भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
३० भोजप्रबन्धः
'आगतानामपूर्णानां पूर्णानामपि गच्छताम् !
यद्ध्वनि न सङ्घट्टो घटानां तत्सरो वरम्' ॥ ७२ ॥
इति । तस्य राजा लक्षं ददौ ।
तब पहिले आया कवि संमुख स्थित छः कविराजों को देखकर बोला --
हे कवियों, इस महान् सरोवर की तटभूमि पर स्थित राजा जब स्व-भवन
जाय, तब कुछ कहना । वे सब महाकवि राजा का संपूर्ण पूर्व कृत आचरण
जान कर खड़े थे । उनमें से एक सरोवर के व्याज से राजा से बोला--
खाली आये और भर कर जाते घड़ों की मार्ग में जो टकराहट न हो,
तालाब वही अच्छा होता है ।
संतुष्ट राजा ने उसे लाख दिये ।
ततो गोविन्दपण्डितस्तान्कवीन्द्रान्दृष्ट्वा चुकोप। तस्य कोपाभिप्रायं
ज्ञात्वा द्वितीयः कविराह--
'कस्य तृषं न क्षपयसि पिबति न कस्तव पयः प्रविश्यान्तः ।
यदि सन्मार्गसरोवर नक्रो न क्रोडमधिवसति' ॥ ७३ ॥
राजा तस्मै लक्षद्वयं ददौ । तं च गोविन्दपण्डितं व्यापारपदाद्दूरीकृत्य ,
'त्वयापि सभायामागन्तव्यम्, परं तु केनापि दौष्ट्यं न कर्तव्यम्' इत्यु-
क्त्वा ततस्तेभ्यः प्रत्येकं लक्षं दत्त्वा स्वनगरमागतः ते च यथायथं
गताः ।
तब गोविंद पंडित उन कविराजों को देखकर क्रुद्ध हो गया । उसके क्रोध
का अभिप्राय जानकर दूसरा कवि बोला --
हे मार्ग के सुन्दर सरोवर, तुम किस की प्यास न बुझा देते और कौन
तुम्हारे भीतर प्रविष्ट होकर जल नहीं पी लेता, यदि तुम्हारे भीतर मगर न
निवास करता ?
राजा ने उसे दो लाख दिये । और उस गोविंद पंडित को प्रदत्त कार्य के
पद से हटाकर आज्ञा दी--'सभा में तुम भी आना, परंतु किसी के साथ
दुष्टता न करना ।' और ऐसा कह कर राजा उन सब में प्रत्येक को लाख-
लाख देकर अपने नगर लौट आया । वे सब कवि अपने-अपने स्थान को गये ।
ततः कदाचिद्राजा मुख्यामात्यं प्राह-
भोजप्रबन्धः ३१
'विप्रोऽपि यो भवेन्मूर्खः स पुराद्बहिरस्तु मे ।
कुम्भकारोऽपि यो विद्वान्स तिष्ठतु पुरे मम' ॥ ७४ ॥
इति । अतः कोऽपि न मूर्खोऽभूद्धारानगरे ।
तदनंतर एकवार राजा ने मुख्य मंत्री से कहा--
ब्राह्मण भी यदि मूर्ख हो, तो मेरी पुरी के बाहर रहे और कुम्हार भी
यदि विद्वान् हो तो मेरे नगर में निवास करे ।
अतः धारा नगर में कोई मूर्ख नहीं रहा ।
३—राजसभायां कालिदासस्य आगमनम्
ततः क्रमेण पञ्चशतानि विदुषां वररुचि-बाण-मयूर-रेफण-हरि-
शंकर-कलिङ्ग-कर्पूर-विनायक-मदन-विद्या-विनोद्-कोकिल-तारेन्द्रमुखाः
सर्वशास्त्रविचक्षणाः सर्वे सर्वज्ञाः श्रीभोजराजसभामलंचक्रुः । एवं स्थिते
कदाचिद्विद्वद्वृन्दवन्दित-सिंहासनासीने कविशिरोमणौ कवित्वप्रिये
विप्रप्रियबान्धवे भोजेश्वरे द्वारपाल एत्य प्रणम्य व्यजिज्ञपत्—'देव,
कोऽपि विद्वान्द्वारि तिष्ठति' इति ।
तत्पश्चात् धीरे-धीरे समस्त शास्त्रों के विज्ञाता, सब सबकुछ जानने वाले
वररुचि, वाण, मयूर, रेफण, हरि, शंकर, कलिंग, कर्पूर, विनायक मदन,
विद्याविनोद, कोकिल, तारेंद्र आदि पाँच सौ विद्वान् श्री भोजराज की सभा
को सुशोभित करने लगे । इस प्रकार कभी विद्वत्समूह द्वारा वंदित सिंहासन
पर कवि शिरोमणि, कवित्व को प्रेम करनेवाले, ब्राह्मणों के प्यारे बंधु राजा
भोज के बैठे होने पर द्वारपाल ने आकर तथा प्रणाम करके निवेदन किया-
'महाराज, द्वार पर कोई विद्वान् प्रतीक्षा कर रहा है।'
अथ राजा 'प्रवेशय तम्' इत्याज्ञप्ते सोऽपि दक्षिणेन पाणिना
समुन्नतेन विराजमानो विप्रः प्राह-'राजन्नभ्युदयोऽस्तु'
राजा—'शंकरकवे किं पत्रिकायामिदम्'
कविः—'पद्यम्'
राजा—'कस्य'
कविः—'तवैव भोजनृपते'
राजा—'तत्पठ्यताम्'
३२ भोजप्रबन्धः
कविः- 'पठ्यते' ।
एतासामरविन्दसुन्दरदृशां द्राक्चामरान्दोलना-
दुल्ललद्गुजवल्लिकङ्कणझणत्कारः क्षणं वार्यताम् ॥ ७५ ॥
यथा यथा भोजयशो विवर्धते सितां त्रिलोकीमिव कर्तुमुद्यतम् ।
तथा तथा मे हृदयं विदूयते प्रियालकालीधवलत्वशङ्कया' ॥ ७६ ॥
ततो राजा शंकरकवये द्वादशलक्षं ददौ। सर्वे विद्वांसश्च विच्छाय-
वदना बभूवुः। परं कोऽपि राजभयान्नावदत्। राजा च कार्यवशाद्-
गृहं गतः ।
राजा द्वारा उसे प्रविष्ट कराने का आदेश होने पर दाहिना हाथ ऊपर
उठाये वह ब्राह्मण बोला- राजन्, उन्नति हो।
राजा ने पूछा- हे शंकर कवि, पत्रिका में क्या है ?
कवि- पद्य ।
राजा- किसके निमित्त ?
