भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
२२८
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
कर्क लग्न : द्वितीयभाव बुध दूसरे भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित
व्ययेश गुरु के प्रभाव से जातक को धन-संचय के लिए
अधिक प्रयत्न करना पड़ता है। भाई-बहिन के सुख में
कुछ कमी रहती है, परन्तु पराक्रम में वृद्धि होती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने
से आयु का पूर्ण सुख मिलता है, परन्तु पुरातत्त्व का
लाभ अपूर्ण रहता है। दैनिक जीवन सुखी तथा प्रभाव-
शाली रहता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
कर्क लग्न : तृतीयभाव : बुध तीसरे भाव में स्वराशि-स्थित बुध के प्रभाव
से जातक के पराक्रम में वृद्धि होती है, परन्तु भाई-
बहिन के सुख में कुछ कमी आती है।
सातवीं नीच-दृष्टि से नवमभाव को देखने
से भाग्य कमजोर रहता है तथा धर्म में भी विशेष
रुचि नहीं होती। ऐसे व्यक्ति को अपयश भी उठाना
पड़ता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
कर्क लग्न : चतुर्थभाव : बुध चौथे भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित
बुध के प्रभाव के जातक की माता, भूमि तथा भवन
के सुख में कुछ त्रुटिपूर्ण सफलता मिलती है, परन्तु
भाई-बहिन का सुख प्राप्त होता है तथा बाहरी
सम्बन्धों से लाभ एवं सुख मिलता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से दशमभाव को देखने
से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सामान्य
सफलताएँ मिलती हैं।
२२६
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
कर्क लग्न : पंचमभाव : बुध पाँचवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित
बुध के प्रभाव से जातक को विद्या तथा सन्तान के
क्षेत्र में त्रुटिपूर्ण सफलता मिलती है। ऐसा व्यक्ति
बुद्धिमान तथा हिम्मती होता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से एकादशभाव को देखने
से बुद्धि-बल द्वारा लाभ होता है तथा बाहरी सम्बन्धों
से सुख प्राप्त होता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
कर्क लग्न : षष्ठभाव : बुध छठे भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित
बुध के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष में नम्रता एवं शांति
के आश्रय से सफलता प्राप्त करता है। भाई-बहिन के
सुख तथा पराक्रम में कुछ कमी रहती है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि वाले द्वादशभाव
को देखने के कारण खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी
स्थानों से सामान्य सम्बन्ध बना रहता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
कर्क लग्न : सप्तमभाव : बुध सातवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित
बुध के प्रभाव से जातक की स्त्री का सुख मिलता है
तथा व्यवसाय में भी सफलता प्राप्त होती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने
के कारण जातक के शरीर में शक्ति तथा दुर्बलता
का सामंजस्य रहता है। ऐसा व्यक्ति अधिक
खर्चीला होता है तथा बाहरी सम्बन्धों एवं परिश्रम
के बल पर उन्नति भी करता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
कर्क लग्न : अष्टमभाव : बुध
आठवें भाव में शनि की राशि पर स्थित बुध
के प्रभाव से जातक की आयु तथा पुरातत्त्व का कुछ
कमियों के साथ लाभ होता है। भाई-बहिन के सुख
तथा पराक्रम में कुछ कमी आती है। बाहरी स्थानों
के सम्बन्ध से खर्च चलता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने
से धन का लाभ होता है, परन्तु सुख के व्ययेश होने
के कारण खर्च अधिक बना रहता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
कर्क लग्न : नवमभाव : गुरु
नवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित
बुध के प्रभाव से जातक की धर्म तथा भाग्योन्नति के
क्षेत्र में कुछ त्रुटिपूर्ण सफलता मिलती है। बाहरी
स्थानों के सम्बन्ध से सामान्य लाभ होता है। खर्च
अधिक रहता है।
सातवीं उच्च दृष्टि से तृतीयभाव को देखने
के कारण पुरुषार्थ की वृद्धि होती है, परन्तु भाग्यो-
न्नति में बाधाएं भी आती रहती हैं।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
कर्क लग्न : दशमभाव : बुध
दसवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित
बुध के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा
व्यवसाय के क्षेत्र में त्रुटिपूर्ण सफलताएँ मिलती हैं,
परन्तु भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम की वृद्धि
