भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
१५४ भोजप्रबन्धः
तच्चरित्रं दृष्ट्वा राजा गृहं समागत्य प्रातः सभायां कालिदासमालोक्य
प्राह—'सुकवे, शृणु—
'दिवा काकरुताद्भीता'
ततः कालिदास आह—
'रात्रौ तरति नर्मदाम्' ।
ततस्तुष्टो राजा पुनः प्राह—
'तत्र सन्ति जले ग्राहाः'
ततः कविराह—
'मर्मज्ञा सैव सुन्दरी' ॥ २६६ ॥
ततो राजा कालिदासस्य पादयोः पतति ।
उसका चरित्र देख घर पहुँच कर राजाने सबेरे सभा में कालिदास को
देखकर कहा—'हे सुकवे, सुनो—
'डरती दिन में 'कांव-कांव' से'
तो कालिदासने कहा—
'तैर नर्मदा जाती रात ।'
तब संतुष्ट हो राजाने फिर कहा—
'पानी में हैं मगर वहाँ तो'
तो कवि ने कहा—
'मर्म सुंदरी को सब ज्ञात'
तो राजा कालिदास के पैरों-पड़ा ।
एकदा धारानगरे विचरन्वेश्यावीथ्यां राजा कन्दुकलीलातत्परां तद्भ्र-
मणवेगेन पादयोः पतितावतंसां काञ्चन सुन्दरीं दृष्ट्वा सभायामाह—
'कन्दुकं वर्णयन्ते कवयः' इति ।
एक बार धारानगर में वेश्या-गली में घूमते राजा ने कंदुकक्रीड़ा में लीन
और उसके घूमने के वेग से जिसके कान का आभूषण पैरों पर गिर गया था,
ऐसी, एक सुंदरी को देखकर सभा में कहा—'कविजन, कंदुक का वर्णन
करें।'
तदा भवभूतिराह—
भोजप्रबन्धः १५५
'विदितं ननु कन्दुक ते हृदयं प्रमदाधरसङ्गमलुब्ध इव ।
वनिताकरतामरसाभिहतः पतितः पतितः पुनरुत्पतसि' ॥ २६७ ॥
तो भवभूति ने कहा-
हे कंदुक, तुम्हारे हृदय की भावना ज्ञात ही है--तुम सुंदरी के अधर का
संग करने के लोभी प्रतीत होते हो, इसी से सुंदरी के कर कमल से ताडित
होने पर गिर-गिर कर पुनः पुनः उछलते हो ।
ततो वररुचिः प्राह-
एकोऽपि त्रय इव भाति कन्दुकोऽयं
कान्तायाः करतलरागरक्तरक्तः ।
भूमौ तच्चरणनखांशुगौरगौरः
स्वस्थः सन्नयनमरीचिनीलनीलः' ॥ २६८ ॥
तब वररुचि ने कहा-
सुंदरी की हथेली की लालिमा से लाल-लाल, धरती पर गिरा होने की
अवस्था में उसके चरण-नखों के किरणजाल से शुभ्र और सामान्य स्थिति में
आँखों की पुतलियों की नीलिमा से नीला-नीला-यह कंदुक एक होने पर भी
तीन जैसा प्रतीत होता है।
ततः कालिदास आह-
'पयोधराकारधरो हि कन्दुकः करेण रोषादभिहन्यते मुहुः ।
इतीव नेत्राकृतिभीतमुत्पलं स्त्रियः प्रसादाय पपात पादयो.' ॥ २६६ ॥
तब कालिदास ने कहा-
क्योंकि इस कंदुक ने सुंदरी के पयोधरों का आकार-धारण किया, अतएव
बार-बार यह उस सुंदरी के कर-द्वारा रोष के कारण ताडित किया जाता है।
इसी से यह नयनों के आकार से डरे कमल के समान कर्ण भूषण सुंदरी को
प्रसन्न करने के निमित्त पैरों पर गिर पड़ा है।
तदा राजा तुष्टस्त्रयाणामक्षरलक्षं ददौ । विशेषेण च कालिदासम्-
दृष्टावतंसकुसुमपतनयोद्धारं सम्मानितवान् ।
तब राजा ने संतुष्ट होकर तीनों को प्रत्यक्षर पर लाख-लाख मुद्राएँ दीं ।
१५६ भोजप्रबन्धः
कालिदास को अनदेखे आभूषण कर्णफूल के पतन का ज्ञाता होने के कारण
विशेष रूप से संमानित किया ।
( २६ ) अष्टषोधय अन्याः कथाः
ततः कदाचिच्चित्रकर्मावलोकनतत्परो राजा चित्रलिखितं महाशेषं
दृष्ट्वा 'सम्यगलिखितम्' इत्यवदत् । तदा कश्चिच्छिवशर्मा नाम कविः
शेषमिषेण राजानं स्तौति-
अनेके फणिनः सन्ति भेकभक्षणतत्पराः ।
एक एव हि शेषोऽयं धरणीधारणक्षमः ॥ ३०० ॥
तदानीं राजा तदभिप्रायं ज्ञात्वा तस्मै लक्षं ददौ ।
कभी चित्रकारी देखने में लगे राजा ने चित्र में बने महाशेष नाग को देख
कर कहा कि अच्छा चित्र बना है । तो कवि शिवशर्मा नामक कवि ने शेष-
नाग के व्याज से राजा की स्तुति की--
मेढकों को खाने में लगे बहुत-से हैं धरती पर साँप ।
किंतु धरणी-धारणा में शक्त एक ही शेषनाग फणिराज ।
(मेंढकों को खाने में लगे रहने वाले तो अनेक सर्प हैं, परंतु धरती को
धारने में समर्थ एक यह शेष नाग ही है । )
तब उसका अभिप्राय जान कर उस समय राजा ने उसे एक लाख
मुद्राएँ दीं ।
कदाचिद्धेमन्तकाले समागते ज्वलन्तीं (१) हसन्तीं संसेवयन् राजा
कालिदासं प्राह-'सुकवे, हसन्तीं वर्णय' इति । ततः सुकविराह--
'कविमतिरिव बहुलोहा संघटितचक्रा प्रभातवेलेव ।
