भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 534, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंऔर कपड़ा पहनते हैं, तब इसका केवल यही अर्थ है कि वे अपना हिस्सा ग़रीब
मेहनतकशों की मेहनत में से ले लेते हैं जोकि रोटी पैदा करते हैं, कपड़े तैयार करते
हैं। लेकिन जब हम देखते हैं कि खेती करने वाले उस मेहनतकश किसान को इन
मुफ़्तख़ोर लोगों की तरह अच्छी ख़ुराक भी नहीं मिलती, तो दिल में ख़याल आता
है कि इस व्यवस्था में ज़रूर कहीं न कहीं धोखा है, ग़लती है, ज़ुल्म है। लेकिन
यह मसला ‘सर्व दर्शन संग्रह’ आदि शास्त्रों की सोलह प्रकार की फ़िलासफ़ी पढ़ने
से हल नहीं हो सकता। सेहत और ज़िन्दगी के सवाल को छोड़कर आज हम एक
बहुत बड़ा सवाल पूछना चाहते हैं कि दुनिया में यह जो दो पार्टियाँ हैं – एक ओर
अमीर, विद्वान, सुस्त और हरामख़ोर; दूसरी तरफ़ ग़रीब, मेहनतकश, जाहिल अनपढ़
लोग जोकि दुनिया की दौलत पैदा करते हैं, तो यह दूसरा पक्ष किस तरह अस्तित्व
में आया? दुनिया के तमाम आन्दोलन जो इस सच्चे सवाल को ओझल करते हैं,
केवल बेहूदा, फ़िज़ूल और ख़तरनाक हैं – फिर वह भले ही मजलिसी हों, भले
ही मज़हबी हों या भाईचारे वाले, आर्थिक हों या राजनीतिक, राष्ट्रीय हो या
अन्तरराष्ट्रीय।
अगर इन पार्टियों को मिला दिया जाये तो दुनिया में कोई ऐसी चीज़, जिसको
कि एक भगवान के बन्दे या क़ौम या मज़हब कहा जाता है, बाक़ी नहीं रह जाती,
क्योंकि सदा ही कभी आँखों के सामने और कभी आँखों से ओझल, अमीर ग़रीबों
के दुश्मन ही बने रहते हैं। क्योंकि वे अपनी दौलत इन ग़रीबों से ही छीनते हैं,
उनको यह आसमानी तोहफ़े की तरह नहीं मिलती और न उनके पास (पारस)
पत्थर है। राजा, वज़ीर और जज लोग सुख से जीवन गुज़ारते हैं, हालाँकि पैदावार
में वह किसी प्रकार की मेहनत नहीं करते, क्योंकि बेचारा किसान सदा टैक्स देता
रहता है। ज़मींदार ख़ाली बैठकर ऐशो-आराम और बदमाशियाँ करता है, क्योंकि
बेचारा ग़रीब खेत-मज़दूर लगान अदा करता रहता है। साहूकार या महाजन आराम
से बैठा हुआ अमीर होता चला जाता है, क्योंकि ऋण का देनदार हमेशा ब्याज देता
रहता है और एक सरमायेदार कारख़ाने के हिस्से ख़रीदकर घर बैठे ही मुनाफ़ा प्राप्त
करके मालामाल हो सकता है, क्योंकि मज़दूरों को मज़दूरी कम दी जाती है। वकील
सैकड़ों रुपये महीना कमा सकता है, हालाँकि वह एक आराम कुर्सी पर बैठा रहता
है और कभी-कभी किसी अदालत में जाकर भाषण झाड़ आता है, क्योंकि वह
अमीरों को जायदाद प्राप्त करने और ग़रीबों से लूटने में सहायता करता है। बात यह
है कि जहाँ कहीं भी यह दिखायी दे कि कोई आदमी बिना हाथ-पैर हिलाये आराम
की ज़िन्दगी भोग रहा है तो फ़ौरन समझ लो कि यहाँ ज़रूर कोई न कोई धोखा
है, फ़रेब है। उसके साफ़ अर्थ यह होते हैं कि अमीर तबका कभी भी यह नहीं
चाहता कि ग़रीब लोग भी उन्नति कर लें, क्योंकि ग़रीबों की उन्नति और विद्या
में बढ़ोत्तरी से तो, हरामख़ोरी फ़ौरन पंख लगाकर उड़ जायेगी। जो कोई टैक्स न दे
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