्म की विशेष उन्नति होती है।
वह बड़ा यशस्वी तथा प्रभावशाली होता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से
पराक्रम में कुछ कमी आती है तथा भाई-बहिनों के साथ
कुछ मतभेद बना रहता है।
ऐसा व्यक्ति भाग्य पर आश्रित रहने वाला
होता है।
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
धनु लग्न : दशमभाव : सूर्य
दसवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
'सूर्य' के प्रभाव से जातक को पिता द्वारा अत्यधिक सह-
योग मिलता है तथा राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी
सफलताएँ प्राप्त होती हैं। ऐसा व्यक्ति बड़ा भाग्यवान्
तथा धार्मिक विचारों का होता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से
जातक को माता, भूमि एवं भवन का यथेष्ट सुख मिलता
है और यश तथा प्रतिष्ठा भी प्राप्त होती है।
४३१
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
धनु लग्न : एकादशभाव : सूर्य
ग्यारहवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित
नीच के सूर्य के प्रभाव से जातक की आमदनी में कुछ
कठिनाइयों के साथ अच्छी वृद्धि होती है।
सातवीं मित्र तथा उच्च दृष्टि से पंचमभाव को
देखने से विद्या, बुद्धि तथा सन्तान के क्षेत्र में भी पर्याप्त
सफलता मिलती है।
ऐसा व्यक्ति गुणी, विद्वान्, सज्जन, मधुरभाषी
तथा सुखी होता है।
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
धनु लग्न : द्वादशभाव : सूर्य
बारहवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित
'सूर्य' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा
बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से कुछ विलम्ब के साथ सफ-
लता मिलती है और लाभ होता है। धर्म-पालन में रुचि
अधिक नहीं होती, परन्तु धर्म तथा परोपकार में ही
अधिक खर्च होता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रुओं
पर प्रभाव बना रहता है तथा शत्रु-पक्ष, झगड़े, मुकदमे
आदि से लाभ एवं विजय की प्राप्ति भी होती है।
'धनु' लग्न में 'चन्द्रमा'
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
धनु लग्न : प्रथमभाव : चन्द्र
पहले भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित
अष्टमेश 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को आयु में वृद्धि
होती है तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। शरीर सुन्दर
तथा स्वस्थ होता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से
कुछ कठिनाइयों के बाद स्त्री का सुख मिलता है तथा
दैनिक आमदनी में भी जातक को कुछ कठिनाइयाँ
आती रहती हैं।
४३२
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
धनुलग्न : द्वितीयभाव : चंद्र
दूसरे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित
'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक धन का संचय नहीं
कर पाता तथा कौटुम्बिक सुख में भी कमी बनी रहती
है, परन्तु रहन-सहन अमीरी ढंग का होता है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में अष्टमभाव को
देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की वृद्धि होती है। मन
में कुछ बेचैनी भी रहती है।
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
धनुलग्न : तृतीयभाव : चंद्र
तीसरे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित
'चंद्रमा' के प्रभाव से जातक को भाई-बहिन के सुख
में कमी प्राप्त होती है तथा पराक्रम की वृद्धि के लिए
विशेष प्रयत्न करना पड़ता है। आयु तथा पुरातत्त्व
का लाभ होता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से नवमभाव को देखने से
कुछ कठिनाइयों के साथ भाग्य एवं धर्म की वृद्धि
होती है। सामान्यतः जातक भाग्यशाली तथा संघर्ष-
पूर्ण जीवन जीने वाला होता है।
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
धनुलग्न : चतुर्थभाव : चंद्र
चौथे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित
'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को माता के सुख में कुछ
कमी रहती है। उसे मातृभूमि से दूर जाकर भी रहना
पड़ता है। आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है।
दैनिक जीवन प्रभावशाली बना रहता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से दशमभाव को देखने से
पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों
के साथ सफलता मिलती है।
४३३
‘धनु’ लग्न की कुण्डली के ‘पंचमभाव’ स्थित ‘चंद्रमा’ का फलादेश
धनु लग्न : पंचमभाव : चंद्र
पाँचवें भाव में ‘मंगल’ की राशि पर स्थित अष्ट-
मेश ‘चंद्रमा’ के प्रभाव से जातक की विद्या, बुद्धि
एवं सन्तान के क्षेत्र में कुछ कमियों का सामना करना
पड़ता है। आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है,
किन्तु मस्तिष्क में चिन्ताएं भी रहती हैं।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से एकादश भाव को देखने से
आमदनी के क्षेत्र में भी बड़ी कठिनाइयों के बाद
सामान्य सफलता मिलती है।
‘धनु’ लग्न की कुण्डली के ‘षष्ठभाव’ स्थित ‘चंद्रमा’ का फलादेश
धनु लग्न : षष्ठभाव : चंद्र
छठे भाव में शत्रु ‘शुक्र’ की राशि पर स्थित