हरमूर्तिरिव हसन्ती भाति विधूसानलोपेता' ॥ ३०१ ॥
राजाक्षरलक्षं ददौ ।
कभी हेमंत ऋतु के आ जाने पर जलती अँगीठी पर तापते हुए राजा ने
कालिदास से कहा-'हे सुकवि, अँगीठी का वर्णन करो।' तब सुकवि ने कहा-
यह हंसती जैसे कवि की बुद्धि बहुलोहा (बहुल+ऊहा=अनेक प्रकार
की कल्पना करने वाली ) होती है, वैसे ही बहुलोहा (बहुत सा लोहा है
भोजप्रबन्धः १५७
जिसमें) है; जैसे प्रभात काल सुघटित चक्र अर्थात् चकई-चकवा का संघटन
(मिलाप) करने वाला होता है, वैसे ही सुघटितचक्रा अर्थात् भली चक्राकार
(गोल) बनी है; और जिस प्रकार शिवजी की मूर्ति विधूमानल (विधु+
उमा+अनल) अर्थात् चंद्रमा, पार्वती और तृतीय नेत्र की ज्वाला से युक्त है
उसी प्रकार विधूमानल अर्थात् धूमरहित अग्नि से सुशोभित है ।
राजा ने अक्षर-अक्षर पर लाख-लाख मुद्राएँ दीं ।
एकदा भोजराजोऽन्तगृहे भोगाईस्तुल्यगुणाश्चतस्रो निजाङ्गना अप-
श्यत्। तासु च कुन्तलेश्वरपुत्र्यां पद्मावत्यामृतुस्नानम्, अङ्गराजस्य पुत्र्यां
चन्द्रमुख्यां क्रमप्राप्तिम्, कमलानाम्न्यां च द्यूतपणजयलब्धप्राप्तिम्, अग्र-
महिष्यां च लीलादेव्यां दूतीप्रेषणमुखेनाह्वानं च, एवं चतुरो गुणान्दृष्ट्वा
तेषु गुणेषु न्यूनाधिकभावं राजाप्यचिन्तयत् । तत्र सर्वत्र दाक्षिण्यनिधी
राज-राजः श्रीभोजस्तुल्यभावेन द्वित्रिघटिकापर्यन्तं विचिन्त्य विशेषानाव-
धारणेन निद्रां गतः । प्रातश्चोत्थाय कृताह्निकः सभामगात् ।
एक बार भोजराज ने अंतः पुर में संमोग योग्य, समान गुणों वाली
अपनी चार पत्नियों को देखा । उनमें कुंतलाधिपति की पुत्री पद्मावती
मासिक ऋतु-स्नानकर चुकी थी, अंगराज की बेटी चंद्रमुखी की नियत पारी
थी, कमला नाम की रानी ने जुए की बाजी में राजा को जीतकर उपलब्ध
किया था । और पट्टरानी लीलादेवी ने दूती भेजकर स्वयं उन्हें आमंत्रित
किया था । इस प्रकार इन चारों योग्यता के आधारों को देखकर उन गुणा
धारों में कौन छोटा है, कौन बड़ा-यह राजा विचार करने लगा । सब में
दक्षिणता रखनेवाला 'दक्षिणनायक' (तुल्यानुरागी) राजराजेश्वर श्री भोज
समान भाव से दो-तीन घड़ी तक विचार करके भी किसी विशिष्टता की
अवधारणा न करने के कारण सो गया । और सुबह उठकर दैनिक कार्य करके
सभा में पहुँचा ।
तत्र च सिंहासनमलङ्कुर्वाणः श्रीभोजः सकलविद्वत्कविमण्डलमण्डनं
कालिदासमालोक्य 'सुकवे, इमां त्र्यक्षरोनतुरीयचरणां समस्यां शृणु।'
इत्युक्त्वा पठति-'अप्रतिपत्तिमूढमनसा द्वित्राः स्थिता नाडिकाः।' इति
पठित्वा राजा कालिदासमाह-'सुकवे, एतत्समस्यापूरणं कुरु' इति ।
१५८ भोजप्रबन्धः
वहाँ सिंहासन को सुशोभित करते श्री भोज ने समस्त विद्वानों और
कवियों की मंडली के श्रृंगार कालिदास को देखकर कहा—'सुकवे, तीन अक्षर
कम चतुर्थ चरण वाली इस 'समस्या' को सुनो' और पढ़ा—'किकर्तव्य विमूढ़
विता दीं, घड़ियां दो-तीन।' यह पढ़कर राजा ने कालिदास से कहा—'हे
सुकवि, इस समस्या की पूर्ति करो।'
ततः कालिदासस्तस्य हृदयं करतलामलकवत्पश्यंस्त्रयक्षराधिक-
चरणत्रयविशिष्टां तां समस्यां पठति--देव,
स्नाता तिष्ठति कुन्तलेश्वरसुता वारोऽङ्गराजस्वसु-
र्द्यूते रात्रिरियं जिता कमलया देवी प्रसाद्याधुना ।
इत्यन्तःपुरसुन्दरीजनगुणे न्यायाधिकं ध्यायता
देवेनाप्रतिपत्तिमूढमनसा द्वित्राः स्थिता नाडिकाः॥ ३०२॥
तदा राजा स्वहृदयमेव ज्ञातवतः कालिदासस्य पादयोः पतति स्म ।
कविमण्डलं च चमत्कृतमजायत ।
तब राजा के हृदय को हथेली पर रखे आँवले के सदृश-देखते कालिदास
ने शेष तीन चरण और (चतुर्थ चरण के शेष) तीन अक्षरों से विशिष्ट उस
समस्या को पढ़ा—
कुंतलराजसुता ऋतुस्नाता, अंगराजदुहिता का वार;
कमला जीती रात द्यूत में, 'देवी' की करनी मनुहार;
अंतःपुर की सुंदरियों के गुण-परिवीक्षण में हो लीन—
किं कर्तव्य विमूढ़ विता दीं राजा ने घड़ियाँ दो-तीन ।
तब राजा अपने मन को ही जान लेने वाले कालिदास के पैरों पड़ा और
कवि मंडली चमत्कृत हो गयी ।
एकदा राजा धारानगरे विचरन्क्वचित्पूर्णकुम्भं धृत्वा समायान्तीं
पूर्णचन्द्राननां कञ्चिद्दृष्ट्वा तत्कुम्भजले शब्दं च कञ्चन श्रुत्वा 'नूनमेव
