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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

दशमांसपलत्रिंशज्झिण्टिकापञ्चविंशतिः ।

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६६६

महाकुक्कुटमांसतैल ।

माषस्यार्द्धाढकं देयं दशमूल्यास्तुलार्द्धकम् ।
बलामूलं च तस्यार्द्धं केतकीनां तथैव च ॥ २२ ॥
दशमांसपलत्रिंशज्झिण्टिकापञ्चविंशतिः ।
जलद्रोणद्वये पक्त्वा पादशेषेऽवतारिते ॥ २३ ॥
तिलतैलस्य च प्रस्थं पयो दत्त्वा चतुर्गुणम् ।
जीवनीयानि यान्यष्टौ मञ्जिष्ठाचव्यकट्फलम् ॥ २४ ॥
व्योषं रास्ना कणामूलं मधुकं पुष्करं तथा ।
माषात्मगुप्ता सैरण्डा शताह्वा लवणत्रयम् ॥ २५ ॥
कृष्णाऽश्वगन्धा ह्यमृता यमानीन्द्रवरी शठी ।
नागरं मागधी मुस्तं वर्षाभू रजनीद्वयम् ॥
शतावरी बृहत्यौ च एतैरक्षसमन्वितैः ॥ २६ ॥

उरद ४ सेर, दशमूल ५० पल, खिरेंटीकी जड २५ पल, केतकीकी जड २५ पल, मुर्गेका मांस ३० पल और पियाबांसेकी जड २५ पल इन सबको दो द्रोण जलमें पकाकर चौथाई भाग जल शेष रहनेपर उतारकर छानलेवे । फिर उस क्वाथमें तिलका तैल एक प्रस्थ, गौका दूध ४ प्रस्थ एवं जीवनीयगणकी आठों ओषधियाँ, मँजीठ, चव्य, कायफल, त्रिकुटा, रायसन, पीपलामूल, मुलहठी, पोहकरमूल, उरद, कौंचके बीज, अण्डकी जड, सोया, बिडनमक, सेंधानमक, कालानमक, काली असगन्ध, गिलोय, अजवायन, इन्द्रजौ, कचूर, सोंठ, पीपल, नागरमोथा, पुनर्नवा, हल्दी, दारुहल्दी, शतवर, बडी कटेरी और कटेरी इन प्रत्येकके दो दो तोले कल्कको मिलाकर उत्तम प्रकारसे तैलको सिद्ध करै ॥ ३२२-३२६ ॥

पक्षाघातेषु सर्वेषु अर्दिते च हनुग्रहे ॥ २७ ॥
मन्दश्रुतौ चाश्रवणे तिमिरे च त्रिदोषजे ।
हस्तकम्पे शिरःकम्पे गात्रकम्पे शिरोग्रहे ॥ २८ ॥
शस्तं कलायखञ्जे च गृध्रस्यामपबाहुके ।
बाधिर्ये कर्णनादे च सर्ववातविकारनुत् ॥ २९ ॥
दण्डापतानके चैव मन्यास्तम्भे विशेषतः ।
हनुस्तम्भे प्रशस्तं स्यात्सूतिकातङ्कनाशनम् ॥ ३० ॥

६६६भैषज्यरत्नावली ।[ वातव्याधि-

त्वच्यं मांसप्रदं चैव शुक्राग्निवलवर्द्धनम् ।
अण्डवृद्धचन्त्रवृद्धिं वा वातरक्तं च नाशयेत् ॥ ३१ ॥

इस तैलको पक्षाघात, अर्दित, हनुग्रह, श्रवणशक्तिका नाश, त्रिदोषजन्य नेत्ररोग, हस्तकम्प, शिरःकम्प, देहकम्प, शिरःपीडा, कलायखञ्ज, गृध्रसी, अपबाहुक, बहरापन, कर्णनाद, दण्डापतानक, विशेषकर मन्यास्तम्भ और हनुस्तम्भ इन सब रोगोंमें सेवन करना । यह तैल सर्वप्रकारके वातरोग, प्रसूतसम्बन्धी सब रोग, अण्डवृद्धि, अन्त्रवृद्धि और वातरक्तरोगको नाश करता है। एवं त्वचाको हितकारी, वीर्य, अग्नि बलकी वृद्धि करता है ॥ २७-३१ ॥

