भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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उस प्रकार वहीं जमे रहने पर राजा चिंता करने लगा कि इससे कैसे
छुटकारा मिले ?
तदा कालिदासः प्राह—'देव, नूनमयं राक्षसः सकलशास्त्रप्रवीणः
सुकविश्व भाति । अतस्तमेव तोषयित्वा कार्यं साधयानि । मान्त्रि-
कास्तिष्ठन्तु । मम मन्त्रं पश्य' इत्युक्त्वा स्वयं तत्र रात्रौ गत्वा शेते स्म ।
तो कालिदास ने कहा—'महाराज, यह राक्षस निश्चय ही संपूर्ण शास्त्रों
का विज्ञाता और सुकवि प्रतीत होता है। इसलिए उसको प्रसन्न करके ही
कार्य सिद्ध करूँगा । मंत्रवेत्ता ठहरें, आप मेरा मंत्र देखिए।' ऐसा कह रात में
वहाँ जाकर स्वयं सो गया ।
प्रथमयामे ब्रह्मराक्षसः समागतः स चापूर्वं पुरुषं दृष्ट्वा प्रतियास-
मेकैकां समस्यां पाणिनिसूत्रमेव पठति । येनोत्तरं तद्धृदयगतं नोक्तम्,
'अयं न ब्राह्मणः, अतो हन्तव्यः' इति निश्चित्य हन्ति । तदानीमपि
पूर्ववदयमपूर्वः पुरुषः । अतो मया समस्या पठनीया । न चेद्वक्ति सदृशमुत्तरं
तस्यास्तदा हन्तव्य इति । बुद्ध्या पठति—
'सर्वस्य द्वे' इति ।
पहिले पहर में ब्रह्म राक्षस आया करता था और नये पुरुष को देखकर
प्रत्येक पहर में एक-एक समस्या के रूप में पाणिनि का सूत्र ही पढ़ा करता
था । जो उसका मनचीता उत्तर न देता, यह विचार कर कि 'यह ब्राह्मण
नहीं है, इसे मार डालना चाहिए,' उसे मार डालता । 'नया पुरुष आया है,
इसलिए मुझे समस्या पढ़नी चाहिए। यदि ठीक उत्तर न दे तो मार डालना
चाहिए'—कालिदास के वहाँ होने पर भी यही विचार कर उसने पढ़ा—
'सब के दो'—
तदा कालिदासः प्राह—
'सुमतिकुमती सम्पदापत्तिहेतू'
इति । ततः स गतः ।
तो कालिदास ने कहा—
'कारण संपद्-विपद् की सुमति-कुमति ही सदा हुआ करती हैं।' तो वह
चला गया ।