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सर्वकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 220, कुल 638 में से

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'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
कर्क लग्न : द्वितीयभाव बुध दूसरे भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित
व्ययेश गुरु के प्रभाव से जातक को धन-संचय के लिए
अधिक प्रयत्न करना पड़ता है। भाई-बहिन के सुख में
कुछ कमी रहती है, परन्तु पराक्रम में वृद्धि होती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने
से आयु का पूर्ण सुख मिलता है, परन्तु पुरातत्त्व का
लाभ अपूर्ण रहता है। दैनिक जीवन सुखी तथा प्रभाव-
शाली रहता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
कर्क लग्न : तृतीयभाव : बुध तीसरे भाव में स्वराशि-स्थित बुध के प्रभाव
से जातक के पराक्रम में वृद्धि होती है, परन्तु भाई-
बहिन के सुख में कुछ कमी आती है।
सातवीं नीच-दृष्टि से नवमभाव को देखने
से भाग्य कमजोर रहता है तथा धर्म में भी विशेष
रुचि नहीं होती। ऐसे व्यक्ति को अपयश भी उठाना
पड़ता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
कर्क लग्न : चतुर्थभाव : बुध चौथे भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित
बुध के प्रभाव के जातक की माता, भूमि तथा भवन
के सुख में कुछ त्रुटिपूर्ण सफलता मिलती है, परन्तु
भाई-बहिन का सुख प्राप्त होता है तथा बाहरी
सम्बन्धों से लाभ एवं सुख मिलता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से दशमभाव को देखने
से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सामान्य
सफलताएँ मिलती हैं।