तस्याः कण्ठग्रहेऽयं घटो रतिकूजितमिव कूजित' इति मन्यमानः सभायां
कालिदासं प्राह--'कूजितं रतिकूजितम्' इति ।
- एक बार धारा नगर में विचरण करते राजा भोज ने किसी स्थान पर
भरे घड़े को लेकर आती एक पूर्ण चंद्रमा के समान मुखवाली स्त्री को देखा
और उस घड़े में जल में उत्पन्न होती ध्वनि को सुनकर यह मान लिया कि
सुंदरी के द्वारा पकड़ कर लिये जाते (इस प्रकार आलिंगित) इस घटकी
ध्वनि रति-समय सुंदरी के द्वारा किये जाते कूजन शब्द के समान है
और सभा में जाकर कालिदास ने कहा—'कूजित रति कूजित है।'
कविराह—
'विदग्धे सुमुखे रक्ते नितम्बोपरि संस्थिते ।
कामिन्याश्लिष्टसुगले कूजितं रतिकूजितम्' ॥ ३०३ ॥
तदा तुष्टो राजा प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ; ननाम च ।
कवि ने कहा—खूब पके, सुंदर मुँहवाले, लाल, कमर पर रखे हुए;
गले लगे कामिनि के घट का यह कूजित रति कूजित है ॥
तब संतुष्ट होकर राजा ने प्रत्यक्षर लक्ष मुद्राएँ दीं और प्रणाम किया ।
एकदा नर्मदायां महाह्रदे जालकैर्वकः शिलाखण्ड ईदृङ्गं शिष्टाचारः
कश्चिद्दृष्टः । तैश्च परिचिन्तितम्—'इदमत्र लिखितमिव किञ्चिद्भाति ।
नूनमिदं राजनिलटं नेयम्' इति बुद्ध्या भोजसंसि समानीतम् ।
एक बार नर्मदा की गहरी जलराशि में जाल डालने वाले मछेरों ने
घिसे-मिटे अक्षरों वाला एक शिला का खंड देखा । उन्होंने सोचा—'यह इस
पर कुछ लिखा-सा प्रतीत होता है । निश्चय ही इसे राजा के पास ले जाना
उचित है ।' ऐसा निश्चय करके वह शिलाखंड भोज की सभा में
ले आये ।
तदाकर्ण्य भोजः प्राह—'पूर्वं भगवता हनुमता श्रीमद्रामायणं कृतम् ।
तदत्र ह्रदे प्रक्षेपितमिति श्रुतमस्ति । ततः किमिदं लिखितमित्यवश्यं
विचार्यमिति लिपिज्ञानं कार्यम् ।'
मछेरों की बात सुनकर भोज ने कहा—'प्राचीन काल में भगवान्
हनुमान ने श्रीमद् रामायण की रचना की थी । ऐसा सुना गया है कि उसे
उन्होंने यहीं जल राशि में फेंक दिया था । सो यह क्या लिखा है, इस पर
अवश्य विचार होना चाहिए और एतदर्थ इसकी लिपि की जानकारी करानी
चाहिए ।'
१६० भोजप्रबन्धः
जतुपरीक्षयाक्षराणि परिज्ञाय पठति । तत्र चरणद्वयमानुपूर्व्याल्लब्धम्-
‘अयि खलु विषमः पुराकृतानां भवति हि जन्तुषु कर्मणां विपाकः'
ततोः भोजः प्राह-‘एतस्य पूर्वार्धं कथ्यताम्' इति ।
चपड़े (लाख) की विधि द्वारा परीक्षा करके अक्षरों के ज्ञात होने पर
पढ़ा उसमें दो चरण अनुक्रम से मिले—
मिलता है कैसा दारुण फल प्राणियों को,
पहिले कभी किये गये हाय, कर्मजाल का !
तब भोज ने कहा—'इसका पूर्वार्ध कहें।'
तदा भवभूतिराह--
क्व नु कुलमकलङ्कमायताक्ष्याः ।
क्व नु रजनीचरसङ्गमापवादः ।
अयि खलु विषमः पुराकृतानां
भवति हि जन्तुषु कर्मणां विपाकः' ॥ ३०४ ॥
तब भवभूति ने कहा---
कहाँ तो निष्कलंक कुल विशाल नयना का,
कहाँ मिला अपवाद निशाचर के संग का;
मिलता है कैसा दारुण फल प्राणियों को,
पहिले कभी किये गये, हाय, कर्मजाल का !
ततो भोजस्तत्र ध्वनिदोषं मन्वानस्तदेव पूर्वार्धमन्यथा पठति स्म--
‘क्व जनकतनया क्व रामजाया क्व च दशकन्धरमन्दिरे निवासः ।
अयि खलु विषमः पुराकृतानां भवति हि जन्तुषु कर्मणां विपाकः' ॥
तो भोज ने उसमें ध्वनि दोष मान कर उस पूर्वार्ध को दूसरे प्रकार से पढ़ा—
कहाँ जनक तनया और राम की पत्नी कहाँ,
और कहाँ रहना दशकंधर के महल का !
मिलता है कैसा दारुण फल प्राणियों को,
पहिले कभी किये गये हाय, कर्मजाल का !
ततो भोजः कालिदासं प्राह--'सुकवे, त्वमपि कविहृदयं पठ' इति ।
स प्राह--
भोजप्रबन्धः १६१
'शिवशिरसि शिरांसि यानि रेजुः शिव शिव तानि लुठन्ति गृध्रपादे ।
अयि खलु विषमः पुराकृतानां भवति हि जन्तुषु कर्मणां विपाकः' ॥३०६॥
तब भोज ने कालिदास से कहा—'सुकवे, तुम भी ( रामायण के ) कवि
के हृदय का भाव पढ़ो ।' कालिदास ने कहा—
जो सिर सुशोभित थे शिवजी के मस्तक पर
शिव-शिव, गृध्र-चरणों में लुठित होना उनका !
मिलता है कैसा दारुण फल प्राणियों को
पहिले कभी किये गये हाय, कर्मजाल का !
