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भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

भोजप्रबन्धः १०५
राजा श्रुत्वापि तुष्टो न दास्यति । राजपुरुषैः सह चर्चां कुर्वाण-
स्तिष्ठति । ततः कविर्व्यचिन्तयत्--'किमु राजा नाश्रावि' ।
दूसरे दिन कुंडिन नगर से गोपाल नामक कवि आया और 'स्वस्ति'
कहकर बोला-
हे भोज, आपके चित्त में आकर दो वस्तुएँ तृण और कण के समान हो
जाती हैं--क्रोध आने पर विरोधियों की सेना (तृण तुल्य) और प्रसन्न
होने पर सुवर्ण का ढेर (कण के समान) ।
यह सुनकर संतुष्ट हो कर भी राजा ने कुछ दिया नहीं, राजपुरुषों के साथ
चर्चा करता रहा । तो कवि सोचने लगा-क्या राजा ने नहीं सुना ?'
ततः क्षणेन समुन्नतमैवावलोक्य राजानं कविराह--
'हे पाथोद् यथोन्नतं हि भवता दिग्व्यावृता सर्वतो
मन्ये धीर तथा करिष्यसि खलु क्षीराब्धितुल्यं सरः ।
किन्त्वेष क्षमते नहि क्षणमपि ग्रीष्मोष्मणा व्याकुलः
पाठीनादिगणस्त्वदेकशरणस्तद्वर्ष तावत्कियत् ॥ २१४ ॥
राजा कविहृदयं विज्ञाय 'गोपालकवे' दारिद्र्याग्निना नितान्तं
दग्धोऽसि ।'
इति वदन् षोडशमणीननर्घ्यान् षोडशदन्तीन्द्रांश्च ददौ ।
तदनंतर क्षण में राजा के ऊपर मुँह उठाते ही देख कर कवि बोला---
हे जलद, आपने जैसे उमड़ कर दिशा को सब ओर से ढक लिया है
उससे मैं समझता हूँ कि हे धीर आप सरोवर को क्षीरसमुद्र की भाँति बना
देंगे, परंतु ग्रीष्म ऋतु की गरमी से व्याकुल ये मछलियाँ आदि प्राणी क्षण
भर का विलंब भी नहीं सह पा रहे हैं, आप ही इनकी एक शरणस्थली हैं;
तो कुछ बरसिए ।
राजा ने कवि के हृदय का मर्म समझा और यह कहते हुए कि गोपाल
कवि, तुम दरिद्रता की आग से पूर्णतया दग्ध हो गये हो--,
सोलह अमोल मणियाँ और सोलह गजराज उसे दिये ।
--:०:--

१०६ भोजप्रबन्धः
( १६ ) प्रभूतदानस्य कतिपयकथाः
एकदा राजा धारानगरे विचरन्क्वचिच्छिवालये प्रसुप्तं पुरुषद्वय-
मपश्यत् । तयोरेको विगतनिद्रो वक्ति—'अहो, ममास्तरासन्न एव कस्त्वं
प्रसुप्तोऽसि जागर्षि नो वा ।'
एक बार धारानगर में विचरण करते हुए राजा ने किसी शिवालय में
सोते दो पुरुषों को देखा । उनमें जागकर एक ने कहा--'मेरे बिछौने के
निकट स्थित तुम कौन हो, सोते हो या जागते हो ?'
ततस्त्वपर आह--'विप्र, प्रणतोऽस्मि । अहमपि ब्राह्मणपुत्रस्त्वामत्र
प्रथमरात्रौ शयानं वीक्ष्य प्रदीप्ते च प्रदीपे कमण्डलूपवीतादिभिर्ब्राह्मणं
ज्ञात्वा भवदास्तरासन्न इवाहं प्रसुप्तः । इदानीं त्वद्गिरमाकर्ण्य प्रबुद्धोऽस्मि ।'
तो दूसरा बोला—'हे ब्राह्मण, प्रणाम करता हूँ । मैं भी ब्राह्मण का बेटा
हूँ; आपको यहाँ पहिली रात में ही सोया देखा और जलते दीपक में कमंडलु
और यज्ञोपवीत आदि देख आपको ब्राह्मण समझ कर आपके विस्तर के ही
निकट मैं भी सो गया । इस समय आपकी वाणी सुनकर जागा हूँ ।'
प्रथमः प्राह—'वत्स, यदि त्वं प्रणतोऽसि ततो दीर्घायुर्भव । वद
कुत आगम्यते, किं ते नाम, अत्र च किं कार्यम् ।'
पहिला बोला—'वत्स, तुम प्रणाम करते हो तो दीर्घायु होओ । कहो,
कहाँ से आते हो, तुम्हारा क्या नाम है और यहाँ क्या काम है ?'
द्वितीयः प्राह— विप्र, भास्कर इति मे नाम । पश्चिमसमुद्रतीरे
प्रभास-तीर्थे समीपे वसतिर्मम । तत्र भोजस्य वितरणं बहुभिर्व्यावर्णितम् ।
ततो याचितुमहमागतः । त्वं मम वृद्धत्वात्पितृकल्पोऽसि । त्वमपि सुपरि-
चयं वद् ।'
दूसरे ने कहा—'ब्राह्मण, मेरा नाम भास्कर है । पश्चिमी समुद्र के
किनारे प्रभास तीर्थ के निकट मेरा निवासस्थान है । वहाँ भोज के दान
करने के संबंध में अनेक लोगों ने वर्णन किया । सो मैं याचना करने आया
हूँ । आप वृद्ध होने के कारण पिता समान हैं । आप भी अपना परिचय
दीजिए ।'

भोजप्रबन्धः १०७
स आह—'वत्स, शाकल्य इति मे नाम। मयैकशिलानगर्या
आगम्यते भोजं प्रति द्रविणाशया । वत्स, त्वयानुक्तमपि दुःखं
त्वयि ज्ञायते कीदृशं तद्वद ।'
उसने कहा--'बच्चे, मेरा नाम शाकल्य है। मैं एक-शिला नगरी से
द्रव्य की आशा से भोज के पास आया हूँ। बेटे, तुमने कहा नहीं हैं, फिर
भी तुम दुःखी हो, यह ज्ञात हो रहा है; वह दुःख कैसा है ? कहो।'
ततो भास्करः प्राह--'तात, किं ब्रवीमि दुःखम् ।
क्षुत्क्षामाः शिशवः शवा इव भृशं मन्दाशया बान्धवा
लिप्ता झर्झरघर्धरी जतुलवैर्नो मां तथा बाधते।
गेहिन्या त्रुटितांशुकं घटयितुं कृत्वा सकाकुस्मितं
कुप्यन्ती प्रतिवेश्म लोकगृहिणी सूचि यथा याचिता' ॥२१५॥
राजा श्रुत्वा सर्वाभरणान्युत्तार्य तस्मै दत्त्वा प्राह—'भास्कर,
सीदन्त्यतीव ते बालाः । झटिति देशं याहि ।'
तो भास्कर बोला--'तात, क्या कहूँ अपना दुःख--
भूख से क्षीण बच्चे शव के समान हो गये हैं, भाई-बंधु पर्याप्त निम्न
विचार के हैं। लाख के टुकड़े से जोड़ी हुई फूटी गागर मुझे उतना कष्ट नहीं
देती, जितना कि फटा कपड़ा सिलने के लिए मेरी घरनी के द्वारा सूई माँगे
जाने पर बनावटी रूप से मुस्कुरा कर घर-घर में क्रुद्ध होती लोगों की घरनियाँ ।
यह सुनकर सब आभूषण उतार उसे देकर राजा ने कहा--'भास्कर,
तुम्हारे बच्चे बड़ा कष्ट पा रहे हैं। झट अपने देश को चले जाओ।'
ततः शाकल्यः प्राह--
अत्युद्धृता वसुमती दलितोऽरिवर्गः
क्रोडीकृता बलवता बलिराजलक्ष्मीः ।
एकत्र जन्मनि कृतं यदनेन यूना
जन्मत्रये तदकरोत्पुरुषः पुराणः ॥ २१६ ॥
ततो राजा शाकल्याय लक्षत्रयं दत्तवान् ।
तब शाकल्य ने कहा--