होती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने
के कारण माता, भूमि एवं भवन आदि का सामान्य
लाभ होता है तथा परिश्रम द्वारा खर्च चलता है।
२३१
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
कर्क लग्न : एकादशभाव : बुध ग्यारहवें भाव में मित्र शुक्र की राशि पर
स्थित बुध के प्रभाव से जातक की आमदनी अच्छी
रहती है। बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से भी लाभ
होता है, परन्तु खर्च अधिक बना रहता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचम भाव को देखने
से सन्तान, विद्या तथा बुद्धि के क्षेत्र में त्रुटिपूर्ण
लाभ होता है, परन्तु जातक अपनी बुद्धि, विवेक-
शक्ति तथा वाणी के बल पर लाभ कमाता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
कर्क लग्न : द्वादशभाव : बुध बारहवें भाव में स्वराशिस्थ बुध के प्रभाव के
जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों
के सम्बन्ध से लाभ होता है। भाई-बहिन के सुख
तथा पराक्रम में कमी रहती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने के
कारण शान्त स्वभाव, पुरुषार्थ एवं व्यय की शक्ति
से शत्रुपक्ष में सामान्य सफलता मिलती है। ऐसा
व्यक्ति धन खर्च करने के बल पर ही अनेक
कठिनाइयों पर नियन्त्रण स्थापित कर पाता है।
'कर्क' लग्न में 'गुरु'
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'प्रथम भाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
कर्क लग्न : प्रथमभाव : गुरु पहले भाव में मित्र चन्द्रमा की राशि पर
स्थित उच्च के गुरु के प्रभाव से जातक की शारीरिक
सौन्दर्य एवं प्रभाव की प्राप्ति होती है। पांचवीं
मित्रदृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान, विद्या
तथा बुद्धि का पूर्ण सुख मिलता है।
सातवीं नीच दृष्टि से सप्तमभाव को देखने
से स्त्री पक्ष तथा दैनिक खर्च में कठिनाइयां बनी रहती
हैं। नवीं दृष्टि से स्वराशि में नवमभाव को देखने से
भाग्य की शक्ति प्रबल रहती है तथा धर्म का लाभ
भी होता है।
२३२
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
कर्क लग्न : द्वितीयभाव : गुरु
दूसरे भाव में मित्र सूर्य की राशि पर
स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब
का पर्याप्त सुख मिलता है। पाँचवीं दृष्टि से
स्वराशि के षष्ठभाव को देखने से धन की शक्ति
द्वारा शत्रु पक्ष पर विजय मिलती है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने
से आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। नवीं
मित्र-दृष्टि से दशमभाव को देखने से राज्य, पिता
तथा व्यवसाय के क्षेत्र में यश, धन, सहयोग तथा सफलता का लाभ होता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
कर्क लग्न : तृतीयभाव : गुरु
तीसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर
स्थित गुरु के प्रभाव से जातक के पराक्रम में वृद्धि
होती है तथा भाई-बहिन का सुख मिलता है।
पाँचवीं नीच दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री
एवं व्यवसाय के क्षेत्र में हानि तथा क्लेश का
शिकार बनना पड़ता है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में नवमभाव को
देखने से धर्म तथा भाग्य की वृद्धि होती है। नवीं
शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ लाभ होता रहता
है। ऐसा व्यक्ति धर्मात्मा, धनी, हिम्मती तथा शत्रुजयी होता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
कर्क लग्न : चतुर्थभाव : गुरु
चौथे भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित
गुरु के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा भवन
के क्षेत्र में त्रुटिपूर्ण लाभ होता है। शत्रु पक्ष में शान्ति
से सफलता मिलती है। पाँचवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टम-
भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व के क्षेत्र में कुछ
असन्तोष रहता है।
सातवीं मित्र दृष्टि से दशमभाव को देखने से
राज्य, पिता एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता मिलती है। नवीं मित्र दृष्टि से द्वादश
भाव को देखने के कारण बाहरी संबंधों से लाभ होता है, परन्तु खर्च अधिक
रहता है।
२३३
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
कर्क लग्न : पंचमभाव : गुरु
पाँचवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर
स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि तथा
सन्तान के क्षेत्र में विशेष सफलता मिलती है। पाँचवीं
दृष्टि से स्वराशि में नवमभाव को देखने से बुद्धि तथा
