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सर्वकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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पृष्ठ 51

४४ भोजप्रबन्धः
अयं मे वाग्गुम्फो विशदपदवैदग्ध्यमधुरः
स्फुरद्वन्धोवन्ध्यः परहृदि कृतार्थः कविहृदि ।
कटाक्षो वामाक्ष्या दरदलितनेत्रान्तगलितः
कुमारे निःसारः स तु किमपि यूनः सुखयति ॥६६॥ इति ।
बुनकर बोला—'देव, मैं कालिदास के अतिरिक्त किसी को कवि नहीं
मानता । तेरी सभा में काव्य के मर्म को जानने वाला विद्वान् कालिदास के
अतिरिक्त कौन है ?
गुरु-कृपारूपी अमृतपाक से उत्पन्न जो सरस्वती वैभव (काव्य) है, वह
कवि को ही प्राप्त होता है, हठपूर्वक कविता पाठ करके प्रतिष्ठा पालने वालों
को नहीं । तालाब में दिन भर लोट कर भी केवल सलिल-प्रवाह गँदला करने
वाला भैंसा क्या कमलों की सुगंध प्राप्त कर पाता है ?
उत्तम पदों की विद्वत्तापूर्ण योजना से मधुर, छंदो लालित्य प्रकट करता
मेरा काव्यबंध कवि के हृदय को आकृष्ट कर कृतार्थ होता है, अतिरिक्त जन
के निकट वह व्यर्थ होता है । अधखुले नयनों की कोर से अद्भुत तिरछे नयनों
वाली सुंदरी का कटाक्ष बालक के निकट सारहीन रहता है किंतु तरुण को
वह आनंद देता है ।
विद्वज्जनवन्दिता सीता प्राह--
विपुलहृदयाभियोग्ये खिद्यति काव्ये जडो न मौर्थ्ये स्वे ।
निन्दति कञ्चुकमेव प्रायः शुष्कस्तनी नारी ॥ ६७ ॥
विद्वानों द्वारा पूजित सीता ने कहा--मूर्ख अपनी मूर्खता पर तो खिन्न
नहीं होता, सहृदयों द्वारा गम्य सत्काव्य पर खिन्न होता है । शुष्क स्तन वाली
स्त्री प्रायः चोली की ही निंदा किया करती है ।
ततः कुविन्दः प्राह--
[L25: बाल्ये सुतानां स्तुतौ कवीनां समरे भटानाम् ।
हुंकारयुक्ता हि गिरः प्रशस्ताः कस्ते प्रभो मोहभरः स्मर स्वम् ॥ ६८ ॥
ततो राजा 'साधु भोः कुविन्द' इत्युक्त्वा तस्याञ्चरलक्षं ददौ । 'मा
भैषीः, इति पुनः कुविन्दं प्राह ।