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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 535, कुल 788 में से

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पृष्ठ 535

तो यह राजे-महाराजे, जज-वकील आदि किस तरह जीवित रह सकते हैं? अगर
मज़दूरों को लूटा न जाये तो कारख़ानों के मालिक और मैनेजर किस तरह करोड़पति
बन सकते हैं? संस्कृत का कथन है कि ‘खानेवाले और खाये जानेवाले में कभी
दोस्ती नहीं हो सकती।’ शेर-बकरी के इकट्ठा लौटने पर एक मसखरा शायर
कहता है, ‘लौटेंगे तो दोनों बेशक इकट्ठा ही, लेकिन उस समय बकरी शेर के
पेट में होगी!’
अमीर वर्ग की हरामखोरी में देशभक्ति और मज़हब आदि भी कोई खास रोल
अदा नहीं कर सकते। क्या कभी कोई मुसलमान ज़मींदार अपने खेत-मज़दूरों का
लगान इसलिए माफ़ कर देता है कि वे मुसलमान हैं? क्यों जी, कभी कोई हिन्दू
साहूकार अपने हिन्दू ऋणदाता से ब्याज लेना इसलिए छोड़ देता है कि वह हिन्दू
है? क्या सिख राजे-महाराजे, वजीर, अमीर, अपनी सिख रियासतों के सिख
किसानों और मज़दूरों से टैक्स और लगान कम वसूल करते हैं? क्या इस लगान
व टैक्स की वसूली के लिए वह कम ज़ुल्म करते हैं? क्या अंग्रेज़ मालिक अपने
अंग्रेज़ मज़दूरों की तनख्वाहें तब बढ़ा देते हैं जब तक कि वे उनकी नाक में दम
नहीं कर देते? क्या स्काटलैण्ड के ज़मींदारों ने अपने जंगल और मैदान ग़रीबों में
बाँटकर उनको अमेरिका जाने से रोकने की कोशिश की है?
पिछले इतिहास से यदि कोई शिक्षा मिलती है तो वह यह कि अमीर वर्ग को
दौलत ही सबसे अधिक प्यारी चीज़ है। उनको मज़हब और देशभक्ति से ज़्यादा
जायदाद और व्यक्तिगत स्वार्थों से प्रेम है। देशभक्ति और मज़हब अच्छी चीज़ें हैं
लेकिन वह भी अमीर वर्ग को दौलत की चेटक से आज़ाद कराने में निष्फल
साबित हुई हैं। दुनिया में आज तक ऐसा ही होता चला आया है और जब तक
बड़े-छोटे अमीर तबके ही ख़त्म नहीं हो जाते तब तक ऐसा ही होता चला जायेगा।
महात्मा बुद्ध, महात्मा टालस्टाय और शहजादा क्रोपोटकिन जैसे महापुरुष अपनी
जायदाद छोड़कर ग़रीबों जैसी ज़िन्दगी बसर करने लगे थे, लेकिन इन एक-दो
दृष्टान्तों से उसूल नहीं बदला जा सकता। यह हस्तियाँ तो सम्माननीय हैं, लेकिन
बाक़ी अमीर वर्ग तो बेईमानी और धोखेबाज़ी – हर प्रकार से अपनी जायदाद की
सुरक्षा करता है।
दूसरों के सिर पर मौज़ करने वाली यह जमात जो भी काम करती है तो केवल
अपने लाभ के लिए ही करती है। वह किसी भी तरह दूसरों का कुछ नहीं सँवार
सकती, क्योंकि दुनिया में दोनों ही क़ौमें मौजूद हैं – अमीर और ग़रीब। इनमें कोई
प्यार और हमदर्दी नहीं है। वह तो एक-दूसरे के पक्ष के विचार समझने में भी
असमर्थ हैं। साधारण लोग तो कम समझी की वजह से दूसरों के ख़याल और काम
के बारे में नहीं समझ सकते और समझदार लोगों को जमाती बँटवारा दूसरों को
समझने से वंचित रखता है। इससे हम देखते हैं कि जमाती बँटवारे के अलावा
परिशिष्ट / 529