१०८ भोजप्रबन्धः
वसुमती धरती का उद्धार किया, शत्रुओं को दल डाला और वली राजाओं
की लक्ष्मी को अपनी गोद में ला धरा, —सो इस बलवान् युक्त (भोजराज)
ने एक ही जन्म में वह सब कर डाला, जो पुराण पुरुष विष्णु ने तीन जन्म
में किया । (वाराहावतार में धरती का उद्धार, रामादि अवतार में शत्रु-
नाश और वामनावतार में बलिराज का राज्य हरण) ।
तो राजा ने शाकल्य को तीन लाख मुद्राएँ दीं ।
अन्यदा राजा मृगयारसेन विचरंस्तत्र पुरः समागतहरिण्यां वाणेन
विद्धायामपि वित्ताशया कोऽपि कविराह—
'श्रीभोजे मृगयां गतेऽपि सहसा चापे समारोपिते-
ऽप्याकर्णान्तगतेऽपि मुष्टिगलिते बाणेऽङ्गलग्नेऽपि च ।
स्थानान्नैव पलायितं न चलितं नोत्कम्पितं नोत्प्लुतं
मृग्या मद्वशगं करोति दयितं कामोऽयमित्याशया' ॥ २१७ ॥
राजा तस्मै लक्षत्रयं प्रयच्छति ।
एक और वार आखेट के लिए विचरण करते राजा ने संमुख आ पड़ी
हिरनी को वाण से बींध दिया, तो वहां धन की आशा से एक कवि ने कहा—
आखेट को गये श्रीभोजराज ने झट से धनुष पर वाण चढ़ाया, कान तक
खींचा और मुट्ठी से निकल कर वह बाण अंग में जा लगा, किंतु इतना
सब होते भी हिरनी न तो स्थान छोड़ कर भागी, न चली, न कांपी, न कूदी—
वह यही आशा करती रही कि यह कामदेव मेरे स्वामी को मेरे वश में कर
रहा है ।
राजा ने उसे तीन लाख दिये ।
अन्यदा सिंहासनमलङ्कुर्वाणे श्रीभोजनृपतौ द्वारपाल आगत्याह-
'देव, जाह्नवीतीरवासिनी काचन वृद्धब्राह्मणी विदुषी द्वारि तिष्ठति' ।
राजा—'प्रवेशय ।' आगच्छन्तीं राजा प्रणमति । सा तं 'चिरं जीव'
इत्युक्त्वाह—
'भोजप्रतापाग्निरपूर्व एष जागर्ति भूभृत्कटकस्थलीषु ।
यस्मिन्प्रविष्टे रिपुपार्थिवानां तृणानि रोहन्ति गृहाङ्गणेपु' ॥ २१८ ॥

राजा तस्यै रत्नपूर्णं कलशं प्रयच्छति । ततो लिखति भाण्डारिकः-
'भोजेन कलशो दत्तः सुवर्णमणिसम्भृतः ।
प्रतापस्तुतितुष्टेन वृद्धायै राजसंसदि' ॥ २१६ ॥
दूसरी बार श्री भोजराज के सिंहासन को सुशोभित करते समय द्वार-
पाल ने आकर कहा—'देव, जाह्नवी गंगा के तट पर रहने वाली एक विदुषी
बूढ़ी, ब्राह्मणी द्वार पर है।' राजा ने कहा—'प्रविष्ट करो।' उसे आती देख
राजा ने प्रणाम किया और वह 'बहुत दिन जीते रहो', यह कहकर बोली—
राजाओं के सैन्यस्थलों में एक अनोखी भोज के प्रताप की अग्नि जल
रही है, जिसमें प्रविष्ट होने पर शत्रु राजाओं के घर के आंगनों में तृण उग
आते हैं।
राजा ने उसे रत्नों से भरा कलसा दिया। तो भंडारी ने लिखा—
राज संसद में अपने प्रताप की प्रशंसा करने पर संतुष्ट हुए भोज ने वृद्धा
को स्वर्ण और मणि से पूर्ण कलश दिया।
अन्यदा दूरदेशादागतः कश्चिच्चोरो राजानं प्राह—'देव,
सिंहलदेशे मया काचन चामुण्डालये राजकन्या दृष्टा, मालवदेशदेवस्य
महिमानं बहुधा श्रुतं त्वमपि वदेति पप्रच्छ । मया च तस्या देवगुणा
व्यावर्णितः। सा चात्यन्ततोषाच्चन्दनतरोर्निरुपमं गर्भखण्डं दत्त्वा
यथास्थानं प्रपेदे । देवगुणाभिवर्णनप्राप्तं तदेतद्गृहाण । एतत्प्रसृत-
परिमलभरेण भृङ्गा भुजङ्गाश्च समायान्ति।' राजा तद्गृहीत्वा तुष्टस्तस्मै
लक्षं दत्तवान् ।
एक वार दूर देश से आया कोई चोर राजा से बोला—'महाराज, मैंने
सिंहल देश में भगवती चामुंडा के मन्दिर में एक राज-कन्या देखी। उसने
मुझसे कहा कि मैंने मालव देश के राजा की बहुत महिमा सुनी है, तू भी
बता। मैंने उसके संमुख महाराज के गुणों का वर्णन किया। वह अत्यन्त
संतुष्ट हो चन्दन वृक्ष के मध्य भाग का एक अनुपम खंड मुझे देकर यथा-
स्थान चली गयी। महाराज के गुणों का वर्णन करने से प्राप्त यह चंदन खंड
महाराज स्वीकारें। इसकी सुगंध के प्रसार से भौंरे और सर्प आ जाते हैं।'
राजा उसे लेकर संतुष्ट हो चोर को लाख मुद्राएं दी।
ततो दामोदरकविस्तन्मिषेण राजानं स्तौति—