सन्तान के सहयोग से भाग्य तथा धर्म की वृद्धि
होती है।
सातवीं शत्रु दृष्टि से एकादशभाव को देखने
से लाभ के क्षेत्र में कुछ कमी रहती है। नवीं मित्र दृष्टि से प्रथमभाव की देखने से
शारीरिक सौन्दर्य, आत्मबल तथा यश की वृद्धि होती है। गुरु के षष्ठेश होने के
कारण जातक को प्रत्येक क्षेत्र में कुछ परेशानियों के बाद ही सफलता मिलती है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
कर्क लग्न : षष्ठभाव : गुरु
छठे भाव में स्वराशि स्थित गुरु के प्रभाव से
जातक अपने शत्रुओं पर अत्यधिक प्रभाव स्थापित
करता है तथा यशस्वी होता है। परन्तु भाग्योन्नति में
कुछ कठिनाइयां आती हैं। पाँचवीं मित्र-दृष्टि से
दशमभाव को देखने के कारण पिता, राज्य एवं
व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता मिलती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव की देखने के
कारण बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है तथा
खर्च अधिक रहता है। नवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने के कारण धन तथा
कुटुम्ब का लाभ होता है। ऐसा व्यक्ति धनी, सुखी तथा यशस्वी होता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
कर्क लग्न : सप्तमभाव : गुरु
सातवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर
स्थित नीच के गुरु के प्रभाव से जातक को स्त्री तथा
व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयां आती हैं तथा शत्रु
पक्ष से व्यवसाय को हानि पहुँचती है। पाँचवीं
शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव की देखने से परिश्रम
द्वारा लाभ होता है।
सातवीं उच्च दृष्टि से प्रथमभाव को देखने
से शारीरिक सौन्दर्य तथा प्रभाव में वृद्धि होती है। नवीं मित्र-दृष्टि से तृतीयभाव
को देखने से पराक्रम बढ़ता है तथा भाई-बहिन का सुख भी मिलता है।
२३४
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
कर्क लग्न : अष्टमभाव : गुरु
आठवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर
स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को आयु तथा
पुरातत्त्व का त्रुटिपूर्ण लाभ होता है, परन्तु शत्रु
पक्ष से अशान्ति मिलती है तथा भाग्य पक्ष दुर्बल
रहता है। पाँचवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को
देखने के कारण खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी
संबंधों से लाभ भी होता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब की वृद्धि
होती है। नवीं शत्रु-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने के कारण माता, भूमि तथा भवन
के सुख में कुछ कमी रहती है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
कर्क लग्न : नवमभाव : गुरु
नवें भाव में स्वराशि-स्थित गुरु के प्रभाव से
जातक के भाग्य तथा धर्म की वृद्धि होती है। पाँचवीं
उच्च दृष्टि से प्रथम भाव को देखने से शारीरिक
सौन्दर्य तथा प्रभाव में वृद्धि होती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से
भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है।
नवीं मित्र-दृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या-
बुद्धि एवं सन्तान के पक्ष में भी विशेष सफलता
मिलती है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
कर्क लग्न : दशमभाव : गुरु
दसवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर
स्थित गुरु के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य एवं
व्यवसाय के क्षेत्र में पूर्ण सफलता, सुख तथा सम्मान
की प्राप्ति होती है। पाँचवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीय
भाव को देखने से धन-कुटुम्ब की वृद्धि होती है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने
से कुछ असन्तोष के साथ माता, भूमि तथा भवन का
पर्याप्त सुख मिलता है। नवीं दृष्टि से स्वराशि में
षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव बना रहता है। ऐसा व्यक्ति परिश्रम
तथा झगड़ों के द्वारा उन्नति करता है।
२३५
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
कर्क लग्न : एकादशभाव : गुरु ग्यारहवें भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित
गुरु के प्रभाव से जातक परिश्रम द्वारा लाभ कमाता है
तथा उसे शत्रु पक्ष से भी लाभ होता है। पाँचवी मित्र-
दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिनों का सुख
सामान्य कमी के लाभ मिलता है तथा पराक्रम में वृद्धि
होती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचमभाव की देखने से