कवि- हे भोजराज, आपके ही निमित्त ।
राजा- तो पढ़िए ।
कवि- पढ़ता हूँ-
परंतु क्षण भरको इन कमल के समान सुंदर नयनों वाली रमणियों के
जल्दी-जल्दी चँवर डुलाने के कारण हिलती भुजलताओं में पड़े कंकणों के
झणत्कार का निवारण तो कीजिए ।
हे भोज, तीनों लोकों को सफेद करने को उद्यत आपका यश जैसे जैसे
बढ़ता है, वैसे-वैसे अपनी प्रिया की अलकावली के श्वेत हो जाने की आशंका
से मेरा हृदय व्यथित होता है ।
तब राजा ने शंकर कवि को बारह लाख दिये । और सब विद्वानों के
मुख उतर गये, परंतु राजा के डर से सब चुप रहे । राजा कार्यवश बाहर
चला गया ।
ततो विभूपालां सभां दृष्ट्वा विबुधगणस्तं निनिन्द- 'अहो
नृपतेरज्ञता । किमस्य सेवया । वेदशास्त्रविचक्षणेभ्यः स्वाश्रयकविभ्यो
लक्षमदात् । किमनेन वितुष्टेनापि । असौ च केवलं ग्राम्यः कविः
शंकरः । किमस्य प्रागल्भ्यम् ।' इत्येवं कोलाहलरवे जाते कश्चिदभ्यगात्
कनकमणिकुण्डलशाली दिव्यांशुकप्रावरणो नृपकुमार इव मृगमदपङ्क-
कलङ्कितगात्रो नवकुसुमसमभ्यर्चितशिराश्चन्दनाङ्गरागेण विलोभयन्वि-
लास इव मूर्तिमान्कवितेव तनुमाश्रितः शृङ्गाररसस्य स्यन्द इव सस्पन्दो
महेन्द्र इव महीवलयं प्राप्तो विद्वान्। तं दृष्ट्वा सा विद्वत्परिषद्भयकौतुकयोः
पात्रमासीत् । स च सर्वान्प्रणिपत्य प्राह—'कुत्र भोजन्नृपः' इति । ते
तमूचुः-इदानीमेव सौधान्तरगतः' इति । ततोऽसौ प्रत्येकं तेभ्यस्ताम्बूलं
दत्त्वा गजेन्द्रकुलगतो मृगेन्द्र इवासीत् ।
तदनंतर सभा को राजा से रहित पाकर विद्वान् लोग उसकी निंदा करने
लगे—'अरे, राजा का अज्ञान है । इसकी सेवा से क्या लाभ ? वेद-शास्त्रों के
विज्ञाता अपने आश्रित कवियों को इसने एक लाख दिया । इतने असंतुष्ट होने
से भी क्या ? यह एक ग्रामीण कवि मात्र है। इसमें प्रगल्भता ही क्या है ?'
इस प्रकार कोलाहल शब्द होने पर सोने के मणिजटित कुंडल-धारण किये,
अत्यंत सुंदर वस्त्र पहिने, राजकुमार की भाँति कस्तूरी का लेप समस्त
शरीर पर किये, नवीन पुष्पों से सिर को सुशोभित किये, चंदन के अंगराग से
लुब्ध करता हुआ मूर्तिमान् विलास के समान, जैसे कविता ने ही देह-धारण
की हो ऐसा, श्रृंगार रस के प्रवाह की भाँति, भूतल पर अवतीर्ण साक्षात्
महेंद्र के समान कोई विद्वान् आया । उसे देखकर वह विद्वन्मंडली भय और
कौतुक की पात्र बन गयी । वह सबको प्रणाम करके बोला—'राजा भोज
कहाँ हैं ?' उन्होंने उसे बताया—'अभी प्रासाद में गये हैं ।' तब वह उन
सबको एक-एक तांबूल देकर गजराजों के बीच स्थित मृगराज की भाँति
स्थित हुआ ।
ततः स महापुरुषः शंकरकविप्रदानेन कुपितांस्तान्बुद्ध्वा प्राह—
'भवद्भिः शंकरकवये द्वादशलक्षाणि प्रदत्तानीति न मन्तव्यम् । अभि-
प्रायस्तु राज्ञो नैव बुद्धः । यतः शंकरपूजने प्रारब्धे शंकरकविस्त्वेकैनैव
लक्षेण पूजितः । किं तु तन्निष्ठांस्तन्नाम्ना विभ्राजितानेकादशरुद्राञ्शंक-
रानपरान्मूर्तीन्प्रत्यक्षाञ्ज्ञात्वा तेषां प्रत्येकमेकैकं लक्षं तस्मै शङ्करकवय
एव शङ्करमूर्तये प्रदत्तमिति राज्ञोऽभिप्रायः' इति । सर्वेऽपि चमत्कृ-
तास्तेन ।
३ भोज०
३४ भोजप्रबन्धः
तत्पश्चात् शंकर कवि को दान मिलने के कारण उन (विद्वानों) को
क्रुद्ध हुआ जान वह महापुरुष बोला- 'शंकर कवि को बारह लाख दिये गये
हैं'—आपका यह मानना उचित नहीं है । राजा का अभिप्राय तो आपने नहीं
समझा । वस्तुतः शंकर-पूजन आरब्ध होने पर शंकर कवि तो एक लाख से
ही पूजा गया है, किंतु उसमें स्थित और उसके नाम से प्रकाशित एकादश
रुद्रों को, शंकर की अन्य प्रत्यक्ष मूर्तियाँ समझ कर, उनमें से प्रत्येक को एक
एक लाख शंकर कवि को ही शंकरमूर्ति विचार कर दिया गया-राजा
का यह अभिप्राय है।' उसने सब को चमत्कृत कर दिया ।
ततः कोऽपि राजपुरुषस्तद्विद्वत्स्वरूपं द्राग्राज्ञे निवेदयामास । राजा
च स्वमभिप्रायं साक्षाद्विदितवन्तं तं महेशमिव महापुरुषं मन्यमानः स-
भामभ्यगात् । स च 'स्वस्ति'- इत्याह राजानम् । राजा च तमालिङ्ग्य
प्रणम्य निजकरकमलेन तत्करकमलमवलम्ब्य सौधान्तरं गत्वा प्रोत्तुङ्ग-
गवाक्ष उपविष्टः प्राह - 'विप्र भवन्नाम्ना कान्यक्षराणि सौभाग्यावल-
म्बितानि । कस्य वा देशस्य भवद्विरहः सुजनान्बाधते' इति । ततः
कविर्लिखति राज्ञो हस्ते 'कालिदासः' इति । राजा वाचयित्वा पादयोः
पतति ।
तदनंतर किसी राजपुरुष ने शीघ्रता पूर्वक उस विद्वान के स्वरूप के
विषय में राजा के आगे निवेदन किया । अपने अभिप्राय को ठीक-ठीक समझ-
लेने वाले उसे प्रत्यक्ष महादेव मान कर राजा सभा में गये। उसने राजा से कहा-
कल्याण हो।' राजा ने उसका आलिंगन किया और प्रणाम किया और अपने
करकमल से उसके करकमल को पकड़ कर प्रासाद के भीतर जा खूब ऊंचे
झरोखे में बैठकर बोला-ब्राह्मण, आपके नाम ने किन अक्षरों को सौभाग्य-
शाली बनाया है और किस देश के सत्पुरुषों को आपका विरह व्यथित कर
