भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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कालिदास को अनदेखे आभूषण कर्णफूल के पतन का ज्ञाता होने के कारण
विशेष रूप से संमानित किया ।
( २६ ) अष्टषोधय अन्याः कथाः
ततः कदाचिच्चित्रकर्मावलोकनतत्परो राजा चित्रलिखितं महाशेषं
दृष्ट्वा 'सम्यगलिखितम्' इत्यवदत् । तदा कश्चिच्छिवशर्मा नाम कविः
शेषमिषेण राजानं स्तौति-
अनेके फणिनः सन्ति भेकभक्षणतत्पराः ।
एक एव हि शेषोऽयं धरणीधारणक्षमः ॥ ३०० ॥
तदानीं राजा तदभिप्रायं ज्ञात्वा तस्मै लक्षं ददौ ।
कभी चित्रकारी देखने में लगे राजा ने चित्र में बने महाशेष नाग को देख
कर कहा कि अच्छा चित्र बना है । तो कवि शिवशर्मा नामक कवि ने शेष-
नाग के व्याज से राजा की स्तुति की--
मेढकों को खाने में लगे बहुत-से हैं धरती पर साँप ।
किंतु धरणी-धारणा में शक्त एक ही शेषनाग फणिराज ।
(मेंढकों को खाने में लगे रहने वाले तो अनेक सर्प हैं, परंतु धरती को
धारने में समर्थ एक यह शेष नाग ही है । )
तब उसका अभिप्राय जान कर उस समय राजा ने उसे एक लाख
मुद्राएँ दीं ।
कदाचिद्धेमन्तकाले समागते ज्वलन्तीं (१) हसन्तीं संसेवयन् राजा
कालिदासं प्राह-'सुकवे, हसन्तीं वर्णय' इति । ततः सुकविराह--
'कविमतिरिव बहुलोहा संघटितचक्रा प्रभातवेलेव ।
हरमूर्तिरिव हसन्ती भाति विधूसानलोपेता' ॥ ३०१ ॥
राजाक्षरलक्षं ददौ ।
कभी हेमंत ऋतु के आ जाने पर जलती अँगीठी पर तापते हुए राजा ने
कालिदास से कहा-'हे सुकवि, अँगीठी का वर्णन करो।' तब सुकवि ने कहा-
यह हंसती जैसे कवि की बुद्धि बहुलोहा (बहुल+ऊहा=अनेक प्रकार
की कल्पना करने वाली ) होती है, वैसे ही बहुलोहा (बहुत सा लोहा है