विद्या, बुद्धि तथा सन्तान के क्षेत्र में सफलता मिलती है।
नवीं नीच दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा
व्यवसाय के क्षेत्र में असन्तोष एवं हानि का सामना करना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति
धनी अवश्य होता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
कर्क लग्न : द्वादशभाव : गुरु बारहवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित
गुरु के प्रभाव से जातक को बाहरी सम्बन्धों से लाभ
होता है तथा खर्च अधिक रहता है। भाग्य तथा धर्म के
क्षेत्र में कमी रहती है। पाँचवीं शत्रु दृष्टि से चतुर्थभाव
को देखने से माता, भूमि तथा भवन का सुख बड़े परिश्रम
द्वारा मिलता है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में षष्ठ भाव को देखने
से शत्रुपक्ष में सफलता मिलती है। नवीं शत्रु-दृष्टि से
अष्टमभाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व का सामान्य लाभ होता है।
'कर्क' लग्न में 'शुक्र'
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
कर्क लग्न : प्रथमभाव : शुक्र पहले भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित
शुक्र के प्रभाव से जातक को शारीरिक सौन्दर्य, सुख
तथा चातुर्य का लाभ होता है। माता तथा भूमि का
बुध भी मिलता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने
से स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी लाभ होता है
तथा भोगादि में खूब रुचि बनी रहती है। ऐसा
जातक सुखी, धनी, विलासी तथा ऐश्वर्यशाली होता है।
२३६
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
कर्क लग्न : द्वितीयभाव : शुक्र
दूसरे भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित
शुक्र के प्रभाव से जातक को धन-कुटुम्ब का सामान्य
असन्तोष के साथ सुख प्राप्त होता है तथा भूमि एवं
भवन का सुख भी मिलता है। माता के सुख में कुछ
कमी रहती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने
से आयु में वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का लाभ भी
होता है। ऐसा जातक धनी तथा सुखी जीवन
बिताता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
कर्क लग्न : तृतीयभाव : शुक्र
तीसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित
शुक्र के प्रभाव से जातक के भाई-बहिन के सुख तथा
पराक्रम में कमी रहती है। माता के सुख में भी कमी
का अनुभव होता है।
सातवीं उच्च दृष्टि से नवमभाव को देखने
से भाग्य की श्रेष्ठ वृद्धि होती है तथा धर्म का पालन
भी होता है। ऐसा व्यक्ति अपनी भीतरी कमजोरियों
को छिपाकर प्रकट में हिम्मती बना रहता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
कर्क लग्न : चतुर्थभाव : शुक्र
चौथे भाव में स्वराशि-स्थित शुक्र के प्रभाव से
जातक को माता, भूमि तथा भवन का पर्याप्त सुख
मिलता है। आय में वृद्धि होने से वह धनी भी
बनता है।
सातवी मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से
पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलता,
सुख, यश एवं धन की प्राप्ति होती है। ऐसा व्यक्ति
बड़ा चतुर, प्रतिष्ठित तथा धनी होता है।
२३७
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
कर्क लग्न : पंचमभाव : शुक्र
पाँचवें भाव में सामान्य मित्र मंगल की राशि पर
स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि तथा
सन्तान का यथेष्ट लाभ होता है। सातवीं दृष्टि से
स्वराशि में एकादशभाव को देखने से आमदनी भी
अच्छी रहती है तथा धन का लाभ खूब होता है।
ऐसे व्यक्ति को माता, भूमि तथा भवन का
सुख भी मिलता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
कर्क लग्न : षष्ठभाव : शुक्र
छठे भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित
शुक्र के प्रभाव से जातक को शत्रु-पक्ष में विजय
मिलती है, परन्तु माता, भूमि तथा भवन के सुख में
कुछ कमी तथा अशान्ति भी रहती है। लाभ के मार्ग
में भी परतन्त्रता का योग बनता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से द्वादशभाव को देखने के
कारण बाहरी सम्बन्धों से सुख तथा लाभ मिलता है
तथा खर्च अधिक रहता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
कर्कलग्न : सप्तमभाव : शुक्र
सातवें भाव में मित्र शनि की राशि पर
स्थित सुख के प्रभाव से जातक को स्त्री, व्यवसाय
तथा दैनिक आय के क्षेत्र में सफलता मिलती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से
जातक को शारीरिक सौन्दर्य, प्रभाव, चातुर्य एवं सुख