रहा है?' तब कवि ने राजा के हाथ पर लिख दिया- 'कालिदास' । बांच कर
राजा पैरों पड़ गया ।
ततस्तत्रासीनयोः कालिदासभोजराजयोरासीत्सन्ध्या । राजा-सखे,
सन्ध्यां वर्णय' इत्यवादीत् । कालिदासः—
भोजप्रबन्धः ३५
'व्यसनिन इव विद्या च्छीयतेपङ्कजश्री-
गुणिन इव विदेशे दैन्यमायान्ति भृङ्गाः ।
कुन्नृपतिरिव लोकं पीडयत्यन्धकारो
धनमिव कृपणस्य व्यर्थतामेति चक्षुः' ॥ ७७ ॥
तत्पश्चात् कालिदास और भोजराज के वहाँ बैठे-बैठे सांझ हो गयी ।
राजा ने कहा—'मित्र, संध्या का वर्णन करो ।'
कालिदासने वर्णन किया---
कमल की शोभा व्यसनों में लीन मनुष्य की विद्या के समान क्षीण हो
रही है, जैसे परदेस में गुणी दीनता को प्राप्त हो जाते हैं, वैसे ही भौंरे
दीनता को प्राप्त हो रहे हैं। बुरे राजा की भांति अंधकार संसार को पीड़ा
दे रहा है और कंजूस के धन के तुल्य नेत्र व्यर्थ हो रहे हैं ।
पुनश्च राजानं स्तौति कविः -
'उपचारः कर्तव्यो यावदनुत्पन्नसौहृदाः पुरुषाः ।
उत्पन्नसौहृदानामौपचारः कैतवं भवति ॥ ७८ ॥
दत्ता तेन कविभ्यः पृथ्वी सकलापि कनकसम्पूर्णा ।
दिव्यां सुकाव्यरचनां क्रमं कवीनां च यो विजानाति ॥७६॥
सुकवेः शब्द सौभाग्यं सत्कविर्वेत्ति नापरः ।
बन्ध्या न हि विजानाति परां दौर्हृदसम्पदम्' ॥ ८० ॥
इति । ततः क्रमेण भोजकालिदासयोः प्रीतिरजायत ।
फिर कवि ने राजा की स्तुति की--
जब तक पुरुषों में मित्रता उत्पन्न न हो, उपचार ( वाह्य आचार )
तभी तक करना उचित हैं । जिनमें मैत्री हो गयी है, उनमें दिखावा वरतना
वंचना है ।
उसने सोने से भरी पूरी समूची धरती ही कवियों को दे डाली, जो
अलौकिक सुकाव्य की रचना और उसके पूर्वा पर संबंध को समझता है ।
सुकवि के शब्द-सौभाग्य को सुकवि ही जानता है, अन्य नहीं; दूसरे
की गर्भ-संपदा (संतान को पेट में रखने का सौभाग्य ) को वांझ नहीं
जानती ।
३६ भोजप्रबन्धः
तदनंतर धीरे-धीरे भोज और कालिदास में प्रीति हो गयी ।
४—कालिदासेन भोजः प्रशंसितः
ततः कालिदासं वेश्यालम्पटं ज्ञात्वा तस्मिन्सर्वे द्वेषं चक्रुः । न को-
ऽपि तं स्पृशति । अथ कदाचित्सभामध्ये कालिदासमालोक्य भोजेन
मनसा चिन्तितम्—‘कथमस्य प्राज्ञस्यापि स्मरपीडाप्रमादः’ इति । सोऽपि
तदभिप्रायं ज्ञात्वा प्राह—
‘चेतोभुवश्चापलताप्रसङ्गे का वा कथा मानुषलोकभाजाम् ।
यद्दाहशीलस्य पुरां विजेतुस्तथाविधं पौरुषमर्धमासीत्’ ॥ ८१ ॥
ततस्तुष्टो भोजराजः प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ ।
तत्पश्चात् कालिदास को वेश्यागामी जानकर सब उससे द्वेष करने
लगे । उसका स्पर्श भी कोई न करता था । कभी सभा के मध्य
कालिदास को देखकर भोज मन ही मन विचारने लगा—‘ऐसे प्रकृष्ट
विद्वान् को भी कामपीडा क्यों है ?’ कालिदास ने उसका अभिप्राय समझ
कर कहा—
मनसिज काम की चंचलता के आगे मनुष्यलोक के निवासियों की तो
कथा ही क्या है, जब कि कामदहन करने वाले त्रिपुरजयी शिव का ही
वह विख्यात पौरुष [काम के संदर्भ में ] आधा रह गया था ।
संतुष्ट होकर राजा भोज ने प्रत्येक अक्षर पर लाख-लाख दिया ।
ततः कालिदासो भोजं स्तौति—
‘महाराज श्रीमज्जगति यशसा ते धवलिते
पयः पारावारं परमपुरुषोऽयं मृगयते ।
कपर्दी कैलासं करिवरमभौमं कुलिशभृ-
`त्कलानार्थं राहुः कमलभवनो हंसमधुना ॥ ८२ ।
तदनंतर कालिदास ने भोज की स्तुति की—
हे श्रीमन् महाराज, तुम्हारे यश से समग्र संसार के शुभ्र हो जाने पर
संप्रति ये पुरुषोत्तम विष्णु क्षीर समुद्र का अन्वेषण करते हैं, जटाजूटधारी शिव
कैलास का, वज्रधर इंद्र दिव्य गजवर ऐरावत का, राहु चंद्रमा का और
कमलवासी ब्रह्मा अपने वाहन हंस का ।
भोजप्रबन्धः ३७
नीरक्षीरे गृहीत्वा निखिलखगततीर्याति नालीकजन्मा
तक्रं धृत्वा तु सर्वानटति जलनिधींश्चक्रपाणिर्मुकुन्दः ।
सर्वानुत्तुङ्गशैलान्दहति पशुपतिः कालनेत्रेण पश्यन्
व्याप्तात्वत्कीर्तिकान्ता त्रिजगति नृपते भोजराज क्षितीन्द्र॥८३॥
हे पृथिवीपति, नरेश भोजराज, तीनों लोकों में तुम्हारी कमनीय कीर्तिरुपी
कांता व्याप्त हो गयी है ( परिणाम स्वरूप त्रिलोकी शुभ्र होगया है ) । सो
नालीक—कमल से जन्म लेने वाले ब्रह्मा नीर-क्षीर लिये समस्त पक्षियों के
पास जा रहे हैं [ जिससे वे नीर क्षीर विवेकी हंस को पहिचान सकें ];
चक्रपाणि विष्णु [ चक्र छोड़ ] तक्र [ माठा ] हाथ में लिये संपूर्ण समुद्रों में
घूम रहे हैं [ जिससे माठा छोड़कर वे दूध फाड़ सकें और इस प्रकार सब
समुद्रों के मध्य उन सबके श्वेत हो जाने से छिप गया उनका क्षीर समुद्र मिल
सके ] । पशुपति शिव अपने ज्वालामय तृतीय नेत्र से देखते हुए सब ऊँचे
पर्वतों को तपा रहे हैं [ कि हिम पिघलने से पिघलते हुए अपने कैलास को वे
पहिचान सकें ] ।
विद्वद्राजशिखामणे तुलयितुं धाता त्वदीयं यशः
कैलासं च निरीक्ष्य तत्र लघुतां निश्चित्वापूर्तये ।
उ(१)क्षाणं तदुपर्युमासहचरं तन्मूर्ध्नि गङ्गाजलं
तस्याग्रे फणिपुङ्गवं तदुपरि स्फारं सुधादीधितिम् ॥ ८४ ॥