११० भोजप्रबन्धः
'श्रीमच्चन्दनवृक्ष सन्ति बहवस्ते शाखिनः कानने
येषां सौरभमात्रकं निवसति प्रायेण पुष्पश्रिया ।
प्रत्यङ्गं सुकृतेन तेन शुचिना ख्याताः प्रसिद्धात्मना
योऽसौ गन्धगुणस्त्वया प्रकटितः क्वासौविह प्रेक्ष्यते' ।
राजा स्वस्तुतिं बुद्ध्वा लक्षं ददौ ।
तब दामोदर कवि ने चंदन खंड के ब्याज से राजा की स्तुति की—
हे शोभावान् चंदन वृक्ष, जंगल में ऐसे बहुत से वृक्ष हैं, जिनकी कुसुमश्री
में ही सुगंध रहा करती है, परन्तु यह जो स्वयं प्रसिद्ध पवित्र पुण्यकृत्य के
कारण विख्यात सुगंध रूपी गुण अपने प्रत्येक अङ्ग से तुमने प्रकट किया है,
वह अन्य वृक्षों में कहाँ दीखता है ?
राजा ने अपनी प्रशंसा को समझ कर ( दामोदर कवि को ) लाख
मुद्राएँ दीं ।
ततो द्वारपाल आगत्य प्राह--'देव, काचित्सूत्रधारी स्त्री द्वारि
वर्तते ।' राजा--'प्रवेशय ।' ततः सागत्य राजानं प्रणिपत्याह-
'वलिः पातालनिलयोऽधः कृतश्चित्रमत्र किम् ।
अधः कृतो दिविस्थोऽपि चित्रं कल्पद्रुमस्त्वया' ॥ २२१ ॥
राजा तस्यै प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ ।
तदनंतर द्वारपाल आकर बोला--'महाराज, कोई सूतवाली स्त्री द्वार
पर विद्यमान है । राजा ने प्रविष्ट कराने की आज्ञा दी । तब वह आकर
राजा को प्रणाम करके बोली-
महाराज, आपने ( दान वर के दानी ) पाताल वासी बलि को नीचे
कर दिया, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं ( वह तो स्वयं नीचे बसे लोक
पाताल का निवासी है ही ); आश्चर्य की बात यह है कि अपने तो ऊपर के
लोक स्वर्ग में स्थित कल्पवृक्ष को भी नीचा कर दिया ।
राजा ने उसे प्रत्येक अक्षर पर लक्ष मुद्राएँ दीं ।
ततः कदाचिन्मृगयापरिश्रान्तो राजा क्वचित्सहकारतरोरधस्ता-
त्तिष्ठति स्म । तत्र मल्लिनाथाख्यः कविरागत्य प्राह--
'शाखाशतशतवितताः सन्ति कियन्तो न कानने तरवः ।
परिमलभरमिलदलिकुलदलितदलाः शाखिनो विरलाः' ॥२२२॥

ततो राजा तस्मै हस्तवलयं ददौ।
फिर कभी आखेट करने से थका राजा कहीं चाम्र वृक्ष के नीचे बैठा
था। वहाँ मल्लिनाथ नामक कवि आकर बोला—
जंगल में शत-शत शाखाओं में फैले न जाने कितने वृक्ष हैं, परन्तु सुगंध
भार से आकृष्ट भ्रमरों के समूह द्वारा जिसके पत्ते छलनी कर दिये गये हैं,
ऐसे वृक्ष विरल हैं।
राजा ने उसे हाथ का कंगन दे दिया।
तत्रैवासीने राज्ञि कोऽपि विद्वानागत्य 'स्वस्ति' इत्युक्त्वा प्राह—
'राजन्, काशीदेशमारभ्य तीर्थयात्रया परिभ्राम्यते दक्षिणदेशवासिना
मया।' राजा—'भवदृशानां तीर्थवासिनां दर्शनात्कृतार्थोऽस्मि।' स
आह--'वयं मान्त्रिकाश्च।' राजा--'विप्रेषु सर्वे सम्भाव्यते।' राजा
पुनः प्राह-'विप्र, मन्त्रविद्यया यथा परलोके फलप्राप्तिः तथा किमि-
हलोकेऽप्यस्ति।'
राजा वहीं बैठे थे कि कोई विद्वान् आ गया और 'स्वस्ति' कह कर बोला-
'राजन् मैं दक्षिण देश का निवासी हूँ, काशी देश से तीर्थयात्रा आरम्भ
करके परिभ्रमण कर रहा हूँ।' राजा ने कहा-'आप जैसे तीर्थ-वासियों
के दर्शन से कृतार्थ हूँ।' वह बोला--'हम मंत्रविद्या-ज्ञानी भी हैं।' राजा--
'ब्राह्मणों में सबकी संभावना है।' और फिर राजा ने कहा- 'विप्र, मंत्रविद्या
से जैसे परलोक में फल मिलता है, वैसे क्या इस लोक में भी मिलता है?'
विप्रः--'राजन्, सरस्वतीचरणाराधनाद्विद्यावाप्तिर्विश्वविदिता। परं
धनावाप्तिर्भाग्याधीना।
गुणाः खलु गुणा एव न गुणा भूतिहेतवः ।
धनसञ्चयकर्तॄणि भाग्यानि पृथगेव हि ॥ २२३ ॥
देव, विद्यागुणा एव लोकानां प्रतिष्ठायै भवन्ति । न तु केवलं
सम्पदः। देव,
आत्मायत्ते गुणग्रामे नैर्गुण्यं वचनीयता ।
दैवायत्तेषु वित्तेषु पुंसां का नाम वाच्यता ॥ २२४ ॥