की प्राप्ति भी होती है।
२३८
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
कर्क लग्न : अष्टमभाव : शुक्र आठवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित
शुक्र के प्रभाव से जातक को आयु एवं पुरातत्त्व का
लाभ होता है तथा परदेश में रहकर उन्नति करता
है। घरेलू सुख में कुछ कमी भी रहती है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने के
कारण धन-संचय नहीं हो पाता तथा कौटुम्बिक सुख
में भी कमी रहती है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
कर्क लग्न : नवमभाव : शुक्र नवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित उच्च
शुक्र के प्रभाव से जातक के धर्म तथा भाग्य को विशेष
वृद्धि होती है। माता, भूमि तथा भवन का उत्तम सुख
भी मिलता है।
सातवीं दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-
बहिन के सुख तथा पराक्रम में कुछ कमी रहती है।
ऐसा व्यक्ति भाग्यवादी, धनी सुखी तथा सौभाग्यशाली
होता है।
कर्क लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
कर्क लग्न : दशमभाव : शुक्र दसवें भाव में सामान्य मित्र मंगल की राशि
पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक की पिता, राज्य
तथा व्यवसाय के क्षेत्र में पूर्ण सफलताएँ मिलती है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में चतुर्थभाव को
देखने से माता, भूमि तथा भवन का सुख भी प्रभूत
मात्रा में उपलब्ध होता है। ऐसा व्यक्ति धनी, सुखी,
गंभीर, चतुर, बुद्धिमान, शृंगार-प्रिय, प्रेमी तथा
ऐश्वर्यशाली होता है।
२३६
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
'कर्क' लग्न : एकादशभाव : शुक्र ग्यारहवें भाव में स्वक्षेत्री शुक्र के प्रभाव से
जातक को आमदनी अच्छी रहती है तथा माता,
भूमि, भवन आदि का सुख भी मिलता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचमभाव को देखने के
कारण विद्या, बुद्धि तथा सन्तान के क्षेत्र में भी पूर्ण
सफलता मिलती है। ऐसा व्यक्ति योग्य, चतुर, धनी,
सुखी तथा श्रेष्ठवाणी बोलनेवाला होता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
कर्क लग्न : द्वादशभाव : शुक्र बारहवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित
शुक्र के प्रभाव से जातक बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से
सुख एवं लाभ उठाता है तथा उसका खर्च अधिक
रहता है। माता, भूमि तथा भवन के सुख में कमी
आती है तथा मातृभूमि से अलग भी रहना पड़ता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु
पक्ष में चातुर्य एवं खर्च से काम निकालने में सफलता
मिलती है।
'कर्क' लग्न में 'शनि'
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
कर्क लग्न : प्रथमभाव : शनि पहले भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर
स्थित शनि के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य
में कुछ कमी आती है तथा शरीर में रोग भी रहता
है। तीसरी मित्र-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-
बहिन का त्रुटिपूर्ण सुख मिलता है, परन्तु पराक्रम में
वृद्धि होती है।
सातवीं दृष्टि से स्वक्षेत्र में सप्तमभाव को
देखने से व्यावसायिक क्षेत्र में सफलता मिलती है
तथा स्त्री का सुख होने पर भी उससे कुछ परेशानी रहती है। दसवीं नीच-दृष्टि से
दशमभाव को देखने से पिता तथा राज्य के क्षेत्र में सफलता एवं सम्मान का सामान्य
लाभ होता है।
२४०
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
कर्क लग्न : द्वितीयभाव : शनि
दूसरे भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित शनि
के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब के क्षेत्र में
हानि पहुँचती है। तीसरी उच्च दृष्टि से चतुर्थ भाव
को देखने से माता, भूमि तथा भवन का सुख
मिलता है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में अष्टमभाव को
देखने से आयु-वृद्धि तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है।
दसवीं मित्र-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से
परिश्रम द्वारा धन का लाभ होता है। ऐसा व्यक्ति अमीरी ढंग का जीवन तो
बिताता है, परन्तु धन तथा पारिवारिक सुख में कमी ही बनी रहती है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
कर्क लग्न : तृतीयभाव : शनि
तीसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित
शनि के प्रभाव से जातक के पराक्रम में वृद्धि होती है,
परन्तु भाई-बहिनों द्वारा परेशानी भी मिलती है।