विद्वानों और राजाओं की चोटी में स्थित मणि स्वरूप [ श्रेष्ठ ] राजन्,
विधाता ने तुम्हारे यश की तौल करने के निमित्त कैलास को निरखा, पर
उसमें हल्कापन पाकर पूरा करने के लिए उसके ऊपर नंदी को रखा, नंदी
पर उमासहित महेश को बैठाया, महेश के सिर पर जलमयी गङ्गा की
स्थापना की, चोटी पर नागराज को स्थित किया और अंत में सबके ऊपर
कांतिमान् अमृत किरण चंद्रमा को रख दिया ।
स्वर्गाद्गोपाल कुत्र व्रजसि सुरमुने भूतले कामधेनो-
र्वत्सस्यानेतुकामस्तृणचयमधुना मुग्ध दुग्धं न तस्याः ।
श्रुत्वा श्रीभोजराजप्रचुरवितरणं व्रीडशुष्कस्तनी सा
( १ ) उक्षाणम्--वृषभम् ।
भोजप्रबन्धः ३६
पढ़ा—'घी-पड़ी दाल के साथ।' [ एक श्लोक के दो चरण-पूर्वार्द्ध तो हुआ,
पर ] उत्तरार्द्ध की स्फुरणा नहीं हुई ।
ततो देवतासदनं कालिदासः प्रणामार्थमगात् । तं वीक्ष्य द्विजा
ऊचुः—'अस्माकं समग्रवेदविदामपि भोजः किमपि नार्पयति । भवादृशां
हि यथेष्टं दत्ते । ततोऽस्माभिः कवित्वविधानधियात्रागतम् । चिरं विचा-
र्य्य पूर्वार्धमभ्यधायि, उत्तरार्धं कृत्वा देहि । ततोऽस्मभ्यं किमपि प्रयच्छ-
ति।' इत्युक्त्वा तत्पुरस्तादर्धमभाणि । स च तच्छ्रुत्वा ।
'माहिषं च शरच्चन्द्रचन्द्रिकाधवलं दधि' ॥ ८६ ॥
इत्याह ।
इसी बीच देवमंदिर में प्रणाम करने के लिए कालिदास आ पहुँचे । उन्हें
देखकर वे ब्राह्मण बोले—'हम संपूर्ण वेदों के ज्ञाताओं को भी भोज कुछ नहीं
देता, आप जैसों को यथेच्छ देता है । सो कविता बनाने की इच्छा से हमलोग
यहाँ आये हैं । बहुत देर तक सोच-विचार कर [ श्लोक का ] पूर्वार्द्ध तो बना
लिया है, उत्तरार्द्ध तुम बना दो । तो राजा हमको भी कुछ देगा ।' यह कह
कर कालिदास के संमुख आधा [ स्वनिर्मित श्लोक ] पढ़ दिया । कालिदास
ने वह सुनकर उत्तरार्द्ध कह सुनाया—
'शरत् काल के चंद्र की चाँदनी के समान शुभ्र भैंस का दही भी ।'
ते च राजभवनं गत्वा दौवारिकानूचुः—'वयं कवितां कृत्वा समा-
गताः । राजानं दर्शयत' इति । ते च कौतुकाद्धसन्तो गत्वा राजानं प्रण-
म्य प्राहुः—
'राजमाषनिभैर्दन्तैः कटिविन्यस्तपाणयः ।
द्वारि तिष्ठन्ति राजेन्द्र च्छान्दसाः श्लोकशत्रवः' ॥ ८७ ॥ इति
वे [ ब्राह्मण ] राज भवन में पहुँच कर द्वारपालों से बोले—'हम कविता
करके आये हैं । राजा का दर्शन कराओ ।' द्वारपाल कौतुक से हँसते हुए राजा
को प्रणाम करके बोले—
हे राजेंद्र, राजमाँ [ बड़ा काला उड़द ] के समान दाँतों वाले, कमर
पर [ अभद्रता से ] हाथ रखे, श्लोकों के शत्रु तुक्कड़ वेद पाठी द्वार पर प्रतीक्षा
कर रहे हैं ।
४० भोजप्रबन्धः
राज्ञा प्रवेशितास्ते दृष्टराजसंसदो मिलिताः सन्तः सहैव कवित्वं
पठन्ति स्म। राजा तच्छ्रुत्वोत्तरार्धं कालिदासेन कृतमिति ज्ञात्वा
विप्रानाह—'येन पूर्वार्धं कारितं तन्मुखात्कवित्वं कदाचिदपि न करणी-
यम्। उत्तरार्धस्य किञ्चिद्दीयते, न पूर्वार्धस्य।' इत्युक्त्वा प्रत्यक्षरं लक्षं
ददौ।
राजा के द्वारा सभा में बुला लिये गये वे पंडित राजसभा को देखकर एक
साथ ही कविता पढ़ने लगे। राजा ने सुनकर जान लिया कि उत्तरार्द्ध कालि-
दास कृत है और ब्राह्मणों से कहा—'जिसने श्लोक का पूर्वार्द्ध बनाया है,
उसके मुख से फिर कभी कविता न की जानी चाहिए। उत्तरार्द्ध के लिए
कुछ दिया जाता है, पूर्वार्द्ध के लिए नहीं।' ऐसा कह कर प्रत्यक्षर लाख-
लाख दिया।
तेषु च दक्षिणामादाय गतेषु कालिदासं वीक्ष्य राजा प्राह--'कवे
उत्तरार्धं त्वया कृतम्' इति। कविराह—
'अधरस्य मधुरिमाणं कुचकाठिन्यं दृशोश्च तैक्ष्ण्यं च।
कवितायां परिपाकं ह्यनुभवरसिको विजानाति' ॥ ८८ ॥
दक्षिणा लेकर उनके चले जाने पर कालिदास को देखकर राजा ने
कहा—'कवि, उत्तरार्द्ध तुमने किया था ?' कवि ने कहा—
अधर की माधुरी, कुच की कठोरता, नेत्रों का तीखापन और काव्य की
परिपक्वता अनुभवी, रसिक व्यक्ति ही समझता है।
राजा च—'सुकवे, सत्यं वदसि।
अपूर्वो भाति भारत्याः काव्यामृतफले रसः।
चवणे सर्वसामान्ये स्वादुवित्केवलः कविः ॥ ८६ ॥
सञ्चिन्त्य सञ्चिन्त्य जगत्समस्तं त्रयः पदार्था हृदयं प्रविष्टाः।
इक्षोर्विकारा मतयः कवीनां मुग्धाङ्गनापाङ्गतरङ्गितानि' ॥६०॥
राजा ने कहा--हे सुकवि, सत्य कहते हो--
भारती [वाणी] के 'काव्यरूपी अमृत फल का रस अपूर्व ही होता
है; उसे चबाकर खा तो सभी सकते हैं, पर उसका स्वादवेत्ता कवि ही
होता है।
समस्त जगती को वार-वार छान डालने पर केवल तीन ही पदार्थ हृदय
में प्रविष्ट हुए—गन्ने का रस, कवियों की मनीषा और मुग्धा रमणियों के
कटाक्षों की ऊर्मिमाला।
---:०:---
६—कविर्लक्ष्मीधरः कुविन्दश्च
ततः कदाचिद् द्वारपालकः प्रणम्य भोजं प्राह—'राजन्, द्रविड-
देशात्कोऽपि लक्ष्मीधरनामा कविर्द्वारमध्यास्ते' इति। राजा 'प्रवेशय'
इत्याह। प्रविष्टमिव सूर्यमिव विभ्राजमानं चिरादप्यविदितवृत्तान्तं प्रेक्ष्य
राजा विचारयामास। आह च....
