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सर्वकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 47, कुल 190 में से

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पृष्ठ 47

४० भोजप्रबन्धः
राज्ञा प्रवेशितास्ते दृष्टराजसंसदो मिलिताः सन्तः सहैव कवित्वं
पठन्ति स्म। राजा तच्छ्रुत्वोत्तरार्धं कालिदासेन कृतमिति ज्ञात्वा
विप्रानाह—'येन पूर्वार्धं कारितं तन्मुखात्कवित्वं कदाचिदपि न करणी-
यम्। उत्तरार्धस्य किञ्चिद्दीयते, न पूर्वार्धस्य।' इत्युक्त्वा प्रत्यक्षरं लक्षं
ददौ।
राजा के द्वारा सभा में बुला लिये गये वे पंडित राजसभा को देखकर एक
साथ ही कविता पढ़ने लगे। राजा ने सुनकर जान लिया कि उत्तरार्द्ध कालि-
दास कृत है और ब्राह्मणों से कहा—'जिसने श्लोक का पूर्वार्द्ध बनाया है,
उसके मुख से फिर कभी कविता न की जानी चाहिए। उत्तरार्द्ध के लिए
कुछ दिया जाता है, पूर्वार्द्ध के लिए नहीं।' ऐसा कह कर प्रत्यक्षर लाख-
लाख दिया।
तेषु च दक्षिणामादाय गतेषु कालिदासं वीक्ष्य राजा प्राह--'कवे
उत्तरार्धं त्वया कृतम्' इति। कविराह—
'अधरस्य मधुरिमाणं कुचकाठिन्यं दृशोश्च तैक्ष्ण्यं च।
कवितायां परिपाकं ह्यनुभवरसिको विजानाति' ॥ ८८ ॥
दक्षिणा लेकर उनके चले जाने पर कालिदास को देखकर राजा ने
कहा—'कवि, उत्तरार्द्ध तुमने किया था ?' कवि ने कहा—
अधर की माधुरी, कुच की कठोरता, नेत्रों का तीखापन और काव्य की
परिपक्वता अनुभवी, रसिक व्यक्ति ही समझता है।
राजा च—'सुकवे, सत्यं वदसि।
अपूर्वो भाति भारत्याः काव्यामृतफले रसः।
चवणे सर्वसामान्ये स्वादुवित्केवलः कविः ॥ ८६ ॥
सञ्चिन्त्य सञ्चिन्त्य जगत्समस्तं त्रयः पदार्था हृदयं प्रविष्टाः।
इक्षोर्विकारा मतयः कवीनां मुग्धाङ्गनापाङ्‌गतरङ्गितानि' ॥६०॥
राजा ने कहा--हे सुकवि, सत्य कहते हो--
भारती [वाणी] के 'काव्यरूपी अमृत फल का रस अपूर्व ही होता
है; उसे चबाकर खा तो सभी सकते हैं, पर उसका स्वादवेत्ता कवि ही
होता है।