११२ भोजप्रबन्धः
देव, मन्त्राराधनेनाप्रतिहता शक्तिः स्यात्। देव, एवं कुतूहलं यस्य।
मया यस्य शिरसि करो निधीयते; स सरस्वतीप्रसादेनास्खलितविद्याप्र-
सारः स्यात्।' राजा प्राह--'सुमते, महती देवताशक्तिः।'
विप्र बोला---'राजन्, सरस्वती के चरणों की आराधना से विद्या की
प्राप्ति होती है, यह संसार-प्रसिद्ध है, परन्तु धन की प्राप्ति भाग्य के अधीन है।
गुण गुण ही होते हैं, गुण संपत्ति के कारण नहीं होते, जो धन-संचय
कराते हैं, वे भाग्य भिन्न ही होते हैं।
महाराज, विद्या गुण ही लोगों की प्रतिष्ठा के निमित्त होते हैं, केवल
संपदा नहीं। महाराज, गुण समूह ( मनुष्य के ) अपने अधीन होता है, तो
निर्गुण रह जाना निंदा योग्य है, परन्तु धन तो दैवाधीन है, उसमें पुरुषों
का क्या दोष ?
महाराज, मंत्राराधन से अशेष शक्ति प्राप्त होती है। देव, उसका यह
चमत्कार है कि मैं जिसके सिर पर हाथ रख दूँ, सरस्वती के प्रसाद से उसके
विद्या का प्रसार निर्बाध हो जायेगा।' राजा ने कहा--'हे बुद्धिशाली, दैवत
की शक्ति बड़ी होती है।'
ततो राजा कामपि दासीमाकार्य विप्रं प्राह-'द्विजवर, अस्या
वेश्यायाः शिरसि करं निधेहि।' विप्रस्तस्याः शिरसि करं निधाय तं
प्राह--'देवि, यद्राज्ञाज्ञापयति तद्वद। ततो दासी प्राह 'देव, अहमद्य
समस्तवाङ्मयजातं हस्तामलकवत्पश्यामि। देव, आदिश किं वर्णयामि।
तत्पश्चात् किसी दासी को बुलाकर ब्राह्मण से कहा--'ब्राह्मण-श्रेष्ठ, इस
वेश्या के सिर पर हाथ धरो।' ब्राह्मण ने उसके सिर पर हाथ धर कर
कहा--'देवि, राजा जिसकी आज्ञा दें, उसका वर्णन करो।' तो दासी
बोली--'महाराज, आज मैं संपूर्ण वाङ्मय को हथेली पर रखे आंवले
तुल्य देख रही हूँ। आज्ञा दें महाराज, किसका वर्णन करूँ?'
ततो राजा पुरः खड्गं वीक्ष्य प्राह--'खड्गं मे व्यावर्णय' इति
दासी प्राह--
'धाराधरस्त्वदसिरेष नरेन्द्र चित्रं
वर्षन्ति वैरिवनिताजनलोचनानि

भोजप्रबन्धः ११३
कोशेन सन्ततमसङ्गतिराहवेऽस्य
दारिद्र्यमभ्युदयति प्रतिपार्थिवानाम्' ॥ २२५॥
राजा तस्यै रत्नकलशाननर्घ्यान्पञ्च ददौ।
तो राजा ने संमुख रखी तलवार को देखकर कहा—मेरे कृपाण का
वर्णन कर।' दासी ने कहा---
'हे नरराज, आपका यह कृपाण एक विचित्र बादल है जो कि शत्रु-स्त्रियों
के नेत्रों से जल वरसाता है ( यह घिर कर स्वयं नहीं वरसता ) और युद्ध में
इसकी कोश से असंगति ( मियान से बाहर रहना ) निरन्तर शत्रु राजाओं
की दरिद्रता की उन्नति करती है।
राजा ने उसे पाँच अमोल रत्नकलश दिये।
ततस्तस्मिन्द्वारे कुतश्चित्पञ्च कवयः समाजग्मुः। तानवलोक्येषद्विच्छाय-
मुखं राजानं दृष्ट्वा महेश्वरकविर्वृक्षमिषेणाह—
'किं जातोऽसि चतुष्पथे घनतरच्छायोऽसि किं छायया
छन्नश्चेत्फलितोऽसि किं फलभरैः पूर्णोऽसि किं संनतः।
हे सद्वृक्ष सहस्व सम्प्रति चिरं शाखाशिखाकर्षण-
क्षोभामोठनभञ्जनानि जनतः स्वैरेव दुश्चेष्टितैः' ॥ २२६ ॥
ततो राजा तस्मै लक्षं ददौ।
तब उसी समय कहीं से पाँच कवि आ गये। उन्हे देख कर राजा का
मुख कुछ उदास हो गया, ऐसे राजा को देख वृक्ष के ब्याज से महेश्वर कवि
ने कहा--
तुम उत्पन्न हुए तो चौराहे पर क्यों ? घनी छाया वाले हुए तो छाया से
ढककर फले क्यो ? और फलों से परिपूर्ण हुए तो झुके क्यों ? हे भले वृक्ष,
अब अपनी ही इन दुश्चेष्टाओं के कारण लोगों से डाली, फुनगियों का
खींचा जाना और क्षोभ में भर कर उनका तोंड़ा-मरोड़ा जाना चिरकाल
तक सहो।
तो राजाने उसे लाख मुद्राएँ दीं।
ततस्ते द्विजवराः पृथक्पृथगाशीर्वचनमुदीर्य यथाक्रमं राजाज्ञया
कम्बले उपविश्य मङ्गलं चक्रुः। तत एकः पठति—
८ भोज०

११४ भोजप्रबन्धः
'कूर्मः पाताल गङ्गापयसि विहरतां तत्तटीरूढमुस्ता-
मादत्तामादिपोत्री शिथिलयतु फणामण्डलं कुण्डलीन्द्रः।
दिङ्मातङ्गा मृणालीकवलनां कुर्वतांपर्वतेन्द्राः
सर्वे स्वैरं चरन्तु त्वयि वहति विभो भोज देवीं धरित्रीम्' ॥२२७॥
राजा चमत्कृतस्तस्मै शताश्वान्ददौ । ततो भाण्डारिको लिखति-
'क्रीडोद्याने नरेन्द्रेण शतमश्वा मनोजवाः।
प्रदत्ताः कामदेवाय सहकारतरोरधः' ॥ २२८ ॥
तदनंतर वे ब्राह्मण अलग-अलग आशीर्वाद कहकर क्रमानुसार राजा
की आज्ञासे कंबल पर बैठ कर मंगल पाठ करने लगे । तब एक ने पढ़ाः-
हे प्रभु भोजराज, धरती का बोझ आप के उठा लेने पर ( अब ) कच्छप
पाताल गंगा में विहार करे, उसके किनारे पर उगे मोथे को आदि वाराह
ग्रहण करे, शेषनाग फणमंडल को शिथिल कर ले, दिङ्नाग (दिशाओं को
धारण करने वाले हाथी) कमल, नालों की जुगाली करें और सब पर्वत
स्वच्छंदतापूर्वक विचरण करें। (भोज के पृथ्वी वहन करलेने से सब मुक्त हैं।)
चमत्कृत हो राजा ने उसे सौ घोड़े दिये । तो भंडारी ने लिखा-
राजा ने क्रीडा-वाटिका में आम्रवृक्षके नीचे मन के समान वेगवाले
सौ घोड़े कामदेव को दिये।
───:०:───
( १७ ) भोजस्य दर्पभङ्ग :
ततः कदाचिद्भोजो विचारयति स्म - 'मत्सदृशो वदान्यः कोऽपि
नास्ति' इति। तद्गर्वं विदित्वा मुख्यामात्यो विक्रमार्कस्य पुण्यपत्रं भोजाय
प्रदर्शयामास । भोजस्तत्र पत्रे किञ्चित्प्रस्तावमपश्यत् । तथाहि—विक्र-
मार्कः पिपासया प्राह—
स्वच्छं सज्जनचित्तवल्लघुतरं दीनार्तिवच्छीतलं
पुत्रालिङ्गनवत्तथैव मधुरं तद्बाल्यसञ्जल्पवत् ।
एलोशीर लवङ्ग चन्दनलसत्कर्पूरकस्तूरिका
जातीपाटलिकेतकैः सुरभितं पानीयमानीयताम्' ॥ २२६ ॥