तीसरी शत्रु-दृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान
से कष्ट मिलता है तथा विद्या-बुद्धि की कमी
रहती है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से नवमभाव को देखने से
भाग्य में रुकावटें आती हैं तथा धर्म में अरुचि रहती
है। बारहवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है,
परन्तु खर्च अधिक रहता है। ऐसा व्यक्ति कुछ क्रोधी स्वभाव का होता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
कर्क लग्न : चतुर्थभाव : शनि
चौथे भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित
शनि के प्रभाव से माता के सुख में कुछ कमी आती
है, परन्तु भूमि, भवन का यथेष्ट सुख मिलता है।
तीसरी शत्रु-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष
में प्रभाव रहता है।
सातवीं नीच-दृष्टि से दशमभाव को देखने से
पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयां
आती हैं। दसवीं शत्रु-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने
से शरीर में आलस्य तथा रोग रहता है तथा घरेलू सुख में भी कुछ कमी आती है।
२४१
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
कर्क लग्न : पंचमभाव : शनि
पाँचवें भाव में शत्रु मंगल की राशि में स्थित
शनि के प्रभाव से जातक को सन्तान, विद्या एवं बुद्धि
के क्षेत्र में कठिनाइयां आती हैं। तीसरी दृष्टि से
स्वराशि में सप्तमभाव को देखने से बुद्धिमती स्त्री
मिलती है, परन्तु उसके कारण कुछ कष्ट भी होता
है। व्यवसाय में भी बुद्धि-योग से सफलता मिलती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से एकादशभाव को देखने
से आमदनी अच्छी रहती है। दसवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन-संचय
में कमी रहती है तथा कुटुम्ब द्वारा भी परेशानियां उठानी पड़ती हैं।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
कर्क लग्न : षष्ठभाव : शनि
छठे भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित
शनि के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष में प्रभाव बनाये
रखता है परन्तु स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ
कठिनाइयों के बाद ही सफलता मिलती है। तीसरी
दृष्टि में स्वराशि में अष्टमभाव को देखने से आयु
तथा पुरातत्त्व की शक्ति बढ़ती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से
खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ
होता है। दसवीं मित्र-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से पराक्रम में वृद्धि होती है,
परन्तु भाई-बहिन से वैमनस्य रहता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
कर्क लग्न : सप्तमभाव : शनि
सातवें भाव में स्वराशि-स्थित शनि के प्रभाव
से जातक को स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता
मिलती है तथा भोगादि के सुख भी खूब मिलते हैं।
तीसरी शत्रु-दृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य
एवं धर्म के क्षेत्र में कुछ कमी रहती है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से
शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्य में कमी आती है।
दसवीं उच्च-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता,
भूमि तथा भवन का पर्याप्त सुख मिलता है।
२४२
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
कर्क लग्न : अष्टमभाव : शनि आठवें भाव में स्वराशि-स्थित शनि के प्रभाव
से जातक की आयु बढ़ती है तथा पुरातत्त्व का लाभ
होता है, परन्तु स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में
परेशानियाँ बनी रहती हैं। बाहरी स्थान के संबंध से
शक्ति भी मिलती है।
तीसरी नीच-दृष्टि से दशमभाव को देखने से
पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में परेशानी रहती
है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से
धन-संचय तथा कुटुम्ब-सुख में कमी आती है। दसवीं
शत्रु-दृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के क्षेत्र में भी
कठिनाइयों का अनुभव होता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
कर्क लग्न : नवमभाव : शनि नवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित
शनि के प्रभाव से जातक को धर्म-पालन तथा
भाग्योन्नति के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयाँ आती हैं,
परन्तु आयु की वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का
सामान्य लाभ होता है। तीसरी मित्र-दृष्टि से
एकादशभाव को देखने से आमदनी बढ़ती है। सातवीं
