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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची

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6-6 ३५०२

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॥ श्रीः ॥

भिषग्वर श्री गोविन्ददाससेनकृता-

भैषज्य रत्नावली।

भाषाटीकासहिता ।

अनेक ग्रंथोंके टीकाकार व रचयिता स्वर्गीय
वैद्य शंकरलालजी द्वारा परिवर्धित, संशोधित
और हिन्दी भाषानुवाद विभूषित

खेमराज श्रीकृष्णदास,
अध्यक्ष-'श्रीवेङ्कटेश्वर' स्टीम्-प्रेस, बम्बई.

★

संवत् २००९, सन् १९५२.

मुद्रक और प्रकाशक-
खेमराज श्रीकृष्णदास,
अध्यक्ष-“श्रीवेङ्कटेश्वर” स्टीम्-प्रेस, बम्बई.
पुनर्मुद्रणादि सर्वाधिकार “श्रीवेङ्कटेश्वर” मुद्रणयन्त्रालयाध्यक्षके अधीन है।

भूमिका ।

भैषज्यरत्नावली आयुर्वेदीय चिकित्सा ग्रन्थोंमें एक उत्कृष्ट और प्रामाणिक चिकित्सा ग्रन्थ समझा जाता है । वैद्य समाजमें आज कल इसका बड़ा आदर है । कारण इसके रचयिता श्रीगोविन्ददाससेनने इसमें अनेक अनुभूत योगोंका संग्रह बड़ी सुन्दर और सरल रीतिसे किया है । इसमें क्वाथ, चूर्ण, अवलेह, आसव, अरिष्ट आदि वनस्पति प्रयोग और रसधातु आदिके द्वारा सिद्ध किये रसायन प्रयोग, इस प्रकार दोनों प्रकारके योगोंका समावेश होनेके कारण इसके द्वारा सभी श्रेणीके वैद्य उत्तमरीतिसे लाभ उठा सकते हैं । इसका प्रत्येक प्रयोग अत्यन्त गुणकारक और आशुफलप्रद होनेसे यह ग्रन्थ वैद्योंको अल्प समयमें ही अत्यन्त आदरणीय हो गया है। अब तक इसके कलकत्ता, लखनऊ, लाहौर आदिमें कई संस्करण हो चुके हैं । पर हमने इसको और भी अधिक उपयोगी बनानेके लिये इसमें दूसरे कई प्राचीन और नवीन ग्रन्थोंके अनेक उत्तम योगोंका संग्रह कर इसको अधिक परिवर्द्धित कर दिया है किन्तु इसमें अन्य ग्रन्थोंके प्रयोगोंके संकलनसे पूज्यपाद वैद्य श्रीगोविन्ददाससेनजीकी धवल कीर्तिमें किसी प्रकारकी बाधा नहीं होगी। बल्कि इससे उनकी उज्ज्वल कीर्ति और भी प्रसारित होगी, ऐसी आशा है । महामान्य कविराज श्रीगोविन्ददाससेनने इसग्रन्थकी अबसे कोई डेढ़ सौ वर्ष पहले रचना की थी । सेन उपाधिसे जान पड़ता है कि वे बंगदेश निवासी थे । पर किस स्थानमें उनका जन्म हुआ था, इसका कुछ ठीक पता नहीं लग सका । पहले इस ग्रन्थका बङ्गालमें अधिक प्रचार हुआ। फिर धीरे धीरे सारे भारतवर्षमें इसका समादर होने लगा । केवल हिन्दी भाषा जाननेवाले वैद्योंके लिये हमने इसके प्रत्येक श्लोकका सरल हिन्दी अनुवाद किया है। हमें इस ग्रन्थके अनुवाद तथा सम्पादन और परिवर्द्धन करनेमें चरक, अष्टांगहृदय, भावप्रकाश, वङ्गसेन, शार्ङ्गधर, चक्रदत्त, योगरत्नाकर आदि कितने ही ग्रन्थोंके सिवाय कविराज श्रीहरलाल गुप्त कविभूषराकी भैषज्यरत्नावलीसे अधिक सहायता मिली है, इसलिये हम उनके प्रति अत्यन्त कृतज्ञता प्रगट करते हैं । तथा कविराज विनोदलालसेनके ग्रन्थद्वारा भी हमें उस कार्यमें थोड़ी बहुत सहायता लेनी पड़ी है, इसलिये हम उनके भी कृतज्ञ हैं, हमने यथा शक्ति इस ग्रन्थको भली प्रकार देख भाल कर पाठकोंके सम्मुख उपस्थित किया है, यदि कोई त्रुटि दृष्टिदोष आदिसे रह गई हो तो कृपया उसको पाठकगण सुधार तथा सूचित कर अनुगृहीत करें। आगामी संस्करणमें वे सब ठीक कर दी जायँगी ।

$$\left. \text{१६-४-३६} \quad \right} \quad \begin{array}{l} \text{भवदीय—} \ \textbf{वैद्य-शङ्करलाल हरिशङ्कर-} \ \qquad \text{आयुर्वेदोद्धारक-कार्यालय, मुरादाबाद.} \end{array}$$