भोजप्रबन्धः १२७
तत्पश्चात् एक बार भोज के मन में आया कि मेरे समान अभिलषित
प्रदान करने वाला कोई नहीं है। उसके घमंड को समझ कर मुख्य मन्त्री ने
विक्रमादित्य का पुण्यपत्र भोज को दिखाया। भोजने उस पत्र में एक प्रस्ताव
देखा। उसमें था- प्यास लगने के कारण विक्रमादित्य ने कहा-
सज्जनों के चित्त के समान स्वच्छ, दीनों के कष्ट के समान हल्का, पुत्र के
आलिंगन के समान शीतल, और बच्चे की अटपटी बोली के तुल्य मीठा,
इलायची, खस, लौंग, चन्दन से युक्त कपूर, कस्तूरी, चमेली, गुलाब, के-
तकी से सुवासित पेय लाओ।
ततो मागधः प्राह--
'वक्त्राम्भोजं सरस्वत्यधिवसति सदा शोण एवाधरस्ते
बाहुः काकुत्स्थवीर्यस्मृतिकरणपटुर्द्दक्षिणस्ते समुद्रः।
वाहिन्यः पार्श्वमेताः कथमपि भवतो नैव मुञ्चन्त्यभीक्ष्णं
स्वच्छे चित्ते कुतोऽभूत्कथय नरपते तेऽम्बुपानाभिलाषः' ॥२३०॥
तो मागध ने कहा-
आपके मुख कमल में सरस्वती वाग् देवी के रूप में नदी सरस्वती
निवास करती है, आपका शोण अर्थात् लाल अधर शोण नद ही है, आपका
दक्षिण बाहु ककुत्स्थ वंशी श्री राम के पराक्रम का स्मरण कराने में दक्ष
(राम के बाहु समान बलिष्ठ) दक्षिण समुद्र है और ये वाहिनी-सेनाएँ
आपके नैकट्य को वाहिनी नदियों के तुल्य कभी छोड़ती ही नहीं है और
आपका चित्त स्वच्छ है, तो हे नरराज आपको जल-पान की इच्छा कहाँ
से हो गयी?
ततो विक्रमार्कः प्राह। तथाहि-
'अष्टौ हाटककोटयस्त्रिनवतिर्मुक्ताफलानां तुलाः
पञ्चाशन्मधुगन्धमत्तमधुपाः क्रोधोद्धताः सिन्धुराः।
अश्वानामयुतं प्रपञ्चचतुरं वाराङ्गनानां शतं
दत्तं पाण्ड्यनृपेण यौतकमिदं वैतालिकायार्प्यताम्' ॥२३१॥
ततो भोजः प्रथमत एतादृद्भुतं विक्रमार्कचरित्रं दृष्ट्वा निजगर्वं तत्याज।
तब विक्रमादित्य ने कहा-

११६ भोजप्रबन्धः
आठ स्वर्ण कोटियाँ, तिरानवे तौल मोती, मधु की गंध से मतवाले
भ्रमरों के (ऊपर घिर कर भनभनाते) कारण क्रोध से उद्धत पचास हाथी,
दस सहस्र घोड़ों, छल-प्रपंच करने में चतुर सौ वारांगनाएँ और पाण्ड्यदेश
राजा ने जो यौतुक दिया है, वह सब इस मागध वैतालिक को दे दो।
तो भोज ने पहिले से ही आश्चर्यमय विक्रमादित्य के चरित्र को देख कर
अपना अभिमान छोड़ दिया।
—:०:—
(१८) विपुलदानस्य कतिपयकथाः
ततः कदाचिद्धारानगरे रात्रौ विचरन् राजा कंचन देवालये शीतालुं
ब्राह्मणमित्थं पठन्तमवलोक्य स्थितः—
'शीतेनाध्युषितस्य माघजलवच्चिन्तार्णवे मज्जतः
शान्ताग्नेः स्फुटिताधरस्य धमतः क्षुत्क्षामकुक्षेर्मम ।
निद्रा क्वाप्यवमानितेव दयिता सन्त्यज्य दूरं गता
सत्पात्रप्रतिपादितेव कमला नो हीयते शर्वरी' ॥ २३२ ॥
इति श्रुत्वा राजा प्रातस्तमाहूय पप्रच्छ—'विप्र, पूर्वेद्यू रात्रौ त्वया
दारुणः शीतभारः कथं सोढः ।'
एक बार धारानगर में रात्रि में विचरण करता राजा किसी देवमंदिर
में शीत से व्याकुल ब्राह्मण को इस प्रकार पढ़ते देख रुक गया—
शीत से आक्रान्त माघमास के जल के समान चिंता के समुद्र में डूबते
बुझ चली आग को शीत से फटे ओठों से फूँकते, भूख से सूखे पेटवाले मुझ
अपमानित प्रिया की भाँति छोड़ कर नींद चली गयी है; और जैसे सुयोग्य
व्यक्ति की संचित लक्ष्मी का क्षय नहीं होता, वैसे ही रात का क्षय नहीं
हो रहा है।
यह सुनकर सबेरे राजा ने उसे बुलाकर पूछा—'ब्राह्मण, गत रात्रि में
तुमने कठोर शीत के भार को कैसे सहा ?'
विप्र आह—
'रात्रौ जानुर्दिवा भानुः कृशानुः सन्ध्ययोर्द्वयोः ।
एवं शीतं मया नीतं जानुभानुकृशानुभिः' ॥ २३३ ॥

भोजप्रबन्धः ११७
राजा तस्मै सुवर्णकलशत्रयं प्रादात् ।
रात में घुटने ( घुटनों के बीच सिर रखकर ), दिन में सूर्य ( धूप )
और द्विसंध्याओं ( प्रातः सायम् ) में आग ( तापकर )— इस प्रकार
जानुभानु-कृशानु ( घुटना, सूरज और आग ) के द्वारा मैंने शीत व्यतीत
किया ।
राजाने उसे तीन स्वर्णकलश दिये ।
ततः कवि राजानं स्तौति—
'धारयित्वा त्वयात्मानं महात्यागधनायुषा ।
मोचिता बलिकर्णाद्याः स्वयशोगुप्तकर्मणः' ॥ २३४ ॥
राजा तस्मै लक्षं ददौ ।
तब कवि ने राजा की स्तुति की—
जिस का धन और आयु महान् त्याग से पूर्ण है, ऐसे आपने स्वयम् को
धारण करके जिनके कीर्तिकार्य गुप्त हो चले थे उन बलि और कर्ण आदि
को छुटकारा दिला दिया । ( बलि और कर्णादि के कार्यों पर अविश्वास
हो चला था, भोज ने स्वदान कृत्यों से उन्हें पुनर्जीवित किया । )
राजा ने उसे लक्ष मुद्राएँ दीं ।
एकदा क्रीडोद्यानपाल आगत्यैकमिक्षुदण्डं राज्ञः पुरो मुमोच । तं
राजा करे गृहीतवान् । ततो मयूरकविर्नितान्तं परिचयवशादात्मनि राज्ञा
कृतामवज्ञां मनसि निधायेक्षुमिषेणाह—
'कान्तोऽसि नित्यमधुरोऽसि रसाकुलोऽसि
किं चासि पञ्चशरकार्मुकमद्वितीयम् ।
इक्षो तवास्ति सकलं परमेकमूनं
यत्सेवितो भजसि नीरसतां क्रमेण' ॥ २३५ ॥
राजा कविहृदयं ज्ञात्वा मयूरं सम्मानितवान् ।
एक बार क्रीडावाटिका के माली ने आकर एक गन्ना राजा के संमुख
उपस्थित किया । राजा ने उसे हाथ में ले लिया । तो मयूर कवि ने अति
परिचय के कारण राजा के द्वारा होती अपनी अवज्ञा को मन में रख कर
गन्ने के व्याज से कहा—