माषतैल १-२ ।

तैलं संकुचितेऽभ्यङ्गे माषसैन्धवसाधितम् ।
बाहुशीर्षगते नस्यं पानं चोत्तरवस्तिकम् ॥
क्वाथोऽत्र माषनिष्पाद्यः सैन्धवं कल्कमेव च ॥ ३२ ॥

१—उड़द और सैन्धेनमकके द्वारा सिद्ध कियेहुए तैलको वायुके द्वारा शरीरमें संकोच होनेपर और बाहुशीर्षगत वातरोगमें मर्दन, नस्य, पान और उत्तरवस्तिद्वारा प्रयोग करनेसे शीघ्र उपकार होता है । इसमें उड़दोंका क्वाथ और सेंधानमकका कल्क लेना चाहिये ॥ ३२ ॥

माषात्मगुप्तातिरसो रुबूकरास्नाशताह्वालवणैः सुपिष्टैः ।
चतुर्गुणे माषबलाकषाये तैलं कृतं हन्ति च पक्षवातम् ॥ ३३ ॥

२—उड़द, कौंचके बीज, मूर्वा, अण्डकी जड, रास्ना, सोया और सेंधानमक इन सबके समान भाग मिश्रित कल्कके साथ उड़द और खिरेंटीके चौगुने क्वाथमें सिद्ध किया हुआ तिलका तैल पक्षवातरोगको नष्ट करता है ॥ ३३ ॥

लघुमाषतैल ।

माषप्रस्थं समावाप्य पचेत्सम्यग्जलाढके ।
पादशेषे रसे तस्मिन् क्षीरं दद्याच्चतुर्गुणम् ॥ ३४ ॥
प्रस्थं च तिलतैलस्य कल्कं दत्त्वाऽक्षसम्मितम् ।
जीवनीयानि यान्यष्टौ शतपुष्पां ससैन्धवाम् ॥ ३५ ॥
रास्नाऽऽत्मगुप्ता मधुकं बला व्योषं त्रिकण्टकम् ।
पक्षाघातेऽर्दिते वाते कर्णशूले च दारुणे ॥ ३६ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६६७

मन्दश्रुतौ चाश्रवणे तिमिरे च त्रिदोषजे ।
हस्तकम्पे शिरःकम्पे विश्वाच्यामपबाहुके ॥ ३७ ॥
शस्तंकलायखञ्जे च पानाभ्यञ्जनवस्तिभिः ।
माषतैलमिदं श्रेष्ठमूर्ध्वजत्रुगदापहम् ॥ ३८ ॥
उत्तम उड़दोंको १ प्रस्थ लेकर एक आढ़क जलमें पकावे । जब पककर चौथाई भाग जल शेष रह जाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उस क्वाथमें दूध ४ प्रस्थ, तिलका तैल १ प्रस्थ एवं जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, ऋद्धि, वृद्धि, सोया, सेंधानमक, रास्ना, कौंचके बीज, मुलहठी, खिरेंटी, त्रिकुटा और गोखुरू इन सब औषधियोंके कल्कको दो दो तोले डालकर विधिपूर्वक उत्तम प्रकारसे तैलको सिद्ध करे । इस तैलको पान, अभ्यञ्जन ( मालिश ) और वस्तिक्रियाद्वारा पक्षाघात, अर्दितवात, दारुण कानकी पीडा, श्रवणशक्तिका ह्रास, बहरापन, त्रिदोष-जन्य नेत्ररोग, हस्तकम्प, शिरःकम्प, विश्वाची, अपबाहुक और कलायखञ्ज इन सब वातरोगोंमें प्रयोग करना चाहिये । यह माषतैल ऊर्ध्वजत्रुरोगको दूर करनेके लिये अत्युत्तम है ॥ ३४-३८ ॥