उच्च के ‘चंद्रमा’ के प्रभाव से जातक का शत्रु-पक्ष पर
प्रभाव बना रहता है। आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ
भी होता है।
सातवीं नीच-दृष्टि से द्वादश भाव को देखने से
खर्चे की परेशानी रहती है तथा बाहरी स्थानों के
सम्बन्ध भी अच्छे सिद्ध नहीं होते।
ऐसे व्यक्ति को शत्रु-पक्ष के कारण कुछ मान-
सिक परेशानियां भी रहती हैं।
‘धनु’ लग्न की कुण्डली के ‘सप्तमभाव’ स्थित ‘चंद्रमा’ का फलादेश
धनु लग्न : सप्तमभाव : चंद्र
सातवें भाव में मित्र ‘बुध’ की राशि पर स्थित
अष्टमेश ‘चंद्रमा’ के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से
कष्ट मिलता है तथा दैनिक व्यवसाय में भी कठिना-
इयाँ आती हैं। आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता
है तथा दैनिक जीवन भी कुछ आनन्दमय बना
रहता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथम भाव को देखने से
शारीरिक सौन्दर्य में वृद्धि होती है, परन्तु स्वास्थ्य
अच्छा नहीं रहता। थोड़े परिश्रम से ही थक जाया
करता है।
४३४
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'चंद्रमा' का फलादेश
धनु लग्न : अष्टमभाव : चंद्र
आठवें भाव में स्वराशि में स्थित 'चंद्रमा' के
प्रभाव से जातक की आयु में वृद्धि होती है तथा पुरा-
तत्त्व का यथेष्ट लाभ होता है। दैनिक जीवन बड़े
ठाठ-बाट का रहता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीय भाव की देखने से
धन के बारे में चिन्ताएं बनी रहती हैं तथा कौटुम्बिक
सुख में भी कमी रहती है।
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
धनु लग्न : नवमभाव : चंद्र
नवें भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित
'चंद्रमा' के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में कुछ
परेशानियां आती हैं तथा यश भी कम मिल पाता है।
धर्म का यथाविधि पालन नहीं होता। आयु तथा पुरा-
तत्त्व में वृद्धि होती है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से
भाई-बहिनों से मतभेद रहता है तथा पराक्रम में भी
यथोचित वृद्धि नहीं हो पाती। जीवन सामान्य ढंग से
व्यतीत होता है।
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
धनु लग्न : दशमभाव : चंद्र
दसवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
'चंद्रमा' के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा
व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयां आती हैं, परन्तु
आयु एवं पुरातत्त्व का लाभ होता है जिसके कारण
जीवन ठाठ से बीतता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थ भाव की देखने से
माता, भूमि एवं भवन का सुख कुछ कमी एवं परेशानी
के साथ मिलता है।
४३५
धनु' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
धनु लग्न : एकादशभाव : चंद्र
ग्यारहवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर
स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को कुछ परेशानियों
के साथ लाभ होता है। आयु तथा पुरातत्त्व की श्रेष्ठ
शक्ति प्राप्त होती है तथा दैनिक जीवन आनन्दपूर्ण
बना रहता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से
विद्या, बुद्धि एवं संतान के क्षेत्र में कुछ कमी रहती है
तथा मस्तिष्क में चिन्ताएं घिरी रहती हैं।
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
धनु लग्न : द्वादशभाव : चंद्र
बारहवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर
स्थित नीच के 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को खर्च
के बारे में बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता
है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से कष्ट मिलता
है। आयु तथा पुरातत्त्व की भी हानि होती है।
दैनिक-जीवन अशान्तिपूर्ण रहता है।
सातवीं उच्चदृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से
शत्रु-पक्ष पर प्रभाव स्थापित होता है तथा झगड़े-
मुकदमों में सदैव विजय प्राप्त होती है।
'धनु' लग्न में 'मंगल'
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
धनु लग्न : प्रथमभाव : मंगल
पहले भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित
'मंगल' के प्रभाव से जातक की शारीरिक शक्ति
अच्छी रहती है तथा परिश्रमी भी होता है। विद्या,
सन्तान तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है :
चौथी मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से
माता, भूमि, भवन का सुख कुछ कमी के साथ
मिलता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को
देखने से कुछ कमी के साथ स्त्री तथा व्यवसाय के
क्षेत्र में लाभ होता है। आठवीं नीचदृष्टि से अष्टम-
भाव को देखने से आयु एवं पुरातत्त्व का क्षेत्र कमजोर रहता है।
४३६
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
धनुलग्न : द्वितीयभाव : मंगल दूसरे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित
'मंगल' के प्रभाव से जातक धन का सामान्य संचय
करता है तथा उसे कौटुम्बिक सुख कुछ कमी के साथ
मिलता है। चौथी दृष्टि से स्वराशि में पंचम भाव
को देखने से विद्या तथा सन्तान की शक्ति प्राप्त
होती है !