मित्र-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से पराक्रम में
वृद्धि होती है तथा भाई-बहिन के सुख में कुछ कमी
रहती है। दसवीं शत्रु-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के बाद शत्रु-
पक्ष पर प्रभाव स्थापित होता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
कर्क लग्न : दशमभाव : शनि दसवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित
नीच के मंगल के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य
तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयाँ आती रहती हैं।
पुरातत्त्व तथा आयु की हानि भी होती है। तीसरी
मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक
रहता है तथा बाहरी स्थानों से लाभ मिलता है।
सातवीं उच्चदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से
माता, भूमि तथा भवन आदि का सुख मिलता है।
दसवीं दृष्टि से स्वराशि में सप्तमभाव को देखने से
स्त्री तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में लाभ होता है।
२४३
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'एकादश भाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
कर्क लग्न : एकादशभाव : शनि
ग्यारहवें भाव में मित्र शुक्र की राशि पर
स्थित शनि के प्रभाव से जातक की आमदनी अच्छी
रहती है। स्त्री तथा व्यवसाय पक्ष में भी लाभ
होता है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से प्रथमभाव को
देखने से शारीरिक सौन्दर्य में कमी आती है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से पंचम भाव को देखने
से विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के क्षेत्र में कुछ कष्ट
रहता है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि में अष्टमभाव को देखने से आयु बढ़ती है तथा
पुरातत्त्व का लाभ भी होता है। ऐसा जातक कम पढ़ा-लिखा होने पर भी अपने
चातुर्य एवं परिश्रम द्वारा सुखी जीवन व्यतीत करता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
कर्क लग्न : द्वादशभाव : शनि
बारहवें भाव में मित्र बुध की राशि पर
स्थित शनि के प्रभाव से जातक को बाहरी स्थानों
के सम्बन्ध से लाभ होता है तथा खर्च अधिक रहता
है। स्त्री, व्यवसाय, आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति
में हानि होती है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से द्वितीय-
भाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब के पक्ष में भी
घोर चिन्ताएँ बनी रहती हैं।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने के कारण शत्रु उत्पात करते रहते
हैं, परन्तु उन पर प्रभाव भी बना रहता है। दसवीं शत्रु-दृष्टि से नवमभाव को देखने
से धर्म-पालन में कमी रहती है तथा भाग्य की शक्ति भी क्षीण हो जाती है। परन्तु
इन सब कठिनाइयों के बावजूद जातक शानदार जीवन व्यतीत करता है।
'कर्क' लग्न में 'राहु'
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कर्क लग्न : प्रथमभाव : राहु
पहले भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर
स्थित राहु के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य
में कमी आती है तथा हृदय चिन्तित बना रहता है।
कभी-कभी मृत्यतुल्य कष्टों का सामना भी करना
पड़ता है, परन्तु वह गुप्त युक्तियों के बल पर अपने
सम्मान को बचाये रखता है तथा उन्नति के लिए
कठिन परिश्रम भी करता है।
२४४
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कर्क लग्न : द्वितीयभाव : राहु दूसरे भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित
राहु के प्रभाव से जातक को धन एवं कुटुम्ब के सुख
की हानि होती है। वह गुप्त युक्तियों तथा कठिन
परिश्रम के बल पर धन की वृद्धि के लिए प्रयत्नशील
रहता है और कभी-कभी आकस्मिक धन-लाभ भी
प्राप्त करता है। उसे अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा के
लिए सदैव चिंतित बने रहना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति
बड़ा परिश्रमी तथा हिम्मती होता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कर्क लग्न : तृतीयभाव : राहु तीसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित
राहु के प्रभाव से जातक के पराक्रम की अत्यधिक
वृद्धि होती है तथा कुछ कठिनाइयों के साथ भाई-
बहिन का सुख भी मिलता है।
ऐसा व्यक्ति अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए कठिन
परिश्रम, गुप्त युक्तियों तथा पुरुषार्थ का सहारा लेता
है। भीतरी रूप से कमजोर होने पर भी ऊपर से बड़ा
