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सर्वकोश
भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 191, कुल 380 में से

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पृष्ठ 191

१६४] भक्तिरसामृतसिन्धु
आज्ञा दी, "उस जीव के कर्म की ओर ध्यान न देकर उसे तुरन्त मुझे लौटा
दो।" इस घटना का तात्पर्य यह है कि प्रकृति के नियमानुसार यम द्वारा
दण्डनीय प्राणी भी कृष्णकृपा से पूर्णतः छूट सकता है।
श्रीकृष्ण की अचिन्त्य शक्तियों का वर्णन शुकदेव गोस्वामी ने
श्रीमद्भागवत में इस प्रकार किया है, "जो अजन्मा होने पर भी नन्द
महाराज के पुत्र हैं, सर्वव्यापक होने पर भी यशोदा के अंक में खेलते हैं विभु
होते हुए यशोदा की प्रेम-रज्जु से बँध गए हैं, अनेकरूप होने पर भी जो
नन्द-यशोदा के आगे एकरूप में विचर रहे हैं, वे अनन्त अचिन्त्य शक्ति-
शाली श्रीकृष्ण मेरी बुद्धि को मुग्ध कर रहे हैं।" ब्रह्मसंहिता में भी उल्लेख
है कि यद्यपि अपने गोलोक वृन्दावन धाम में श्रीकृष्ण का नित्य-निवास है,
तथापि वे सर्वव्यापक हैं, यहाँ तक कि परमाणुओं में भी हैं।
५७. कोटिब्रह्माण्डविग्रह
श्रीमद्भागवत (१०.१४.११) में ब्रह्माजी कहते हैं, "महत्तत्त्व, अहं-
कार, मन, बुद्धि, आकाश, वायु, जल, अग्नि, पृथ्वी-इन प्राकृत तत्त्वों से यह
बृहत् अण्ड बना है। केवल एक ब्रह्माण्ड का रचयिता इस प्रकार का तुच्छ
शरीर वाला कहाँ और कहाँ मैं आप, जिनके रोमकूपों से प्रकाश में
परमाणुओं के समान असंख्य ब्रह्माण्ड प्रकट-अप्रकट होते रहते हैं। आपके
महत्त्व के सामने मैं तो बिल्कुल नगण्य हूँ, अतः क्षमा करके मुझ पर कृपा
कीजिए।"
यदि कोई केवल एक ब्रह्माण्ड की भी जाँच करे तो उसमें असंख्य
लोक, निवास और देवलोक जैसी अद्भुत वस्तुयें पायगा। ब्रह्माण्ड का
पूर्ण विस्तार ५० करोड़ योजन है और वह अनेक अप्रमेय पाताल लोकों से
भी युक्त है। श्रीकृष्ण इस सब के उद्गम अवश्य हैं; परन्तु अपनी अचिन्त्य
शक्ति का विस्तार करते हुए वे सदा वृन्दावन में ही रहते हैं। ऐसे सर्व-
शक्तिमान् प्रभु की स्तुति में कौन समर्थ हो सकता है ?
५८. अवतारावलीबीज
गीतगोविन्द में जयदेव गोस्वामी ने गाया है, "भगवान् ने मत्स्यरूप
से वेदों का उद्धार किया है; कूर्मावतार में सम्पूर्ण जगत् का वहन किया
है; वराह अवतार में पृथ्वी को जल से निकाला है; नृसिंहरूप में हिरण्यक-
शिपु का वध किया है, वामन अवतार में बलि से छल किया है; परशुराम
के रूप में सम्पूर्ण क्षत्रिय-वंश का नाश किया है; राम अवतार में सब असुरों