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भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 190 में से

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पृष्ठ 164

भोजप्रबन्धः १६१
'शिवशिरसि शिरांसि यानि रेजुः शिव शिव तानि लुठन्ति गृध्रपादे ।
अयि खलु विषमः पुराकृतानां भवति हि जन्तुषु कर्मणां विपाकः' ॥३०६॥
तब भोज ने कालिदास से कहा—'सुकवे, तुम भी ( रामायण के ) कवि
के हृदय का भाव पढ़ो ।' कालिदास ने कहा—
जो सिर सुशोभित थे शिवजी के मस्तक पर
शिव-शिव, गृध्र-चरणों में लुठित होना उनका !
मिलता है कैसा दारुण फल प्राणियों को
पहिले कभी किये गये हाय, कर्मजाल का !
ततस्तस्य शिलाखण्डस्य पूर्वपुटे जतुशोधनेन कालिदासपठितं तमेव
दृष्ट्वा राजा भृशं तुतोष ।
तदनंतर उस शिला खंड के पहिले भाग में जतु शोधन क्रिया के द्वारा
कालिदास के पढ़े गये ही पदों को देखकर राजा अत्यंत संतुष्ट हुआ ।
—:०:—
( २७ ) ब्रह्मराक्षसनिवारणम्
कदाचिद्भोजेन विलासार्थं नूतनगृहान्तरं निर्मितम् । तत्र गृहान्तरे
गृहप्रवेशात्पूर्वमेकः कश्चिद्ब्रह्मराक्षसः प्रविष्टः । स च रात्रौ तत्र ये वसन्ति
तान्भक्षयति । ततो मान्त्रिकान्समाहूय तदुच्चाटनाय राजा यतते स्म ।
स चाऽगच्छन्नेव मान्त्रिकानेव भक्षयति। किञ्च स्वयं कवित्वादिकं पूर्वा-
भ्यस्तमेव पठंस्तिष्ठति । एवं स्थिते तत्रैव रक्षसि राजा 'कथमस्य निवृत्तिः'
इति व्यचिन्तयत् ।
एक समय भोज ने आनंद-विलास के लिए एक और नया घर बनवाया ।
उस दूसरे घर में गृह प्रवेश से पहिले ही एक ब्रह्मराक्षस प्रविष्ट हो गया । रात
में जो वहाँ रहते थे, वह उन्हें खा जाता था । तो राजा ने मंत्रवेत्ताओं को
बुलाकर उसे भगाने का प्रयत्न किया; किंतु ब्रह्म राक्षस वहाँ से न जाकर
मांत्रिकों को ही खा जाता और इसके अतिरिक्त राक्षस होने से पहिले की
स्थिति में अभ्यस्त काव्य आदि का पाठ करता हुआ जमा रहता । राक्षस के
११ भो०