'आकारमात्रविज्ञानसम्पादितमनोरथाः (१)।
धन्यास्ते ये न शृण्वन्ति दीनाः क्वाप्यर्थिनां गिरः' ॥ ६१ ॥
तब फिर कभी द्वारपाल प्रणाम करके भोज से बोला—राजन्, द्रविड देश
से कोई लक्ष्मीधर नाम का कवि आया है और द्वार पर उपस्थित है। राजा
ने कहा—भीतर ले आओ। उसके प्रविष्ट होते ही सूर्य के तुल्य दीप्तिमान्,
बहुत समय से जिसका समाचार नहीं ज्ञात हुआ हो ऐसे, उसे देखकर राजा
विचारने लगा और बोला—वे मनुष्य धन्य हैं, जो कभी याचकों की दीन
वाणी नहीं सुनते, आकृति देखकर ही सब समझकर याचकों के मनोरथ पूर्ण
कर देते हैं।
स चागत्य तत्र राजानं 'स्वस्ति' इत्युक्त्वा तदाज्ञयोपविष्टः प्राह—
'देव, इयं ते पण्डितमण्डिता सभा। त्वं च साक्षाद्विष्णुरसि। ततः किं
नाम पाण्डित्यं तथापि किञ्चिद्वच्मि—
भोजप्रतापं तु विधाय धात्रा शेषैर्निंरस्तैः परमाणुभिः किम्।
हरेः कवेऽभूत्पवित्रम्बरे च भानुः पयोधेरुदरे कृशानुः ॥ ६२ ॥
इति। ततस्तेन परिषच्चमत्कृता। राजा च तस्य प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ।
वह आकर और राजा से 'कल्याण हो' यह कह कर राजा की आज्ञा से
बैठ गया और बोला—'देव, यह आपकी सभा पंडितों से सुशोभित है और
(१) आकारमात्रविज्ञानेन सम्पादिता मनोरथा येषान्ते इत्यर्थः।
४२ भोजप्रबन्धः
आप तो साक्षात् विष्णु है । सो पंडिताई की तो बात ही क्या है--फिर भी
कुछ कह रहाहूँ--
विधाता ने राजा भोज के प्रताप का निर्माण कर क्या थोड़े से शेष रहे
परमाणुओं से इंद्र के हाथ का वज्र, आकाश मण्डल में सूर्य और समुद्र के
उदर में स्थित वडवाग्नि का निर्माण किया है ? ( अर्थात् भोज के प्रताप के
संमुख ये तेजस्वी वस्तुएँ नगण्य हैं । ) ।
तो इससे राजसभा चमत्कृत हो गयी । राजा ने उसे प्रत्यक्षर
लक्ष दिया ।
पुनः कविराह—‘देव, मया सकुटुम्बेनात्र निवासाशया समागतम् ।
क्षमी दाता गुणग्राही स्वामी पुण्येन लभ्यते ।
अनुकूलः शुचिर्दक्षः कविर्विद्वान्सुदुर्लभः ॥ ६३
इति । ततो राजा मुख्यामात्यं प्राह—‘अस्मै गृहं दीयताम्’ इति ।
पुनः कवि ने कहा—'देव, मैं यहाँ बस जाने की आशा से कुटुंब सहित
आया हूँ ।
क्षमा-शील, दानी और गुणों का ग्राहक स्वामी पुण्य से प्राप्त होता है,
किंतु हितकारी, पवित्र, चतुर, कवि और विद्वान् स्वामी तो अति दुर्लभ है ।'
तब राजाने मुख्य मंत्री से कहा--'इन्हें घर दो ।'
ततो निखिलमपि नगरं विलोक्य कमपि मूर्खममात्यो नापश्यत्,
यं निरस्य विदुषे गृहं दीयते । तत्र सर्वत्र भ्रमन्कस्याचित्कुविन्दस्य गृहं
वीक्ष्य कुविन्दं प्राह—‘कुविन्द, गृहान्निःसर । तव गृहं विद्वानेष्यति’
इति ।
तदनंतर समस्त नगर को देख डालने पर भी मुख्य मंत्री को कोई मूर्ख
दृष्टि गोचर नहीं हुआ, जिसको हटा कर विद्वान् को घर दिया जाता ।
तब सर्वत्र घूमते हुए किसी कपड़े बुनने वाले [जुलाहे] का घर देख
कर मंत्री ने उससे कहा--'हे बुनकर, तुम घर छोड़ दो । तुम्हारे घर में
विद्वान् आयेगा ।'
ततः कुविन्दो राजभवनमासाद्य राजानं प्रणम्य प्राह - देव,
भवदमात्यो मां मूर्खं कृत्वा गृहान्निःसारयति, त्वं तु पश्य मूर्खः पण्डितो
वेति ।
भोजप्रबन्धः ४३
काव्यं करोमि नहि चारुतरं करोमि
यत्नात्करोमि यदि चारुतरं करोमि ।
भूपालमौलिमणिमण्डितपादपीठ
हे साहसाङ्क कवयामि वयामि यामि ॥ ६४ ॥
तब बुनकर राज भवन में पहुँच कर राजा को प्रणाम करके बोला—
'महाराज, आपका मंत्री मुझे मूर्ख समझ कर घर से निकाल रहा है, तो तू
देख कि मैं मूर्ख हूँ या पंडित—
काव्य रचता हूँ, पर सुंदर नहीं रचता और यदि प्रयत्नपूर्वक रचता हूँ तो
सुंदर भी रच लेता हूँ। राजाओं की मुकुट मणियों से सुशोभित चरण पीठ
वाले हे महावीर, मैं कविता करता हूँ और बुनाई करता हूँ; और (अब)
जाता हूँ।'
ततो राजा त्वङ्कारवादेन वदन्तं कुविन्दं प्राह—'ललिता ते पद-
पङ्क्तिः, कवितामाधुर्यं च शोभनम्, परन्तु कवित्वं विचार्य वक्तव्यम्'
इति। ततः कुपितः कुविन्दः प्राह—'देव अत्रोत्तरं भाति किन्तु न
वदामि। राजधर्मः पृथग्विद्वद्धर्मात्' इति। राजा प्राह—'अस्ति चेदुत्तरं
ब्रूहि' इति।
तब राजा ने 'तू' शब्द से संबोधित करने वाले बुनकर से कहा—'तेरे
