भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 118, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ेंततो राजा तस्मै हस्तवलयं ददौ।
फिर कभी आखेट करने से थका राजा कहीं चाम्र वृक्ष के नीचे बैठा
था। वहाँ मल्लिनाथ नामक कवि आकर बोला—
जंगल में शत-शत शाखाओं में फैले न जाने कितने वृक्ष हैं, परन्तु सुगंध
भार से आकृष्ट भ्रमरों के समूह द्वारा जिसके पत्ते छलनी कर दिये गये हैं,
ऐसे वृक्ष विरल हैं।
राजा ने उसे हाथ का कंगन दे दिया।
तत्रैवासीने राज्ञि कोऽपि विद्वानागत्य 'स्वस्ति' इत्युक्त्वा प्राह—
'राजन्, काशीदेशमारभ्य तीर्थयात्रया परिभ्राम्यते दक्षिणदेशवासिना
मया।' राजा—'भवदृशानां तीर्थवासिनां दर्शनात्कृतार्थोऽस्मि।' स
आह--'वयं मान्त्रिकाश्च।' राजा--'विप्रेषु सर्वे सम्भाव्यते।' राजा
पुनः प्राह-'विप्र, मन्त्रविद्यया यथा परलोके फलप्राप्तिः तथा किमि-
हलोकेऽप्यस्ति।'
राजा वहीं बैठे थे कि कोई विद्वान् आ गया और 'स्वस्ति' कह कर बोला-
'राजन् मैं दक्षिण देश का निवासी हूँ, काशी देश से तीर्थयात्रा आरम्भ
करके परिभ्रमण कर रहा हूँ।' राजा ने कहा-'आप जैसे तीर्थ-वासियों
के दर्शन से कृतार्थ हूँ।' वह बोला--'हम मंत्रविद्या-ज्ञानी भी हैं।' राजा--
'ब्राह्मणों में सबकी संभावना है।' और फिर राजा ने कहा- 'विप्र, मंत्रविद्या
से जैसे परलोक में फल मिलता है, वैसे क्या इस लोक में भी मिलता है?'
विप्रः--'राजन्, सरस्वतीचरणाराधनाद्विद्यावाप्तिर्विश्वविदिता। परं
धनावाप्तिर्भाग्याधीना।
गुणाः खलु गुणा एव न गुणा भूतिहेतवः ।
धनसञ्चयकर्तॄणि भाग्यानि पृथगेव हि ॥ २२३ ॥
देव, विद्यागुणा एव लोकानां प्रतिष्ठायै भवन्ति । न तु केवलं
सम्पदः। देव,
आत्मायत्ते गुणग्रामे नैर्गुण्यं वचनीयता ।
दैवायत्तेषु वित्तेषु पुंसां का नाम वाच्यता ॥ २२४ ॥