ततस्तस्य शिलाखण्डस्य पूर्वपुटे जतुशोधनेन कालिदासपठितं तमेव
दृष्ट्वा राजा भृशं तुतोष ।
तदनंतर उस शिला खंड के पहिले भाग में जतु शोधन क्रिया के द्वारा
कालिदास के पढ़े गये ही पदों को देखकर राजा अत्यंत संतुष्ट हुआ ।
—:०:—
( २७ ) ब्रह्मराक्षसनिवारणम्
कदाचिद्भोजेन विलासार्थं नूतनगृहान्तरं निर्मितम् । तत्र गृहान्तरे
गृहप्रवेशात्पूर्वमेकः कश्चिद्ब्रह्मराक्षसः प्रविष्टः । स च रात्रौ तत्र ये वसन्ति
तान्भक्षयति । ततो मान्त्रिकान्समाहूय तदुच्चाटनाय राजा यतते स्म ।
स चाऽगच्छन्नेव मान्त्रिकानेव भक्षयति। किञ्च स्वयं कवित्वादिकं पूर्वा-
भ्यस्तमेव पठंस्तिष्ठति । एवं स्थिते तत्रैव रक्षसि राजा 'कथमस्य निवृत्तिः'
इति व्यचिन्तयत् ।
एक समय भोज ने आनंद-विलास के लिए एक और नया घर बनवाया ।
उस दूसरे घर में गृह प्रवेश से पहिले ही एक ब्रह्मराक्षस प्रविष्ट हो गया । रात
में जो वहाँ रहते थे, वह उन्हें खा जाता था । तो राजा ने मंत्रवेत्ताओं को
बुलाकर उसे भगाने का प्रयत्न किया; किंतु ब्रह्म राक्षस वहाँ से न जाकर
मांत्रिकों को ही खा जाता और इसके अतिरिक्त राक्षस होने से पहिले की
स्थिति में अभ्यस्त काव्य आदि का पाठ करता हुआ जमा रहता । राक्षस के
११ भो०
१६२ भोजप्रबन्धः
उस प्रकार वहीं जमे रहने पर राजा चिंता करने लगा कि इससे कैसे
छुटकारा मिले ?
तदा कालिदासः प्राह—'देव, नूनमयं राक्षसः सकलशास्त्रप्रवीणः
सुकविश्व भाति । अतस्तमेव तोषयित्वा कार्यं साधयानि । मान्त्रि-
कास्तिष्ठन्तु । मम मन्त्रं पश्य' इत्युक्त्वा स्वयं तत्र रात्रौ गत्वा शेते स्म ।
तो कालिदास ने कहा—'महाराज, यह राक्षस निश्चय ही संपूर्ण शास्त्रों
का विज्ञाता और सुकवि प्रतीत होता है। इसलिए उसको प्रसन्न करके ही
कार्य सिद्ध करूँगा । मंत्रवेत्ता ठहरें, आप मेरा मंत्र देखिए।' ऐसा कह रात में
वहाँ जाकर स्वयं सो गया ।
प्रथमयामे ब्रह्मराक्षसः समागतः स चापूर्वं पुरुषं दृष्ट्वा प्रतियास-
मेकैकां समस्यां पाणिनिसूत्रमेव पठति । येनोत्तरं तद्धृदयगतं नोक्तम्,
'अयं न ब्राह्मणः, अतो हन्तव्यः' इति निश्चित्य हन्ति । तदानीमपि
पूर्ववदयमपूर्वः पुरुषः । अतो मया समस्या पठनीया । न चेद्वक्ति सदृशमुत्तरं
तस्यास्तदा हन्तव्य इति । बुद्ध्या पठति—
'सर्वस्य द्वे' इति ।
पहिले पहर में ब्रह्म राक्षस आया करता था और नये पुरुष को देखकर
प्रत्येक पहर में एक-एक समस्या के रूप में पाणिनि का सूत्र ही पढ़ा करता
था । जो उसका मनचीता उत्तर न देता, यह विचार कर कि 'यह ब्राह्मण
नहीं है, इसे मार डालना चाहिए,' उसे मार डालता । 'नया पुरुष आया है,
इसलिए मुझे समस्या पढ़नी चाहिए। यदि ठीक उत्तर न दे तो मार डालना
चाहिए'—कालिदास के वहाँ होने पर भी यही विचार कर उसने पढ़ा—
'सब के दो'—
तदा कालिदासः प्राह—
'सुमतिकुमती सम्पदापत्तिहेतू'
इति । ततः स गतः ।
तो कालिदास ने कहा—
'कारण संपद्-विपद् की सुमति-कुमति ही सदा हुआ करती हैं।' तो वह
चला गया ।
[Header] भोजप्रबन्धः १६३
पुनरपि द्वितीयामे समागत्य पठति—
'वृद्धो यूना' इति ।
फिर दूसरे पहर में आकर उसने पढ़ा—
'बूढ़े को युवक'—
दिं कविराह—
'सहपरिचायात्त्यज्यते कामिनीभिः। इति ।
तो कवि ने कहा—
'ने परिचय हो जाने पर कामिनियाँ सदा छोड़ दिया करती हैं।'
तृतीयामे स राक्षसः पुनः समागत्य पठति—
'एको गोत्रे' इति ।
तीसरे पहर में उस राक्षस ने फिर आकर पढ़ा—
'एक ही गोत्र में'--
ततः कविराह—
'प्रभवति पुमान्यः कुटुम्बं बिभर्ति' इति ।
तो कवि ने कहा--
'पुरुष ऐसा होता है, जिससे कुटुंब का पालन हुआ करता है।'
ततश्चतुर्थयामे आगत्य स राक्षसः पठति—
'स्त्री पुंवच्च' इति ।
तत्पश्चात् चौथे पहर में आकर उस राक्षस ने पढ़ा--
'स्त्री पुरुषतुल्य'--
ततः कविराह--
'प्रभवति यदा तद्धि गेहं विनष्टम्' ॥ ३०७ ॥ इति ।
तो कवि ने कहा--
'जिस घर में हो जाती, वह घर विनाश को प्राप्त हुआ करता है।'