पद की पंक्ति ललित है, कवितामाधुरी भी सुंदर है, परंतु काव्य विचार करके
सुनाना चाहिए।' तब कुपित हो बुनकर बोला—'महाराज, मुझे इसका
उत्तर आता है, परंतु कह नहीं रहा हूँ। राजा का धर्म विद्वान् के धर्म से भिन्न
है।' राजा ने कहा—'यदि है तो उत्तर दे।'
कुविन्दः प्राह--'देव, कालिदासाहतेऽन्यं कविं न मन्ये । कोऽस्ति
ते सभायां कालिदासाहते कवितातत्त्वविद्विद्वान् ।
यत्सारस्वतवैभवं गुरुकृपापीयूषपाकोद्भवं
तल्लभ्यं कविनेव नैव हठतः पाठप्रतिष्ठाजुषाम् ।
कासारे दिवसं वसन्नपि पयःपूरं परं पङ्किलं
कुर्वाणः कमलाकरस्य लभते किं सौरभ (१) सौरिभः ॥ ६५ ॥
(१) “लुलायो महिषो वाहद्विपत्कासरसैरभाः” इत्यमरात् महि इत्यर्थः ।
४४ भोजप्रबन्धः
अयं मे वाग्गुम्फो विशदपदवैदग्ध्यमधुरः
स्फुरद्वन्धोवन्ध्यः परहृदि कृतार्थः कविहृदि ।
कटाक्षो वामाक्ष्या दरदलितनेत्रान्तगलितः
कुमारे निःसारः स तु किमपि यूनः सुखयति ॥६६॥ इति ।
बुनकर बोला—'देव, मैं कालिदास के अतिरिक्त किसी को कवि नहीं
मानता । तेरी सभा में काव्य के मर्म को जानने वाला विद्वान् कालिदास के
अतिरिक्त कौन है ?
गुरु-कृपारूपी अमृतपाक से उत्पन्न जो सरस्वती वैभव (काव्य) है, वह
कवि को ही प्राप्त होता है, हठपूर्वक कविता पाठ करके प्रतिष्ठा पालने वालों
को नहीं । तालाब में दिन भर लोट कर भी केवल सलिल-प्रवाह गँदला करने
वाला भैंसा क्या कमलों की सुगंध प्राप्त कर पाता है ?
उत्तम पदों की विद्वत्तापूर्ण योजना से मधुर, छंदो लालित्य प्रकट करता
मेरा काव्यबंध कवि के हृदय को आकृष्ट कर कृतार्थ होता है, अतिरिक्त जन
के निकट वह व्यर्थ होता है । अधखुले नयनों की कोर से अद्भुत तिरछे नयनों
वाली सुंदरी का कटाक्ष बालक के निकट सारहीन रहता है किंतु तरुण को
वह आनंद देता है ।
विद्वज्जनवन्दिता सीता प्राह--
विपुलहृदयाभियोग्ये खिद्यति काव्ये जडो न मौर्थ्ये स्वे ।
निन्दति कञ्चुकमेव प्रायः शुष्कस्तनी नारी ॥ ६७ ॥
विद्वानों द्वारा पूजित सीता ने कहा--मूर्ख अपनी मूर्खता पर तो खिन्न
नहीं होता, सहृदयों द्वारा गम्य सत्काव्य पर खिन्न होता है । शुष्क स्तन वाली
स्त्री प्रायः चोली की ही निंदा किया करती है ।
ततः कुविन्दः प्राह--
[L25: बाल्ये सुतानां स्तुतौ कवीनां समरे भटानाम् ।
हुंकारयुक्ता हि गिरः प्रशस्ताः कस्ते प्रभो मोहभरः स्मर स्वम् ॥ ६८ ॥
ततो राजा 'साधु भोः कुविन्द' इत्युक्त्वा तस्याञ्चरलक्षं ददौ । 'मा
भैषीः, इति पुनः कुविन्दं प्राह ।
भोजप्रबन्धः ४५
तब बुनकर ने कहा—
'हे स्वामी, आपको ऐसा मोह कैसे उत्पन्न हुआ ? स्मरण कीजिए—
बाल्यावस्था में पुत्रों की, सुरतकाल में स्त्रियों की, स्तुति करते समय कवियों
की और युद्ध में योद्धाओं की एकवचन युक्त 'तू'--वाली बोली ही प्रशंसनीय
होती है।'
तब राजा ने सुंदर; हे कुविंद, सुंदर'--ऐसा कह कर उसे प्रत्यक्षर एक
लाख दिया और फिर उस बुनकर से कहा—'जा, निर्भय रह ।'
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७—रात्रौ राज्ञो नगर-भ्रमणम्
एवक्रमेणातिक्रान्ते कियत्यपि काले बाणः पण्डितवरः परं राज्ञा
मान्यमानोऽपि प्राक्तनकर्मतो दारिद्र्यमनुभवति । एवं स्थिते नृपतिः
कदाचिद्रात्रावेकाकी प्रच्छन्नवेषः स्वपुरे चरन्बाणगृहमेत्यातिष्ठत् । तदा
(१) निशीथे बाणो दारिद्र्याद्व्याकुलतया कान्तां वक्ति-'देवि, राजा
कियद्वारं मम मनोरथमपूरयत् । अद्यापि पुनः प्रार्थितो दास्येव । परन्तु
निरन्तरप्रार्थनारसे मूर्खस्यापि जिह्वा जडीभवति।' इत्युक्त्वा मुहूर्तार्धं
मौनेन स्थितः ।
इसी प्रकार धीरे-धीरे कुछ समय व्यतीत होने पर राजा के द्वारा परम
संमानित होने पर भी पंडितवर बाण पूर्व जन्म के कर्म के कारण दरिद्रता
भोग रहे थे। ऐसी ही दशा में कभी रात में अकेले वेष बदल कर अपनी
नगरी में घूमते-फिरते राजा बाण के घर पहुँच रुक गये। तभी रात में दरि-
द्रता के कारण व्याकुल बाण ने पत्नी से कहा—'राजा ने कितनी बार मेरा
मनोरथ पूर्ण किया। आज भी फिर प्रार्थना करने पर देता ही है। किंतु
निरन्तर प्रार्थना में लगे रहते मूर्ख की जीभ जड़ हो जाती है। ऐसा कह कर
आधे मुहूर्त तक चुप बैठा रहा।
