भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभोजप्रबन्धः ११३
कोशेन सन्ततमसङ्गतिराहवेऽस्य
दारिद्र्यमभ्युदयति प्रतिपार्थिवानाम्' ॥ २२५॥
राजा तस्यै रत्नकलशाननर्घ्यान्पञ्च ददौ।
तो राजा ने संमुख रखी तलवार को देखकर कहा—मेरे कृपाण का
वर्णन कर।' दासी ने कहा---
'हे नरराज, आपका यह कृपाण एक विचित्र बादल है जो कि शत्रु-स्त्रियों
के नेत्रों से जल वरसाता है ( यह घिर कर स्वयं नहीं वरसता ) और युद्ध में
इसकी कोश से असंगति ( मियान से बाहर रहना ) निरन्तर शत्रु राजाओं
की दरिद्रता की उन्नति करती है।
राजा ने उसे पाँच अमोल रत्नकलश दिये।
ततस्तस्मिन्द्वारे कुतश्चित्पञ्च कवयः समाजग्मुः। तानवलोक्येषद्विच्छाय-
मुखं राजानं दृष्ट्वा महेश्वरकविर्वृक्षमिषेणाह—
'किं जातोऽसि चतुष्पथे घनतरच्छायोऽसि किं छायया
छन्नश्चेत्फलितोऽसि किं फलभरैः पूर्णोऽसि किं संनतः।
हे सद्वृक्ष सहस्व सम्प्रति चिरं शाखाशिखाकर्षण-
क्षोभामोठनभञ्जनानि जनतः स्वैरेव दुश्चेष्टितैः' ॥ २२६ ॥
ततो राजा तस्मै लक्षं ददौ।
तब उसी समय कहीं से पाँच कवि आ गये। उन्हे देख कर राजा का
मुख कुछ उदास हो गया, ऐसे राजा को देख वृक्ष के ब्याज से महेश्वर कवि
ने कहा--
तुम उत्पन्न हुए तो चौराहे पर क्यों ? घनी छाया वाले हुए तो छाया से
ढककर फले क्यो ? और फलों से परिपूर्ण हुए तो झुके क्यों ? हे भले वृक्ष,
अब अपनी ही इन दुश्चेष्टाओं के कारण लोगों से डाली, फुनगियों का
खींचा जाना और क्षोभ में भर कर उनका तोंड़ा-मरोड़ा जाना चिरकाल
तक सहो।
तो राजाने उसे लाख मुद्राएँ दीं।
ततस्ते द्विजवराः पृथक्पृथगाशीर्वचनमुदीर्य यथाक्रमं राजाज्ञया
कम्बले उपविश्य मङ्गलं चक्रुः। तत एकः पठति—
८ भोज०