ततः स राक्षसो यामचतुष्टयेऽपि स्वाभिप्रायमेव ज्ञात्वा तुष्टः प्रभात-
समय समागत्य तमाश्लिष्य प्राह—'सुमते, तुष्टोऽस्मि । किं तवाभीष्टम्'
इति । कालिदासः प्राह—'भगवन्, एतद्गृहं विहायान्यत्र गन्तव्यम्'
इति । सोऽपि तथा' इति गतः। अनन्तरं तुष्टो भोजः कविं बहु मानितवान् ।
१६४ भोजप्रबन्धः
तो वह राक्षस चारों ही पहरों में अपना मनचीता भाव जानकर संतुष्ट
हुआ और प्रभात काल में आकर कालिदास का आलिंगन करके.बोला--'हे
सुबुद्धि शाली, मैं संतुष्ट हूँ। तुम्हारा अभीष्ट क्या है ?' कालिदास ने कहा—
'भगवन्, इस घर को छोड़कर और स्थान पर चले जाइए।' वह भी 'ठीक'
है, यह कह चला गया। इसके बाद संतुष्ट भोज ने कवि का बहुत संमान
किया।
---:०:---
( २८ ) मल्लिनाथस्य दारिद्र्यनिवारणम्
एकदा सिंहासनमलङ्कुर्वाणे श्रीभोजे सकलभूपालशिरोमणौ द्वार-
पाल आगत्य प्राह—'देव, दक्षिणदेशात्कोऽपि मल्लिनाथनामा कविः
कौपीनावशेषो द्वारि वर्तते। राजा—'प्रवेशय' इत्याह।
एक बार समस्त पृथ्वी-पतियों के शिर की मणि के समान ( श्रेष्ठ ) श्री
भोज के सिंहासन को सुशोभित करने पर द्वारपाल आकर बोला—'महाराज,
दक्षिण देश से आया कोई कौपीन मात्र धारी मल्लिनाथ नामक कवि द्वार पर
उपस्थित है।' राजा ने कहा—'प्रवेश दो।'
ततः कविरागत्य 'स्वस्ति' इत्युक्त्वा तदाज्ञया चोपविष्टः पठति --
'नागो भाति मदेन खं जलधरैः पूर्णेन्दुना शर्वरी
शीलेन प्रमदा जवेन तुरगा नित्योत्सवैर्मन्दिरम्।
वाणी व्याकरणेन हंसमिथुनैर्नद्यः सभा पण्डितैः
सत्पुत्रेण कुलं त्वया वसुमती लोकत्रयं भानुना' ॥३०८॥
तब कवि ने आकर 'कल्याण हो' कहा और राजा की आज्ञा से बैठ
कर पढ़ा--
मद से हाथी शोभित होता है, आकाश जलधर बादलों से, रात्रि
पूर्ण चंद्र से, नारी शील से, घोड़ा वेग से, मंदिर प्रतिदिन के उत्सवों से, वाणी
व्याकरण से, नदियाँ हंसों के जोड़ों से, सभा पंडितों से, कुल सपूत से, धरती
आपसे और तीनों लोक सूर्य से शोभित होते हैं।
ततो राजा प्राह--'विद्वन्, तवोद्देश्यं किम्' इति।
तब राजा ने कहा--'हे विद्वान्, तुम्हारा उद्देश्य क्या है?',
भोजप्रबन्धः १६५
ततः कविराह--
'अम्बा कुप्यति न मया न स्नुषया सापि नाम्बया न मया ।
अहमपि न तया न तया वद राजन्कस्य दोषोऽयम्' ॥३०६॥
इति । राजा च दारिद्रयदोषं ज्ञात्वा कविं पूर्णमनोरथं चक्रे ।
तब कवि ने कहा--
माँ क्रोध करती है, पर न मुझ पर न अपनी पतोहू ( मेरी पत्नी ) पर;
और वह ( मेरी पत्नी ) भी न माँ पर क्रोध करती है, न मुझ पर; और मैं
न माँ पर क्रोध करता हूँ, न पत्नी पर; तो हे राजा, आप ही कहो कि यह
दोष किसका है ?
और राजा ने दरिद्रता का दोष समझा और कवि का मनोरथ पूर्ण
कर दिया ।
---: ० :---
( २६ ) राज्ञः सर्वस्वदानम्
एकदा द्वारपाल आगत्य राजानं प्राह--'देव, कविशेखरो नाम
महाकविर्द्वारि वर्तते । राजा--'प्रवेशय' इत्याह ।
एक बार द्वारपाल आकर राजा से बोला--'महाराज, कवि शेखर नाम
का महाकवि द्वार पर उपस्थित है ।' राजा ने कहा--प्रविष्ट कराओ ।'
ततः कविरागत्य 'स्वस्ति' इत्युक्त्वा पठति--
'राजन्दौवारिकादेव प्राप्तवानस्मि वारणम् ।
मदवारणमिच्छामि त्वत्तोऽहं जगतीपते' ॥ ३५० ॥
तब कवि ने आकर स्वस्ति' कहा और पढ़ा--
हे राजा, वारण ( बाधा ) मुझे द्वारपाल से ही प्राप्त हो चुका है; हे
जगत् के स्वामी, मैं तुम से मद युक्त वारण ( हाथी ) चाहता हूँ ।
तदा प्राङ्मुखस्तिष्ठन्नराजाऽतिसन्तुष्टस्तं प्राग्देशं सर्वं कवये दत्तं मत्वा
दक्षिणाभिमुखोऽभूत् । ततः कविश्चिन्तयति--'किमिदम् । राजा मुखं
परावृत्य मां न पश्यति' इति ।
१६६ भोजप्रबन्धः
उस समय पूर्व की ओर (कवि की ओर) मुख करके बैठे राजा ने
अत्यंत संतुष्ट हो 'पूर्व का संपूर्ण देश मैंने कवि को दे दिया'—यह मान
लिया और दक्षिण की ओर मुंह करके बैठ गया। तो कवि ने सोचा—'यह
क्या है कि राजा मुँह फेर कर बैठ गया और मेरी ओर देखता भी नहीं?'