सातवीं नीच-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने
से आयु तथा पुरातत्त्व के क्षेत्र में कमी रहती है।
आठवीं मित्र-दृष्टि से नवमभाव को देखने से बड़ी कठिनाइयों के साथ भाग्योन्नति में
थोड़ी-बहुत सफलता मिलती है तथा धर्म का पालन भी कम ही हो पाता है।
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
धनुलग्न : तृतीयभाव : मंगल तीसरे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर
स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में वृद्धि
होती है तथा भाई-बहिन का सुख कुछ कमी के साथ
मिलता है। विद्या तथा सन्तान-पक्ष भी कमजोर
रहता है। चौथी शत्रु-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से
शत्रु पक्ष पर विजय मिलती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से नवम भाव को देखने से
भाग्य तथा धर्म की उन्नति होती है। आठवीं मित्र-
दृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में न्यूनाधिक
सफलता मिलती रहती है। जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं !
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
धनुलग्न : चतुर्थभाव : मंगल चौथे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित
'मंगल' के प्रभाव से माता, भूमि तथा भवन के सुख
की हानि होती है। सन्तान तथा विद्या का पक्ष भी
कमजोर रहता है। चौथी मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव
को देखने से स्त्री तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में
कुछ कठिनाइयों से काम चलता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से दशम भाव को देखने से
पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कमी के
साथ सफलता मिलती है। आठवीं शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से बुद्धियोग
के आमदनी बढ़ती है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है !
४३७
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
धनुलग्न:पंचमभाव: मंगल पाँचवें भाव में स्वराशि-स्थित व्ययेश 'मंगल'
के प्रभाव से जातक को कुछ परेशानियों के बाद
विद्या एवं संतान के क्षेत्र में कुछ सफलता मिलती
है। चौथी नीच-दृष्टि से मित्र राशि में अष्टमभाव
को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व में कमी रहती है
तथा उदर-विकार बना रहता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से एकादश भाव को
देखने से बुद्धियोग द्वारा आमदनी के क्षेत्र में कुछ
सफलता मिलती है। आठवीं दृष्टि से स्वराशि में
द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है, परन्तु बाहरी स्थानों से विशेष लाभ
भी होता है।
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
धनुलग्न: षष्ठभाव: मंगल छठे भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित
'मंगल' के प्रभाव से जातक को शत्रु-पक्ष में सफलता
मिलती है। परन्तु सन्तान तथा विद्या के क्षेत्र में
कमी रहती है। चौथी मित्र-दृष्टि से नवम भाव को
देखने से कुछ परेशानियों के साथ भाग्य एवं धर्म
की वृद्धि होती है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वादश भाव को
देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी संबंधों
में कठिनाइयां आती हैं। आठवीं मित्र-दृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शारीरिक
सौन्दर्य तथा स्वास्थ्य में कमी तथा मस्तिष्क में परेशानी रहती है।
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
धनुलग्न: सप्तमभाव: मंगल सातवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर
स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से
कष्ट मिलता है तथा व्यवसाय में हानि होती है।
बाहरी स्थानों से कुछ अच्छा संबंध रहता है, जिसके
बल पर खर्च चलता रहता है। चौथी मित्र-दृष्टि से
दशम भाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय
के क्षेत्र में सामान्य सफलता मिलती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथम भाव को देखने
से शरीर में कुछ कमजोरी रहती है। आठवीं उच्च-
दृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब का अच्छा सुख प्राप्त होता है।
४३८
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
धनुलग्न : अष्टमभाव : मंगल आठवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर
स्थित नीच के 'मंगल' के प्रभाव से जातक की आयु
तथा पुरातत्त्व शक्ति में कमी आती है। पेट में