११६ भोजप्रबन्धः
तुम कमनीय हो, अत्यंत मधुर हो, रस तुझसे टपका जा रहा है, और
क्या कहें कि तुम पंचशर काम के अद्वितीय धनुष हो; हे गन्ने, तुम में सब
कुछ है, पर एक कमी है कि सेवित होने पर (चूसे जाने पर) धीरे-धीरे
नीरसता को प्राप्त हो जाते हो।
राजा ने कवि के हृदय को समझ कर कविमयूर को सम्मानित किया।
ततः कदाचिद्रात्रौ सौधोपरि क्रीडापरो राजा शशाङ्कमालोक्य प्राह-
'यदेतच्चन्द्रान्तर्जलदलवलीलां वितनुते
तदाचष्टे लोकः शशक इति नो मां प्रति तथा।'
ततश्चाधो भूमौ सौधान्तः प्रविष्टः कश्चिच्चोर आह-
'अहं त्विन्दुं मन्ये त्वदरिविरहाक्रान्ततरुणी-
कटाक्षोल्कापातव्रणकणकलङ्काङ्किततनुम्' ॥२३६॥
कभी रात में महल के ऊपर क्रीडारत राजा ने (चन्द्रमा के) शशचिह्न
को देखकर कहा-
'यह जो चन्द्रमा के मध्य मेघखंड जैसी कुछ प्रतीति है, लोक उसे शशक
कहता है किंतु मुझे ऐसा नहीं लगता।
तो नीचे के तलमें महल के भीतर घुसा कोई चोर बोला-
मैं तो समझता हूँ आपके वैरियों की विरह पीडिता तरुणियों के
कटाक्षों के कारण जो उल्कापात होता है, उसी से हुए घाव के कलंक
का यह चिह्न चन्द्रमा के शरीर में है।
राजा तच्छ्रुत्वा प्राह--'अहो महाभाग, कस्त्वमर्धरात्रे कोशगृहमध्ये
तिष्ठसि' इति। स आह-'देव, अभयं नो देहि' इति। राजा--'तथा'
इति। ततो राजानं स चोरः प्रणम्य स्ववृत्तान्तमकथयत्। तुष्टो राजा
चोराय दश कोटीः सुवर्णस्योन्मत्तान्गजेन्द्रांश्च ददौ।
यह सुनकर राजा बोला- हे महाभाग, कोषागर के मध्य आधीरात में
घुसे तुम कौन हो?' वह बोला-महाराज, मुझे अभय दीजिए।' राजा ने
कहा--ठीक है।' तब राजा को प्रणाम करके चोर ने अपनी वार्ता कह डाली।
संतुष्ट राजा ने चोर को सोने की दस कोटियाँ और मदमाते गजराज दिये।
ततः कोषाधिकारी धर्मपत्रे लिखति-

भोजप्रबन्धः ११६
तदस्मै चोराय प्रतिनिहतमृत्युप्रतिभिये
प्रभुः प्रीतः प्रादादुपरितनपादद्वयकृते।
सुवर्णानां कोटीर्दश दशनकोटिक्षतगिरी-
न्गजेन्द्रानप्यष्टौ मदमुदितकूजन्मधुलिहः ॥ २३७ ॥
तो कोषाधिकारीने धर्मपत्र में लिखा--
उपर्युक्त दो चरणों की रचना पर प्रसन्न हो स्वामी ने मृत्यु के आतंक से
निर्भय कर चोर को सोने की दस कोटियाँ और दाँतों की नोकों से पर्वतों
को तोड़ देने वाले और जिनके टपकते मदपर मोद से भरे मधुके चटोरे भौंरे
भनभनाते रहते थे ऐसे आठ गजराज दिये ।
ततः कदाचिद्द्वारपाल आगत्य प्राह- 'देव- कौपीनावशेषो विद्वा-
न्द्वारि वर्तते' इति । राजा--'प्रवेशय' इति । ततः प्रविष्टः स कविर्भोज-
मालोक्याद्य मे दारिद्र्यनाशो भविष्यतीति मत्वा तुष्टो हर्षाश्रूणि मुमोच ।
कभी द्वारपाल आकर बोला-- 'एक कौपीनमात्र धारण किये विद्वान्
द्वार पर उपस्थित है । 'राजाने कहा--'प्रविष्ट कराओ ।' तब प्रविष्ट हो वह
कवि भोजराज को देख यह मानकर कि आज मेरी दरिद्रता का नाश होगा,
प्रसन्नता के आँसू गिराने लगा ।
राजा तमालोक्य प्राह-'कवे, किं रोदिषि' इति । ततः कविराह-
'राजन्, आकर्णय मद्गृहस्थितिम् ।
अये लाजाउच्चैः पथि वचनमाकर्ण्य गृहिणी
शिशोः कर्णौ यत्नात्सुपिहितवती दीनवदना ।
मयि क्षीणोपाये यदकृत दृशावश्रुबहुले
तदन्तः शल्यं मे त्वमसि पुनरुद्धर्तुमुचितः ॥ २३८ ॥
राजा 'शिव शिव कृष्ण कृष्ण इत्युदीर्य्यन्प्रत्यक्षरंलक्षं दत्त्वा प्राह-
'सुकवे त्वरितं गच्छ गेहम् । त्वद्गृहिणी खिन्नाभूत्' इति ।
राजा ने उसे देखकर कहा-'हे कवि, रोते क्यों हो ?' तो कवि
बोला--'महाराज, मेरे घर की दशा सुनें--
'खीलें लो खीलें' मार्ग में उच्च स्वर में कहे जाते इन वचनों को सुन कर
दीनमुखी हो मेरी घरनी ने बच्चे के कानों को प्रयत्नपूर्वक भली भांति