ततो दक्षिणदेशे समागत्याभिमुखः कविः पठति--
'अपूर्वेयं धनुर्विद्या भवता शिक्षिता कथम्।
मार्गणौघः समायाति गुणो याति दिगन्तरम् ॥ ३११ ॥
ततो राजा दक्षिणदेशमपि मनसा कवये दत्त्वा स्वयं प्रत्यङ्मुखोऽभूत्।
तब दक्षिण की ओर आ राजा के संमुख हो कवि ने पढ़ा--आपने यह
अनोखी धनुर्विद्या कहाँ से सीखी है कि वाण-समूह तो आता है पर प्रत्यंचा
(धनुष की डोरी) दूसरी ओर चली जाती है, अर्थात् मार्गणौघ (याचक
समूह) के आते ही गुण (कृपा) दूसरी ओर हो जाती है।
तो दक्षिण देश भी कवि को देने का मन में संकल्प कर राजा स्वयम्
पश्चिम को मुख करके बैठ गया।
कविस्तत्रागत्य प्राह--
'सर्वज्ञ इति लोकोऽयं भवन्तं भाषते मृषा।
पदमेकं न जानीषे वक्तुं नास्तीति याचके' ॥ ३१२ ॥
ततो राजा तमपि देशं कवेर्दत्तं मत्वोदङ्मुखोऽभूत्।
कवि उधर आकर बोला--
आपको यह संसार व्यर्थ ही सर्वज्ञ कहता है; आप तो याचक से 'नहीं
है' यह एक शब्द भी कहना नहीं जानते।
तो राजा ने वह (पश्चिम) देश भी कवि को देकर उत्तर की ओर
मुख कर लिया।
कविस्तत्राप्यागत्य प्राह--
'सर्वदा सर्वदोऽसीति मिथ्या त्वं कथ्यसे बुधैः।
नारयो लेभिरे पृष्ठं न वक्षः परयोषितः' ॥ ३१३ ॥
ततो राजा स्वां भूमिं कविदत्तां मत्वोत्तिष्ठति स्म।
कवि वहाँ भी आकर बोला-
विद्वान् लोग यह असत्य ही कहते हैं कि तुम सदा सब को सब कुछ दिया
करते हो, न तो तुम्हारे शत्रुओं ने तुम्हारी पीठ पायी और न पर नारियों ने
तुम्हारा वक्षःस्थल पाया ।
तो राजा अपनी सब धरती को दी मान कर उठ गया ।
कविश्च तदभिप्रायमज्ञात्वा पुनराह—
'राजन्कनकधाराभिस्त्वयि सर्वत्र वर्षति ।
अभाग्यच्छत्रसंछन्ने मयि नायान्ति बिन्दवः' ॥ ३१४ ॥
कवि ने राजा का अभिप्राय न समझ कर फिर कहा—
हे राजा, सब स्थानों पर तुम्हारे स्वर्ण धाराओं की वर्षा करने पर भी
अभाग्य के छाते से ढके मुझ पर बूँदें नहीं गिरतीं ।
तदा राजा चान्तःपुरं गत्वा लीलादेवीं प्राह-'देवि, सर्वं राज्यं कवये
दत्तम्। तत्तपोवनं मया सहागच्छ' इति। अस्मिन्नवसरे विद्वान्द्वारि
निर्गतः। बुद्धिसागरेण वृद्धामात्येन पृष्टः- 'विद्वन्, राज्ञा किं दत्तम्'
इति। स आह-'न किमपि' इति। तदामात्यः प्राह- 'तत्रोक्तं श्लोकं
पठ।' ततः कविः श्लोकचतुष्टयं पठति। अमात्यस्ततः प्राह-'सुकवे,
तव कोटिद्रव्यं दीयते; परं राज्ञा यदद्य तव दत्तं भवति तत्पुनर्विक्रीयताम्'
इति, कविस्तथा करोति। ततः कोटिद्रव्यं दत्त्वा कविं प्रेषयित्वामात्यो
राजनकटमागत्य तिष्ठति स्म।
तब राजा ने रनिवास में जाकर लीला देवी से कहा-'देवी, सारा
राज्य कवि को दे दिया। सो मेरे साथ तपोवन चलो'। इसी अवसर पर
विद्वान् द्वार पर निकल आया। बूढ़े मंत्री बुद्धिसागर ने पूछा-'हे
विद्वान्, राजा ने क्या दिया?' वह बोला-'कुछ भी नहीं।' तो अमात्य
ने कहा-'वहाँ पढ़े श्लोक पढ़ो।' तो कवि ने चारों श्लोक पढ़ दिये।
तब मंत्री ने कहा-'हे सुकवि, तुम्हें एक करोड़ द्रव्य देता हूँ, पर
राजा ने इस समय जो कुछ दिया है, उसे बेच दो।' कवि ने वैसा
ही किया। तो कवि को एक करोड़ द्रव्य देकर भेज कर मंत्री राजा के पास
जाकर बैठा।
१६८ •भोजप्रबन्धः
तदा राजा च तमाह - 'बुद्धिसागर, राज्यमिदं सर्वं दत्तं कवये।
पत्नीभिः सह तपोवनं गच्छामि। तत्र तपोवने तवापेक्षा यदि मया
सहागच्छ' इति। ततोऽमात्यः प्राह- 'देव, तेन कविना कोटिद्रव्य-
मूल्येन राज्यमिदं विक्रीतम्। कोटिद्रव्यं च विदुषे दत्तम्, अतो
राज्यं भवदीयमेव। भुङ्क्ष्व' इति। तदा राजा च बुद्धिसागरं विशेषेण
संमानितवान्।
तब राजा ने उससे कहा-'बुद्धिसागर, यह सारा राज्य कवि को दे
दिया। पत्नी सहित वन जा रहा हूँ। यदि वहाँ तपोवन में तुम्हें मेरे
साथ की अपेक्षा हो तो मेरे साथ आओ।' तब मंत्री बोला--'महाराज, एक
करोड़ द्रव्य मूल्य में उस कवि ने यह राज्य बेच दिया है और एक करोड़ द्रव्य
विद्वान् को दे दिया गया है, इस लिए राज्य आपका ही है। भोग कीजिए।'
तो राजा ने बुद्धिसागर का विशेष संमान किया।
--:०:--
( ३० ) तक्रविक्रीती युवती
अन्यदा राजा मृगयारसेनाटवीमल्ललाटन्तपे तपने क्षूनदेहः
पिपासापर्याकुलस्तुरगमारुह्योदकार्थी निकटतटभुवमटंस्तदलव्ध्वा परि-
श्रान्तः कस्यचिन्महातरोरधस्तादुपविष्टः। तत्र काचिद्गोपकन्या सुकुमा-
रमनोज्ञसर्वाङ्गा यदृच्छया धारानगरं प्रति तक्रं विक्रीतुकामा तक्रभाण्डं
चोद्वहन्ती समागच्छति। तामागच्छन्तीं दृष्ट्वा राजा पिपासावशादेतद्भा-
ण्डस्थं पेयं चेत्पिवामीति बुद्ध्यापृच्छत्--'तरुणि, किमावहसि' इति।'
एक और वार राजा आखेट के शौक में जंगल में घूम रहा था; जब
सूरज सिर को तपाने लगा तो खिन्न-दुःखी, प्यास से अत्यंत व्याकुल, जल के
लिए घोड़े पर चढ़ निकटवर्त्ती तट भूमि में घूमते-फिरते जल को न पा, थक
कर एक बड़े वृक्ष के नीचे जा बैठा। उधर एक सुकुमार और मनोहर सब
अंगों वाली ग्वाले की कन्या अपनी इच्छा से माठा बेचने के निमित्त माठे का
वरतन लिये धारा नगर की ओर जाती, चली आ रही थी। राजा ने उसे
आती हुई देखकर प्यास के वश हो यह सोचा कि इसके वरतन में यदि कोई
पीने की वस्तु हो तो पिऊँ और पूछा-'हे तरुणी, क्या ले जा रही हो?'