पुनः पठति—
हर हर पुरहर परुषं क हलाहलफल्गु याचनावचसोः ।
एकैव तव रसज्ञा तदुभयरसतारतम्यज्ञा ॥ ६६ ॥
देवि,
(१) अर्द्धरात्रे ।
४६ भोजप्रबन्धः
दारिद्र्यस्यापरा मूर्तिर्याच्ञा न द्रविणाल्पता ।
अपि कौपीनवाञ्छंभुस्तथापि परमेश्वरः ॥ १०० ॥
सेवा सुखानां व्यसनं धनानां याच्ञा गुरूणां कुनृपः प्रजानाम् ।
प्रनष्टशीलस्य सुतः कुलानां मूलावघातः कठिनः कुठारः ॥ १०१ ॥
तत्सत्यपि दारिद्र्ये राज्ञो वक्तुं मया स्वयमशक्यम् ।
यच्छन्क्षणमपि जलदो वल्लभतामेति सर्वलोकस्य ।
नित्यप्रसारितकरः करोति सूर्योऽपि सन्तापम् ॥ १०२ ॥
किं च देवि, वैश्वदेवावसरे प्राप्ताः क्षुधार्ताः पश्चाद्यान्तीति तदेव मे
हृदयं दुनोति ।
दारिद्यानलसन्तापः शान्तः सन्तोषवारिणा ।
याचकाशाविघातान्तर्दाहः केनोपशाम्यते ॥ १०३ ॥
पुनः पढ़ने लगा--
हे त्रिपुरारि शिव शंकर, हलाहल विष और व्यर्थ चले जाते याचना
के वचन-इन दोनों में कौन अधिक तीक्ष्ण है, यह दोनों के तार
तम्य-न्यूनाधिकता-को जानने वाली तुम्हारी रसना [जीभ] ही बता
सकती है।
हे देवि,
दरिद्रता की दूसरी मूर्ति याचना होती है, धन की न्यूनता नहीं; शिव
शंभु कौपीन धारी ही है, फिर भी परमेश्वर [कहे जाते] है।
चाकरी सुखों को, व्यसन धनको, याचना गौरव को, कुनृपति प्रजा
को और शीलहीन व्यक्ति का पुत्र कुल को जड़ से काटने वाला कठोर
कुल्हाड़ा होता है।
सो दरिद्रता होने पर भी मेरा राजा से स्वयम् कुछ कहना असंभव है।
क्षण भर भी दान करता जलद-बादल संपूर्ण लोक का प्रिय हो जाता
है और सदा कर [किरण रूपी हाथ] फैलाये सूर्य भी संतापकारी
होता है।
परंतु हे देवि, गृहस्थ कर्म बलिवैश्वदेव के अवसर पर आये भूख से
पीडित जन भी [मेरे द्वार से] वापस चले जाते हैं, वही मेरे हृदय को
पीडित करता है।
भोजप्रबन्धः ४७
दरिद्रता रूपी आग की जलन तो संतोष के जल से शांत हो गयी है, किंतु
माँगनेवालों की आशा नष्ट कर देने से जो अंतर्दाह है, उसका उपशमन
किसके द्वारा हो ?
राजा चैतस्सर्वं श्रुत्वा 'नेदानीं किमपि दातुं योग्यः । प्रातरेव वाणां
पूर्णमनोरथं करिष्यासि ।' इति निष्क्रान्तो राजा—
'कृतो यैर्न च वाग्मी च व्यसनी तं न यैः पदम् ।
यैरात्मसदृशो नार्थी किं तैः काव्यैर्बलैर्धनैः' ॥ १०४ ॥
राजा ने यह सब सुनकर विचारा कि इस समय तो मैं इसे
कुछ देने योग्य हूँ नहीं, प्रातः काल इसका मनोरथ पूर्ण करूँगा—और
चला गया—
जिस काव्य ने मनुष्य को वक्तृत्व कला में निपुण नहीं बनाया, जिस बल
ने किसी को अधीन—स्ववश—नहीं किया और जिस धन ने याचक को
अपने समान ( धनी ) नहीं कर दिया, वह काव्य, बल और धन व्यर्थ है ।
एवं पुरे परिभ्रममाणे राजनि वर्त्मनि चोरद्वयं गच्छति । तयोरेकः
प्राह शकुन्तः—'सखे, स्फारान्धकारविततेऽपि जगत्यञ्जनवशात्सर्वं परमा-
णुप्रायमपि वस्तु सर्वत्र पश्यामि । परन्तु सम्भारगृहानीतकनकजातमपि
न मे सुखाय' इति ।
जब राजा इस प्रकार नगर में भ्रमण करते फिर रहे थे, तो मार्ग में दो
चोर जा रहे थे । उनमें से एक शकुंत नामक चोर बोला--'मित्र, जगत् में
घोर अँधेरा फैला होने पर भी अंजन लगा होने के कारण परमाणु जैसी भी
छोटी सब वस्तुएँ सर्वत्र देख पा रहा हूँ किंतु कोषागार से चुरा लिया हुआ
स्वर्ण भी मुझे सुख नहीं दे रहा है ।'
द्वितीयो मरालनामा चोर आह—'आहृतं सम्भारगृहात्कनकजात-
मपि न हितमिति कस्माद्धेतोरुच्यते' इति । ततः शकुन्तः प्राह—'सर्वतो
नगररक्षकाः परिभ्रमन्ति । सर्वोऽपि जागरिष्यत्येषां भेरीपटहादीनां
निनादेन । तस्मादाहृतं विभज्य स्वस्वभागगतं धनमादाय शीघ्रमेव
गन्तव्यम्' इति ।
दूसरे मराल नाम के चोर ने कहा—'खजाने से चुरा लाया गया सोना
भी अच्छा नहीं लगता—ऐसा किस कारण से कहते हो ?' तो शकुंत बोला--
४८ भोजप्रबन्धः
'चारों ओर नगर रक्षक घूम रहे हैं। इन नगाड़ों और पटहों के शब्द से सब
जग जायेंगे। सो चुराये [ माल ] को बाँट कर अपने-अपने भाग में आये धन
को लेकर शीघ्र ही चला जाना उचित होगा।'
मरालः प्राह—'सखे, त्वमनेन कोटिद्वयपरिमितमणिकनकजातेन
किं करिष्यसि' इति।
मराल ने पूछा—'मित्र, तू इस दो करोड़ परिमाण के मणि और सोने
से क्या करेगा ?