१२२ भोजप्रबन्धः
पुनरपि पठति कविः-
केचिन्मूलाकुलाशाः कतिचिदपि पुनः स्कन्धसम्बन्धभाज-
श्छायां केचित्प्रपन्नाः प्रपदमपि परे पल्लवानुञ्जयन्ति।
अन्ये पुष्पाणि पाणौ दधति तदपरे गन्धमात्रस्य पात्रं
वाग्वल्ल्याः किन्तु मूढाः फलमहह नहि द्रष्टुमप्युत्सहन्ते ॥२४३॥
कवि ने फिर पढ़ा-
कुछ लोग वृक्ष की जड़ के लिए व्याकुल रहते हैं, कुछ तने को लेना
चाहते हैं; कुछ छाया का ही ग्रहण करते हैं, कुछ पत्तों को तोड़ लेते हैं;
कुछ अन्य फूलों को हाथों में धारण कर लेते हैं और कुछ गंधमात्र के पात्र
बनते हैं; किंतु, हाय, ये मूर्ख वाणी रूपी वल्लरी के फलों को देखने के लिए
भी उत्साहित नहीं होते ।
एतदाकर्ण्य बाणः प्राह-
परिच्छन्नस्वादोऽमृतगुडमधुक्षौद्रपयसां
कदाचिच्चाभ्यासाद्व्रजति ननु वैरस्यमधिकम्।
प्रियाविम्बोष्ठे वा रुचिरकविवाक्येऽप्यनवधि-
र्नवानन्दः कोऽपि स्फुरति तु रसोऽसौ निरुपमः ॥२४४॥
ततो राजा लक्षं दत्तवान् ।
यह सुनकर बाण ने कहा-
अमृत, गुड़, मधु, छुहारे और दूध का स्वाद एक तो स्पष्ट नहीं है दूसरे
वार-वार प्रयोग से कभी-कभी पर्याप्त विरस भी हो जाता है; किंतु प्रिया के
विम्बोष्ठ और रमणीय कवि वचन में एक असीम नवीन आनंद है, उससे तो
एक निरुपमेय रस का स्फुरण होता है ।
तो राजा ने लाख मुद्राएँ दीं ।
---:०:---
(११) कालिदासभवभूत्योः स्पर्धा
ततः कदाचित्सिंहासनमलङ्कुर्वाणे श्रीभोजे द्वारपाल आगत्य प्राह-
'देव, वाराणसीदेशादागतः कोऽपि भवभूतिर्नाम कविर्द्वारि तिष्ठति'

इति। राजा प्राह—'प्रवेशय' इति। ततः प्रविष्टः सोऽपि सभामगात्।
ततः सभ्याः सर्वे तदागमनेन तुष्टा अभवन्। राजा च भवभूतिं प्रेक्ष्य
प्रणमति स्म। स च 'स्वस्ति' इत्युक्त्वा तदाज्ञयोपविष्टः।
एक बार श्रीभोज के सिंहासन को सुशोभित करने पर द्वारपाल ने
आकर कहा—'देव, वाराणसी देश से आया एक भवभूति नामक कवि द्वार
पर उपस्थित है।' राजा ने कहा—'प्रविष्ट कराओ।' सो प्रविष्ट होने पर वह
भी सभा में पहुँचा। तब सभी सभासद् उसके आने से संतुष्ट हुए। राजा ने
भवभूति को देख कर प्रणाम किया। वह 'स्वस्ति' कहकर उसकी आज्ञा से
बैठ गया।
भवभूतिः प्राह—'देव,
नानीयन्ते मधुनि मधुपाः पारिजातप्रसूनै-
र्नाभ्यर्थ्यन्ते तुहिनरुचिनश्चन्द्रिकायां चकोराः।
अस्मद्वाङ्माधुरीमधुरसापद्यपूर्वावताराः
सोल्लासाः स्युः स्वयमिह बुधाः किं मुधाभ्यर्थनाभिः॥२४५॥
भवभूति ने कहा—महाराज,
भौंरे मधु पर पारिजात (कल्प वृक्ष) के फूलों द्वारा नहीं लाये जाते;
शीतल कांति चंद्रमाकी चाँदनी के निमित्त चकोरों की अभ्यर्थना नहीं की
जाती (ये स्वयं ही आकृष्ट होते हैं।) इसी प्रकार मेरी वाणी की माधुरी के
मिठास को प्राप्त कर पहिले से यहाँ पधारे विद्वज्जन स्वयं ही उल्लसित हो
जायेंगे—व्यर्थ अभ्यर्थना करने से क्या लाभ ?
नास्माकं शिविका न कापि कटकाचालङ्क्रियासत्क्रिया
नोत्तुङ्कस्तुरगो न कश्चिदनुगो नैवाम्बरं सुन्दरम्।
किन्तु क्ष्मातलवर्त्यशेषविदुषां साहित्यविद्याजुषां
चेतस्तोषकरी शिरोनतिकरी विद्या नवद्यास्ति नः॥२४६॥
हमारे पास न तो पालकी है, न सत्कार के लिए सुसज्जित मुलायम
बिछौना; न ऊँचा घोड़ा है, न कोई अनुचर और न सुन्दरवस्त्र; किंतु धरती
पर विद्यमान समस्त साहित्यविद्या के ज्ञाता विद्वानों के चित्त को सन्तुष्ट
करने वाली और उनके शिर को विनत करने वाली श्रेष्ठ विद्या है।

१२६ भोजप्रबन्धः
चंद्रमंडल (मुख) खिन्न हो गया; माला से ग्रथित अंधकार बिखर गया
(पुष्पमाल से युक्त केशराशि बिखर गयी); पहिले खिलते केतक-पुष्प की
कोर की लीला करने वाली सुंदर मुसकान शांत हो गयी, कुंडलों का नृत्य
समाप्त हो गया, कुवलयों का जोड़ा (दोनों नेत्र) मुंद गया और प्रवालों
(ओष्ठों) से सी-सी करना बंद हो गया--तत्पश्चात् न जाने क्या हुआ ?
राजा कालिदासं प्राह--'सुकवे, भवभूतिना सह साम्यं तव न
वक्तव्यम्।' भवभूतिराह--'देव, किमिति वारयसि।' राजा--'सर्व-
प्रकारेण कविरसि।' ततो बाणः प्राह--'राजन्, भवभूतिः कविश्चेत्
कालिदासः किं वक्तव्यः राजा--'बाणकवे, कालिदासः कविर्न। किन्तु
पार्वत्याः कश्चिदवनौ पुरुषावतार एव।' ततो भवभूतिराह--'देव, किमत्र
प्राशस्त्यं भाति।' राजा प्राह--'भवभूते, किमु वक्तव्यं प्राशस्त्यं कालि-
दासश्लोके। यतः 'केतकशिखालीलायितं सुस्मितम्' इति पठितम्।'
ततो भवभूतिराह--'देव, पक्षपातेन वदसि' इति। ततः कालिदासः
प्राह--'देव अपख्यातिर्मा भूत्। भुवनेश्वरीदेवालयं गत्वा तत्सन्निधौ
तां पुरस्कृत्य घटे संशोधनीय त्वया।'
राजा ने कालिदास से कहा--'हे सुकवि, भवभूति के साथ तुम्हारी
समता अवचनीय है।' भवभूति ने कहा--'महाराज, क्यों निवारण करते
हैं?' राजा--'तुम सब प्रकार से कवि हो।' तो बाण ने कहा--'राजन्,
यदि भवभूति कवि है, तो कालिदास को क्या कहा जाय ?' राजा--'कवि
बाण, कालिदास कवि नहीं है, अपितु धरती पर पार्वती का एक पुरुषावतार
ही है।' तो भवभूति ने कहा--'महाराज, इसमें प्रशंसनीय क्या प्रतीत होता
है?' राजा ने कहा--'भवभूति, कालिदास के श्लोक की प्रशंसनीयता के
विषय में कहना क्या? क्या कहा है--'केतक-पुष्प की कोर की लीला करने
वाली सुंदर मुसकान' ! तो भवभूति ने कहा--'महाराज, पक्षपात पूर्ण कहते
हैं?' तो कालिदास ने कहा--'महाराज, अपकीर्ति न हो। भुवनेश्वरी
देवी के मंदिर में जाकर उसके निकट कविता को रखकर आप घट द्वारा
परीक्षण करें।'
ततो भोजः सर्वकविवृन्दपरिवृतः सन्भुवनेश्वरीदेवालयं प्राप्य तत्र
तत्सन्निधौ भवभूतिहस्ते घटं दत्त्वा श्लोकद्वयं च तुल्यपत्रद्वये लिखित्वा