बृहन्माषतैल ।

माषातसीयवकुरुण्टककण्टकारीगोकण्टटुण्टुकजटाकपि-
कच्छुतोयैः । कार्पासकास्थिशणबीजकुलत्थकोल-
क्वाथेन बस्तपिशितस्य रसेन चापि ॥ ३९ ॥ शुण्ठ्या
समागधिकया शतपुष्पया च सैरण्डमूलसपुनर्नवया
सरण्या । रास्नाबलामृतलताकटुकैर्विपक्वं माषाख्यमेत-
दपबाहुहरं च तैलम् ॥ ४० ॥ अर्द्धाङ्गशोषमपतानक-
माढ्यवातमाक्षेपकं सभुजकम्पशिरःप्रकम्पम् । नस्येन
वस्तिविधिना परिषेचनेन हन्यात्कटीजघनजानुरुजश्च
सर्वाः ॥ ४१ ॥

उड़द, अलसी, जौ, पियाबाँसकी जड, कटेरी, गोखरू, शोनापाठेकी जडकी छाल, बालछड, कौंचके बीज, कपासके बीज ( बिनौले ), सनके बीज, कुलथी और सूखे बेर इन प्रत्येकके क्वाथ और बकरेके मांसरसके साथ सोंठ, पीपल, सोया, अण्डकी जड, पुनर्नवा, प्रसारिणी, रास्ना, खिरेंटी, गिलोय और कुटकी इन औषधियोंके

६६८ भैषज्यरत्नावली । [ वातव्याधि-

समान भाग मिश्रित कल्कके साथ तिलके तैलको यथाविधि पकावै । यह बृहन्मा-
षनामक तैल नस्य, बस्तिक्रिया और मालिशद्वारा प्रयोग करनेसे अपबाहुकवात,
अर्द्धाङ्गशोष, अपतानक, आन्ध्रवात, आक्षेपक वातरोग, बाहुकम्प, शिरःकम्प एवं
कमर, जंघा और जानुगत सर्वप्रकारके रोगोंको निवारण करता है ॥ ३९-४१॥

सप्तप्रस्थमहामाषतैल ।

माषक्वाथे बलाक्वाथे रास्नाया दशमूलजे ।
यवकोलकुलत्थानां छागमांसरसे पृथक् ॥ ४२ ॥
प्रस्थे तैलस्य च प्रस्थं क्षीरं दत्त्वा चतुर्गुणम्।
रास्नात्मगुप्तासिन्धूत्थशताह्वैरण्डमुस्तकैः ॥
जीवनीयबलाव्योषैः पचेदक्षसमैर्भिषक् ॥ ४३ ॥
हस्तकम्पे शिरःकम्पे बाधिर्ये चापबाहुके ।
बाहुशोषे कर्णशूले कर्णनादे च दारुणे ॥ ४४ ॥
विश्वाच्यामर्दिते कौब्ज्ये गृध्रस्यामपतानके ।
वस्त्यभ्यञ्जनपानेषु नावने च प्रयोजयेत् ॥ ४५ ॥
माषतैलमिदं श्रेष्ठमूर्ध्वजत्रुगदापहम् ।
क्वाथप्रस्थाः षडेवात्र विभक्त्यन्तेन दर्शिताः ॥ ४६ ॥

