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सर्वकोश
भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 181, कुल 380 में से

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पृष्ठ 181

१५४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
३६. ह्रीमान्
जो पुरुष कभी-कभी शील-संकोच व्यक्त करता है, उसे ह्रीमान्
कहते हैं।
जैसा 'ललितमाधव' में वर्णन है, अपनी कनिष्ठ अंगुली पर
गोवर्धन धारण करते समय श्रीकृष्ण में लज्जाभाव प्रकट हुआ था। सारी
गोपियाँ श्रीकृष्ण के इस अद्भुत कृत्य को निहार रही थीं और वे भी
गोपियों को देखकर मुस्करा रहे थे। जब उनकी दृष्टि गोपियों के वक्षः-
स्थल पर गई तो हाथ के कंपन से गोवर्धन तनिक-सा हिल गया जिससे
उसके नीचे खड़े सब गोपवृन्द कुछ भयभीत से हो गए। गोपों के इस भय
को देखकर बलराम जी हँस पड़े। परन्तु श्रीकृष्ण समझे कि बलराम ने
गोपियों के वक्षःस्थल को देखने में उनके मनोभाव को जान लिया है,
इसलिए लज्जित होकर उन्होंने तुरन्त सिर झुका लिया।
३७ शरणागत-पालक
श्रीकृष्ण सब शरणागत जीवों के रक्षक हैं।
श्रीकृष्ण का एक शत्रु तो इस विचार से ही मुग्ध हो उठा कि यदि
वह केवल श्रीकृष्ण के शरणागत हो जाय तो वे सब प्रकार से उसकी रक्षा
करेंगे। श्रीकृष्ण उस चन्द्रमा के समान हैं जो चाण्डाल और अस्पृश्यों के
घरों पर भी अपनी शीतल चन्द्रिका का वितरण करने में संकोच नहीं
करता।
३८. सुखी
निरन्तर प्रसन्न रहते हुए दुःख की गन्ध तक से सदा दूर रहने वाला
सुखी कहलाता है।
जहाँ तक श्रीकृष्ण द्वारा सुख के भोग का सम्बन्ध है, शास्त्रों में
उल्लेख है कि श्रीकृष्ण एवं उनकी महिषियों के श्रीअंग जिन अलंकारों से
से विभूषित रहते थे, स्वर्ग के कोषाध्यक्ष कुबेर के लिए उनका मनोरथ
करना भी असम्भव है। श्रीकृष्ण के राजद्वार पर निरन्तर जो नृत्य चलता
था, स्वर्ग के देवता उसकी स्वप्न में भी कल्पना नहीं कर सकते। स्वर्ग में
इन्द्र सदा अप्सराओं के नृत्य को देखने में डूबे रहते हैं। परन्तु श्रीकृष्ण के
द्वार पर अभिनीत नृत्य का सौन्दर्य इन्द्र के अनुमान से परे का था। गौरी से
भी अधिक सुन्दर और चन्द्रकलाओं से पूर्ण सुन्दरियों का निरन्तर श्रीकृष्ण
के पास अन्तःपुर में निवास था। अतः श्रीकृष्ण से बढ़कर भोगी और कौन