भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
दशमूलीकषायैस्तु सर्पिः सैन्धवसंयुक्तम् ।
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२१३
कृतमालपल्लवरसे खरमञ्जरीकल्कसिद्धं नवनीतम् ।
नस्येन जयति नित्यं सूर्यावर्त्तं सुदुर्वारम् ॥ ८ ॥
अमलतासके पत्तोंके रसमें चिरचिटेके बीजोंका कल्क और नैनी घी डालकर विधिपूर्वक पकावे । फिर इसकी प्रतिदिन नस्य लेनेसे दारुण सूर्यावर्त्तरोग शीघ्र नष्ट होता है ॥ ८ ॥
दशमूलीकषायैस्तु सर्पिः सैन्धवसंयुक्तम् ।
नस्यमर्द्धावभेदघ्नं सूर्यावर्त्तशिरोऽर्त्तिजित् ॥ ९ ॥
दशमूलके काढ़ेमें सेंधानमक, घृत डालकर एकत्र पकालेवे । पश्चात् उस घृतको नस्यद्वारा प्रयोग करे तो अर्द्धावभेदक सूर्यावर्त्तशिरोरोग दूर होताहै ॥ ९ ॥
शिरीषमूलबीजैरवपीडं च योजयेत् ।
अवपीड़ो हितो वा स्याद्वचापिप्पलिभिः कृतः ॥ १० ॥
सिरसकी छाल और मूलीके बीज ये प्रत्येक छः छः माशे लेकर एकत्र पीस लेवे फिर उनमेंसे रस निचोड लेवे । उस रसकी नास लेनेसे अथवा वच, पीपलके चूर्णको एकत्र मिलाकर नास लेनेसे सूर्यावर्त्तरोग नष्ट होता है ॥ १० ॥
जाङ्ग्लानि च मांसानि कारयेदुपनाहनम् ।
तेनास्य शाम्यति व्याधिः सूर्यावर्त्तः सुदारुणः ॥ ११ ॥
जङ्गलीजीवोंके मांस और वातनाशक औषधियोंको एकत्र पकाकर उसमें सेंधा-नमक और तिलका तेल डालकर मन्दोष्ण लेप करे । इससे दारुण सूर्यावर्त्त (आधाशीशी) रोग शमन होता है ॥ ११ ॥
भृङ्गराजरसच्छागक्षीरांशोऽर्कप्रतापितः ।
सूर्यावर्त्तं निहन्त्याशु नस्येनैव प्रयोगराट् ॥ १२ ॥
भाँगरेका रस और बकरीका दूध इनको समान भाग लेकर एकत्र करके धूपमें गरम कर नास लेनेसे सूर्यावर्त्तरोग तत्काल नाश होता है ॥ १२ ॥
अर्द्धावभेदककी चिकित्सा ।
एष एव विधिः कृत्स्नः कार्यश्चार्द्धावभेदके ॥ १३ ॥
यह ही उक्त सब विधि अर्द्धावभेदक शिरोरोगमें करनी चाहिये ॥ १३ ॥
पिबेत्सशर्करं क्षीरं नीरं वा नारिकेलजम् ।
सुशीतं वापि पानीयं सर्पिर्वा नस्यतस्तयोः ॥ १४ ॥
१२१४ भैषज्यरत्नावली । [ शिरोरोग-
अर्द्धावभेदक और सूर्यावर्त्तरोगमें चीनी मिलाहुआ दूध अथवा नारियलका जल पान करे अथवा शीतल पानीयद्रव्योंमें घृत मिलाकर नास लेवे तो उक्त दोनों प्रकारका शिरोरोग नष्ट होता है ॥ १४ ॥
तिलात्कल्कं सनलदं सक्षौद्रलवणान्वितम् ।
तेनास्य लेपयेच्छीर्षमर्द्धभेदो व्यपोहति ॥१५॥
कालेतिल और बालछड दोनोंको समान भाग लेकर एकत्र पीसकर शहद, सेंधा-नमकके साथ मिश्रित करके लेपकरनेसे अर्द्धावभेदक शिरोरोग दूर होताहै ॥