उडदोंका क्वाथ, खिरैंटीका क्वाथ, रास्नाका क्वाथ, दशमूलका क्वाथ एवं जौं
बेर, कुलथी इन तीनोंका मिश्रित क्वाथ और बकरेका मांसरस ये प्रत्येक एक
प्रस्थ लेकर एकत्र मिलालेवे । फिर उसमें तिलका तेल एक प्रस्थ, दूध चार प्रस्थ
एवं रास्ना, कौंचके बीज, सैन्धानमक, सोया, अण्डकी जड, नागरमोथा, जीवक,
ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, मुगवन, मषवन, जीवन्ती, मुलहठी,
खिरैंटी, सोंठ, मिरच और पीपल इन प्रत्येकके कल्कको दो दो तोले डालकर
उत्तम प्रकारसे तैलको पकावे । इस तैलको हस्तकम्प, शिरःकम्प, बधिरता, अपबा-
हुक, बाहुशोष, कर्णशूल, दारुण कर्णनाद, विश्वाची, अर्दित, कुबडापन, गृध्रसी,
अपतानक आदि वातरोगोंमें बस्तिक्रिया, मर्द्दन, पान और नस्यकर्मद्वारा प्रयोग
करनेसे शीघ्र लाभ होता है। यह तेल ऊर्ध्वजत्रुरोगको नाश करनेके लिये अत्यन्त
श्रेष्ठ औषध है । इसमें छः क्वाथ एक एक प्रस्थ लेना । यह बात क्वाथद्रव्यवाचक-
शब्दोंके अन्तमें स्थित विभक्तियों द्वारा मालूम होती है ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६६९

महामाषतैल ।

माषस्यार्द्धाढकं दत्त्वा तुलार्द्धं दशमूलतः ।
पलानि च्छागमांसस्य त्रिंशद्रोणेऽम्भसः पचेत् ॥ ४७ ॥
पूतशीते कषाये च चतुर्थांशावशेषिते ।
प्रस्थं च तिलतैलं च पयो दद्याच्चतुर्गुणम् ॥ ४८ ॥
आत्मगुप्ता रुबूकं च शताह्वा लवणत्रयम् ।
जीवनीयानि मञ्जिष्ठा चव्यचित्रककट्फलम् ॥ ४९ ॥
सव्योषं पिप्पलीमूलं रास्ना मधुकसैन्धवम् ।
देवदार्वमृता कुष्ठं वाजिगन्धा वचा शठी ॥
एतैरक्षसमैर्भागैः साधयेन्मृदुनाऽग्निना ॥ ५० ॥

कपडेकी पोटलीमें बंधेहुए उडद अर्द्धाढक, दशमूल ५० पल और पोटलीमें बँधाहुआ बकरेका मांस ३० पल लेकर इन सबको १ द्रोण जलमें पकावे । पकते पकते जब चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर शीतल होनेपर वस्त्रमें छानलेवे । फिर इस क्वाथमें तिलका तैल १ प्रस्थ, दूध ४ प्रस्थ एवं कौंच, अण्डकी जड, सोया, सेंधानमक, विरियासञ्चरनमक, कालानमक, जीवनीयगणकी दशों ओषधियाँ, मंजीठ, चव्य, चीतेकी जड, कायफल, त्रिकुटा, पीपलामूल, रास्ना, मुलहठी, सैंधानमक, देवदारु, गिलोय, कूठ, असगन्ध, वच और कचूर इन सब ओषधियोंके दो दो तोले कल्कको डालकर मन्दमन्द अग्निके द्वारा तैलको पकावे ॥ ४७–५० ॥

पक्षाघातेऽर्दिते वाते बाधिर्य्ये हनुसंग्रहे ।
कर्णमन्याशिरःशूले तिमिरे च त्रिदोषजे ॥ ५१ ॥
पाणिपादशिरोग्रीवाभ्रमणेमन्दसंक्रमे ।
कलायखञ्जे पाङ्गुल्ये गृध्रस्यामपबाहुके ॥ ५२ ॥
पाने वस्तौ तथाऽभ्यङ्गे नस्ये कर्णाक्षिपूरणे ।
तैलमेतत्प्रशंसन्ति सर्व्ववातरुजापहम् ॥ ५३ ॥

यह तैल—पक्षाघात, अर्दितवात, बधिरता, हनुग्रह, कर्णशूल, मन्यास्तम्भ, शिरःशूल, त्रिदोषज तिमिररोग, हाथ, पाँव, शिर और गर्दनका हिलना, शनैः शनैः चलना, कलायखञ्ज, पंगुता, गृध्रसीवात और अपबाहुक आदि वातरोगोंमें अत्यन्त प्रशंसनीय