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॥ श्रीः ॥

भैषज्यरत्नावली-विषयानुक्रमणिका।


विषय.पृष्ठ.विषय.पृष्ठ.
मंगलाचरणम्१किरातादि, पिप्पल्यादि, बृहद्गुडूच्यादि२८
आयुर्वेदके लक्षण, आयुर्वेदकी निरुक्ति२गुडूच्यादि, द्राक्षादि”
आयुर्वेदकी उत्पत्ति”रास्नादि, गुडूच्यादि, दशमूलादि२९
चिकित्साप्रकरणम्।पित्तज्वरकी चिकित्सा”
मानकी परिभाषा१०तिक्तादि”
ज्वरकी चिकित्सा१३कट्फलादि, पर्पटादि३०
षडङ्गपानीय१७द्राक्षादि, पटोलादि”
षडङ्गादि साधन१८ह्रीबेरादि, कलिङ्गादि, विश्वादि३१
माँड आदिके लक्षण१९गुडूच्यादि, किरातादि”
अन्नादि साधन, ज्वरमें पथ्य”महाद्राक्षादि, यवपटोल३२
ज्वरकी तीन अवस्था, जीर्णज्वर के लक्षण२१नागरादि, अमृतादि”
ज्वररोगीको कषाय पिलानेका नियम”विदारिकादि, धान्यशर्करा३३
आमज्वरके लक्षण”श्रीपर्ण्यादि, पर्पटादि”
कषायादि ओषधियोंके सेवन का निषेध२२गुडूच्यादि, भूनिम्बादि, धान्याकक्वाथ३४
अभुक्त अवस्थामें औषध सेवन के गुण”मृद्वीकादि, दुरालभादि”
जीर्णाजीर्ण-औषधिके लक्षण२३त्रायमाणादि३५
मात्राका निरूपण”कफज्वरकी चिकित्सा”
सामान्य ज्वरकी चिकित्सा२४मधुपिप्पली, चतुर्भद्रावलेह”
धान्य-पटोलक्वाथ, वृश्चीरादि-क्षीरपान२४सिन्धुवारक्वाथ”
गुडूच्यादि”सप्तच्छदादि, वासादि, निम्बादि३६
आरग्वधादि, पथ्यादि२५मरिचादि, त्रिफलादि”
बृहत्पर्पटकादि”मुस्तादि, कटुत्रिकादि३७
नागरादि, मुस्तादि”पिप्पल्यादिगण, सारिवादि”
नागरादि, किराततिक्तकादि२६आमलक्यादि, हरिद्रादि, अभयादि३८
वातज्वरकी चिकित्सा”व्याघ्यादि, पटोलादि”
बिल्वादि, भूनिम्बादि, विश्वादि”भूनिम्बादि३९
पञ्चमूल्यादि, कणादि२७वात-पित्तज्वरकी चिकित्सा”
शालपर्णी आदि, शतपुष्पादि”नवाङ्ग क्वाथ, निदिग्धिकादि”

( २ ) भैषज्यरत्नावली-

विषय.पृष्ठ.विषय.पृष्ठ.
गुडूच्यादि, बृहद्गुडूच्यादि३९पित्ताधिक्यसन्निपातज्वरकी चि०५७
घनचन्दनादि, त्रिफलादि४०परूषका'दि, चन्दनादिक्वाथ,,
पञ्चभद्र, मधुकादि,,किरातादि सप्तक,,
मुस्तादि, किरातादि४१श्लेष्मोल्बणसन्निपातज्वरकी चि० ।
पित्तकफज्वरकी चिकित्सा,,बृहत्यादिक्वाथ५७
कण्टकार्यादि, भार्ङ्ग्यादि,,वातपित्ताधिक्यसन्निपात-ज्वरकी चिकित्सा५८
अमृतादि, पटोलादि४२पञ्चमूलीक्वाथ,,
अमृताष्टक, चातुर्भद्रक,,वातकफाधिक्यसन्निपातज्वरकी ०”,,
वासास्वरस, नागरादि, गुडूच्यादि४३चातुर्भद्रकक्वाथ,,
भार्ङ्ग्यादि, पटोलादि,,पित्तकफोल्बणसन्निपातज्वरकी० ”,,
भद्रमुस्तादि, द्राक्षादि, बृहद्गुडूच्यादि४४पर्पटादिक्वाथ,,
पञ्चतिक्तकषाय, पटोलादि,,त्रिदोषोल्बणसन्निपातज्वरकी० ”,,
वातश्लेष्मज्वरंकी चिकित्सा४५यागराजक्वाथ,,
रूक्षस्वेदाद्युपचार,,शीताङ्ग सन्निपातज्वरकी चिकित्सा ।५९
पञ्चकोल, निम्बादि४६भास्वन्मूलादि,,
क्षुद्रादि, दशमूलीकषाय,,प्रलापकसन्निपातज्वरकी चिकित्सा ।
दार्वादि, आरग्वधादि४७तगरादि,,
त्रिफलादिकषाय, मुस्तादि,,रक्तष्ठीवनसन्निपातज्वरकी चिकित्सा६०
बृहत्पिप्पल्यादि क्वाथ,,रोहिषादि, पद्माकादि,,
किरातादिक्वाथ४८जिह्वकसन्निपातज्वरकी चिकित्सा ।
सन्निपातज्वरकी चिकित्सा,,शुण्ठ्यादि,,
लङ्घनाद्युपचार,,रुग्दाहसन्निपातज्वरकी चिकित्सा ।
अंजन, स्वेद४९उशीरादि,,
नस्य५०चित्तविभ्रमसन्निपातज्वरकी चि०६१
निष्ठीवन, अष्टाङ्गावलेह५१मृद्वीकादि,,
अञ्जन, दशमूल५२कर्णकसन्निपातज्वरकी चिकित्सा ।
द्वादशाङ्ग, चतुर्दशाङ्ग, अष्टादशाङ्ग५३भार्ङ्ग्यादि,,
भूनिम्बादि, अष्टादशाङ्ग,,
मुस्तादिगण, द्वाविंशाङ्ग५४
बृहत्यादिगण शट्यादिगण५५
बृहत्कण्टफलादि,,
वाताधिक्यसन्निपातज्वरकी चि०५६
बृहत्पञ्चमूलक्वाथ, कट्फलादि,,