सविडङ्गं तिलं कृष्णं समं कृत्वा प्रपेषयेत् ।
नस्यकर्मणि दातव्यमर्द्धभेदं विनाशयेत् ॥१६॥
वायविडङ्ग और काले तिल इनको सम भाग लेकर बारीक पिसकर इनकी नस्य लेवे तो इससे अर्द्धावभेदक रोग नाश होता है ॥ १६ ॥
दग्धचुल्लीम्मृत्तिकायाश्चूर्णं मरिचचूर्णकम् ।
समांशं मिलितं कुर्यान्नस्यमर्धावभेदके । १७ ॥
चूल्हेकी जलीहुई मिट्टी और कालीमिरच दोनों समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे। उक्त चूर्णकी नास लेनेसे आधाशीशी ) शिरोरोग शान्त होता है ॥१७॥
अनन्तवातकी चिकित्सा ।
अनन्तवाते कर्त्तव्यः सूर्यावर्त्तहितो विधिः ॥
शिरावेधश्च कर्त्तव्योऽनन्तवातप्रशान्तये ॥
आहारश्च विधातव्यो वातपित्तविनाशनः ॥ १८ ॥
अनन्तवातरोगको शान्त करनेके लिये सूर्यावर्त्तरोगनाशक औषधियोंसे चिकित्सा करनी एवं रोगीको वात-पित्तनाशक भोजन करना और शिरावेध कर रुधिर निकालना चाहिये ॥ १८ ॥
शङ्खककी चिकित्सा ।
सूर्यावर्त्ते हितं यच्च शंखके स्वेदवर्जितम् ।
क्षीरसर्पिः प्रशंसन्ति नस्यं पानं च शंखके ॥ १९ ॥
शङ्खरोगमें स्वेदक्रियाको छोडकर सूर्यावर्त्तमें कहीहुई विधिके अनुसार समस्त-चिकित्सा और क्षीरसर्पि ( मक्खन ) का पान करना तथा नासलेना ॥ १९ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२१५
शतावरीं कृष्णतिलान्मधुकं नीलमुत्पलम् ।
दूर्वां पुनर्नवां चापि लेपं साध्ववतारयेत् ॥
शीततोयावसेकांश्च क्षीरसेकांश्च शीतलान् ॥ २० ॥
शतावर, काले तिल, मुलहठी, नीलकमल, दूब और पुनर्नवा इन सबको समान भाग लेकर जलमें पीसकर शिरपर लेप करे और शीतल जल तथा शीतल दूधसे शिरपर सेचन क्रिया करे तो शंखरोग दूर होता है ॥ २० ॥
कल्कैश्च क्षीरवृक्षाणां शंखकस्य प्रलेपनम् ।
शंखकरोगमें वड, पीपल, गूलर, पाखर और बेंत आदि क्षीरीवृक्षोंकी छालके कल्कद्वारा लेप करना चाहिये ॥
क्रौञ्चकादम्बहंसानां शरायोः कच्छपस्य च ।
रसैः सुविहितस्याथ तस्य शंखकसन्धिजाः ॥
ऊर्ध्वास्तिस्रः शिराः प्राज्ञो भिन्द्यादेव न ताडयेत् २१
बगला, हंस, कलहंस, शराल ( पक्षीविशेष ) और कछुआ इनके मांसरसका पान कराकर रोगीको पुष्ट करके शंखसन्धिका उपरकी तीन शिराओंको वेधना चाहिये किन्तु उसको तोडना नहीं चाहिये ॥ २१ ॥
गिरिकर्णीफलरसं मूलं च नस्यमाचरेत् ।
मूलं वा बन्धयेत्कर्णे शीघ्रं हन्ति शिरोव्यथाम् ॥ २२ ॥
अपराजिताके फलोंके रस अथवा उसकी मूलके रसद्वारा नास लेवे किम्वा उक्त औषधिकी जडको कानमें बांध देवेतो शिरका दर्द शीघ्र नष्ट होता है ॥ २२ ॥