हिम्मती दिखाई देता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कर्क लग्न : चतुर्थभाव : राहु
चौथे भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित
राहु के प्रभाव से जातक को माता के सुख में कुछ
कमी प्राप्त होती है तथा भूमि और भवन का सुख भी
अल्प मात्रा में प्राप्त होता है। उसे देश छोड़ कर परदेश
में भी रहना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति कभी-कभी
असफलताओं का भी विशेष शिकार बनता है।
२४५
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कर्क लग्न : पंचमभाव : राहु
पाँचवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर
स्थित राहु के प्रभाव से जातक की विद्याध्ययन में
कठिनाई आती है तथा सन्तान-पक्ष से कष्ट होता
है। बहुत समय बीत जाने पर ही सन्तान का सुख
मिलता है। कम पढ़-लिखा होने पर भी ऐसा व्यक्ति
अपनी बातों से बड़े-बड़े बुद्धिमानों को भी प्रभावित
करता है। वह स्वभाव से जिद्दी तथा कानून का
जानकार भी होता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कर्क लग्न : षष्ठभाव : राहु
छठे भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित
राहु के प्रभाव से जातक के लिए शत्रु-पक्ष द्वारा
कठिनाइयाँ उत्पन्न हो जाती हैं, परन्तु वह देश-नीति
के आश्रय से उनका दमन करने में सफल हो जाता है।
ऐसा व्यक्ति गुप्त युक्तियों का ज्ञाता, चतुर,
स्वार्थी तथा पाप-पुण्य की चिन्ता न करने वाला
होता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कर्क लग्न : सप्तमभाव : राहु
सातवें भाव में मित्र शनि की राशि पर
स्थित राहु के प्रभाव से जातक को स्त्री तथा
व्यवसाय के क्षेत्र में परेशानियों तथा कठिनाइयों
का शिकार होना पड़ता है। उसकी इन्द्रिय में
विकार होता है। घरेलू मामलों में उसे कभी-कभी
घोर कष्ट उठाना पड़ता है, परन्तु अन्त में सफलता
भी प्राप्त कर लेता है।
२४६
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कर्क लग्न : अष्टमभाव : राहु सातवें भाव में मित्र शनि की राशि पर
स्थित राहु के प्रभाव से जातक की आयु के बारे में
कभी-कभी चिन्ताजनक स्थितियों का मुकाबला
करना पड़ता है तथा पुरातत्त्व की हानि भी होती
है। वह उदर-विकार से ग्रस्त रहता है। जीवन-
निर्वाह के लिए उसे अनेक गुप्त युक्तियों का आश्रय
लेना पड़ता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कर्क लग्न : नवमभाव : राहु नवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित
राहु के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में कठि-
नाइयां आती हैं तथा धर्म का भी यथावत् पालन
नहीं हो पाता।
उसे कभी-कभी बड़े संकटों का सामना भी
करना पड़ता है, परन्तु गुप्त युक्तियों तथा परिश्रम
के बल पर कुछ सफलता भी प्राप्त करता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कर्क लग्न : दशमभाव : राहु
दसवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित
राहु के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा
व्यवसाय के क्षेत्र में परेशानियां उठानी पड़ती हैं।
अनेक कष्टों को भोगने तथा अनेक बार निराश होने
के बाद वह अपने परिश्रम, धैर्य तथा बहादुरी से थोड़ी
बहुत उन्नति करता तथा प्रतिष्ठा भी बचाता है।
२४७
‘कर्क’ लग्न की कुण्डली के ‘एकादशभाव’ स्थित ‘राहु’ का फलादेश
कर्क लग्न : एकादशभाव : राहु
ग्यारहवें भाव में मित्र शुक्र की राशि पर
स्थित राहु के प्रभाव से जातक को बड़ी चतुराई
के साथ यथेष्ट धन का लाभ होता है, परन्तु
कभी-कभी सामान्य कठिनाइयां भी उठानी पड़ती
हैं तथा संकटों का सामना करना पड़ता है। कभी
कभी आकस्मिक रूप से भी धन-लाभ होता है।
‘कर्क’ लग्न की कुण्डली के ‘द्वादशभाव’ स्थित ‘राहु’ का फलादेश
कर्क लग्न : द्वादशभाव : राहु
बारहवें भाव में मित्र बुध की राशि में स्थित
राहु के प्रभाव से जातक को बाहरी स्थानों के संबंध
से गुप्त युक्तियों के बल पर लाभ होता है तथा
खर्च अधिक रहता है। वह परदेश में विशेष सम्मान
एवं ख्याति प्राप्त करता है।
ऐसा व्यक्ति अपनी कमजोरियों को प्रकट
नहीं करता तथा बड़ी चतुराई तथा बुद्धिमानी से
उन्नति एवं सफलता प्राप्त करता है।
‘कर्क’ लग्न में ‘केतु’
‘कर्क’ लग्न की कुण्डली के ‘प्रथमभाव’ स्थित ‘केतु’ का फलादेश
कर्क लग्न : प्रथमभाव : केतु
पहले भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर
स्थित केतु के प्रभाव से जातक के शरीर पर किसी
गहरी चोट अथवा घाव का निशान बनता है।
शारीरिक सौन्दर्य तथा स्वास्थ्य में कमी आती है।
चेचक की बीमारी हो सकती है तथा कभी-कभी
मृत्युतुल्य कष्ट भी भोगना पड़ता है।