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सर्वकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 190 में से

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पृष्ठ 48

समस्त जगती को वार-वार छान डालने पर केवल तीन ही पदार्थ हृदय
में प्रविष्ट हुए—गन्ने का रस, कवियों की मनीषा और मुग्धा रमणियों के
कटाक्षों की ऊर्मिमाला।
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६—कविर्लक्ष्मीधरः कुविन्दश्च
ततः कदाचिद् द्वारपालकः प्रणम्य भोजं प्राह—'राजन्, द्रविड-
देशात्कोऽपि लक्ष्मीधरनामा कविर्द्वारमध्यास्ते' इति। राजा 'प्रवेशय'
इत्याह। प्रविष्टमिव सूर्यमिव विभ्राजमानं चिरादप्यविदितवृत्तान्तं प्रेक्ष्य
राजा विचारयामास। आह च....
'आकारमात्रविज्ञानसम्पादितमनोरथाः (१)।
धन्यास्ते ये न शृण्वन्ति दीनाः क्वाप्यर्थिनां गिरः' ॥ ६१ ॥
तब फिर कभी द्वारपाल प्रणाम करके भोज से बोला—राजन्, द्रविड देश
से कोई लक्ष्मीधर नाम का कवि आया है और द्वार पर उपस्थित है। राजा
ने कहा—भीतर ले आओ। उसके प्रविष्ट होते ही सूर्य के तुल्य दीप्तिमान्,
बहुत समय से जिसका समाचार नहीं ज्ञात हुआ हो ऐसे, उसे देखकर राजा
विचारने लगा और बोला—वे मनुष्य धन्य हैं, जो कभी याचकों की दीन
वाणी नहीं सुनते, आकृति देखकर ही सब समझकर याचकों के मनोरथ पूर्ण
कर देते हैं।
स चागत्य तत्र राजानं 'स्वस्ति' इत्युक्त्वा तदाज्ञयोपविष्टः प्राह—
'देव, इयं ते पण्डितमण्डिता सभा। त्वं च साक्षाद्विष्णुरसि। ततः किं
नाम पाण्डित्यं तथापि किञ्चिद्वच्मि—
भोजप्रतापं तु विधाय धात्रा शेषैर्निंरस्तैः परमाणुभिः किम्।
हरेः कवेऽभूत्पवित्रम्बरे च भानुः पयोधेरुदरे कृशानुः ॥ ६२ ॥
इति। ततस्तेन परिषच्चमत्कृता। राजा च तस्य प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ।
वह आकर और राजा से 'कल्याण हो' यह कह कर राजा की आज्ञा से
बैठ गया और बोला—'देव, यह आपकी सभा पंडितों से सुशोभित है और
(१) आकारमात्रविज्ञानेन सम्पादिता मनोरथा येषान्ते इत्यर्थः।