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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 538, कुल 788 में से

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पृष्ठ 538

जाने से ही किसानों और मज़दूरों को शिक्षा, ख़ुराक और रिहायश की तो बात ही
क्या, ज़रुरी चीजें भी नसीब नहीं होंगी। ग़रीब किसानों को इस बात से क्या
मतलब कि उनकी कमाई का ख़ासा बड़ा हिस्सा टैक्स आदि के रूप में
लूट-पाटकर ले जाने वालों में से कितने हिन्दुस्तानी हैं और कितने दूसरे?
माल-असबाब में से मुहम्मदुल्ला या स्वामी को भी हिस्सा मिलता है जोकि इसी
देश के हैं। फिर कांग्रेस ने कभी यह भी माँग की है कि देशी सरकारी नौकरों
की तनख्वाह घटा दी जाये और किसानों का टैक्स कम कर दिया जाये? कांग्रेस
ने सरकारी अफसरों की तनख्वाह कम करवाकर ग़रीब किसानों का भार कम
करने की कभी कोशिश की है? फिर आम जनता को इन आन्दोलनों और माँगों
से क्या मतलब?
असल में ऐसी (आन्दोलनकारी) लहरें तो मध्यम दर्जे के लोगों के दिमाग़ में
से ही निकल सकती थीं, क्योंकि वह लोग अपने बच्चों के लिए अच्छी से अच्छी
आसामी चाहते हैं। वकीलों की आँखें सदा जज की पदवी को तरसती रहती हैं,
ग्रेजुएट लोग सूबों की सरकारों में अच्छी-अच्छी आसामियों को देख-देखकर
ललचाते रहते हैं। क्योंकि यह मध्यम वर्ग के लोगों की माँगें हैं, इसलिए उन्होंने
मध्यम वर्ग के लोगों को ही मुल्क और क़ौम समझना आरम्भ कर दिया है।
कांग्रेस वाले अक्सर चीख़ा करते हैं कि पंजाब कौंसिल और असेम्बली में
हिन्दुस्तानियों की गिनती बढ़नी चाहिए। इससे भी आम हिन्दुस्तानियों को क्या लाभ
हो सकता है? कौंसिलों के लिए कौन चुने जाते हैं? क्या वे लोग अपनी सेवाओं
का इनाम नहीं लेते? क्या वे लोग इसमें अपनी इज़्ज़त और फ़ख़्र नहीं समझते? क्या
आनरेबल कहने से लोग किसी को 'शहीद' कहने लगते हैं? क्या सदस्यता के लिए
चुने जाना सख़्त मुसीबत की ज़िन्दगी गुज़ारना है या इससे बिल्कुल विपरीत? यह
सवाल ज़रूर पूछे जाने चाहिए और जवाब भी मिलने चाहिए।
कौंसिल के असली फ़ायदों का सवाल एक तरफ़ छोड़कर भी अगर देखें तो
नज़र आयेगा कि यह ख़याल केवल उस जमात के दिमाग़ में पैदा हो सकता है
जिसे इससे कोई लाभ पहुँचने की आशा हो। कौंसिल के लिए कुछेक और वकील
एवं साहूकार चुने जाने से करोड़ों मेहनतकश लोगों की जमात में क्या फ़र्क़ पड़
सकता है? क्या इन लोगों के टैक्स कम कर दिये जायेंगे? क्या उन लोगों के पुराने
ख़तरे – बेगार, पुलिस या तहसीलदार, अकाल या प्लेग दूर हो जायेंगे? क्या उन
लोगों के लिए गाँवों में साफ़ पानी पहुँचाने का बन्दोबस्त किया जायेगा? क्या गाँवों
में स्कूल और लाइब्रेरी खोल दी जायेंगी। कुछ हिन्दुस्तानियों के कौंसिल में चले
जाने के साथ तो हम उपरोक्त बातों में कोई जमा-घटा नहीं देखते। हाँ, कुछेक
तालीम वाले लोग इससे रुपया ज़रूर कमा सकेंगे और कुछ उनकी इज़्ज़त भी बढ़ेगी
और वह बड़े रोब के साथ इधर-उधर फिर सकेंगे और ये अँधेर ढाने वाले लोग
532 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़