नागरकल्कविमिश्रं क्षीरं नस्येन योजितं पुंसाम् ।
नानादोषोद्भूतां शिरोरुजां हन्ति तीव्रतराम् ॥ २३ ॥
सोंठको दूधमें पीसकर नस्य लेनेसे अनेक दोषोंसे उत्पन्नहुई दारुण शिरकी पीडा तत्काल शमन होती है ॥ २३ ॥
शिरोबस्ति ।
आशिरो व्यायतं चर्म कृत्वाऽष्टाङ्गुलमूच्छितम् ।
तेनावेष्ट्य शिरोऽधस्तान्माषकल्केन लेपयेत् ॥ २४ ॥
निश्चलस्योपविष्टस्य तैलैः कोष्णैः प्रपूरयेत् ।
धारयेदारुजः शान्तेर्यामं यामार्द्धमेव वा ॥ २५ ॥
| १२१६ | भैषज्यरत्नावली । | [ शिरोरोग- |
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शिरोवस्तिर्जयत्येष शिरोरोगं मरुद्भवम् ।
हनुमन्याक्षिकर्णार्त्तिमर्दितं मूर्द्धकम्पनम् ॥ २६ ॥
जितने चमडेसे मस्तक पूरा पूरा ढकजाय इतना लम्बा और आठ अँगुल चौडा चमडा लेकर उससे रोगीके मस्तकको बाँधकर उसके नीचे उडदोंके कल्कका लेप करदेवे । पश्चात् रोगीको निश्चल बैठाकर सुहाता सुहाता तिलका तेल उस चमडेमें भरदेवे । जबतक शिरकी पीडा शान्त न हो तबतक अथवा एक प्रहरतक किम्वा चार घडीतक तेलको धारण करे । यह शिरोबस्ति वातज शिरोरोग, हनुग्रह, मन्यास्तम्भ, नेत्र और कर्णरोग अर्दित और मस्तकका काँपना आदि रोगोंको शमन करती है ॥ २४–२६ ॥
अर्द्धनाडीनाटेश्वर ।
वराटं टङ्कणं शुद्धं पञ्चभागसमन्वितम् ।
नवभागं मरीचस्य विषभागत्रयं मतम् ॥ २७ ॥
स्तन्येन वटिकां कृत्वा नस्यं दद्याद्विचक्षणः ।
शिरोविकारान्विविधान् हन्ति श्लेष्मोत्तरानपि ॥ २८ ॥
कौडीकी भस्म २॥ भाग, सुहागेकी खील २॥ भाग, कालीमिरच ९ भाग और विष ३ भाग लेवे । इन सबको एकत्र स्त्रीके दूधके द्वारा खरल करके गोलियाँ बनालेवे । फिर इस गोलीको दूधमें घिसकर नास लेवे तो यह शिरके नानाप्रकारके कफप्रभृति दोषजनित विकारोंको नष्ट करती है ॥ २७ ॥ २८ ॥
चन्द्रकान्तरस ।
मृतसूताभ्रकं तीक्ष्णं ताम्रं गन्धं समं समम् ।
स्नुहीक्षीरैर्द्दिनं मर्द्यं भक्षयेन्माषमात्रकम् ॥ २९ ॥
मधुना मर्दितं सेव्यं लौहपात्रे दिने दिने ।
सूर्यावर्त्तादिकान्हन्ति शिरोरोगान्न संशयः ॥ ३० ॥
रससिन्दूर, अभ्रक, लोहा, ताँबा इनकी भस्म और शुद्ध गन्धक इन सबको समान भाग लेकर थूहरके दूधमें एक दिनतक खरल करके उडदकी बराबर गोली बनालेवे । उस गोलीको प्रतिदिन लोहेके वर्त्तनमें शहदके साथ मिलाकर भक्षण करे तो यह सूर्यावर्त्तादि समस्त शिरके रोगोंको निसन्देह नष्टकर देता है ॥ २९ ॥ ३० ॥
शिरःशूलाद्रिवज्ररस ।
पलं रसं पलं गन्धं पलं लौहं पलं रविः ।
गुग्गुलोः पलचत्वारि तदर्द्धं त्रिफलारजः ॥ ३१ ॥