शकुन्तः—'एतद्धनं कस्मैचिद्द्विजन्मने दास्यामि यथायं वेदवेदा-
ङ्गपारगोऽन्यं न प्रार्थयति।'
शकुंत—यह धन किसी ब्राह्मण को दे दूँगा कि वह वेद और वेदांग का
पारंगत होकर किसी और से न माँगेगा।
मरालः—'सखे चारु।
ददतो युध्यमानस्य पठतः पुलकोऽथ चेत्।
आत्मनश्च परेषां च तद्दानं पौरुषं स्मृतम् ॥ १०५ ॥
अनेन दानेन तव कथं पुण्यफलं भविष्यति।'
मराल—'मित्र, सुंदर। दान करते, युद्ध करते और काव्य पाठ करते
समय यदि अपने और दूसरो के रोंगटे खड़े हो जायँ तभी वह दान, पराक्रम
और पाठ कहा जाता है।
तो इस [ चोरी के ] दान से तुमको पुण्यफल कैसे मिलेगा?'
शकुन्तः—'अस्माकं पितृपैतामहोऽयं धर्मः, यच्चौर्येण वित्तम् नीयते'
शकुंत—'चोरी से धनार्जन तो हमारे बाप-दादा से चला आया धर्म है।'
मरालः—'शिरश्छेदमङ्गीकृत्यार्जितं द्रव्यं निखिलमपि कथं दीयते।'
मराल—'सिर कटाना स्वीकार करके कमाया हुआ सब धन क्यों दान
करते हो?'
शकुन्तः--मूर्खो नहि ददात्यर्थं नरो दारिद्र्यशङ्कया।
प्राज्ञस्तु वितरत्यर्थं नरो दारिद्र्यशङ्कया' ॥ १०६ ॥
शकुंत--'मूर्ख मनुष्य दरिद्रता की शंका से धन-दान नहीं करता और
बुद्धिमान् पुरुष भविष्य में आनेवाली दरिद्रता के निवारणार्थ धन वितरण कर
देता है।'
भोजप्रबन्धः ४६
मरालः—'किञ्चिद्वेदमयं पात्रं किञ्चित्पात्रं तपोमयम्।
पात्राणामुत्तमं पात्रं शूद्रान्नं यस्य नोदरे' ॥ १०७ ॥
मराल—वेद पाठी कुछ दान का पात्र होता है और कुछ तपस्वी दान के
योग्य होता है, दान पाने का उत्तम पात्र वह है, जिसके पेट में निकृष्ट अन्न
नहीं होता।'
शकुन्तः—'अनेन वित्तेन किं करिष्यति भवान्।'
शकुन्त—'आप इस धन का क्या करेंगे?'
मरालः—सखे, काशीवासी कोऽपि विप्रवटुरत्रागात्। तेनास्मत्पितुः
पुरः काशीवासफलं व्यावर्णितम्। ततोऽस्मत्तातॊ बाल्यादारभ्य चौर्यं
कुर्वाणो दैववशात्स्वपापान्निवृत्तो वैराग्यात्सकुटुम्बः काशीमेष्यति। तद-
र्थमिदं द्रविणजातम्।'
मराल—'मित्र, एक काशी का रहनेवाला ब्राह्मण विद्यार्थी यहाँ आया।
उसने मेरे पिता के संमुख काशीवास के फल का वर्णन किया। सो बचपन
से चोरी करनेवाले मेरे पिता दैववश अपने पाप से निवृत्त हो वैराग्य के
कारण सकुटुम्ब काशी जायेंगे। यह सब धन उसी निमित्त है।'
शकुन्तः—'महद्भाग्यं तव पितुः। तथा हि—
वाराणसीपुरीवासवासनावासितात्मना।
किं शुना समतां याति वराकः पाकशासनः ॥ १०८ ॥
ऊपरं कर्मसस्यानां क्षेत्रं वाराणसी पुरी।
यत्र सँल्लभ्यते मोक्षः समं चाण्डालपण्डितैः ॥ १०६ ॥
मरणं मङ्गलं यत्र विभूतिश्च विभूषणम्।
कौपीनं यत्र कौशेयं सा काशी केन मीयते ॥ ११० ॥
शकुंत—'तेरा पिता बड़ा भाग्यशाली है। जैसा कि है—
वाराणसी नगरी में निवास करने की इच्छा जिसके हृदय में व्याप्त है,
उस कुत्ते की समता में क्या बेचारा इन्द्र आ सकता है ?
वाराणसी नगरी कर्म रूपी खेती के लिए ऊसर हैं (कर्म फल के बंधन
से मुक्त), जहाँ कि चंडाल और ब्राह्मण-दोनों ही समान रूप में मोक्ष प्राप्त
करते है।
४ भोज०
५० भोजप्रबन्धः
जहाँ मृत्यु प्राप्त होना मंगल है, भस्म आभूषण है और जहाँ कौपीन ही
पटांबर है, उस काशी की समता किससे हो सकती है ?'
एवमुभयोः संवादं श्रुत्वा राजा तुतोष। अचिन्तयच्च मनसि-
'कर्मणां गतिः सर्वथैव विचित्रा उभयोरपि पवित्रा मतिः' इति।
ततो राजा विनिवृत्त्य भवनान्तरे पितृपुत्रावपश्यत्। तत्र पिता पुत्रं
प्राह--'इदानीं परिज्ञातशास्त्रतत्त्वोऽपि नृपतिः कार्पण्येन किमपि न
प्रयच्छति। किंतु--
अर्थिनि कवयति कवयति पठति च पठति स्तवोन्मुखे स्तौति।
पश्चाद्यामीत्युक्ते मौनी दृष्टिं निमीलयति' ।। १११ ।।
राजाप्येतच्छ्रुत्वा तत्समीपं प्राप्य 'मैवं वद्' इति स्वगात्रात्सर्वाभरणा-
न्युत्तार्य ददौ तस्मै।
इस प्रकार दोनों का वार्तालाप सुन कर राजा संतुष्ट हुआ और मन में
सोचने लगा-'कर्मगति सब प्रकार से विचित्र होती है। दोनों की ही मति
पवित्र है।'
तदनन्तर राजा ने उस स्थान से हट कर एक अन्य गृह में पिता-पुत्र
को देखा। वहाँ पिता ने कहा-'आजकल शास्त्रमर्म का परिज्ञानी भी राजा
कृपणता के कारण कुछ देता नहीं, परं च-
याचक (कवि) के कविता करने पर कविता कर देता है, काव्यपाठ
करने पर स्वयम् भी पढ़ देता है और प्रशंसा करने पर प्रशंसा कर देता है,
किन्तु बाद में कवि के 'जाता हूँ' कहने पर चुपचाप आँखें मूंद लेता है।
राजा यह सुन उसके समीप जाकर बोला कि ऐसा न कहो, और अपने
शरीर से सब आभूषण उतार कर उसे दे दिये।
---: o :---
८-क्रीडाचन्द्रः
ततो गृहमासाद्य कालान्तरे सभामुपविष्टः कालिदासं प्राह-'सखे,
'कवीनां मानसं नौमि तरन्ति प्रतिभाम्भसि।'
ततः कविराह-
'यत्र हंसवयांसीव भुवनानि चतुर्दश' ।। ११२ ।।