विकार तथा मस्तिष्क में चिन्ताएं रहती हैं। संतान
पक्ष से कष्ट होता है तथा विद्या-पक्ष में कमजोरी
रहती है। चौथी शत्रु-दृष्टि से एकादश भाव को देखने
से कठिन परिश्रम द्वारा आमदनी में वृद्धि होती है।
सातवीं उच्च-दृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से धन-
कुटुम्ब का सामान्य सुख मिलता है। आठवीं शत्रु-
दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से पराक्रम की वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों से
विरोध रहता है।
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
धनुलग्न : नवमभाव : मंगल नवें भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित
'मंगल' के प्रभाव से जातक के भाग्य तथा धर्म की
उन्नति होती है। विद्या तथा सन्तान के क्षेत्र में भी
कुछ कमी के साथ सफलता मिलती है। चौथी दृष्टि
से स्वराशि में द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक
रहता है तथा बाहरी संबन्धों से खर्च चलता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने
से भाई-बहिनों से विरोध रहता है तथा पराक्रम में
कमी आती है। आठवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन
का सुख कुछ कमी के भाव मिलता है।
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
धनुलग्न : दशमभाव : मंगल दसवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
'मंगल' के प्रभाव से जातक की राज्य के क्षेत्र में
बुद्धियोग से सफलता मिलती है तथा पिता एवं
व्यवसाय के क्षेत्र में हानि रहती है। चौथी मित्र-दृष्टि
से प्रथम भाव को देखने के शारीरिक सौन्दर्य एवं
स्वास्थ्य में कमी रहती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से
माता, भूमि एवं भवन का सुख कुछ कमी के साथ
मिलता है। आठवीं दृष्टि से स्वराशि में पंचम भाव
को देखने से विद्या, बुद्धि का श्रेष्ठ लाभ होता है, परन्तु सन्तान-पक्ष फिर भी कमजोर
रहता है।
४३६
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'एकादश भाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
धनुलग्न : एकादश भाव : मंगल ग्यारहवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित
[कुण्डली १०२२ : एकादश भाव में मं.] 'मंगल' के प्रभाव से जातक की आमदनी में पर्याप्त वृद्धि
होती है। खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों
से कुछ कठिनाई के साथ लाभ होता है। चौथी उच्च
दृष्टि से शत्रुराशि में द्वितीय भाव को देखने से धन-
संचय के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ता है तथा
कुटुम्ब का सुख प्राप्त होता है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में पंचम भाव की
देखने से विद्या एवं सन्तान पक्ष से लाभ होता है।
आठवीं शत्रु-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव रहता है तथा
झगड़ों में विजय एवं लाभ की प्राप्ति होती है।
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
धनुलग्न : द्वादशभाव : मंगल बारहवें भाव में स्वराशि में स्थित 'मंगल' के
[कुण्डली १०२३ : द्वादश भाव में मं.] प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी
सम्बन्धों से लाभ होता है! सन्तान तथा विद्या-पक्ष में
कमी रहती है। चौथी शत्रु-दृष्टि से तृतीय भाव की
देखने से भाई-बहिनों से विरोध रहता है, परन्तु पराक्रम
की वृद्धि होती है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से षष्ठ भाव की देखने से
शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है तथा झगड़ों से लाभ
होता है। आठवीं मित्र-दृष्टि से सप्तम भाव की देखने
से स्त्री-पक्ष से कष्ट मिलता है तथा व्यवसाय में कठिनाइयां आती रहती हैं।
'धनु' लग्न में 'बुध'
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
धनुलग्न : प्रथमभाव : बुध पहले भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित
[कुण्डली १०२४ : प्रथम भाव में बुं.] 'बुध' के प्रभाव से जातक को श्रेष्ठ शारीरिक तथा
विवेकशक्ति प्राप्त होती है। पिता, राज्य एवं व्यवसाय
के क्षेत्र में भी सफलता मिलती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से स्वराशि में सप्तम भाव
को देखने से सुन्दर पत्नी मिलती है तथा ससुराल से
यथेष्ट धन भी प्राप्त होता है। दैनिक आमदनी भी
बहुत अच्छी रहती है।
४४०
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
धनु लग्न : द्वितीयभाव : बुध
दूसरे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित
'बुध' के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब का
विशेष सुख मिलता है। पिता, राज्य तथा व्यवसाय
से भी लाभ होता है परन्तु स्त्री-सुख में कमी रहती
है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने
आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। दैनिक जीवन
उल्लासपूर्ण एवं शानदार बना रहता है।
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
धनु लग्न : तृतीयभाव : बुध
तीसरे भाव में मित्र 'शनि की राशि पर स्थित
'बुध' के प्रभाव से जातक के पराक्रम की वृद्धि होती
है तथा भाई-बहिनों का यथेष्ट सुख मिलता है। अपनी
विवेक-बुद्धि से उसे प्रत्येक क्षेत्र में सफलता मिलती
है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से नवम भाव को देखने से
भाग्य तथा धर्म की वृद्धि होती रहती है।
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
धनु लग्न: चतुर्थभावः बुध
चौथे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित नीच
के 'बुध' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि एवं
भवन के सुख में कमी प्राप्त होती है। स्त्री तथा
गृहस्थी के सुख में भी कठिनाइयां आती हैं।
सातवीं उच्च दृष्टि से स्वराशि में दशम भाव
को देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ पिता, राज्य
एवं व्यवसाय के क्षेत्र में शक्ति एवं सफलता प्राप्त
होती है।
४४१
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
धनु लग्न : पंचमभाव : बुध पाँचवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित
'बुध' के प्रभाव से जातक की विद्या, बुद्धि तथा सन्तान
का श्रेष्ठ लाभ होता है। स्त्री, गृहस्थी, पिता, राज्य
एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी उन्नति होती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से एकादश भाव को देखने
से आमदनी खूब होती है। ऐसा व्यक्ति वार्तालाप
करने में बड़ा चतुर, बुद्धिमान तथा यशस्वी भी होता
१०२८ है।
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
धनु लग्न : षष्ठभाव : बुध
छठे भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'बुध'
के प्रभाव से जातक को शत्रु-पक्ष में सफलता मिलती
है, परन्तु पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में हानि
उठानी पड़ती है। नाना के पक्ष से लाभ होता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से
खर्च अधिक रहता है तथा उसे बाहरी सम्बन्धों से लाभ
१०२९ होता है।
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
धनु लग्न : सप्तमभाव : बुध
सातवें भाव में 'स्वराशि' स्थित 'बुध' के प्रभाव
से जातक को सुन्दर स्त्री मिलती है तथा स्त्री-पक्ष से
लाभ भी होता है। दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में भी
सफलता मिलती है। राज्य एवं विद्या से भी सहयोग
तथा सम्मान मिलता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथम भाव को देखने से
शारीरिक सौन्दर्य तथा प्रभाव में वृद्धि होती है।
१०३०
४४२
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'सुख' का फलादेश
धनुलग्न : अष्टमभाव : बुध आठवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर
स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक की आयु तथा पुरा-
तत्त्व की शक्ति प्राप्त होती है। परंतु पिता, राज्य एवं
व्यवसाय के क्षेत्र में कभी-कभी बड़े घाटे तथा कठिना-
इयों का सामना करना होता है। सामान्य रहन-सहन
शानदार रहता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीय भाव को देखने के
धन तथा कुटुम्ब की वृद्धि के लिए विशेष परिश्रम
करना पड़ता है।
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
धनुलग्न : नवमभाव : सुख नवें भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित
'बुध' के प्रभाव से जातक अत्यधिक भाग्यवान् तथा
धर्मात्मा होता है। पिता, राज्य, व्यवसाय तथा स्त्री-
पक्ष में भी उसे अत्यन्त सफलता मिलती है। अपनी
विवेक-बुद्धि से वह यथेष्ट धन तथा सम्मान अर्जित
करता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से
भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम की भी अत्यधिक
वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति बहुत सुखी जीवन बिताता है।
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
धनुलग्न : दशमभाव : सुख दसवें भाव में स्वराशि-स्थित उच्च के बुध के
प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा व्यवसाय के