भोजप्रबन्धः १२७
तुलायां सुमोच । ततो भवभूतिभागे लघुत्वोद्भूतामीषदुन्नतिं ज्ञात्वा देवी
भक्तपराधीना सदसि तत्परिभवो मा भूदिति स्वावतंसकह्लारमकरन्दं
वामकरनखाग्रेण गृहीत्वा भवभूतिपत्रे चिक्षेप ।
तो फिर समस्त कवि मंडली के साथ भोज भुवनेश्वरी देवी के मंदिर
पहुँचे और उनके सान्निध्य में भवभूति के हाथ में घट देकर और दोनों श्लोक
दो समान पत्रों पर लिखकर तराजू में रख दिये । तब फिर भवभूति वाले
भाग को हलकेपन के कारण कुछ ऊँचा उठा देख भक्त के अधीन देवी ने यह
विचार कर कि मेरे भक्त भवभूति की सभा में अप्रतिष्ठा न हो, अपने कर्ण
फूल के कमल की मकरंद बायें हाथ के नख की कोर से लेकर भवभूति के
(श्लोक वाले) पत्र में डाल दीं ।
ततः कालिदासः प्राह-
'अहो मे सौभाग्यं मम च भवभूतेश्च भणितं
घटायामारोप्य प्रतिफलति तस्यां लघिमनि ।
गिरां देवी सद्यः श्रुतिकलितकह्लारकलिका-
मधूलीमाधुर्यं क्षिपति परिपूर्त्यै भगवती' ॥ २४३ ॥
तो कालिदास ने कहा--
अहा, मेरा सौभाग्य है कि मेरी और भवभूति की काव्योक्ति को तुला में
रखने पर भवभूति की उक्ति में जब हलकापन आने लगा तो उसकी पूर्ति के
लिए भगवती वाग्देवी ने तुरंत कान में पहिनी कमल कली के मकरंद के
माधुर्य को रख दिया ।
ततः कालिदासपाद्योः पतति भवभूतिः । राजानं च विशेषज्ञं मनुते
स्म । ततो राजा भवभूतिकवये शतं मत्तगजान्ददौ ।
तब भवभूति कालिदास के पैरों पड़ गये और राजा को विशेषज्ञ मान
लिया । तो राजा ने भवभूति कवि को सौ मतवाले हाथी दिये ।
---:०:---
(२०) दानस्य कतिपयकथाः
अन्यदा राजा धारानगरे रात्रावेकाकी विचरन्काञ्चन स्वैरिणीं
सङ्केतं गच्छन्तीं दृष्ट्वा पप्रच्छ—'देवि, का त्वम्। एकाकिनी मध्यरात्रौ
क्व गच्छसि' इति ।

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भोजप्रबन्धः

एक बार धारा नगर में एकाकी विचरण करते राजा ने एक स्वेच्छा
विहारिणी को संकेत-स्थल (पूर्व निश्चित मिलन स्थान) की ओर जाती
देख पूछा—'हे देवी, तुम कौन हो? आधी रात में अकेली कहाँ जा
रही हो?'
ततश्चतुरा स्वैरिणी सा तं रात्रौ विचरन्तं श्रीभोजं निश्चित्य प्राह—
'त्वत्तोऽपि विषमो राजन्विषमेषुः क्ष्मापते ।
शासनं यस्य रुद्राद्या दासखन्मूर्ध्नि कुर्वते ॥ २५४ ॥
ततस्तुष्टो राजा दोर्दण्डादादायाङ्गदं वलयं च तस्यै दत्तवान्। सा च
यथास्थानं प्राप ।
तो वह चतुर इच्छाचारिणी यह निश्चय करके कि यह रात में विचरण
करता राजा भोज है, उससे बोली—
हे धरती के स्वामी राजा, विषमबाण (पंचबाण कामदेव) आपसे भी
अधिक उग्र है, जिसके शासन को रुद्रादि देव दास के समान शिरोधार्य
करते हैं।
संतुष्ट हो राजा ने भुजदंड से बाजूबंद और कंगन उसे दिये। और वह
भी अपने निश्चित स्थान को चली गयी।
ततो वर्त्मनि गच्छन्क्वचिद्गृह एकाकिनीं रुदतीं नारीं दृष्ट्वा 'किम-
र्थमर्धरात्रौ रोदिति। किं दुःखमेतस्याः।' इति विचारयितुमेकमङ्गरक्ष-
कंप्राहेिणोत्।
तदनंतर मार्ग में जाते हुए किसी घर में एक अकेली स्त्री को रोती
देख—'यह आधी रात को क्यों रो रही है? इसको क्या दुःख है?—यह
विचारने के लिए एक अंगरक्षक को भेजा।
ततोऽङ्गरक्षकः पुनरागत्य प्राह—'देव, मया पृष्टा यदाह तच्छृणु—
वृद्धोमत्पतिरेष मञ्चकगतः स्थूणावशेषं गृहं
कालोऽयं जलदागमः कुशलिनो वत्सस्य वार्तापि नो ।
यत्नात्सञ्चिततैल बिन्दु घटिका भग्नेति, पर्याकुला
दृष्ट्वा गर्भभरालसां निजवधूं श्वश्रूश्चिरं रोदिति ॥ २५५ ॥
ततः कृपावारिधिः क्षोणीपालस्तस्यै लक्षं ददौ।