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सर्वकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 237, कुल 638 में से

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'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कर्क लग्न : पंचमभाव : राहु
पाँचवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर
स्थित राहु के प्रभाव से जातक की विद्याध्ययन में
कठिनाई आती है तथा सन्तान-पक्ष से कष्ट होता
है। बहुत समय बीत जाने पर ही सन्तान का सुख
मिलता है। कम पढ़-लिखा होने पर भी ऐसा व्यक्ति
अपनी बातों से बड़े-बड़े बुद्धिमानों को भी प्रभावित
करता है। वह स्वभाव से जिद्दी तथा कानून का
जानकार भी होता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कर्क लग्न : षष्ठभाव : राहु
छठे भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित
राहु के प्रभाव से जातक के लिए शत्रु-पक्ष द्वारा
कठिनाइयाँ उत्पन्न हो जाती हैं, परन्तु वह देश-नीति
के आश्रय से उनका दमन करने में सफल हो जाता है।
ऐसा व्यक्ति गुप्त युक्तियों का ज्ञाता, चतुर,
स्वार्थी तथा पाप-पुण्य की चिन्ता न करने वाला
होता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कर्क लग्न : सप्तमभाव : राहु
सातवें भाव में मित्र शनि की राशि पर
स्थित राहु के प्रभाव से जातक को स्त्री तथा
व्यवसाय के क्षेत्र में परेशानियों तथा कठिनाइयों
का शिकार होना पड़ता है। उसकी इन्द्रिय में
विकार होता है। घरेलू मामलों में उसे कभी-कभी
घोर कष्ट उठाना पड़ता है, परन्तु अन्त में सफलता
भी प्राप्त कर लेता है।