भोजप्रबन्धः १६६
॥ च तन्मुखश्रिया भोजं मत्वा तत्पिपासां च ज्ञात्वा तन्मुखावलोकन-
शाच्छन्दोरूपेणाह-
'हिमकुन्दशशिप्रभशङ्कनिभं परिपक्व कपित्थ सुगन्धरसम् ।
युवतीकरपल्लवनिर्मथितं पिव हे नृपराज रुजापहरम्' ॥३१५॥ इति ।
उसके मुख की कांति से उसने उसे भोज मानकर और उसकी प्यास
को जानकर उसके मुख को देखने के लिए छंद रूप में कहा-
बर्फ कुंद, चंदा और शंख के समान श्वेत,
पके हुए कैथ का सुगंधित जैसे रस है,
युवती के कोमल कर-किसलय से मथा हुआ
पान करें राज-राज, सर्वरोगहर है।
राजा तच्च तक्रं पीत्वा तुष्टस्तां प्राह--'सुभ्रूः, किं तवाभीष्टम्' इति ।
च किंचिदाविष्कृतयौवना मदपरवशमोहाकुलनयना प्राह-'देव,
कन्यामेवावेहि ।'
वह मीठा पीकर संतुष्ट हो राजा ने उससे कहा-'हे सुंदर भ्रुकुटी
ने, तुम्हारी क्या कामना है?' जिसका यौवन कुछ-कुछ प्रकट हो
था, ऐसी वह मद के परवश हो चंचल नेत्रों से मोह प्रकट करती हुई
ने- 'महाराज, मुझे कुमारी कन्या ही समझें ।
सा पुनराह-
'इन्दुं कैरविणीव कोकपटलीवाम्भोजिनीवल्लभं
मेघं चातकमण्डलीव मधुपश्रेणीव पुष्पव्रजम् ।
माकन्दं पिकसुन्दरीव रमणीवात्मेश्वरं प्रोषितं
चेतोवृत्तिरियं सदा नृपवर त्वां द्रष्टुमुत्कण्ठते' ॥३१६॥
यथा कुमुदिनी शशि को चाहे, सूरज को मंडल चकवों का,
झुंड पपीहों का बादल को, फूलों को समूह भ्रमरों का,
आमों को कोयलिया, बिछुड़ा अपना पति रमणी को वांछित,
मनोवृत्ति यह सदा नृपतिवर, तुम्हें देखने को उत्कंठित ।
राजा चमत्कृतः प्राह-'सुकुमारि, त्वां लीलादेव्या अनुमत्यास्वीकुर्मः।'
इति धारानगरं नीत्वा तां तथैव स्वीकृतवान् ।
१७० भोजप्रबन्धः
चमत्कृत हो राजा ने कहा—'हे सुकुमारी तुम्हें लीलादेवी की अनुमति
से स्वीकारूँगा।' और उसे धारा नगरी ले जाकर उसी प्रकार स्वीकारा।
—: o :—
( ३१ ) विलक्षणसमस्यापूर्तिः
कदाचिद्राजाभिषेके मदनशरपीडिताया मदिराक्ष्याः करतलगलितो-
हेमकलशः सोपानपङ्क्तिषु रटन्नध पपात । ततो राजा सभायामागत्य-
कालिदासं प्राह--'सुकवे, एनां समस्यां पूरय--'टटंटटंटंटटंटंटंटम्।'
किसी समय राजा के स्नान के अवसर पर काम बाण से पीड़ित मदमाते
नयनों वाली तरुणी की हथेली से छूटा सोने का कलसा सीढ़ियों पर टकराता
गिर गया। तो राजा ने सभा में आकर कालिदास से कहा—'हे सुकवि,
इस समस्या की पूर्ति करो—'टटंटटंटंटटंटंटंटम्।'
ततः कालिदासः प्राह--
'राजाभिषेके मदविह्वलाया हस्ताच्च्युतो हेमघटो युवत्याः।
सोपानमार्गे प्रकरोति शब्दं टटंटटंटंटटंटंटंटम् ॥ ३१७ ॥
तदा राजा स्वाभिप्रायं ज्ञात्वाक्षरलक्षं ददौ।
तो कालिदास ने कहा—
नृप के नहाते मद विह्वला के कर से छूटा स्वर्णकलश युवति के, करने
लगा शब्द सुसीढ़ियों पर टटंटटंटंटटंटंटंटंटंटम्।
तब राजा ने अपना अभिप्राय समझकर प्रत्यक्षर पर लक्ष मुद्राएँ दीं।
—: o :—
( ३२ ) चौरो मुककुण्डः कविः
अन्यदा सिंहासनमलंकुर्वाणे श्रीभोजे कश्चिच्चौर आरक्षकै राज-
निकटं नीतः। राजा तं दृष्ट्वा 'कोऽयम्' इत्यपृच्छत्। तदा रक्षकः प्राह--
'देव, अनेन कुम्भिलकेन कस्मिंश्चिद्वेश्यागृहे घातपातमार्गेण द्रव्या-
ण्यपहृतानि' इति। तदा राजा प्राह--'अयं दण्डनीयः' इति।
अन्य वार श्रीभोज के सिंहासन को सुशोभित करने पर रखवाले एक चोर
को राजा के निकट लाये। राजा ने उसे देखकर पूछा—'यह कौन है?' तो
भोजप्रबन्धः १७१
रखवाला बोला—'महाराज, इस चोर ने एक वेश्या के घर में सेंध के रास्ते
से द्रव्य चुराये हैं।' तो राजा ने कहा--'इसे दंड दो।'
ततो भुक्कुण्डो नाम चौरः प्राह—
'भट्टिर्नष्टो भारवीयोऽपि नष्टो भिक्षुर्नष्टो भीमसेनोऽपि नष्टः।
भुक्कुण्डोऽहं भूपतिस्त्वं हि राजन्भोभापङ्क्तावन्तकः संनिविष्टः।३१६॥
तो भुक्कुंड नाम का चोर बोला—
नष्ट हुआ भट्टि, भारवीय भी विनष्ट
हुआ नष्ट, भीमसेन भी विनष्ट है,
भुक्कुंड मैं हूँ और तू है भूपति भोज
'भा-भा' की पंक्ति में यमराज संनिविष्ट है।
तदा राजा प्राह--'भो भुक्कुण्ड, गच्छ गच्छ यथेच्छं विहर।'
तो राजा ने कहा--अरे भुक्कुंड, जा भाग, यथेच्छया विहार