क्षेत्र में अत्यधिक सफलताएँ मिलती हैं। उसे पर्याप्त
यश, धन तथा सम्मान प्राप्त होता है।
सातवीं नीच-दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने के
माता के सुख में कमी रहती है तथा भूमि, भवन के
सुख में भी कुछ कठिनाइयाँ आती हैं।
४४३
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
धनुलग्न : एकादशभाव : बुध ग्यारहवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर
स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक की आमदनी खूब
होती है। पिता, राज्य, व्यवसाय तथा स्त्री-पक्ष में
भी पर्याप्त सुख, यश, धन, लाभ तथा सम्मान प्राप्त
होता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से
विद्या, बुद्धि एवं सन्तान का सुख भी यथेष्ट मिलता
है। ऐसा व्यक्ति धनी, सुखी, विद्वान् तथा यशस्वी
होता है।
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
धनुलग्न : द्वादशभाव : बुध बारहवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर
स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता
है, परन्तु बाहरी स्थानों के सम्बन्धों से लाभ प्राप्त
होता है। पिता, राज्य तथा स्त्री के सुख की हानि
होती है। जन्म-स्थान में रहकर व्यवसाय करने से
घाटा होता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से
शत्रु-पक्ष एवं झगड़े-मुकदमे के मामलों में सफलता
होती है।
'धनु' लग्न में 'गुरु'
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
धनुलग्न : प्रथमभाव : बुध पहले भाव में स्वराशि में स्थित 'गुरु' के प्रभाव
से जातक की शारीरिक सौन्दर्य एवं सुख की प्राप्ति
होती है। भूमि तथा भवन का सुख भी मिलता है।
पाँचवीं मित्र-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से विद्या,
बुद्धि एवं सन्तान के क्षेत्र में भी सफलता मिलती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तम भाव को देखने से स्त्री तथा
व्यवसाय का सुख भी मिलता है। नवीं मित्र-दृष्टि से
नवम भाव को देखने से भाग्य तथा धर्म की उन्नति
होती है।
ऐसा व्यक्ति विद्वान्, गुणी, सुन्दर, धनी, धर्मात्मा, मधुरभाषी, सज्जन तथा
आनन्दी होता है।
४४४
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
धनु लग्न : द्वितीयभाव : गुरु दूसरे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित
'गुरु' के प्रभाव से जातक के धन तथा कुटुम्ब-सुख
की हानि होती है। शारीरिक सुख तथा सौन्दर्य में
भी कमी आती है। माता, भूमि तथा भवन का पक्ष
भी कमजोर रहता है। पाँचवीं शत्रु-दृष्टि से षष्ठ भाव
को देखने से शत्रु-पक्ष में प्रभाव स्थापित होता है तथा
झगड़े के मामलों में बुद्धिमानी से सफलता मिलती
है। सातवीं उच्च-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने से
आयु एवं पुरातत्त्व का लाभ होता है।
नवीं मित्र-दृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के
क्षेत्र में सुख, सम्मान, यश तथा सफलता की प्राप्ति होती है।
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
धनु लग्न : तृतीयभाव : गुरु तीसरे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित
'गुरु' के प्रभाव से जातक को कुछ मतभेद के साथ
भाई-बहिन का सुख प्राप्त होता है तथा पराक्रम में
भी कमी आती है। भूमि, भवन तथा माता का सामान्य
सुख मिलता है। पाँचवीं मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को
देखने से स्त्री सुन्दर मिलती है तथा स्त्री से सुख और
व्यवसाय में सफलता मिलती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से नवम भाव को देखने से
भाग्य तथा धर्म की वृद्धि होती है। नवीं शत्रु-दृष्टि से एकादश भाव को देखने से
आमदनी के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती रहती है।
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
धनु लग्न : चतुर्थभाव : गुरु चौथे भाव में स्वराशि में स्थित 'गुरु' के प्रभाव से
जातक को माता, भूमि तथा भवन का श्रेष्ठ सुख
मिलता है। शारीरिक सौन्दर्य एवं प्रभाव की प्राप्ति भी
होती है। पाँचवीं उच्च तथा मित्र-दृष्टि से अष्टम भाव
को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की वृद्धि होती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से दशम भाव को देखने से
पिता से सुख, राज्य से सम्मान तथा व्यवसाय से लाभ
होता है। नवीं मित्र-दृष्टि से द्वादश भाव को देखने से
खर्च अच्छी तरह चलता है तथा बाहरी स्थानों से लाभ होता है।