भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 540, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंआये दिन दुखी होकर मेरी ज़िन्दगी किस तरह गुज़र रही है। तालीमयाफ़्ता मध्यम
वर्ग के लोग ख़ाक इसका अन्दाज़ा लगा सकेंगे।
हम तो साफ़ कहते हैं कि किसानों की कांग्रेस के प्रस्ताव इस कांग्रेस से
बिल्कुल अलग और नये ढंग के हैं और उनकी माँगें भी दूसरे ही ढंग की होंगी।
शैक्षणिक लहरें
राजनीतिक लहरों में देश ने बहुत-सी कुर्बानियाँ दीं। दर्जनों बहुमूल्य जानें इसमें लग
गयीं। लेकिन शैक्षणिक लहरों के लिए तो हमारी बहुत-सी ताक़त ख़र्च हुई और
बहुत से नेक मर्द और औरतों की ज़िन्दगियाँ इनके लिए वक्फ़ हो गयीं। लेकिन
परिणाम यहाँ भी निराशा भरा हो गया है, क्योंकि इससे भी मध्यम वर्ग को ही कुछ
लाभ पहुँच सका है। हमारे बहुत-से नेताओं ने शहरों में अलग-अलग क़ौमों,
बिरादरियों और सभाओं की ओर से स्कूल-कॉलेज खोल दिये, लेकिन क्या हम
पूछ सकते हैं कि उन देशभक्तों के दिलों में स्कूल-कॉलेज खोलने का ख़याल
किस तरह पैदा हुआ? और क्यों उन्होंने अपने इस बड़े काम को गाँवों में नहीं किया,
जिससे ख़र्च तो कम होता और लाभ अधिक पहुँचता। उन्होंने वकील और दफ़्तरों
के लिए क्लर्क पैदा करना ही अपना मन्तव्य क्यों बना लिया है और फिर हिन्दू
और मुसलमान अलग-अलग अपनी-अपनी यूनिवर्सिटियाँ क्यों क़ायम कर रहे हैं?
हम तो यह समझते हैं कि यह लोग भी वर्ग-रुचि के साये के नीचे ही अपना काम
करते हैं। दृष्टान्त पंजाब के आर्य समाज का ही ले लें।
वे (स्वामी दयानन्द की यादगार) एक ऐसे कॉलेज से क्या चाहते हैं जोकि
पंजाब की सरकारी यूनिवर्सिटी के साथ मिलने वाला हो? कितना अँधेर है। कहाँ
स्वामी दयानन्द का आदर्श, कहाँ सरकारी यूनिवर्सिटी और इसके कॉलेज! लेकिन
आखिर यह हुआ क्यों? इसकी वजह साफ़ है। इसके उपासकों में अधिकतर वकील
और ग्रेजुएट आदि मध्यम वर्ग के लोग ही थे। यदि कहीं संस्कृत पढ़े पण्डितों के
सामने स्वामी दयानन्द की यादगार स्थापित करने का सवाल आता तो वह बिल्कुल
अलग चीज़ क़ायम करते। यदि उनके (स्वामी दयानन्द के) पुरातन उपासकों में
किसानों की बहुसंख्या होती तो उन लोगों में ही कॉलेज क़ायम किया होता। इनके
ख़याल में किसी अन्य प्रकार की यादगार ही अच्छी और लाभदायक होती। समाज
के शैक्षणिक अड्डे केवल इसीलिए क़ायम हुए कि मध्यम दर्जे के लोगों के
बाल-बच्चे अच्छी तरह कमा सकें। यही वर्ग-रुचि काम कर रही है। दक्षिण के
देशभक्तों ने शिक्षा के लिए बहुत कुर्बानियाँ कीं, लेकिन किनकी शिक्षा के लिए?
फरगूसन कॉलेज ने मध्यम वर्ग के हज़ारों नौजवानों को शिक्षा दी। रोजी कमाने और
उन्नति करने योग्य बनाया, लेकिन किसानों के लिए इसने क्या किया? इस कॉलेज
में से जितने वकील और प्रोफ़ेसर निकलते हैं, वे बेचारे किसानों के सिरों पर यूँ
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