करता रह।'
--: ० :--
( ३३ ) कविसत्कारः
कदाचिद्द्रोजो मृगयापर्याकुलो वने विचरन्विश्रमाविष्टहृदयः
कञ्चित्तटाकमासाद्य स्थितवान्श्रममाप्तसुप्तः । ततोऽपरपयोनिधिकुहरं
गते भास्करे—
तत्रैवारोचत निशा तस्य राज्ञः सुखप्रदा।
चञ्चच्चन्द्रकरानन्द संदोहपरिकन्दला ॥३१६ ॥
कभी मृगया में व्यस्त भोज वन में विचरण करते हुए विश्राम करने की
इच्छा से किसी तालाब पर पहुँच जा बैठा और श्रम के कारण सो
गया। तब सूर्य के पश्चिम समुद्र में डूब जाने पर वहीं चमकते
चंद्रमा की किरणों के आनंद से परिपूर्ण सुखदायिनी रात राजा को
अच्छी लगी।
ततः प्रत्यूषसमये नगरीं प्रति प्रस्थितो राजा चरमगिरिनितम्ब-
लम्बमानशशाङ्कविम्बमवलोक्य सकुतूहलः सभामागत्य तदा समीप-
स्थान्कवीन्द्रान्निरीक्ष्य समस्यामेकामवदत्--'चरमगिरिनितम्बे चन्द्रबिम्बं
ललम्बे।'
३७२ भोजप्रबन्धः
तब प्रभात वेला में नगरी की ओर जाते राजा ने अस्ताचल श्रेणी में
लटकते चंद्रविम्ब को देखकर कुतूहल पूर्वक सभा में आ उस समय निकटवर्ती
कवियों का निरीक्षण करके एक समस्या पढ़ी--'चंद्र विम्ब लटक गया
अस्ताचलभाल में।'
तदा प्राह भवभूतिः--
'अरुणकिरणजालैरन्तरिक्षे गतर्ते'
तो भवभूति ने कहा--
'नभ में रवि किरणों से सितारे मिट जाने पर'
ततो दण्डी प्राह--
'चलति शिशिरवाते मन्दमन्दं प्रभाते।'
तब दंडी ने कहा--
'मंद मंद शीत पवन बहते उपाकाल में।'
ततः कालिदासः प्राह--
'युवतिजनकदम्वे नाथमुक्तौष्ठबिम्बे चरमगिरिनितम्बे चन्द्रबिम्बं
ललम्बे' ।
तदनंतर कालिदास ने कहा--
'स्वामियों से नारियों के मुक्त होते ओष्ठबिम्ब चंद्रबिम्ब लटक गया
अस्ताचल-भाल में।'
ततो राजा सर्वानपि संमानितवान् । तत्र कालिदासं विशेषतः
पूजितवान् ।
तब राजा ने सब कवियों का संमान किया और कालिदास की विशेष
आराधना की।
--: ० :--
( ३४ ) रोगीराजा
अथ कदाचिद्भोजो नगराद्बहिर्निर्गतो नूतनेन तटाकाम्भसा बाल्य-
साधितकपालशोधनादि चकार। तन्मूलेन कश्चन शफरशावः कपालं
प्रविष्टो विकटकरोटिकानिकटघटितो विनिर्गतः। ततो राजा स्वपुरीमवाप।
तदारभ्य राज्ञः कपाले वेदना जाता।
भोजप्रबन्धः १७३
एक बार भोज नगर से बाहर निकला और नये तालाब के पानी से
बचपन से सिद्ध कपाल-शुद्धि आदि की क्रिया की। ताल के नीचे से एक
मछली का बच्चा राजा के कपाल में घुस गया और टेढ़ी नस के निकट कृमि
छोड़कर बाहर निकल गया। फिर राजा अपनी पुरी में आगया। तब से
राजा के कपाल में पीडा होने लगी।
ततस्तत्रत्यैर्भिषग्वरैः सम्यक्चिकित्सितापि न शान्ता। एवमहर्निशं
नितरामस्वस्थे राज्यमानुषविदितेन महारोगेण।
क्षामं क्षाममभूद्वपुर्गतसुखं हेमन्तकालेऽब्जव-
द्वक्त्रं निर्गतकान्ति राहुवदनाक्रान्ताब्जबिम्बोपमम्।
चेतः कार्यपदेषु तस्य विमुखं क्लीवस्य नारीष्विव
व्याधिः पूर्णतरो बभूव विपिने शुष्के शिखावानिव ॥३२१॥
वह पीडा वहाँ के अच्छे चिकित्सकों के द्वारा भली भाँति चिकित्सा करने
पर भी दूर न हुई। इस प्रकार मनुष्यों को अज्ञात महारोग से राजा के दिन
रात निरंतर अस्वस्थ रहने पर—
सुख-चैन न मिलने से राजा का शरीर अत्यंत क्षीण और मुख हेमंत ऋतु
में कमल के समान अभद्र, कांतिहीन, राहु के मुख में पड़े चंद्रबिम्ब के सदृश
हो गया। जैसे नपुंसक स्त्रियों से विमुख रहता है, वैसे ही उसका चित्त राज-
काज से विमुख रहने लगा और जैसे सूखे जंगल में आग फैल जाती है, वैसे ही
रोग पूरी तरह फैल गया।
एवमतीते संवत्सरेऽपि काले न केनापि निवारितस्तद्गदः। ततः
श्रीभोजो नानाविधसमानौषधग्रसनरोगदुःखितमनाः समीपस्थं शोक-
सागरनिमग्नं बुद्धिसागरं कथमपि संयुताक्षरामुवाच वाचम्—'बुद्धिसा-
गर, इतः परमस्मद्विषये न कोऽपि भिषग्वरो वसतिमातनोतु। बाहटादि-
भेषजकोशान्निखिलान्स्रोतसि निरस्यागच्छ। मम देवसमागमसमयः
समागतः, इति। तच्छ्रुत्वा सर्वेऽपि पौरजनाः कवयश्चावरोधसमाजश्च
विगलदस्त्रासारनयना बभूवु।
इस प्रकार एक वर्ष का समय बीत जाने पर भी किसी से उसका रोग
दूर न हुआ। तब अनेक प्रकार की एक जैसी औषधों के सेवन और रोग से