भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११२ भोजप्रबन्धः
देव, मन्त्राराधनेनाप्रतिहता शक्तिः स्यात्। देव, एवं कुतूहलं यस्य।
मया यस्य शिरसि करो निधीयते; स सरस्वतीप्रसादेनास्खलितविद्याप्र-
सारः स्यात्।' राजा प्राह--'सुमते, महती देवताशक्तिः।'
विप्र बोला---'राजन्, सरस्वती के चरणों की आराधना से विद्या की
प्राप्ति होती है, यह संसार-प्रसिद्ध है, परन्तु धन की प्राप्ति भाग्य के अधीन है।
गुण गुण ही होते हैं, गुण संपत्ति के कारण नहीं होते, जो धन-संचय
कराते हैं, वे भाग्य भिन्न ही होते हैं।
महाराज, विद्या गुण ही लोगों की प्रतिष्ठा के निमित्त होते हैं, केवल
संपदा नहीं। महाराज, गुण समूह ( मनुष्य के ) अपने अधीन होता है, तो
निर्गुण रह जाना निंदा योग्य है, परन्तु धन तो दैवाधीन है, उसमें पुरुषों
का क्या दोष ?
महाराज, मंत्राराधन से अशेष शक्ति प्राप्त होती है। देव, उसका यह
चमत्कार है कि मैं जिसके सिर पर हाथ रख दूँ, सरस्वती के प्रसाद से उसके
विद्या का प्रसार निर्बाध हो जायेगा।' राजा ने कहा--'हे बुद्धिशाली, दैवत
की शक्ति बड़ी होती है।'
ततो राजा कामपि दासीमाकार्य विप्रं प्राह-'द्विजवर, अस्या
वेश्यायाः शिरसि करं निधेहि।' विप्रस्तस्याः शिरसि करं निधाय तं
प्राह--'देवि, यद्राज्ञाज्ञापयति तद्वद। ततो दासी प्राह 'देव, अहमद्य
समस्तवाङ्मयजातं हस्तामलकवत्पश्यामि। देव, आदिश किं वर्णयामि।
तत्पश्चात् किसी दासी को बुलाकर ब्राह्मण से कहा--'ब्राह्मण-श्रेष्ठ, इस
वेश्या के सिर पर हाथ धरो।' ब्राह्मण ने उसके सिर पर हाथ धर कर
कहा--'देवि, राजा जिसकी आज्ञा दें, उसका वर्णन करो।' तो दासी
बोली--'महाराज, आज मैं संपूर्ण वाङ्मय को हथेली पर रखे आंवले
तुल्य देख रही हूँ। आज्ञा दें महाराज, किसका वर्णन करूँ?'
ततो राजा पुरः खड्गं वीक्ष्य प्राह--'खड्गं मे व्यावर्णय' इति
दासी प्राह--
'धाराधरस्त्वदसिरेष नरेन्द्र चित्रं
वर्षन्ति वैरिवनिताजनलोचनानि